कम्युनिष्ट पुरोधा

 

    अमर शहीद क्रांतिकारी कॉमरेड - बलदेव मान

                                           ● सतीश छिम्पा

    - (अमर शहीद कॉमरेड बलदेव मान की शहादत.. पंजाब में खाड़कू धड़ों की सबसे बड़ी गलती साबित हुई....हालांकि मैं इस हमारे कम्युनिष्ट पुरोधा श्रंखला की यह किश्त यहां नही देकर सीधा रिसाले में छपने भेजना चाह रहा था मगर इधर पंजाब से जो जो बहुत बुरे हालातो के फिर से उठ खड़ने के समाचार आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि पंजाब के फासिस्ट्स किसी बहुत घिनोने काम को अंजाम देने वाले है। दो समुदायों के कट्टर धड़े और दोनों ही बर्बर- इसलिए महान शहीद कॉमरेड बलदेव मान पर लिखी लिखत का एक संक्षिप्त अंश......)


   
         बलदेव सिंह मान प्रतिबद्ध, सच्चा, समर्पित और ईमानदार कम्युनिष्ट क्रांतिकारी था जो हर एक मोर्चे पर लग्न और हौसले से अथक और निर्बाध काम मे , मुहिम में जुटे हुए थे। वर्ष 1967-69 और 1970-71 नक्सली आंदोलन के सबसे सक्रिय वर्ष थे। देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था। देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधाधुंध अन्याय, दमन और हत्याओं और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग जन संगठनों का निर्माण करने और जन संगठनों में क्रांतिचेता विचारो के लिए सक्रिय भी था। आक्रोश के लिए वाहन बनने की ओर बढ़ रहा था। सन 1971 ई. में पश्चिमी मोर्चा युद्ध के चलते दहक रहा था।  इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पाकिस्तान के साथ युद्ध जीत लिया था और अंध राष्ट्रवाद के बवंडर को अपने पक्ष में रखा था, जल्द ही अंध उत्साह का बुलबुला फूटने लगा।। 

     छात्र युवाओ ने सिर पर कफ़न बांधकर ही घर से निकलने लगे थे। नहीं तो भला कौन सा भलामानस आग में कूदता है। परंतु जवानी को तो इंकलाबी, जुझारू, योद्धा, नक्सलबाड़ी बनने का पागलपन हो गया था । उन्होंने न तो नहरों के किनारों पर पुलिस की गोलियां की परवाह की और न ही वो उत्पीड़न केंद्रों( टाॅरचर सेंटर) के समक्ष डोले( घबराए)।हुकूमत उन्हें शहीद करती, और नौजवान बसंती गीत गाने के लिए  आगे आ जाते। 1967-69 का पहला दौर था। खाते-पीतों (धनाडों) की हजारों एकड़ जमीन पर मजदूरों किसानों के कबज़े करवाने और विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा के लिए सड़कों पर लाना।

   जब मरजीवड़े जमीनों पर लाल झंडे गाढ़ने लगे और विद्यार्थियों ने हुकूमत को कंपकपी ला दी तब फिर पुलिस का अत्याचार शुरू हुआ । क्रांतिकारीयों ने बदले के रूप में वर्गीय दुश्मन के सफाए की लाइन अपना ली। यह सिर लेने और देने का समय था। राजशाही की तरफ से बेहतरीन नौजवान मारे गए और लापता कर दिए गए और बाकियों  को तिल तिल कर मरने के बाद जेलों मेंबंद कर दिया गया । यह नक्सलबाड़ी लहर का हथियारबंद वाला दौर था। इस जुझारू विद्रोही लहर के लिए जंगबाजों का कत्ल और  जेलों के नर्क ने एक बार गैप पैदा कर दिया । हुकूमत उनकी कमर तोड़ने में कामयाब हो गई ।


   उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों का संघर्ष छिड़ गया और 1972 में पंजाब के किसानों ने जमींदारा यूनियन के नाम पर अपनी मांगों को लेकर लड़ाई शुरू कर दी। मोगा के छात्रों पर सरकार के मुंह से खून बह रहा था और दो छात्रों को पुलिस ने गोली मार दी थी।  जनता का प्रचण्ड आक्रोश, दावानल सा उबलता गुस्सा जो एक विशाल और उग्रवादी ऐतिहासिक संघर्ष में बदल गया था। 

