चन्द्र सिंह बिरकाळी और मनुज देपावत
०सतीश छिम्पा
(आज बिरकाळी जी के जन्मदिवस पर इन दो महान समकालीन कवियों का मूल्यांकन- किश्त -१)
(लोकपक्षधर जन सरोकार या सामंती आश्रय प्राप्त कविता। 'लू' और 'बादळी' ऋतुकाव्य की अमर कृतियां, धोरां वाळा देस जाग-मनुष्य के जीवन का महान गान)
राजस्थान की टिब्बों से घिरी मरुभूमि रचनात्मक रूप से बहुत उर्वर है। यहां जेठ का तपता तावड़ा है तो पोष की भयंकर ठंड। और इसी अनिश्चित वातावरण में हुए हैं अनेक विद्वान और मुक्तिकामी। यहां एक से बढ़कर एक कहानीकार, रंगकर्मी, चित्रकार, कवि और पत्रकार हुए है। जिनकी प्रतिबद्ध रचना धर्मिता के कारण अनेक कालजेई और जरूरी रचनाएं आई। वे जिन्होंने शब्द की शक्ति और विचारों की ऊष्मा के ताण देश भर को अपनी और आकर्षित किया। उनमे ज्यादातर सामंती ठसक और झुकाव के बावजूद भी अगर प्रकृति वर्णन में लोक की पीड़ाओं, प्यास और कष्ट आता है- उसी रुझान के चलते यह व्यापक विस्तार पाकर उठता है।
अक्सर हम पराधीन और स्वाधीन राजस्थानी कविता की बात करते समय सामंती मानवद्रोही प्रवृतियों और मुक्तिकामी मार्क्सवादी काव्यगत विशेषताओं के बीच ना तो अंतर कर पाते हैं और ना ही उनकी तत्कालीन काव्यगत चेतना के वैचारिक प्रदूषण और लोकपक्षधर उज्ज्वल वैचारिक स्थापनाओं में किसी भांत का अंतर करते हुए, उन जरूरी लौकिक विचारों और मानवद्रोही प्रदूषक सामंती प्रवृतियों को अलग करने, निस्तारण या कहें कि इन सब डांखळों को फटकार के 'संवार लेना' बहुत ज्यादा जरूरी तब हो जाता है जब आर्थिक संपन्न या इस और जिनका इसलिए ध्यान रहता है क्योंकि रचनाकार को न्यूटल होने के लाभ का पता रहता है और वे धनपति वर्ग और उनके खड़े किए गए सांस्कृतिक माफिया साहित्यिक दस्तों के मुकाबले रचनात्मक तो बहुत उर्वर रहते हैं, वैचारिक भी लेकिन वे उनकी खरीदफरोख्त, छपास के भूखे तबकों या नाम या मंचो के लालच से जिन कमजोर धड़ों को खरीदकर सत्तर के दशक की तरह उभार देते हैं जिसका सबसे बड़ा और घातक आगामी पीढ़ी को भोगना पड़ेगा, या कहें वे इसी प्रदूषण के बीज ही हो जाते हैं, क्योंकि युवा कवि अचानक जब आलोचना में हाथ आजमाना शुरू करता है तो उनके पास मूल्यांकन की वो वैज्ञानिक द्वंद्वात्मक दीठ नही होती है जो जीवन और खतरों में अंतर करके वहां प्रतिरोध को स्थापित कर सके। छांछळकर अक्सर हम वाह वाही के लालच में जन शब्द का निहितार्थ भूल जाते हैं।
हमे देखना होगा कि बिरकाली के समकालीन मनुज देपावत की रचनाओ का स्वर कैसा था। उनके सरोकार क्या बीकानेर दरबार से थे या लोक से थे। जिसका अब हम प्रयास कर रहे हैं।
बहुत बड़ा मगर व्यक्तिगत प्रमुख नाम है चंद्रसिंह बिरकाळी का। जिन्होंने अपने दो लघु कविता पुस्तकों के बल पर राजस्थानी कविता का स्वभाव ही बदल दिया था। 'लू' और 'बादळी' राजस्थान की अनिश्चित वातावरण को प्रकट करती हुई प्रकृति परक कविताएं जब प्रकाशित होकर सामने आई तो जैसे तूफान ही उठ खड़ा हुआ हो। स्वतंत्रता के बाद राजस्थानी कविता का यह पहला बदला और परिष्कृत स्वर था। जिसने थापित किया कि इस तरह भी रची जा सकती है कविताएं।
