मुझे बड़े लोगों की तरह रहना नहीं आता
-सतीश छिम्पा
वह एक क्षण जो मेरे भीतर दुबका पड़ा है, बार-बार पुलक कर उठ बैठता है। मैं नहीं चाहता कि वह मेरे भीतर ही मुरझाकर रह जाए। बार-बार हरा होता रहे, मैं भी यही चाहता हूँ—और उनकी जो छब यहाँ है, वह भी मचलती रहे। कुछ वाक्य हैं जो मेरा दागिस्तान की तरह हमेशा याद रहते हैं।
'मुझे बड़े लोगों की तरह रहना नहीं आता।Ó कितनी मासूमियत से कहा था उन्होंने। मैं लगातार उन्हीं की तरफ देखता स्तब्ध खड़ा रहा। क्या वाकई उन्हें बड़े लोगों की तरह रहना नहीं आता या बड़े लोगो को बड़ा होना नहीं आता। यह इंसान है कि कोई फरिश्ता? इतनी सरलता, इतनी मासूमियत कि उनका भोला-भाला चेहरा मेरे भीतर छप सा जाता है। जरूरी नहीं कि सभी बड़े लोग अच्छे हों। मगर अच्छे लोग हमेशा बड़े होते हैं और वे उन्हीं अच्छे लोगों में शामिल हैं।
तुलनात्मक प्रश्नों में मैं हमेशा मात खा जाता हूँ, मगर विश्लेषण में मुझे आनन्द आता है। चीजों, व्यक्तियों की व्याख्या करने में मैं माहिर हूँ। मगर मेरा विश्लेषण उनकी सफेद दाढ़ी और धोव्ठफूलीये चेहरे पर अटक जाता है, उनकी ठपाई हुई दाढ़ी में, मेरे सारे कयास भटककर रहे जाते हैं। मैं हार जाता हूँ। हाथ खड़े किए मैं अब उनके सामने हूँ, ''कैसे जी रहे हैं? कुछ मुश्किल सा नहीं लगता ???
''मुश्किल क्या है, यह तो जीवन है।''
जीवन और मनुष्यों के प्रति उनका दृष्टिकोण बड़ा सापेक्ष है। दोनों के प्रति ही संवेदनाएँ उनके यहाँ है। मगर वे कभी जवानी की अल्हड़ता, आवारगी और कभी किसी किताब पर कर रहे हैं, तो आश्चर्यचकित कर देंगे। पढ़ाकू! मनुष्य पर बात करते हैं तो एक यात्रा है। एक ही आदमी के इतने रूप देख रहा हूँ मैं, और अन्त में एक मासूम सा बच्चा! फिर पूछते हैं, ''मैं ज्यादा बोल गया क्या?'' एक अपनापा झलकता है उनके भीतर। भावों से लबरेज हैं वे, मैं उन्हें छूना चाहता हूँ—पकडऩा चाहता हूँ
, संवेदना का काई सिरा, जिससे पहुँच सकूँ, जीवन के और नजदीक। मैं असफल रहता हूँ।
जीवन में सब-कुछ प्रवाहमान है, कहीं कोई चीजों का अस्तित्व क्षणिक होता है। मनुष्य का भी! कहीं कोई स्थिरता नहीं, ठहराव नहीं। ठहराव की अपेक्षा की जाती है। इच्छाएँ पनपती हैं, और कुछ हासिल नहीं होता। हम असफल से खड़े रहते हैं। यह कैसी आँख-मिचौनी है, सच मैं तंग आ चुका हूँ।
''क्या सोच रहा है? छोरी से बात नहीं करता क्या? फोन कर ले।ÓÓ वे कह रहे थे और मैं बस हँस के रह गया। जिया से पिछले दो दिन से फोन पर कोई बात नहीं कर पाया हूँ। हाँ कल हम मिले जरूर थे, एक सम्पूर्ण मुलाकात। भरी-भरी सी। मैं प्रेम से सराबोर हूँ। एक भरी-पूरी बेल की तरह मैं प्रेम से महक रहा हूँ। मेरे भीतर से प्रेम झांक रहा है। यह इतने सुहाने दिन हैं कि मैं कहीं नहीं जाना चाहता और प्रेम किसी दरख्त की तरह मुझ पर छाया है। बहुत प्यारा है सब-कुछ। जिया भी।
