बहुत जरूरी किताबें

किताबें जो है बहुत जरूरी.......

                           ● सतीश छिम्पा 

 (अक्टूबर क्रांति और बाद की राजनीतिक हलचल.. के बारे में जानने के लिए ये दो किताबें जरूरी है लेकिन तीसरी किताब 'ख्रुश्चेव झूठा था' सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि ख्रुश्चेव के स्तालिन के बारे में फैलाए गए झूठ को तर्क सहित खरिज करती है।   किताबें-  खासकर दार्शनिक राजनीतिक रूप पढ़ने के लिए किताबों का चयन बहुत गंभीर और जोखिम भरा होता है। सावधानी जरूरी है। )
                                            

   (जॉन रीड)

.१) दस दिन जब दुनियां हिल उठी"
.२) अक्टूबर क्रांति और लेनिन
.३) ख्रुश्चेव झूठा था।

           जॉन रीड की "दस दिन जब दुनियां हिल उठी" और एल्बर्ट रीस विलियम्स की "अक्टूबर क्रान्ति और लेनिन" हमारे लिए जरूरी दस्तावेज हैं, लेकिन साथ ही ग्रोवर फर की 'ख्रुश्चेव झूठा था' सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि ख्रुश्चेव के स्तालिन के बारे में फैलाए गए झूठ को तर्क सहित खरिज करती है। लेनिन के नेतृत्व में हुई अक्टूबर क्रांति ने पहली बार सारी दुनिया को निर्माता उत्पादक वर्ग की वर्गीय एकजुटता और मानवीय गरिमामय जीवन को सही अर्थों में सिखाया था।   महान लेनिन के नैतृत्व में सोवियत क्रांति के बाद जिस तरह की लोक राज , सर्वहारा अधिनायकत्व मतलब एक महान  व्यवस्था का उदय हुआ और सोवियतों संघ के काम ने  सारी दुनिया को बगैर किसी  प्रलोभन के प्रभावित किया था। मानव इतिहास में यह पहली महाकाव्यात्मक मुक्ति थी, जिसमे पहली बार शासन उसके निर्माताओं के हाथों में आया। मज़दूर वर्ग ही तो है निर्माता। जुल्मी, अन्यायी, कपटी ज़ार को मिटाकर मेहनतकशो के आंगन तक फैल गयी थी। 
  जॉन रीड ,एल्बर्ट रीस विलियम्स उन पांच अमेरिकी जनो में से एक थे जो अक्टूबर क्रान्ति के तूफानी दिनों के साक्षी थे। हर एक युवा, प्रौढ़ और युवतर समेत हर क्रांतिकारी के लिए जरूरी है कि वे अपने महान नेताओं और क्रांतियों को जाने। इतिहास को समझे और भविष्य गढ़ें।  

            दस दिन जब दुनिया हिल उठी (जॉन रीड)





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        संसार भर के पत्रकारों में सबसे खुशनसीब थे  अमेरिकी पत्रकार जॉन रीड। जब महान लेनिन के नेतृत्व में अक्टूबर क्रांति  का बहुत उथल पुथल वाला दौर चल रहा था तब जॉन रीड उसके बीच मे थे। उन्होंने आंखों देखे हाल पर जो किताब "दस दिन जब दुनिया हिल उठी" नाम से लिखी, इस महान मुक्ति संघर्ष के लिए वो प्रमाणित किताब है। अमरीकी होते हुए भी उन्होंने जिस तटस्थता से लिखा उसी कारण यह किताब रातों रात चर्चित होकर फैल गई थी। दुनिया की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है। इसी नाम से इस किताब पर एक फ़िल्म भी बनी है।

