प्यार के इस प्रेमिल दिन.....

प्यार के इस प्रेमिल दिन- प्यार का संदेश
(प्यार के इस प्रेमिल दिन- उन्हें याद करते हुए जिनसे है उम्मीद जीवन की हरियल)
                                        ● सतीश छिम्पा

   मैंने जब उन्हें बताया कि मेरी सबसे प्रिय कहानियों में 'इकतालिसवां' के बाद इज़ाबेला अलेंदे की कहानी 'मेंढक का मुँह' है। और बातचीत के दौरान ही उन्हें इसी कहानी का यह अंश जो मेरा पसंदीदा है कि -"प्यार के अभाव में वे इतने दरिद्र हो गए थे कि वे अपनी भेड़ों, यहां तक कि तट पर पकड़ ली गई सील मछलियों को भी गले लगाकर उनके साथ सो जाते थे, हालाँकि रसोइया उनके खाने में शोरा छिड़कता था ताकि उनका जिस्मानी उत्ताप और उनमें स्मृति की आग ठंडी हो जाए। सील मछलियों के बड़े स्तन उन्हें दूध पिलाने वाली माँ की याद दिलाते और यदि वे जीवित, गर्म और धड़कती सील मछली की खाल उतार लेते तो प्रेम से वंचित व्यक्ति अपनी आँखें बंद करके ऐसी कल्पना कर सकता था कि उसने किसी जलपरी को आगोश में ले लिया हो।"  सुनाया और हर्षित होते हुए बताया कि 'इज़ाबेला' चिली के पहले लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए मार्क्सवादी राष्ट्रपति अलेंदे की भतीजी हैं जिन्हें अमरीका की सीआईए ने पदच्युत करके शहीद कर दिया था।'- तब उनका कहना था कि 'मैं हमेशा विदेशी लेखकों के ही हवाले क्यों देता हूँ ?'- दरअसल यह उनका प्रश्न नहीं बल्कि खीज थी क्योंकि इस बात में कोई भी सच्चाई नहीं है। मैं तो जो रचना मुझे पसंद आती है- उसके नोट्स ले लेता हूँ। समय आने पर उन पर बात भी करता हूँ। दरअसल उनकी समस्या यह नहीं थी बल्कि अपने फ़ासीवादी अमानवीय रूप को छिपाने के लिए और बौद्धिक हलकों में नाम चमकाने की गरज से जो 'मध्यमार्गी' बीमार नकाब उन्होंने लगा रखा था- उसको मैंने खींचकर उतार दिया था। जिसका पता तब लगा जब 'वेलेंटाइंस डे' तो पाश्चात्य अश्लीलता का परिचायक है'- जैसा धुर दक्षिणपंथी मंत्र मेरे कानों में गूंजा।
  
        जब उसने कहा कि प्यार के दिन की उसको दरकार नहीं, प्यार हर दिन होता है। उसकी सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा है प्यार- जो कहीं भी, कभी भी हो सकता है। उसका कहना था कि प्रेम किया था मीरा ने- चॉकलेट, टेडी बियर देने की बुरी परम्परा की शुरुआत तो नहीं की थी- जबकि उनका प्रेम महान था। मैं हैरान नही हो पाया। आजकल के इस फासिस्ट समय मे हैरानी दुर्लभ हो गई है मेरे लिए- इन मसलों में कुछ ज्यादा ही- वो भी तब जब  इस समूची धरती के मानव इतिहास में घृणा का पहला बीज रोपने वाले प्रेम की बात करते हैं। वे जब बात करते हैं तब 'मीरा को उसको रियासतकालीन सामंतवादी घनघोर स्त्रीविरोधी व्यवस्था के पहले मुखर विद्रोह का दर्जा नहीं दिया जाता। अगर ऐसा होता तो राणा सांगा की केवल युद्धोन्माद और तद्जनित वीरता के किस्सों पर लहालोट नहीं होते- उनकी सामाजिक सांस्कृतिक नीतियों और कामों का ऐतिहासिक अन्वेषण करते। मगर यह मध्यमवर्गीय सोच है जो हावी रहती है। यहां गलत का विरोध निज से जोड़ दिया जाता है। इसलिए मैंने ज्यादा बात ना करते हुए 'प्यार के इस प्रेमिल दिन पर प्यार का संदेश उन्हें दे दिया.....'
दुनिया के सभी आशिकों, सभी माशूकाओं को 'प्यार के इस प्रेमिल दिन पर बहुत सारा प्यार.....