''एक बार रामदेव जी के मेले में एक बुढिय़ा ने कहा था मुझसे, ''थू के जाणै, म्हंू आखै इण्डिया नै जाणू?ÓÓ वे कह रहे थे। जीवन में अनुभव के कितने मायने हैं। लोकानुभव हमें भरा-पुरा रूप प्रदान करते हैं। क्या वाकई में मैं कुछ नहीं जानता? हो सकता है। अभी तो अनुभवों की शुरुआत ही है। बिना अनुभव जीवन दृष्टि भी स्थूल होती है। मगर उनके जीवनानुभवों का तो खजाना बहुत विशाल है। यह लम्बी यात्रा तय की है उन्होंने। लोगों को जाँचा, परखा है। जीवन में उतरकर, जीवन की गहराई को महसूसा है। तभी जीवन और मनुष्यों के प्रति उनका दृष्टिकोण लोगों से भिन्न है। पर मुझे अब कई प्रश्नों ने घेर रखा है। मैं पूछना चाहता हूँ। उनसे। बहुत बातें करना चाहता हूँ। कैसे ठेल लाए इस जीवन को वे अकेले ही, यहाँ तक? कैसे तय की इतनी यात्राएँ? कैसे उस धुँधली सी लकीर का पीछा कर पहुँचे हैं यहाँ तक? मगर मैं कुछ नहीं पूछ पाता हूँ। एक डर मेरे भीतर दुबका पड़ा और डर के आगे मैंने घुटने टेक दिए।
वे फिर बोल रहे हैं, ''रोम्या रोला ने कहा है किह जिन्दा रहने की ठोस वास्तविकता है अन्य जनों से अहंकार की टकराहट से स्वैच्छापूर्ण संन्यास।ÓÓ वे अब मेरी तरफ देख रहे हैं और मैं सहमति से सर हिला देता हूँ। बिल्कुल सटीक बात है। मगर क्या यह संभव है? क्या मानव अपने अहंकार का त्यागकर सकता है? बिना अहंकार जीवन कितना सुरीला सा हो जाएगा। न कोई झगड़ा, न टकराहटें। मैं अपनी ही सोच में डूब रहा हूँ। उनकी बातों में मैं साम्य रखता हूँ। मगर पहले कुछ नहीं समझता। जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण मुझे अच्छा लगता है, मगर वे मुझे बच्चा समझते हैं। अब तो मैं बड़ा हो गया हूँ।
सफेद दाढ़ी! सफेद बाल! सफेद शर्ट में वे किसी सूफी फकीर की तरह लग रहे हैं। किसी अंजाने ईश्वर से आत्मा को एकाकार किए से। उनकी एक पवित्र छब मेरे भीतर पैठी हुई है। वे बोलते हैं तो बोल अमृतधारा से बहते हुए भीतर उतरते हैं, और सब कुछ पवित्र हो जाता है। मैं उनकी तुलना बुल्लेशाह से करता हूँ—मगर बीच ही में अटक जाता हूँ। यह जरूरी तो नहीं है।
वे अब जोर से हँस रहे हैं। बहुत जोर से ठहाके लगाकर। मैं परेशान सा उन्हें देख रहा हूँ।
कुछ भी समझने में असफल। क्या करूँ इस बन्दे का, मैं परेशान हूँ। सही बात तो यह है कि मैं परेशान भी फिजूल में हो रहा हूँ। क्या करना है कुछ करके? क्या हो जाएगा मेरे विश्लेषण करने से? सब कुद तो विश्लेषित है। जीवन है, चले चला जा रहा है। बस गोता लगाओ और दूर निकल जाओ! वह लड़की भी तो अभी जिन्दा है।
''दो वक्त की रोटी मिल जाए, यह सबसे बड़ा सूख है।ÓÓ उनके शब्द फिर से मेरे भीतर उतरते हैं। पसरते हैं। वास्तव में अब कुछ रह ही नहीं गया है। सब कुछ सामने है। काँच की तरह पारदर्शी। मैं हूँ, मेरे सामने वे बैठे हैं, मगर और भी बहुत कुछ है। शायद तीन दशकों का अन्तराल, जो मुझे उनसे पूर्ण रूप से जुडऩे नहीं देना चाहता, या यह जुड़ावा पिघले हुए काँच की तरह बहकर ठस जाता है, फिर कुछ बाकी नहीं रहता। टूट सा जाता है।
क्या यह सब इसलिए तो नहीं हो रहा कि उन्होंने जीवन को बहुत नजदीकी से देखा है। भोग किया है जीवन के हर हिस्से से। जीवन को भोगने के पश्चात् ही आदमी बड़ा बनता है और जो दिखाता नहीं वह वास्तव में जीवन के नजदीक होता है।
तो मेरे सामने बैठे हैं। एक हल्की सी ललाई उनके चेहरे पर तैरी और आँखों में उतरकर पसर गई। मैं देख रहा हूँ उन्हें, मन करता है फूलों का गुदव्ठा बनाकर उनके चेहरे पर लेप दूँ, कि वे महक जाएँ। महक क्या किलक जाएँ। कुछ चहचहाट तो करें, आदमी इतना चुप्पा भी हो सकता है क्या?