           "ठीक आठ बजकर चालीस मिनट हुए थे, जब तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सभापति मंडल के सदस्यों ने प्रवेश किया। उनमें  महान लेनिन भी थे। नाटा कद, गठा हुआ शरीर, भारी सिर - गंजा, उभरा हुआ और मजबूती से गर्दन पर बैठा हुआ। छोटी छोटी आँखें, चपटी सी नाक, काफी बड़ा फैला हुआ मुंह और भारी ठुड्डी ; दाढ़ी फ़िलहाल सफाचट, लेकिन पहले के और बाद के वर्षों की उनकी मशहूर दाढ़ी अभी से उगने लगी थी। पुराने कपड़े पहने हुए, जिनमें पतलून उनके कद को देखते हुए खासकर लंबी थी। चेहरे मोहरे से वह जनता के आराध्य नहीं लगते थे, फिर भी उन्हें जितना प्रेम और सम्मान मिला, उतना इतिहास में विरले ही नेताओं को मिला होगा। एक विलक्षण जन नेता, जो केवल अपनी बुद्धि के बल पर नेता बने थे। तबियत में रंगीन मिजाजी और  ना ही हल्कापन... ना ही ऐसी स्वभावगत विलक्षणता, जो मन को आकर्षित करती। वह दृढ, अविचल और अनासक्त व्यक्ति थे, परन्तु उनमें गहन विचारों को सीधे सादे शब्दों में समझाने की और किसी भी ठोस परिस्थिति को विश्लेषित करने की अपूर्व क्षमता थी। और उनमें सूक्ष्मदर्शिता के साथ साथ साहसिकता कूट कूट कर भरी थी।"




"..... और बाद में लेनिन बोलने के लिए खड़े हुए। मिनटों तक तालियों की गड़गड़ाहट होती रही, लेकिन वह जाहिरा उससे बेखबर लोगों के खामोश होने का इंतज़ार करते हुए खड़े रहे - अपने सामने रीडिंग स्टैंड को पकड़े, वह अपनी छोटी छोटी, मिचमिचाती आँखों से भीड़ को एक सिरे से दूसरे सिरे तक देख रहे थे। जब तालियां बंद हुईं, उन्होंने निहायत सादगी से बस इतना ही कहा, "अब हम समाजवादी व्यवस्था का निर्माण शुरू करेंगे!" और फिर जनसमुद्र का वही प्रचंड गर्जन।"  

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(..एल्बर्ट रीस विलियम्स की "अक्टूबर क्रान्ति और लेनिन" )

     लेनिन द्वन्द्वात्मक पद्धति और वाद विवाद के आचार्य और बहस में अत्यधिक अव्यग्र रहने वाले व्यक्ति थे।बहस में उनका सर्वोत्कृष्ट रूप प्रस्तुत होता है। ओल्गिन (म.न.नोवोमेइस्की) ने लिखा है, "लेनिन विरोधी को उत्तर नही देते, बल्कि उसकी बखियां उधेड़कर रख देते हैं-उसका सही रूप प्रकट देते हैं।उनकी प्रज्ञा उस्तरे की धार की तरह तेज है।उनका मस्तिष्क विलक्षण कुशाग्रता के साथ काम करता है।विपक्षी के प्रत्येक दोष की तरफ उनका ध्यान जाता है। जो प्रमेय उन्हें मान्य नही होते,उनके प्रति अपनी असहमति प्रकट करते हैं और ऐसे प्रमेयों के उपहासास्पद नतीजों को निकालकर उनके बेतुकेपन को भी प्रकट कर देते हैं।इसके साथ ही वे व्यंग्यपूर्ण चोटें भी करते हैं,अपने विरोधी की हंसी भी उड़ाते हैं,उसे फटकारते भी हैं।वे आपको यह अनुभव कराते हैं कि उनके तर्कों से पराजित उनका विरोधी अज्ञानी,मुर्ख,प्रगल्भ एवम् तुच्छ व्यक्ति है।आप उनकी तर्क शक्ति से प्रभावित हो उनकी और झुक जाते हैं।आप उनके बौद्धिक भावावेग से अभिभूत हो जाते हैं"

   हर क्रांतिकारी के लिए जरूरी है कि वे अपने महान नेताओं और क्रांतियों को जाने। इतिहास को समझे और भविष्य गढ़ें। एल्बर्ट रीस विलियम्स उन पांच अमेरिकी जनो में से एक थे जो अक्टूबर क्रान्ति के तूफानी दिनों के साक्षी थे।