‘लू’ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुई थी अपनी मारक तासीर और कुदरती स्वर के कारण। खुद बिरकाळी जी को भी ‘लू’ प्रिय थी। दरअसल रेगिस्तानी जनजीवन जिन प्राकृतिक आपदाओं को सहता आया है वो है अकाल और भयंकर लू, गर्मी। बुजुर्ग बताते हैं कि 'छपनियो काळ, काळ कोनी हो, मौत ही मौत।', सुनते हैं कि इस अकाल के समय लोग भूखो मरते हुए दरख्तों के छोड्डे तक खाने लगे थे। इन्ही सब व्यधियो के बीच सृजन हुआ था 'लू' और 'बादळी' का।
सन 1941 ई में छपी 'बादळी' हर तरफ चर्चित थी। ‘बादळी’ को मरुभूमि के लोग, उडीक में पुकारते हैं, इस वेदना को इन्होंने स्वर दिया था। ‘बादळी’ पर बिरकाली जी को काशी की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा रत्नाकर पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। और सम्मान का प्रतीक बलदेवदास पदक भी दिया गया। आधुनिक राजस्थानी रचनाओं में यह पहली ही रचना हैं जिसकी तत्कालीन साहित्यकारों सुमित्रा नंदन पन्त , महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” नें प्रशन्सा करते हुए इस पर चर्चाएं आयोजित की थी। यहां तक कि रविन्द्रनाथ टैगोर , मदनमोहन मालवीय आदि नें भी बिरकाली जी को महान कवि और प्रकृति के चितारे रचनाकार के रूप में स्वीकार किया था।
रावत सारस्वत के सहयोग से उन्होंने राजस्थानी भाषा प्रचार सभा का गठन किया और राजस्थानी में ‘मरुवाणी’ नामक मासिक का प्रकाशन शुरू किया। ‘मरुवाणी’ का प्रकाशन शुरू करना आधुनिक राजस्थानी के इतिहास में उसी तरह का हस्तक्षेप था जिस तरह जयनारायण व्यास द्वारा प्रकाशित और मनुज देपावत द्वारा संपादित 'आगीवाण' का था।
सरोकारो के परिप्रेक्ष में बात की जाय, तो वह इस क्रूर समय मे प्रतिबद्धता और ईमानदार आलोचना की डिमांड करता है।
यहां विचारों की एक ऐसी आंधी है जिसमे हर तरह के अराजक तत्व शामिल है। यहां लोक के अंतर्गत संघर्षो को जिस प्रतिरोधी साहित्य का आधार मिलता है वो उज्ज्वल है, ठोस है मगर कलावादी जमात से घिरा हुआ है। इसके अपने दीठ के विकास के लिए शुरुआती भटकाव शुरू होकर सामाजिक अन्वेषण से राजनीतिक प्रतिबद्ध मोर्चा तैयार करने में जो जो मूल्य शामिल होते हैं, अपरिपक्व ही मिलते हैं। जिसमें सबल और कमजोर दोनों ही न केवल साथ रहते हैं अपितु दोनों को समान सुनवाई के अधिकार भी प्राप्त होते हैं | अंतर्वस्तु ??? अदीठ, यह कि कुछ मूल तत्वों और उनकी विशेषताओं या गुणों के लिहाज से जो सब में समान है जैसे मानव स्वाभाव, मानव का महत्व , अनघर्ष, पहचान, भएव और गरिमा, मानव व्यक्तित्व आदि में सभी व्यक्तियों को समान समझा जाना चाहिए |