वे तीन-चार बातें बोलते हैं, फिर कोमा सा लगाते हुए बड़ी मासूमियत से पूछते हैं, ''मैं ज्यादा तो नहीं बोल रहा?ÓÓ उनकी यह अदा वास्तव में मुझे बाँध रही थी। मैं कहना चाह रहा था कि ''नहीं आप ज्यादा तो नहीं बोल रहे, मगर मै चाहता हूँ कि आप ज्यादा बोलें, इतना बोलें कि सुनने की मेरी सारी प्यास मिट जाए।ÓÓ मगर मैं ऐसा कुछ नहीं कह पाता हूँ—और वे फिर चुप्पी साध लेते हैं। उनका रचनात्मक और लौकिक रूप यहाँ एकमेक होता सा जान पड़ता है, कहीं कोई दोगापन नहीं, सब सात्विक, पवित्र।
कमरे में हल्का-हलका प्रकाश है। हल्की-हल्की ठंड ओर वोदका के पैग। वे अब बिल्कुल रोमानी हो चुके हैं। एकदम सफेद, दूध से चेहरे पर हल्की ललाई और आँखों में लाल डोरे। अब वे अपनी बीती जिन्दगी और जीवन के बारे में बता रहे हैं। उनका चेहरा पाँच साल के बच्चे की तरह मासूम सा लगने लगा है। बीच में कई बार जिया की मासूमियत का भी भ्रम बना रहा। मगर वह सब क्षणिक था। जीवन को पूरी तरह भोगने के पश्चात् ही हमारे पास संवेदना बचती है। एक गरीब आदमी के पास पीड़ाएँ, संवेदनाएँ, उसकी अकूत सम्पदा होती है, जो कि संभ्रांत खाए-पीए व्यक्ति के पास नहीं मिलतीं।
''सूट-बूट पहने संभ्रांत लोगों से मैं बचपन से ही डरता आया हूँ, जैसे वो मुझे दबोच लेंगे।ÓÓ एक हल्की सी खिलखिलाहट और वोदका का आखिरी घूंट। मैं उनसे कहना चाहता था कि यही एक डर मुझे भी लगता है और मैं अपने संभ्रांत दोस्तों से दूरी बनाकर रखता हूँ। मगर मैं कुछ नहीं बोला, बस उनकी निश्छल बातें सुनता रहा। वो बता रहे थे कि कैसे उनके प्रोफेसर साथी उन्हें इसके लिए समझाते रहते हैं कि अब तुम भी अच्छे व उच्च प्रोफेशन में हो, कुलीनों की तरह रहा करो। यूँ बच्चों और हर किसी से मत मिला-जुला करो। मगर मन बार-बार वहीं खिंचा चला जाता है, जहाँ से पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से निकलकर आया हूँ। वो निश्चंतता, आवारगी, फक्कड़पना अब नहीं रहा। कहीं भी, कैसे भी रात गुजार लेना। चाय की थडिय़ों पर दिन भर लोगों के चेहरे पढऩा अब वैसा नहीं होता, मगर लड़कों से मिलता हूँ तो वो सब याद हो आता है—जो अब अतीत है।
इस बीच मेरे मोबाइल पर जिया के तीन-चार मैसेज आते हैं, मगर मैं उनकी बातों में डूबा हूँ, उसे कोई रिफ्लाई नहीं दे सका। वह फिर नाराजगी से भरे दो मैसेज भेजती है।
''कभी मेरा भी ख्याल कर लिया करो। छोड़कर चली जाऊगी तो फिर बहुत रोओगे।ÓÓ मैंने मैसेज पढ़ा तो काँप कर रह गया। कमबख्त ने ये क्या लिख दिया। मन आशंका से भर गया ''क्या कहीं कुछ गड़बड़ है।ÓÓ
''ऐसा क्यों बोल रही है, मैं तो हमेशा तुम्हें ही सोचता रहता हूँ। अब भी तुम्हारे बारे में ही कुछ लिख रहा था।ÓÓ मैंने मैसेज बॉक्स में मैसेज टाइप किया और उसके नम्बर पर सेण्ड कर दिया।