प्यार के इस विशेष दिन उन सभी को 
जो हमारे 'ऐतिहासिक अपसांस्कृतिक अनैतिक अवमूल्यों' की भेंट चढ़कर 'त्याज्य' हुए 
जो 'इस देश की सभ्यता की प्राचीनता के मिथ्या दंभ के शिकार हुए
जो 'सभ्यता की असभ्य अपसांस्कृतिक प्राचीनता के घमंड में 'प्रबोधन की महिमा भूल गए'
जो 'तथाकथित पुरातनता के अपसांस्कृतिक अवमूल्यों के वश होकर श्रम संस्कृति को अछूत घोषित कर चुके हैं- उन्हें भी मेरी तरफ से बहुत सारा प्यार

उन सभी लड़कियों और स्त्रियों को जो यहां की 'व्यवस्था' द्वारा देह व्यापार में धकेल दी गई 
और हमारी शीलवान संस्कृति के 'शील' के लिए जो 'वेश्या' के अलंकार से अलंकृत की जाती है से प्यार करना इसके सामाजिक शील के लिए सबसे बड़ा अश्लील ख़तरा है- 
उन सभी लड़कियों और महिलाओं को 
जिनके लिए हमारी अस्मिता और शुचितावादी कपटी और अमानवीय सामाजिक व्यवस्था के शब्दकोश में 
कुछ स्थाई शब्द दर्ज किए हुए हैं 
सदियों से- 
मसलन 'रांड, रंडी, वेश्या, टैक्सी, माल, असलाह.....

उन सबको प्यार के इस प्रेमिल दिन पर मेरी तरफ़ से बहुत सारा प्यार

धरती के उन सभी निर्वीर्य मनुष्यों को प्यार 
जो मानव रूप में पैदा होकर भी 
इस तथाकथित पुरातनता के घमंड में 
छिद्दी हुई  अपसांस्कृतिक अनैतिकता के 'लिंगजीवी' व्यवहार के शिकार होकर 
भटकते हैं दर- दर..... 
और तिस पर भी 
इस सभ्यता के नैतिकशास्त्र में लिखा है कहीं पर कि 'मानव महान है- मानव ईश्वरीय अंश रूप है और वंदनीय है....'
इस धरती की 
उन सभी बलात्कृत लड़कियों, स्त्रियों 
और नन्हीं बच्चियों को बहुत सा प्यार और स्नेह
जो इस पुरातन 
'लिंगधारी' सभ्यता की जातीय महानताओं की शिकार हुई 
इस धरती के 
उन अबोध बालकों को बहुत स्नेह 
जो बड़े- बूढ़ों के 'कुकर्म/दुष्कर्म' के शिकार होकर भी सुनते हैं हर रोज 
'हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति का कर्णकटु गीत 
और पाश्चात्य सभ्यता और खुलेपन का मर्सिया'

उन सबको प्यार के इस प्रेमिल दिन पर मेरी तरफ़ से बहुत सारा प्यार

वे सभी लोग जो कहते हैं कि 
प्रेम का नहीं होता कोई एक विशेष दिन 
और उत्सवधर्मिता का नाम देकर जो अनजाने में ही अपने इस 'विरोधी मानवीय महान मूल्य' को 
अतिरिक्त महानता के साथ स्थापित करते हैं- 
उन घृणा जीवियों 
उन सभी अतीत जीवियों
उन आयूध जीवियों
उन मिथक जीवियों
उन सभी रूढ़ी जीवियों
उन सभी कुतर्क जीवियों..... 
मतलब नफ़रतों का बीज बोने और फसल तैयार करने वाले उन सभी 'अक्ल के अंधों' को 
प्यार के इस प्रेमिल दिन पर मेरी तरफ़ से बहुत सारा प्यार