  बलदेव का मानना था कि एक बेहतरीन कतार के लिए प्रतिबद्ध और सच्चे कम्युनिष्टस होने के साथ ही साथ विचार धारक रूप से भी उन्नत होना लाजमी है। मान का यह भी मानना था कि सूझबूझ भरी गतिशीलता के वैचारिक सोपान वाले युवा धर्म के नाम पर आतंक को फैलने नही देंगे और यह प्रतिरोधी स्टैंड उन्ही की देन था।


बलदेव सिंह मान अथक और निर्बाध गति का नाम थे
वर्ष 1967-69 और 1970-71 नक्सली आंदोलन के सबसे सक्रिय वर्ष थे। देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था। देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधे दमन और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग सार्वजनिक संगठनों का निर्माण करने और सार्वजनिक आक्रोश के लिए वाहन बनने की ओर बढ़ रहा था। यद्यपि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पाकिस्तान के साथ युद्ध जीत लिया था और अंध राष्ट्रवाद के बवंडर को अपने पक्ष में रखा था, जल्द ही अंध उत्साह का बुलबुला फूटने लगा। उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों का संघर्ष छिड़ गया और 1972 में पंजाब के किसानों ने जमींदारा यूनियन के नाम पर अपनी मांगों को लेकर लड़ाई शुरू कर दी। मोगा के छात्रों पर सरकार के मुंह से खून बह रहा था और दो छात्रों को पुलिस ने गोली मार दी थी। प्रचंड जनता का गुस्सा एक विशाल और उग्रवादी ऐतिहासिक संघर्ष में बदल गया था।

इस अवधि के दौरान, नक्सली आंदोलन, विशेष रूप से सीपीआई (एम), (एमएल) सत्यनारायण सिंह के नेतृत्व में कीर्ति किसान यूनियन, नौजवान भारत सभा जैसे क्रांतिकारी जन संगठन मैदान में उतरे। यह गौरवशाली ऐतिहासिक काल है जब युवा नेता बलदेव सिंह मान की क्रांतिकारी गतिविधियों और कम्युनिस्ट क्रांतिकारी चरित्र का निर्माण और विकास शुरू हुआ।
भरत सभा के निर्माण में युवा नेता बलदेव सिंह, उनके साथी शस्त्रराज सुखराज सिंह छीना, हरदेव सिंह छीना, सरबजीत सिंह भितेवध, जगीर सिंह खेमकरन, बलराज सिंह जगदेव कलां, जगतार सिंह, और कई अन्य युवा नेता शामिल हैं। अमृतसर जिले में युवा जागृति और सक्रियता की एक निर्बाध हवा बहने लगती है। युवा भारत सभा गाँव के बदमाशों, जमाखोरों, ब्लैकमेलरों, मुखबिरों और ठगों की नींद से वंचित दिख रहा है। यह ऐसा था जैसे कोई समुद्र मंथन कर रहा हो और देवता सभी राक्षसों को चुनौती दे रहे हों।

