मार्क्सवाद और जाति का प्रश्न....
मार्क्सवाद ही मुक्ति का मार्ग है.....
(● सतीश छिम्पा)
( रंगनायकम्मा की दीठ यहां आकर जरूरी विचारों और सवालों को ठोस रूप खड़ा करती है, जवाब भी देती हैं।)
महान माओ का यह कथन हालांकि जातीयता या धर्म पर नही है बल्कि क्रांतिकारी कतारों के व्यवहार पर है- लेकिन इसको मैं यहां उसी तरह दे रहा हूँ- पदार्थ की प्रकृति के साथ प्रवृति का भी ब्यौरा जहां उभर कर आता है... "प्रत्येक प्रक्रिया में परस्पर विरोधी पहलू एक दूसरे को बहिष्कृत करते हैं,आपस में संघर्ष करते हैं, और एक दूसरे के विरोधी होते हैं। ऐसे परस्पर विरोधी पहलू बिना किसी अपवाद के सभी वस्तुओं की प्रक्रियाओं में तथा समस्त मानव चिंतन में निहित होते हैं। "
तेलुगु लेखिका रंगनायकम्मा की यह किताब हो सकता है आप सबको ठीक लगे मगर मुझे इसके द्वंद्वात्मकता के परिणाम नही दिखे जो शायद-- बैद्धिक चालाकी या कहें थोड़ा विचलन नज़र आता है जो स्पष्ट दिखता भी है लेकिन वो उससे अगली इस किताब की भूमिका जरूर तैयार करने में सक्षम है... और वो भी हल्के नही बल्कि द्वंद्वात्मक और भाषाई तरलता और बहुत सहजता के साथ निष्पक्ष रूप से पहले जहां वे बाबा साहेब अम्बेडकर, और बौद्ध और मार्क्स के साहित्य के गहन अध्ययन के आधार पर वस्तुपरक ढंग से, तथ्यों, साक्ष्यों एव तर्कों के साथ जाति प्रश्न के समाधान से जुड़े अहम प्रश्नों से जूझती तो है मगर वो हल नही निकल पाता जिसकी दरकार थी। इसलिए जाती प्रश्न एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण ही इनमे सबसे ज्यादा ठीक और बेहतर है-- यह पुस्तक जाति समस्या और दलित प्रश्न पर एक सुंदर , स्वस्थ और जरूरी बातचीत का सिलसिला शुरू करवा कर व्यापक बहस का माहौल तैयार कर सकती है? कहा नही जा सकता, क्योंकि हम जिस मार्क्सवाद या कहें द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मूल्यों की बात करें तो यह समाज के हाशिए से लेकर मुख्यधारा तक और जहां जहां जीवन है वहां ये जीवित और जरूरी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ स्थापित होता है और एक जरुरी पॉइंट यह भी है कि राजनीति रूप से मार्क्सवाद वर्ग संघर्ष के द्वारा मेहनतकश या कहें सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की स्थापना करता है। जहां ड्यूइन वादी पूंजीवादी लोकतंत्र और मार्क्स के बीच समानता एक प्रतिशत भी नहीं
दरअसल हम लोग जब भी इस मुद्दे पर जो इस समय का सबसे ज्यादा गंभीर मुद्दा है जिस पर बात करते हैं तो या लोक शिक्षा से सुनते है तो जो सबसे पहले जातीयता का रूप हमारे सामने आता है वो बहुत बुरा और संक्रामक और कमजोर रूढ़ियों के बीमार वर्गीकरण से सामने यह आता है जिसको 'सृष्टी में विभाज्यकारी तत्वों और द्वंद्वात्मक सिद्धांत से बिल्कुल विपक्ष एक महान कर्मयोगी जीवन जिसमे कर्म ही जात है जैसा बीमार आदर्श खड़ा कर दिया गया था-- जबकि वास्तव में जातियां शोषण द्वारा बनाये गये श्रम विभाजन से अस्तित्व में आयीं है। जहाँ पहले भी और अब तो बहुत ही ज्यादा अमानवीय सामाजिक व्यवहार की निडर गुंडावाहिनीयां सांस्कृतिक मोर्चे पर बहुत बुरा व्यवहार लेकर आती है। जहां, सम्भव नही है- या तो सामाजिक जनवादी या सांस्कृतिक क्रांति या परिवर्तन बहुत जरुरी है।