प्यार के बहुत प्यारे और प्रेमिल 
और ऐतिहासिक और इस सुंदर दिन  
आज मैं याद कर रहा हूँ 
इस धरती की उन सबसे सुंदर निर्मितियों को
जिनकी सुंदरता का मापक 
उनका रंग, रूप, शक्ल और नयन नक्श
और देह और देह का नमक नहीं 
बल्कि दोपाया लाशों की भारी संख्या में 
जबकि जीवित होने का मतलब ज़ोंबी में बदल जाना है
उनका असंक्रमित होना 
और जीवन की सुंदरता के साथ जीवित होना 
और जुल्म के विरुद्ध आवाज़ उठाना है

मैं याद करता हूँ और उनके भावों को सोचते हुए करता हूँ सबका अभिवादन
पिछले वर्षों में प्रतिरोध के इतिहास में अमर हुई उन तमाम लड़कियों और महिलाओं का गरिमामय क्रांतिकारी अभिवादन जो न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में 
किसी न किसी बात को लेकर अन्याय से भिड़ गई
मैं याद करता हूँ 
उनके चेहरों के हावभाव 
और क्रांतिकारी अभिवादन करता हूँ :- 
जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की उन तमाम लड़कियों का जो तंत्र की नई साजिश रूप में आए नए सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA 2019) को लेकर जो निडर, निधड़क और ईमानदार प्रतिरोध में
राजसत्ता से भिड़ गई थी

 एक बड़ा प्रतिरोधी आंदोलन जो इन संस्थानों से शुरू हुआ और जो पूरे देश में फैल गया। इस प्रतिरोध में शामिल हर एक धर्म, जाति, नस्ल और वर्ण की सभी लड़कियों को और जेएनयू और जामिया की तरह ही दुनियाभर में अपने हक की लड़ाई के लिए निडरता से व्यवस्था से भिड़ने वाली बहादुर लड़कियां 
जो हिरावल दस्ते में नज़र आई- 
उन सब लड़कियों को 'कॉमरेडाना सलाम, स्नेह 
और प्यार के इस प्रेमिल दिन पर 
युवा मगर ज़िंदा पीढ़ियों की तरफ़ से बहुत सारा प्यार

देश के फासिस्ट निज़ाम के साथ 
निडर होकर टक्कर लेने वाली बहादुर लड़कियों
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लूट तंत्र से 
बेख़ौफ़ भिड़ने वाली योद्धाओं
तुम सबके कारण ही पुख़्ता हुई है 
महान मुक्ति की उम्मीदें
तुम सबको इंकलाबी सलाम

सलाम तुम्हे साथियों....

आयशा रैना (जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी)
महिंदर कौर (समकालीन किसान आंदोलन)
इब्रू तिमतिक (तुर्की)
हेलिन बोलेक (तुर्की)
अबिलिया करुटास्तो (चिली)
अलाह सलाह (सुडान)
ओल्गा मिसिक (रशिया)
लाम का लो (हॉन्ग कॉन्ग)

तुम सब जहां भी, जिस भी धरती पर हो
यह धरती ऋणी है 
धरती की उम्मीदें बचाए रखने के लिए
तुम्हारी निडर, निष्कपट बहादुरी को सलाम......
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 भले ही फासिस्ट तंत्र के मायावी नागरिकता बिल का मामला हो या विश्व पूंजीवाद का कोई षड्यंत्र या तुर्किश सत्ता का साम्राज्यवादी रुख हो या मानवाधिकार के हनन की बात हो या पर्यावरण को लेकर समर हो या फिर शिक्षा को लेकर या फिर भारतीय फासिस्टों के अभिन्न मित्र इजराइली जीयनवादियों के विरुद्ध फिलिस्तीनी लड़कियां और स्त्रियां हो या विक्टर जारा के विद्रोही गीत गाती और चे ग्वेरा ज़िंदाबाद के नारे लगाती चिली की छात्राएं हो.... वे सब लडकिया और महिलाएं जो दुनिया भर की प्रताड़ित, शोषित और दबी कुचली जनता की आवाज़ और उम्मीद बनकर छा गई।
 