किसी भी वैज्ञानिक विचारधारा में किसी रचना को समझने के कंटेंट या द्वंद्वात्मक स्थितियां या तथा रूप के संबंध को समझना आवश्यक माना जाता है। इसके अंतर्गत लेखक क्या कहता है तथा कैसे कहता है- पर जोर दिया जाता है-- जिसमे एक तटस्थ तीसरा पक्ष भी होता है लेकिन यहां मनुज की कविता में या कहें दर्शन में ऐसा नही मिल पाया। अब जब ये पंक्ति सामने है इसलिए उन्होंने धोरों की जनता को जागने का आह्वान किया - धोरां आळा देस जाग रै, ऊंठा आळा देस जाग। राजस्थानी भाषा साहित्य की पहली और अद्भुत शुद्ध इंकलाबी या मार्क्सवादी कवि को आलोचकों ने वैचारिक स्तर पर क्यों नही मूल्यांकित किया ? , राजस्थानी जुझारू कविता के पहले ही कवि थे मनुज देपावत या कहें कि वे इंकलाबी कवियों में से एक थे जो लोकहित के लिए क्रांति का मार्ग ही अंतिम और एकमात्र मार्ग मानते थे। यही एक मुख्य कारण रहा कि हमारे सामंती साहित्यिक हल्के में महान इंकलाबी कवि- मनुज देपावत बीमारू या कुंठित आलोचकों के चलते उस स्थान नही स्थापित हो सके जो उनका बनता था।
मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे जब पूंजीवाद और सामंतवाद का अंतिम युद्ध (युद्ध ही माना जाए, व्यवस्थागत बदलाव और नीतिगत ढांचा ध्वस्त) खत्म होने के बाद जब नवजात भारतीय पूंजीवाद और उसके आपसांस्कृतिक अवमूल्यों के विरुद्ध लोकयुद्ध की कविता गीत लिखे - प्रतिरोध का पहला आधार जो बने उन्हें ना मार्क्सवादी माना या स्थापित किया गया और जिसे मुख्य धारा से अलग भी अलग रखा गया था। आप देखिए कि मानव समूह, समाज या वर्ग में आर्थिक, जातीय और वर्गीय और शोषण और कुपोषण, जबर जुल्म, अन्याय के विरुद्ध जन का आह्वान करने वाली कविता जिसमे वर्ग विभेद, पक्षधरता और इंकलाब या मुक्ति का दर्शन हो वो मार्क्सवादी या इंकलाबी सृजन है। वे कविताएं जो मध्यम मार्गीय समाजवादी या नवजनवादी कविताओ का आवरण लेकर रचाव करते हैं, कमजोर लिबरल इसमे लगातार स्थापित हो ही रहे होते हैं। एक जरुरी बात यह भी है कि किसी मूवमेंट के दौरान उसी के तत्वों को कविता में ढाला जाता है तो जाहिर है वे उसी विचारधारा या बिरादराना संगठन के होंगे-- लेकिन इसी तरह के मूवमेंट से प्रभावित होकर मध्यममार्गी लोग कविता रचे तो उस कविता को उसी धारा के साथ ही जोड़ा जाता है, कवि यहां गौण है। मनुज देपावत और बिरकाली के लोकहित या सरोकारों को यहां अनवेंषित किया जाना बहुत जरूरी है- क्योंकि निःसन्देह चन्द्रसिंह जी महान कवि रहे, उनका रचाव लोक के प्राकृतिक आपदाओं के कष्टों को रेखांकित करते हैं लेकिन इससे भी जरूरी एक और मूल्य होता है, वो समय अगर अंधकार का है तो कवि भले महान हो, उसका सत्ता से संबंध उसको कहीं न कहीं लोक भीतर ले जाकर शर्मिंदा करता ही करता है।
भारतीय भाषाओं में चौथा और पांचवा और उसके बाद लगातार सत्तर के दशक तक लगातार राजसत्ता के जुल्मो सितम के विरुद्ध नोजवानो का हुजूम सड़कों पर गोलियों का शिकार हो ही रहे थे तो उस समय कविता का स्वर, उनकी महानता को स्थापित करता है, ना कि कोई आलोचक। यह इंकलाबी- क्रांतिकारी कविताओं का दौर था- और अस्सी के दशक में विद्रोही मगर दिशाहीन विध्वंसात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करते हुए अंत मे बदलाव के मार्फ़त कविता