युवा और छात्र नेता बलदेव सिंह मान इस समुद्र मंथन में पाया गया एक बहुमूल्य हीरा था। कुछ महीनों के भीतर, पूरे जिले में युवा भारत सभा इकाइयाँ स्थापित की जा रही थीं।
युवा नेता कॉमरेड मान ने भी छात्रों को संगठित किया। गुरशरण भी अमृतसर में भाई जी की सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा थे और कभी-कभी अपने छोटे नाटक मंडली के साथ नाटक भी खेलते थे। मान की प्रतिभा इतनी बहुमुखी थी कि वह एक कहानी भी बना सकते थे।
युवा भारत सभा के नेतृत्व में युवा आंदोलन को भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। कुछ में 'लीडर' बनने की इच्छा पैदा हुई और लोगों को चौधरी बनने के लिए प्रेरित किया, कुछ को एक विशेष राजनीतिक पार्टी के हितों की सेवा करने और कुछ को केवल युवाओं की गतिविधियों के लिए प्रेरित किया। मान को इन सभी गलत और कुटिल प्रवृत्तियों से निपटना था। कॉमरेड मान ने अपने विचारों और संगठनात्मक क्षमता की परिपक्वता के साथ इन सभी गलत प्रवृत्तियों को दूर करना सीख लिया था।
नौजवान भारत सभा के नेतृत्व में, अमृतसर जिले में किसानों, औद्योगिक श्रमिकों और युवाओं का एक जन-आंदोलन चल रहा था, जब खतरे की घंटी बजी।
युवा आंदोलन और युवा भारत सभा को खुद की देखभाल करने और गतिविधि के नए रूपों की खोज करने की चुनौती दी। इस समय के दौरान, कॉमरेड मान ने अपने जीवन की गतिविधि और संघर्ष की यात्रा को जारी रखने और समर्पित करने के लिए, अपने दिल में वास्तविक और कम्युनिस्ट क्रांतिकारी विचारों की अटूट स्वीकार्यता का एहसास करते हुए, परिपक्वता का रास्ता चुना। । अब कॉमरेड मान न केवल एक युवा नेता के रूप में, बल्कि एक कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेता के रूप में भी उभरे।
आपातकाल के उठाने के बाद, कॉमरेड मान ने अपनी बहुमुखी गतिविधियों की निरंतरता को और विकसित किया। उन्होंने पार्टी के नेता भगवंत सिंह उर्फ ​​हलधर के नेतृत्व और सहयोग में युवा आंदोलन के प्रवक्ता, 'ललकार' का प्रकाशन शुरू किया।

      इस के लगातार प्रकाशन, नई और अलग लेखन सामग्री के कारण यह मासिक पत्र कुछ ही महीनों अपनी विलक्षण स्थान और पहचान स्थापित कर गया था। एक बार जब इसकी आर्थिक समस्या बहुत गंभीर हो गई थी, तब इसके संपादक साथी मान, अपना सोने का कड़ा भी गिरवी रखने से नहीं हिचकिचाए थे। आपातकाल हटाए जाने के बाद हुए पंजाब विधानसभा चुनावों में यही कॉमरेड मान माकपा (एम. एल.)  के उम्मीदवार के रूप में सत्यनारायण सिंह के राजासांसी से चुनाव मैदान में उतरें। इस चुनाव में मान, उनके साथियों और पार्टी संगठन के कार्यों ने सीपीएम के उम्मीदवार श्री दलीप सिंह तपियाला और उनकी पार्टी के साथ ही कांग्रेसियों और अकालियों को भी चिन्ता में डाल दिया था। इन चुनावों में कामरेड मान और पार्टी को मिली। हजार वोटों ने सभी को हैरानी में डाल दिया था। यंहा तक कि क्रान्तिकारी कम्यूनिस्ट कैम्प भी मान को मिले इस जनाधार से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। पंजाब में खासकर अमृतसर में खालिस्तानी आतंक, सरकारी साम्प्रदायिक हिंसा और देश भर में हुए सिख समुदाय के कत्लेआम के बावजूद कॉमरेड मानू और उनकी पार्टी अपनी राजनैतिक जनाधार को बचाने में सफल रही थी।

 बिल-बहिष्कार, उग्रवादी किसान आन्दोलन तथा कीर्ति किसान यूनियन के कुशल नेतृत्व का भी क प्रभाव था जिसने 1985 के विधान सभा चुनावों में कॉमरेड मान और उनकी पार्टी का जनाधार और उनके वोटों की गिनती को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका अदा की।
 मई 1983 में गाँवो में पंचायत चुनाव हुए । मानु जल्द ही अपनी परेशानियों से बाहर निकले और बिल-बाहिष्कार के नारे के साथ गाँवों में पहुंचे। गाँव-गाँव में किसान समितियों उभरने लगी और बिल-बहिष्कार आन्दोलन प्रभावी होने लगा। सरकारी और साम्प्रदायिक आंतक के  घातक, भयंकर और भटकाव वाले प्रभावों के बावजूद अजनाला, खेमकरण, झबाल आदि स्थानों पर कि कीर्ति किसान संघ के झुण्डे तुले जोश पूर्ण किसान सम्मेलन होने लगे कॉमरेड माने और उनके जुझारू साथियों का यह काम एक एतिहासिक काम था जिसने बता दिया कि सरकारी और साम्प्रदायिक दहशत का मुकाबला करने के लिए' एक विशाल किसान और लोक-लहर अनिवार्य आवश्यकता है| इसने यह भी सिद्ध कर दिया कि साम्प्रदायिकता से लड़ना अपरिहार्य और जनता का मोर्चों पर जुटना भी जरूरी है। किसानों के इस साहसी और फुर्तीले आन्दोलनं का ही परिणाम था कि मार्च 1984 में चड़ीगढ़ में एक राज्य-स्तरीय किसान सम्मेलन का आयोजन हुआ। 