आयशा रैना (जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी)

1.आयशा रैना (जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी)

         सबसे पहले मुक्तिकामी प्रतिरोधन की उजास भरी शक्ति की मिसाल कायम करने वाली और दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया की लड़ाई में कूदने वाली लड़कियां सामने आईं। पूर्वोत्तर की सेवन सिस्टर (सात राज्य) से लेकर दिल्ली तक हर जगह ये विरोध हुए। जामिया मिलिया इस्लामिया में दिल्ली पुलिस लाठीचार्ज के समय जिस तरह से दो महिलाओं ने आगे आकर अपने साथी को बचाया वो जामिया के प्रोटेस्ट का आइडियल शील्ड फेस  बन गया। पुलिस ने आंसू गैस का भी इस्तेमाल किया और वाटर कैनन और दिल्ली पुलिस पर ये आरोप है कि छात्रों पर गोलियां भी चालाई गईं। एक तस्वीर में तीन लड़कियां किसी ऊंचाई पर चढ़कर 'मुक्तिकामी नारों की पवित्र गर्जना के साथ नारेबाज़ी' करती दिखीं। ये सब कुछ सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल के कारण हुआ था जो इस देश के फ़ासीवादी निज़ाम की अल्पसंख्यकों को अलग- थलग करने की अमानवीय असफल कोशिश थी। 
       बिल के मुताबिक अल्पसंख्क, हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी, ईसाई जो अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान के 2015 के पहले आए हैं उन्हें फास्ट ट्रैक सिटिजनशिप दी जाएगी। मुसलमानों को भारत की सिटिजनशिप नहीं दी जाएगी। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार वो भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक नहीं हैं। जो लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं उनका कहना है कि ये नया बिल सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को अलग करने की कोशिश कर रहा है और ये एक सेक्युलर देश के लिए अच्छा नहीं है। पूरे देश के इंसाफ़ पसंद लोगों ने इसका जोरदार प्रतिरोध किया था। इसी प्रोटेस्ट में जामिया की उस स्टूडेंट की तस्वीर भी सामने आई थी जो निडरता से अपने साथी को बचाने के लिए पुलिस के सामने डटकर खड़ी हो गई थी। इस बहादुर लड़की का नाम आयशा रैना है। आयशा रैना जो लोगों के लिए ईमानदार और निडर प्रतिरोध की मिसाल बनकर उभरी और इतना ही नहीं आयशा ने सभी छात्र नोजवानो को अपनी आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित भी किया था। आयशा के लिए इस हिम्मत की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पुलिस ने छात्रों के प्रदर्शन पर आंसू गैस, बुलेट और वाटर कैनन और लाठियों से हमला किया था और कुछ छात्र घायल हो गए थे। आयशा के अनुसार वो लोग घर में घुसे थे ताकि अपने घायल छात्रों को पुलिस से बचा सकें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और पुलिस पीछे से आ गई। हमने पहले पेड़ के पीछे छुपने की कोशिश की, लेकिन तब तक लाडिडा जो अस्थमा की मरीज है उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी तभी वो पास के इसी एक घर पर गए जहां उन्हें लगा कि पुलिस उनका पीछा नहीं करेगी। आयशा ने इसी दौरान अपनी हिम्मत की मिसाल दी। 

  भारत मे उठी इस फ़ासीवादी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की लोक लहर जिसके हिरावल में लड़कियां थी ने इस देश के प्रतिरोधन के इतिहास को बदलकर रख दिया।

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2. महिंदर कौर :-

  पिचासी साल की महिंदर कौर पंजाब के बठिंडा जिले के गांव बहादुरगढ़ जंडिया की रहने वाली हैं। कंगना राणावत ने इन्हीं दादी को लेकर एक विवादास्पद ट्वीट किया था। उसने 100 रुपये लेकर बुजुर्ग महिला को आंदोलन में शामिल होने वाली महिला की टिप्पणी की थी। इस मामले में कंगना रणौत को पंजाब समेत पूरे देश में विरोध का सामना करना पड़ा था। 