०-० "निम्न वर्गों के लोगों को जनता पर थोपे गये शोषण और आसमान श्रम विभाजन को समाप्त कर स्वयं अपने आप को मुक्त करना होगा। जाति विरोधी संगठन को इस प्रकार काम करना चाहिए कि वर्ग संघर्ष को अपना मुख्य उद्देश्य रखते हुए वह निम्न जातियों की तात्कालिक समस्याओं को हल करने के लिए संघर्ष करता रहे। यदि उच्च जातियों के लोग भी इन संगठनों के उद्देश्य से सहमत होते हैं तो वे भी इनके सदस्य बनेंगे। यदि हम इन्हें 'दलित' संगठन कहते हैं तो इनमे 'उच्च' जातियों के लोगों को शामिल करना सम्भव नहीं होगा। क्या ऐसा नहीं होगा ? उच्च जातियों में भी असंख्य ऐसे लोग हैं जो जाति भेद को समाप्त करना चाहते हैं।"
- -०- " पुरुषों और महिलाओं के बीच बाहरी काम और घरेलू काम के रूप में पुराना श्रम विभाजन है। यहाँ तक कि बाहर के कामों में भी यह श्रम विभाजन महिलाओं को पीछे धकेलता है। मार्क्सवाद जो रास्ता दिखाता है वह समाज की सभी असमानताओं और अंतर्विरोधों के ख़िलाफ़ संघर्ष का रास्ता है जो वर्ग संघर्ष से शुरू होकर श्रम के शोषण के खात्मे और लोगों की हर किस्म की अधीनता से मुक्ति तक जाता है।"
यूरोपीय सामंती नस्लों ने जिन देवताओं और इंद्रलोक की तरह के दरबार और अलौकिक से लौकिक का असंभव सा जो युद्ध करवाकर जो मिथक गढ़ा था वो हर एक मानवद्रोही ताकत के मुंह पर व्यपक चोट है। यह कोई स्वर्ग से मुक्त करने का अमल नही बल्कि जनता को जनता के लिए प्रतिरोधी बैरिकेड्स खड़े करने का या कहें लोक के युद्ध का आह्वान है, जो आज तक जीवित है। यह सबकी सब धारणाएं ओछी और मानवद्रोही है जैसे भारत की हर एक परम्परागत सामाजिक धारणाए मनुष्यो की जगह जिस तत्व को खड़ा करके द्वेष फैला रहे हैं- और अंतिम उपाय ना बुद्ध और ना ही बाबा साहेब आंबेडकर के इस ज्योन ड्युई के पूंजीवादी यथास्थितिवादी लोकतंत्र में हुई थी, आज भी नहीं है। और यहां से बराबर गतिविधियां आयोजित करके आगे बढ़ना जरूरी है।
जो लोग बाबा साहेब अम्बेडकर के जाति उन्मूलन विचार को पढ़ चुके हैं और उनके समर्थक हैं उनके लिए ये दोनों ही किताब पढ़ना जरूरी है " जाति और वर्ग :- एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण" रंगनायकम्मा यहां अम्बेडकर के जाति उन्मूलन सिद्धांत को खारिज करके जो मार्क्सवादी थियरी प्रस्तुत करती है हकीकत में वही जाति उन्मूलन का वर्गीय अवस्थिति के भीतर अंतिम उपाय बनता है। वे महिलाओं की मुक्ति और उनके श्रम के शोषण के बारे में भी बताती हैं। बौद्धिक मूर्खताओं की कोई सीमा नही होती तभी तो एक विशेष तबका इस एक बात से सहमत नही कि मार्क्सवाद ही "मुक्ति की एकमात्र राह है" दूसरा है कोई तो बताएं।
बौद्धिक हठधर्मिता का कोई इलाज नही होता है। यह धूर्तता का सबसे खतरनाक लेवल है जिसको आप पछाड़कर भी खुद पछड़ सकते हैं। जाति विहीन समाज की कल्पना ही नही की जा सकती है जब तक कि पूंजीवादी साम्राज्य और उसका हितसाधक फासिज़्म मौजूद है। वर्गीय प्रतिबद्धता और समायोजन का वैज्ञानिक पक्ष बहुत ही ज्यादा जरूरी हो जाता है।
इसके लिए मैं अरविंद मार्क्सवादी अध्ययन शोध संस्थान द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला से एक अंश साभार ले रहा हूँ ताकि कुछ चीजें स्पष्ट हो जाए
- "जाति प्रश्न और उसका समाधान
:- एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण" से यह अंश साभार
पूँजीपति, बड़े-मँझोले व्यापारी, कुलक, फार्मर, नौकरशाहों से लेकर विभिन्न उच्च मध्य वर्ग के लोग और अन्य परजीवी जमातें – जो शासक वर्ग और उनके पक्षधर वर्ग हैं, उनके हितों में आपसी टकराव भी हैं, लेकिन व्यापक मेहनतकश जनता के विरुद्ध राजनीतिक नीतिगत निर्णय और कार्रवाई में वे एकजुट हैं। दूसरी ओर, जो गाँव और शहर के सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा हैं, निम्न मध्य वर्ग और निम्न मध्यम किसान हैं – जो क्रान्ति की मुख्य ताकत हैं, उनकी एकजुटता की