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           ●   ख्रुश्चेव झूठा था...(ग्रोवर फर ) 

(  भारत के संशोधनवादी धड़े आज तक ख्रुश्चेव के इस संशोधन और बदलाव को महानता का दर्जा दिए चल रहे हैं। यह किताब महान लेनिन और स्तालिन और क्रांति के बारे में ख्रुश्चेव गिरोह द्वारा फैलाई गई हर एक गलत धारणाओं से बचा लेती है। एक बहुत खतरनाक और बड़ी साजिश को आधार देकर मजबूत बनाने वाले ख्रुश्चेवी झूठ और उसके वंशजों से  बचना जरूरी है।)
         ग्रोवर फर की खोज और अध्ययन के पश्चात लिखी गई किताब 'ख्रुश्चेव लाइड' जिसका अनुवाद 'ख्रुश्चेव झूठा था' नाम से है... इसमें उन्होने सोवियत संघ की कम्यूनिस्ट  की 25 फरवरी, 1956 को हुई 20 वीं पार्टी कांग्रेस में निकिता ख्रुश्चेव द्वारा स्टालिन और बेरिया के अपराधों के बारे में दी गई कुख्यात 'सिक्रेट स्पीच' के तमाम रहस्योद्घाटनों को झूठा प्रमाणित करते हुए साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं। इस सिक्रेट स्पीच में निकिता ख्रुश्चेव ने जोसेफ स्तालिन पर बहुत सारे अपराधों के आरोप लगाए थे। ख्रुश्चेव का भाषण विश्वभर के कम्यूनिस्ट आंदोलन के लिए गहरा आघात था जिससे वह कभी नहीं उभर पाया। इसने इतिहास का रूख ही बदल दिया। सोवियत संघ के विघटन के बाद सोवियत अभिलेखागार में अभी तक गुप्त रखे गए दस्तावेजों के प्रकाशित होने पर ग्रोवर फर ने एक दशक तक इनका अध्ययन किया।

 आरोप देखिए :-
        स्तालिन ने उन नेताओं को "नैतिक एवं शारिरिक रुप से खत्म" कर दिया जिन्होंने उनका विरोध किया.... 

 निस्तारण :- स्तालिन के पूरे जीवन में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जिसमें उन्होंने किसी को इसलिए "सामूहिक नेतृत्व" से "हटाया" हो क्योंकि वह व्यक्ति स्तालिन से मतभेद रखता था।

                 स्तालिन ने तो किसी को नेतृत्व से इसलिए कभी भी नहीं हटाया क्योंकि वह उनका विरोध करता था, हाँ ख्रुश्चेव ने जरुर ऐसा किया था। ख्रुश्चेव व अन्य ने 26 जून 1953 को लावरेन्ती बेरिया को फर्जी आरोपों के तहत गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद उन्होंने बेरिया और उसके साथ छह अन्य करीबी सहयोगियों-
मेरकुलोव, देकानोजोव, कोबुलोव ,गोग्लिद्जे़, मेशिक एवं व्लोद्जिमिर्स्की - की हत्या करवायी।




1956 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की आठवीं कांग्रेस में हिस्सा लेने के लिए जब सोवियत नेता अनास्तास मिकोइआन के नेतृत्व में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का एक प्रतिनिधिमण्डल पहुँचा तो पेंग (ते-हुआई) ने उनसे सीधे पूछा कि ऐसा क्यों है कि सोवियत पार्टी अब जाकर स्तालिन की आलोचना कर रही है। मिकोईआन ने जवाब दिया: ' उस समय हमने अपनी राय रखने की हिम्मत नहीं की। ऐसा करना मौत को न्योता देना था।'
इस पर पेंग ने जवाब दिया: "वह कैसा कम्युनिस्ट है जो मौत से डरता है?"