को नया और श्रेष्ठ वैचारिक और द्वंद्ववादी रूप देते हैं। अगर हम लोक की चेतना की थाह लेते हुए लोक की उस कविता के धरातल का अध्ययन करें तो जरूरी चीजें सामने आ जाती है। जिस कविता को प्रकृति के गौरव गान या उसके कहर के बखान की कविता को प्राकृतिक वर्णन के बाद छोड़ना नही होता, बल्कि उसके सत्ता संग संबधों का अन्वेषण भी जरूरी हो जाता है। मुलम्मे में गढ़कर रखा है वो हकीकतन मार्क्सवादी/ इंकलाबी कविता है।
यह विडंबना ही है यहां की ज्यादातर लोग जनवाद को मार्क्सवाद समझे बैठे हैं। मार्क्सवादी अवधारणा जिस महान परिवर्तन के समांतर है जिससे इसका फलक वैश्विक होता है- जबकि जनवाद, डेमोक्रेसी- इसी की वजह से अनेक कवियों का मूल्यांकन ही गड़बड़ झाला है। यह ना ही अतिशयोक्ति है और ना ही आत्ममुग्ध बयानबाजी है कि कविताओ के सही और सटीक मूल्यांकन के लिए वैज्ञानिक तर्कणा विकसित करना बहुत जरूरी है जो वाक्यों के भीतर जमी विचारधारा को पकड़ जान सके यह बहुत सूक्ष्म और गहराई मांगता है- मगर अभी समय लगेगा आलोचनाओ में वैज्ञानिक दीठ को स्थापित होने में। (लोकभाषाओं में इंकलाबी स्वर ब-१ से साभार)
राजस्थानी कविता के दो महान थंभों की कविताएं....
'बादळी'- से दस दोहे.....
आंठू पोर अडीकतां वीतै दिन ज्यूं मास ।
दरसण दे अब, बादळी मूरधर नै मत तास ।।1।।
आठों पहर प्रतिक्षा करते हुए दिन भी महीनों की तरह व्यतीत होते
है । बादली, अब तो दर्शन दो ! मरूधर को और अधिक त्रास मत दो ।
आस लगांया मुरधरा देख रही दिन रात ।
भागी आ तुं, बादळी आयी रूत बरसात ।।2।।
मरूधरा तुम्हारी आशा लगाये दिन-रात देख रही है। बादली, तू
दौड़ी आ ! वर्षा ऋतु आ गई है ।
कोरां-कोरां धोरियां डूंगा-डूंगा डेर ।
आव रमां ए बादळी ले ले मुरधर ल्हैर ।।3।।
बादली, आओं ! मरूधर में लहरें ले ले कर, कोरे-कोरे टीलों
और गहरे-गहरे डैरों में रमण करें ।
ग्रीखम-रूत दाझी धरा कळप रही दिन रात ।
मेह मिलावण बादळी बरस बरस बरसात ।।4।।
ग्रीष्म ऋतु से दग्ध धरा दिन-रात कलप रही है । मेह से मिलन कराने वाली
बादली, बरसो और ख़ूब बरसों
नहीं नदी-नाला अठै नहिं सरवर सरसाय ।
एक आसरो बादळी मरू सूकी मत जाय ।।5।।
यहाँ न तो नद्दी-नाले है और न सरोवर ही सरसा रहे है । बादली एक तेरा
ही आश्रय है, अतः मरूधरा में बरसे बिना ही न चली जाना ।
खो मत जीवण, बावळी डूंगर-खोहां जाय ।
मिलण पुकारै मुरधरा रम-रम धोरां आयं ।।6।।
बादली, पर्वत गुफ़ाओं में जाकर मत खोओ । तुम से मिलने के लिये
मरूधरा पुकार रही है। यहाँ आकर टीलों में रमण करो ।
नांव सूण्या सुख उपजै जिवडै हुळस अपार ।
रग-रग नाचै कौड में दे दरसण जिणवार ।।7।।
तुम्हारा नाम सुनते ही सुख उपजता और प्राणों में अपार हुलास होता
है । जिस समय तू दर्शन देती है रग-रग तुम्हारे चाव में नाच उठती
है ।
आयी घणी उडिकंता मुरधर कौड करै।
पान फूल सै सूकिया कांई भैंट धरे ? ।।8।।
बहुत प्रतीक्षा के बाद तू आई है, इसलिए मरूधरा चाव कर रही है। पर फूल
पत्ते सब सूख गए है, वह तुम्हे क्या भेंट दें ?