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 3. इब्रू तिमतिक :-

   तुर्की की फासीवाद विरोधी मानवाधिकार कम्युनिष्ट कार्यकर्ता इब्रू तिमतिक जो साम्राज्यवादी षड्यंत्रों के विरुद्ध भूख हड़ताल के 238 वें दिन शहीद हुई- ये सब क्रांतिचेताओं का तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यब एरडोगन के विरुद्ध प्रतिरोध कर रहे थे। उन्हें तुर्की के NATO (नाटो) के सदस्य होने को लेकर अन्य मानवद्रोही फासिस्ट गतिविधियों से सख़्त एतराज था। और वे सब निडरता से प्रतिरोध में आ डटे


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4.. अबिलिया करुटास्तो (चिली)

       पिछले साल चिली की राजसत्ता की जनद्रोही नीतियों के ख़िलाफ़ जो विशाल छात्र प्रतिरोध हुआ- उसमे चिली के शहीद विद्रोही गीतकार विक्टर ज़ारा के गीतों और विद्रोह के प्रतीक गिटार के साथ सबसे पहले मैदान में उतरी इक्कीस वर्षी युवा लड़की।

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5. हेलिन बोलेक
     
 हेलिन बोलेक और इब्राहिम गोकसेक जो कि तुर्की के प्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय कम्युनिष्ट कल्चरल म्यूज़िक बैंड या ग्रुप योरुम (Yorum) के सदस्य थे जिन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था और तुर्की की फासीवाद विरोधी मानवाधिकार कम्युनिष्ट कार्यकर्ता इब्रू तिमतिक जो भूख हड़ताल के 238 वें दिन शहीद हुई- ये सब क्रांतिचेताओं का तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यब एरडोगन के विरुद्ध प्रतिरोध कर रहे थे। उन्हें तुर्की के NATO (नाटो) के सदस्य होने को लेकर अन्य मानवद्रोही फासिस्ट गतिविधियों से सख़्त एतराज था। और वे सब निडरता से प्रतिरोध में आ डटे

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6. अलाह सलाह, सुडान 

दिसंबर का प्रोटेस्ट तो आपने देख लिया अब एक बार अप्रैल का प्रोटेस्ट भी देख लेते हैं। कट्टर सुडान में एक महिला वहां के आंदोलन का चेहरा बन गई। सुडान के डिक्टेटर ओमार अल बशहीर का तख्तापलट करने के लिए विरोध प्रदर्शन चल रहा था जहां 22 साल की आर्किटेक्चर स्टूडेंट अलाह सलाह ने अपनी आवाज़ उठाई। उन्हें इस आंदोलन का चेहरा माना गया और दुनिया की प्रभावशाली विद्रोह करने वाली महिलाओं में वो शामिल हो गईं। उनकी फोटो बहुत ज्यादा शेयर की गई और कई युवा महिलाओं ने उनका साथ दिया। ये वो चेहरा था जो आगे बढ़ा। 


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7. ओल्गा मिसिक, रशिया

    ओल्गा मिसिक जो 17 साल की ही है। इसकी तस्वीर और वीडियो जुलाई में वायरल हुआ था जिसमे ओल्गा पुलिस के सामने सड़क पर बैठकर रशिया का संविधान पढ़ रही थीं। वो रशिया में फ्री इलेक्शन की मांग कर रही थीं और राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रही थीं। 
 
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8. लाम का लो, हॉन्ग कॉन्ग

    जब हॉन्ग कॉन्ग के कई हिस्सों में चीन के विवादित बिल को लेकर प्रोटेस्ट शुरू हुआ तो 26 साल की एक लड़की का फोटो वायरल हुआ जो शांति से मेडिटेशन के पोज़ में बैठी हुई थी। ये हॉन्ग कॉन्ग के बेहतरीन कल्चर को दिखाने वाली तस्वीर बन गई और लाम असल में इस विरोध प्रदर्शन का नया रूप दिखाने वाली महिला बन गईं।


(विशेष :- इस लिखत में आए हुए कुछ प्रतिरोधी महिलाओं के नाम और जानकारी साभार इंटरनेट से ली गई है।)

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