पर असल बात है कि यह आरोप ही झूठा था।

ख्रुश्चेव के भाषण का विस्तारपुर्वक अध्ययन करने के बाद चौकाने वाले परिणाम प्रस्तुत करते हुए उन्होने रहस्योद्घाटन किया है कि ख्रुश्चेव द्वारा लगाए गए 61 इल्जामों में से एक भी सच नहीं है। अभी तक का नहीं तो कम से कम 20वीं सदी का सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाला भाषण क्या एक बेईमानी से भरा धोखा था? मार्क्सवादी इतिहास को समझने के निहितार्थ यह विचार कितना ज्यादा भयानक है। फर ने ख्रुश्चेव के झूठों, सोवियत और पाश्चात्य इतिहासकारों सहित त्रात्सकीपंथियों और कम्यूनिस्ट विरोधियों का अध्ययन करते हुए प्रभावशाली तरीके से सोवियत इतिहास को झूठ साबित किया है। वास्तव में हर चीज जो हम सोचते हैं कि हम स्टालिन काल के बारे में जानते हैं वह गलत साबित हुई है। सोवियत रूस का इतिहास और 20वीं सदी के कम्यूनिस्ट आंदोलन को पूरी तरह से फिर से लिखना होगा। 

       कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं पार्टी कांग्रेस में 25 फरवरी, 1956 को ( निकिता ख्रुश्चेव द्वारा दिये गये कुख्यात "गुप्त भाषण" में स्तालिन एवं बेरिया के "अपराधों" का हर "खुलासा" प्रमाणित तौर पर झूठा था)  झूठा साबित किया जा चुका है। मगर ये कूपमण्डूक लेनिन का वसीयतनामा नामक वाक्य को बार बार उच्चारित करने वाले इन कुपढ़ों द्वारा जिस ढोर ढब किया जाता है उससे इनकी लेनिन प्रति नकारात्मक रूख का भी साफ परटाव होता है जो ख्रुश्चेव के झूठ के बीच जाने अनजाने क्रांति कि गरिमा तक को नोचने पर उतारू त्रोत्सकी  के वंशज और आसपास के कुछ त्रोत्सकीपंथी जो बहुत समय से स्तालिन को बदनाम करने या कहे बदनाम रूप में स्थापित करने के इतने घटिया और इतनी संख्या में प्रयास कर चुके हैं कि अब इनकी किसी कुतर्को भरी दलील पर ध्यान देना ही समय नष्ट करने जैसा अपराध लगता है।

   यहां त्रोत्सकी के एक किसी अनुयायी का कहना है कि - "जब स्तालिन लेनिन के जीवनकाल में ही इस तरीके से आचरण कर सकते थे, जब वे नदेज्दा कोस्तान्तिनोव्ना क्रुप्सकाया - जिन्हें पार्टी अच्छे तरीके से जानती है और जिनका लेनिन की एक निष्ठावान मित्र एवं पार्टी के जन्म से ही उनके लक्ष्य के लिए लड़ने वाली सक्रिय योद्धा के रुप में बेहद सम्मान करती है- के साथ ऐसा बर्ताव कर सकते थे, तो हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि स्तालिन अन्य लोगों के साथ कैसे पेश आते होंगे । उनकी ये नकारात्मक अभिलाक्षणिकताएँ लगातार विकसित होती रहीं और अन्तिम के वर्षों में तो उन्होंने बिलकुल बर्दाश्त न किया जा सकने वाला रुप अख्तियार कर लिया था।"..... 



            विज्ञान में भवुकता का कोई स्थान नही है। तथ्य, विचार और व्यवहार के बीच भावुक्तो मानव जीवन के कुछ हिस्सों के प्रति है तो राजनीतिक रूप के लिए कतई नहीं। त्रोत्सकी के इन बौद्धिक मवालियों को क्रुप्सकाया या लेनिन या स्तालिन बाबत नाम सोचना तक भी बुरा है। यह साबित हो जाता है कि त्रोत्सकी के नाम को जिंदा रखने के प्रयासों में ये कितना गिर सकते हैं। ख्रुश्चेव के भाषण के अन्य पहलू त्रात्स्की के लेखन की तरह ही हैं। उदाहरण के लिए त्रात्स्की ने मास्को मुकदमों को फर्जी आयोजन के रुप में देखा जो इस दीठ से स्वाभाविक था कि वे अपने मुख्य प्यादों के साथ उसमे शामिल थे। यह योजना जिस निम्न और ओछे स्तर तक जा कर पूरी किए जाने के प्रयास थे, वे आज भी निंदनीय और घ्रणित है।