 इस सम्मेलन से ही कॉमरेड मान के नेतृत्व में साम्प्रदायिकता से जूझते सीमावर्ती जिले के अमृतसर में 74 टूक लेकर कूच किया। प्रदर्शन के अन्त तक ट्रकों का काफिला अमृतसर  से आता-जाता रहा। कॉमरेड मान की  पार्टी उनकी टीम ने भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक मजबूत आधार स्थापित करने का महान काम किया था।
 पर ऑपरेशन ब्लू स्टार ने इस मोर्चे में अड़चन पैदा कर दी। दोनों प्रकार के आंतक का सामना और सेना के दमन से निपटा जाना भी एक समस्या थी। कुछ कान्तिकारियों को गिरफ्तार भी किया गया और कुछ को उन्हें सैन्य अधिकारियो द्वारा बुरी तरह प्रताड़ित किया गया।
    


    अमर शहीद कामरेड बलदेव सिंह मान की अपनी नवजात बिटिया के नाम चिट्ठी...

"तेरा स्वागत करता हूँ, मेरी प्यारी बच्ची। तुम्हारे जन्म का समाचार तुम्हारी दादी से 18 तारीख़ (सितम्बर, 1986) को मिला। तुम्हारी दादी ने यह समाचार उतनी प्रसन्नता से नहीं बताया, जितनी प्रसन्नता से यह समाचार उसने तुम्हारे स्थान पर लड़के के जन्म की स्थिति में मुझे दिया होता। क्योंकि, तुम एक लड़की हो, इसलिए घर का माहौल तेरे जन्म से इतना ख़ुशगवार नहीं हुआ। शोक संतप्त ढंग से ताइयों ने कहा, "अच्छा, गुड्डी आ गयी?" जैसे कि कुदरत ने मेरे साथ कोई बड़ा अन्याय किया हो। इस तरह के माहौल में तुम्हारे आगमन के बारे में मुझसे पूछा जा रहा है। तेरे तायों ने तो आज मेरे साथ इस बारे में कोई बात ही नहीं की।शायद वे इस बारे में कुछ भी न कहना बेहतर समझते हैं। कुछ कॉमरेड दोस्त जो मेरी विचारधारा से अवगत हैं, या इस प्रकार कह लो कि मेरी विचारधारा के साथ हैं, तेरे जन्म की ख़ुशी की बधाई देंगे और मुझे तेरे जन्म की ख़ुशी में पार्टी लेने के लिए कहेंगे। तेरी दादी ने तेरे नानकों (ननिहाल) की ओर से भेजे गये बधाई के पत्रों पर भी आश्चर्य व्यक्त किया है और हैरानी भरे लहज़े में पूछा है कि, "लड़कियोंं की काहे की बधाई होती है?" उसे यह गम है कि उसका पुत्र बढ़ा नहीं, बल्कि वह तो घट गया है। वह तभी बढ़ता है यदि उसके घर पुत्र ने जन्म लिया होता।
मेरी बच्ची, मुझे इस सब पर कोई हैरानी नहीं हुई और क्योंकि, मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि वर्तमान सामाजिक प्रणाली में लड़की एक बोझ समझी जाती है, ऋण का भार समझी जाती है। मैंने इस विषय पर बहुत कुछ पढ़ा और सुना था, और मैं आज ख़ुद इस अनुभव से गुज़र रहा हूँ।इससे बड़ा गम शायद तेरी दादी को इस कारण भी हो सकता है क्योंकि मैं उसकी नज़रों में बेकमाऊ तथा बेकार हूँ और शायद निकम्मा भी। इसलिए, तुझे किसी कमाऊ और रोज़गार में लगे पिता की बेटी बनना चाहिए था। इस समाज का यह व्यवहार तो सदियों से ऐसा ही चला आ रहा है। औरत की गुलामी का यह सिलसिला भी जागीरदारी तथा पूँजीवादी व्यवस्था की ही पैदावार है।