आयी आज उडिकंता झडिया पान र फूल ।
सूकी डाळयां तिणकला मुरधर वाळ समूळ ।।9।।
प्रतीक्षा करते हुए आज तू आई है, पर फूल-पत्ते सब झड़ चुके है । मरूधार,
सुखी डालिंया और तिनके अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे ।
आतां देखै उंतवाली हिवडै़ हुयो हुळास।
सिर पर सूकी जावतां छूटी जीवण आस ।।10।।
तुम्हें द्रुतगति से आती देख ह्दय में हुलास हुआ, पर सिर पर से सूखी ही जाते समय जीवन की आशा छूट रही है ।
-----"लू"-- ऋतु काव्य से
कोमळ कोमळ पांखड्यां कोमळ कोमळ पान
कोमळ कोमळ बेलड्यां राख्या लूआं ध्यान ।। 1।।
फूलों की नरम-नरम पंखुड़ियां, नवांकुरित नरम-नरम पत्ते और नन्हीं-नन्हीं मृदु लताओं को बचानें का प्रयत्न तो करना, लूओं !
सूरज किरणां चाव में फूटी कळी समूळ
लूआं दीसी सामनै लागी हिवड़ै सूळ।। 2।।
००००००००००००००००००००००००००००००००००००
राजस्थानी इंकलाबी कवि मनुज देपावत का एक गीत
(धोरां आळा देस जाग रे......)
धोरां आळा देस जाग रे, ऊंठां आळा देस जाग।
छाती पर पैणा पड़्या नाग रे, धोरां आळा देस जाग
।।
उठ खोल उनींदी आंखड़ल्यां, नैणां री मीठी नींद
तोड़
रे रात नहीं अब दिन ऊग्यो, सपनां रो कू़डो मोह
छोड़
थारी आंख्यां में नाच रह्या, जंजाळ सुहाणी रातां
रा
तूं कोट बणावै उण जूनोड़ै, जुग री बोदी बातां रा
रे बीत गयो सो गयो बीत, तूं उणरी कू़डी आस त्याग
।
छाती पर पैणा पड़्या नाग रे ,धोरां आल़ा देश जाग
रे ! ऊंटा आल़ा देश जाग !
खागां रै लाग्यो आज काट, खूंटी पर टंगिया धनुष-
तीर
रे लोग मरै भूखां मरता, फोगां में रुळता फिरै वीर
रे उठो किसानां-मजदूरां, थे ऊंठां कसल्यो आज जीण
ईं नफाखोर अन्याय नै, करद्यो कोडी रो तीन-तीन
फण किचर काळियै सापां रो, आज मिटा दे जहर-
झाग ।
छाती पर पैणा पड़्या नाग रे ,धोरां आल़ा देश जाग
रे ! ऊंटा आल़ा देश जाग !.
रे देख मिनख मुरझाय रह्यो, मरणै सूं मुसकल है जीणो
ऐ खड़ी हवेल्यां हँसै आज, पण झूंपड़ल्यां रो दुख दूणो
ऐ धनआळा थारी काया रा, भक्षक बणता जावै है
रे जाग खेत रा रखवाळा, आ बाड़ खेत नै खावै है
ऐ जका उजाड़ै झूंपड़ल्यां, उण महलां रै लगा आग ।
छाती पर पैणा पड़्या नाग रे ,धोरां आल़ा देश जाग
रे ! ऊंटा आल़ा देश जाग !
ऐ इन्कलाब रा अंगारा, सिलगावै दिल री दुखी हाय
पण छांटां छिड़कां नहीं बुझैली, डूंगर लागी आज
लाय
अब दिन आवैला एक इस्यो, धोरां री धरती धूजैला
ऐ सदां पत्थरां रा सेवक, वै आज मिनख नै पूजैला
ईं सदां सुरंगै मुरधर रा, सूतोडां जाग्या आज भाग ।
छाती पर पैणा पड़्या नाग रे ,धोरां आल़ा देश जाग
रे ! ऊंटा आल़ा देश जाग !
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