     20 वीं पार्टी कांग्रेस के बाद गुप्त भाषण में ख्रुश्चेव ने जिनोविएव, कामेनेव और त्रात्स्कीपंथियों के मृत्युदंड की भर्त्सना की थी। परन्तु वास्तव में ख्रुश्चेव के भाषण का पूरा अभिप्राय, जिसमें ख्रुश्चेव ने असीम अपराधों के ज़रिये समाजवाद को असफल करने के लिए गलत दिशा देने का जो आरोप लगाते हुए स्तालिन को जिम्मेदार ठहराया था, उसके सब शब्द त्रोत्सकी से आयात किए गए थे। और यह इनके किसी गुप्त सन्धि की तरह का दस्तावेज ही नज़र आता है.... यहां स्पष्ट है कि ख्रुश्चेव वो सब के सब झूठे, गद्दारी भरे आरोप जो खुद के झूठ के साथ त्रोत्सकी के झूठ को मिलाकर एक बड़े झूठ की स्थापना के कुप्रयासों में जी जान से जुटा था और यह 'गुप्त भाषण' न केवल ख्रुश्चेव बल्कि त्रोत्सकी के अन्य अनुयाइयों के द्वारा तैयार किया गया वो झूठ था जिसको लगातार दस साल के शोध और श्रम के बाद ग्रोवर फर ने 'ख्रुश्चेव झूठा था'' के मार्फ़त (त्रात्स्की द्वारा स्तालिन के दैत्य के रुप में चित्रण करने वाले भावों से मेल खाते ख्रुश्चेव) ख्रुश्चेव को बेनकाब करने में सफल हुआ था।



     स्तालिन हमेशा अपने को लेनिन का शिष्य कहते थे और मार्क्स और लेनिन के बताए रास्ते और नीतियों पर ही चलकर उन्होने सोवियत रूस को मात्र 40 साल में उस मुकाम पर पहुंचा दिया था जहां तक पहुंचने के लिए पूंजीवादी देशों को 400 साल लगे थे। वह स्तालिन ही थे जिनके नेतृत्व में कम्यूनिस्टों ने लाखों कुर्बानियां देकर हिटलर के फासीवाद को करारी शिकस्त देकर दुनिया को फासीवादी खतरे से बचाया था। अंतरिक्ष में पहला मानव भी स्तालिन काल में शुरू किए गए कार्यों की ही देन थी। इसके अलावा उनके कार्यकाल में रूस से बेरोजगारी, अपराध, वैश्यावृति खत्म हो चुकी थी और देश कृषि, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थय के क्षेत्र में अभूतपुर्व कीर्तिमान स्थापित कर रहा था।

       यह महत्वपुर्ण पुस्तक स्तालिन के बारे में  त्रोत्सकी समर्थकों और संशोधनवादी ख्रुश्चेव के द्वारा दुनिया भर में फैलाए गए झूठों की हकीकत को जानने के लिए जरूर पढ़नी चाहिए। वह स्तालिन ही थे जो सोवियत संघ को विकास की असीम ऊंचाइयों पर ले गए थे। संशोधनवादी ख्रुश्चेव के कार्यकाल के दौरान से ही बुर्जुआ वर्ग को खुली छूटें मिलनी शुरू हो गई और इन संशोधनवादी नीतियों के चलते ही अंततोगत्वा ख्रुश्चेव से आगे नब्बै के दशक में मिखाइल गोर्बाचोव के समय ग्लास्नोत पेरेस्त्रोइका नीतियों की कब्र में ख्रुश्चेव की नीतियां दफन हो गई और उसी समय सोवियत  संघ का विघटन हो गया।

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