प्यारी बच्ची मेरे जीवन का उद्देश्य और मेरे द्वारा लड़ी जा रही लड़ाई शायद मुझे बहुत ही देर से, बड़ी होने पर समझ आये। जिस समय तूने जन्म लिया है, पेजाब की धरती सांप्रदायिक आधार पर बँटी पड़ी है।कहीं लोग इसलिए मारे जा रहे हैं क्योंकि उनके सिरों पर केश नहीं हैं, तो कहीं इस कारण ज़िन्दा जलाये जा रहे हैं क्यांेकि उनके सिरों पर केश हैं।धर्म के नाम पर मानवता की हत्या की जा रही है। लोगों को विभाजित करके, खून की होली खेलने में लगाकर, शैतान दूर बैठे हँस रहे हैं। मेरी बच्ची, जिस वक़्त तुमने जन्म लिया है, तेरा पिता इन सियाह ताक़तों के ख़िलाफ़ संघर्ष में व्यस्त है। ये सियाह ताक़तें इस धरती से प्रकाश को ओझल कर देना चाहती हैं। रौशनी फैलाने वाले आफ़ताबों को ख़त्म करना इनकी साज़िश है। मेरी बच्ची, इन साज़िशों के विरुद्ध संघर्ष करना, शहादतें देना अत्यंत आवश्यक है। मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि मैं रोशनी की तलाश करते-करते इनके हाथों शहीद नहीं हो जाऊँगा।कुछ भी हो मेरी बच्ची, तुझे हमेशा अपने जीवन में इस बात पर गर्व होगा कि तुम एक ऐसे पिता की बेटी हो, जिसने इस आँधियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी। शायद तेरी ज़िंदगी में मैं तुझे वे सुविधाएँ न दे सकूँ और न ही वे ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर सकूँ जो एक पिता को बच्चों के लिए करनी चाहिए, लेकिन मेरे सिद्धान्त की विरासत तेरे लिए सबसे अनमोल होगी। तुम एक ऐसे दिये की लौ हो, जिसे प्रकाश बाँटना है। 
शायद तुझे वे सियाह पहन न नसीब हों, जिनमें मेरे लोग इस वक़्त गुज़र रहे हैं। बलिदानों के बीज बोकर हम यहाँ एक ऐसे चमन की रचना कर डालें, जिसमें तुम आज़ादी की हवा खा सको। यदि हम इस लड़ाई को जीत न भी सकें, तो मेरी बच्ची, तुम उस सच के लिए लड़ रहे काफ़िले की नायक बनने की कोशिश अवश्य करना। मैं कभी नहीं चाहूँगा कि तुम सिक्ख बना, हिंदू या मुसलमान बनो। इन सबसे ऊपर उठकर इनसान बनने की कोशिश अवश्य करना। देखना कहीं इन बँटवारों में तुम्हारी इनसानियत न बँट जाये। मेरी प्यार बच्ची, इन कुछ शब्दों के जरिये, तेरे जन्म पर मैं यह संदेश भेज रहा हूँ। आशा है स्वीकार करोगी और इस पर अमल भी करोगी। ये कुछ शब्द तेरी ज़िंदगी की बुनियाद हैं, इन पर अपनी ज़िंदगी के सपनों का निर्माण करना।" 

                -तुम्हारा पिता।

यह मार्मिक चिट्ठी शहीद कामरेड बलदेव सिंह मान ने अपनी नवजात बिटिया के नाम लिखी थी जो हिंदी जगत सहित तत्कालीन भारतीय भाषाओं में चर्चा का विषय रही, एक अमर चिट्ठी की तरह।

। इसके एक हफ़्ते बाद ही 25 सितंबर 1986 की रात आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी, और यही हत्या खालिस्तान के ताबूत में अंतिम कील साबित हुआ था। उस वक़्त, जब बेटियों का जन्म बोझ माना जाता था, अपनी बेटी के नाम एक पिता की यह चिट्ठी प्रेरणादायक है।

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