राह में अन्य समस्याओं के अतिरिक्त एक अहम समस्या यह है कि वे जातियों में बँटे हुए हैं, उनके बीच कई स्तरों पर सामाजिक पार्थक्य (segregation) की छोटी-बड़ी दीवारें हैं। सवाल है कि जो जातिगत पूर्वाग्रह और अन्तरविरोध भारतीय समाज में, किसी न किसी रूप में लगभग सर्वव्याप्त हैं, उनके पीछे केवल अधिरचनात्मक कारण (पुराने संस्कार या कुछ लोगों के शब्दों में, ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रभाव) ही मुख्य कारण है, या कुछ आर्थिक कारण हैं जो अधिरचनात्मक कारणों को सम्बल और बल देने का काम करते रहते हैं? अक्सर देखने में आता है कि किसी जातिगत टकराव या दलित उत्पीड़न की घटना के पीछे, कम या ज्यादा गहराई में वर्गों के आर्थिक हितों का टकराव मुख्य कारण होता है, लेकिन उस मामले पर समाज में जो ध्रुवीकरण होता है, वह जातिगत आधार पर ही होता है! भारत में वोट बैंक की बुर्जुआ संसदीय राजनीति जाति-ध्रुवीकरण को अपना एक मुख्य साधन बनाती है, लेकिन क्या वही तीखे जाति-अन्तरविरोधों का मुख्य कारण है? जाति यदि केवल अतीत का बोझ है, सामन्ती अवशेष है या ‘‘ब्राह्मणवादी’’ संस्कृति का प्रभाव है तो कुछ आमूलगामी सामाजिक आन्दोलन ही इसे कुछ समय में उखाड़ फेंकते। लेकिन ऐसा लगता नहीं है। जाति-व्यवस्था अपनेआप में उतनी जड़ नहीं है, जितनी लगती है। इसमें एक खास किस्म की आन्तरिक गतिशीलता है, जिसके चलते प्राचीन भारत में पैदा होकर मध्य काल और औपनिवेशिक दौर के ऐतिहासिक कालखण्डों को पार करती हुई यह आज भी अपनी प्रभावी उपस्थिति बनाये हुए है। हर सामाजिक-आर्थिक संरचना के अनुरूप ढल पाने में यह सक्षम थी और अलग-अलग ऐतिहासिक दौरों के शासक वर्गों ने हितपूर्ति के लिए इसे अनुकूलित कर लिया है।"
बहुत बार हमारे सामने जातीय प्रश्न जो उन्मूलन के संदर्भ में आते हैं और लाए भी जाते हक़ीन का हर बार हर एक मुल्यांकन में किसी भी भांत का सकारात्मक रुख ना होने या धारणाओं के स्थापना संबंध में असफलता या वैचारिक कमजोरियों का उभरकर आना.... अर्द्धसामन्ती- अर्द्धऔपनिवेशिक समाज में क्रांति के बाद में चीन की नवजनवादी क्रान्ति सम्पन्न हुई और फिर वहाँ भी समाजवाद की संक्रमण-यात्रा की शुरुआत हुई जो ज्यादा पेचीदा बनने लगी थी जब सोवियत संघ में 1953- 54 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बाद- लेकिन ये सब सामाजिक राजनीतिक रोग जिनके लिए बहुत जरूरी और ठोस रोगप्रतिरोधक ओषधि है- मार्क्सवाद, क्रांति और एक नए सुंदर समाज की स्थापना। क्रांति के बाद एक बहुत पिछड़ा और कमजोर देश चीन जिसने अद्भुत विकास किया और सामाजिक जीवन को ससम्मान स्थापित उसको भी कर डीएम और किसानी समाज होने के कारण चीन में समाजवादी संक्रमण की विशिष्ट और गम्भीर समस्याएँ थीं। सोवियत संघ में पूँजीवादी पुनरस्थापन के चलते अनेक राष्ट्रों में संस्कृतिक सामाजिक मुहिम खत्म होने पग गई थी।
किसी भी संसदीय पार्टी या विचार या जीवन के मुढले विचार के विरोधी, सहज, और उस प्रवृति को और न तो कम से कम एक सटीक और सदृढ़ विचार को समझ सकने और वैज्ञानिक तर्क और द्वंद्वात्मक सतर्क तक के अपने उस चेतन्य बिंदु को या लोक चेतना के सांस्कृतिक उच्च स्तर का विकास और अध्ययन और समझ तो होनी ही चाहिए और इस बाबत भी वैचारिकी विकसित करके बहस का आरंभिक दौर या तो शुरू किया जाए या व्यापक स्तर पर स्टडी सर्किल या सेमिनारों के माध्यम से जाती उन्मूलन के वे तमाम दस्तावेज जो मुक्ति का द्वंद्वात्मक मार्ग दिखाते हो पर चर्चा या बहस डिबेट जरूरी हो।
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