वे मेरे सामने देखकर मुस्कुरा रहे हैं। नाराज हैं शायद। नाराज होना ही था। दरअसल शराब के दो-तीन घूँट पीने के बाद मेरे सारे आवरण उतर जाते हैं। मैं अपनी असली सूरत के साथ पेश होता हूँ। यहाँ भी वही हुआ। वे बड़े गम्भीर तरीके से साम्यवाद पर बात कर रहे थे और मैं जोश में आकर बोल पड़ा कि ''मैं एक दिन नक्सलवादी बनूँगा और पाँच सालों के भीतर क्रांति कर दूँगा।ÓÓ और उन्होंने एक करड़ी मीट से मेरी तरफ देखा। मैं दहल गया। यह क्या हो गया? मैं कुछ कह पाता। इससे पहले ही मेरा मोबाइल टुनटुना उठा। जिया का मैसेज था।
''मेरे बारे में क्या लिखा जा रहा है जनाब?ÓÓ
''प्रेम कविता लिख रहा था, तुम्हारे साथ को याद करके।ÓÓ कई बार परिस्थितियों के कारण झूठ बोलना पड़ता है, सो मैंने भी बोल दिया।
वे मुझसे नाराज थे, मगर भोला मनुष्य दिल का साफ होता है, और वही हुआ, उनकी नाराजगी भी क्षणिक साबित हुई। वे फिर अपनी बातें बताने लगे। मुस्कुराने लगे। हरे होने लगे। तभी वोदका का एक पैग बनता है और वे गिलास अपने हाथ में लिए बैड के ठेग लगाकर एक लम्बी साँस छोड़ते हैं, जैसे तीन दशकों की यात्रा में थककर अब विश्राम कर रहे हों। मगर क्या यह विश्राम है? अभी यात्रा खत्म ही कहाँ हुई है? अभी तो बहुत सफर बाकी है।
''एक दिन सब हमें छोड़कर चले जाएँगे। माँ भी एक दिन मर जाती है। पिता की भी मृत्यु हो जाएगी और हम अकेले रह जाएँगे।ÓÓ वे बोल रहे थे। मैंने सुना और सुन्न रह गया। यह क्या कह दिया। मेरी आँखों में आँसू छलछला आते हैं। नहीं मेरी माँ नहीं मरेगी। वह हमेशा जीवित रहेगी। सदा मेरे पास रहेगी। मैं कहता हूँ और रो पड़ता हूँ। यह कैसे संभव होगा? क्या सब-कुछ मिटकर नहीं रह जाएगा? मैं सोच रहा था। अभी पूरा विचार कर भी नहीं पाया था कि वे बोल पड़े-''तुम रोये क्यों?ÓÓ
''मेरी माँ हमेशा जीवित रहेगी, मेरे पास।ÓÓ मैं आँखें पौंछकर जवाब देता हूँ। ''तुम्हारी तरह मैं भी कहता था। मगर माँ भी एक दिन चली गई। यह तो होना ही होता है।ÓÓ उन्होंने कहा और वोदका का आखिरी घूँट समाप्त कर गिलास तिपाई पर रख दिया। एक बोझिल सा मौन हमारे बीच पसर गया।
मैं कुछ नहीं बोल सका, चुपचाप उठा पेशाब करने के लिए चला गया। वापस आया तो देखा वे फोन पर किसी से मजाक कर रहे हैं। मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। उन्हें हँसते, चुहल करते देखता रहा। अब वे बिल्कुल बच्चे बने हुए हैं।
फिर एक मैसेज आता है। जिया ही है। ''मुझे नींद नहीं आ रही है। तुम्हारी याद आ रही है।ÓÓ इसकी यही अदा मुझे लुभाती है। पता नहीं कहाँ से सीखकर आई है। चिरमिची सी आँखों वाली। मिलती है तो लिपटकर बच्चों की तरह लातालडिय़ा करती है। बहुत भाता है मुझे उसका यह बच्चा रूप और मैं उसमें उतर जाता हूँ, सम्पूर्ण।
''मुझे भी तो तुम्हारी याद आ रही है। ये सर्द हवाएँ बार-बार मुझे तुम्हारी ओर खींच रही हैं।ÓÓ मैंने रिप्लाई दिया।
वे अब अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर चुके हैं। मेरी पलकें भी बोझल हो रही हैं। मैं आँखें खोलने की कोशिश करता हूँ—मगर वे जबरन बन्द हो रही हैं। मोबाइल फिर बजता है, मगर मैं उसे देख नहीं पाता हूँ और शरीर ढीला छोड़कर बिस्तर पर पड़ जाता हूँ।
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