पाश का रो देना आंसू बहाना, आम बात नहीं थी


लोर्का, एक नाम ही नही, गीत था मुक्ति का,  आजादी का हामी वो कम्युनिष्ट क्रांतिकारी कवि जिसकी कविता 'एक बुल फाइटर की मौत' कविता सुनकर तानाशाह फ्रांको ने कहा था, "यह आवाज़ चुप होनी चाहिए।" और फ्रांको के पिट्ठुओं ने लोर्का का कत्ल कर दिया, मगर लोर्का न सिर्फ स्पेन में बल्कि विश्व में अमर हो गया,उसी तरह पंजाब में 23 मार्च 1988 को तलवंडी सलेम में अपने खेत में लगे ट्यूबवेल पर नहाते वक्त मित्र हंसराज के साथ अवतार सिंह सन्धु पाश की आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी लहर के आग्गु क्रांतिकारी कवि पाश न केवल पंजाबी बल्कि विश्व कविता में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं,पाश ने खुद लिखा है कि, "जो सफ़र मेरी कविता ने किया उसी तरह का सफ़र मेरे जीवन का है।मार्क्सवाद के बारे में गहन शिक्षा सीपीआई के पार्टी स्कूलों में हासिल की,ज़िन्दगी के बारे में प्रगतिशील नज़रिया हासिल करने के बावजूद अगर मुझे 1970 के शुरू में नक्सली कॉमरेडों से मेलजोल  रखने के लिए जेल ना हो गयी होती तो अब तक मैं मोहब्बत और पहचान के निगुणेपन आदि विषयों पर लिखने वाला कवि होता।"

"किरचां खिंडा दिंदी सी पाश दी कविता" नामक संस्मरण में पाश के दोस्त शमशेर सन्धु लिखते हैं कि,-
"जगराओं के एल.आर.एम. कॉलेज में  कवि दरबार था जिसमे पाश को लाने की जिम्मेदारी मेरी थी।कवि दरबार शुरू होने लगा तो पाश कहने लगा,"मैं तो आधे'क मिनिट की कविता सुना के खे'ड़ा छुड़ा लूंगा।तेरे आड़ी का मान रख लूंगा पर मुझे बार-बार स्टेज पर और कविताएँ सुनाने के लिए मजबूर मत करना।पाश ने वहां जो छोटी सी 9 लाइनों की कविता सुनाई उसकी याद ज्यों की त्यों तरोताज़ा है।पाश ने अभी एक ही लाइन अपनी गरजती आवाज़ में बोली थी कि खचाखच भरा पांडाल नारों से गूंज उठा।पाश ने एक हाथ लहरा कर विद्यार्थियों को शांत करने की कोशिश की पर विद्यार्थियो का तो जैसे खून खोलने लग गया।नारे और ऊँचे और ऊँचे होते गए......

"इंकलाब
ज़िंदाबाद,ज़िंदाबाद
प्रिथीपाल रंधावा
अमर रहे,अमर रहे
पाश की कविता
ज़िंदाबाद,ज़िंदाबाद।"
नारों की गूँज कुछ कम हुई तो पाश ने छोटी पर पूरी कविता सुनाई।कविता क्या थी,जैसे कोई शक्तिशाली बम फट गया हो,जैसे चारों तरफ किरचें खिंड गयी हो।कविता थी 'पंजाब स्टूडेंट यूनियन' के आग्गु प्रिथीपाल रंधावा के बारे में,जिसका कत्ल हो गया था।
प्रिथी नूं
"जिदण तूं प्रिथी जम्मिया
केहड़ा दिन सी माँ" 
कविता खत्म करके पाश कॉलेज के पांडाल से बाहर की ओर रवाना हुआ तो यूँ लगा जैसे सारा पांडाल ही उसके पीछे चला जा रहा हो।कॉलेज के गेट तक पहुँचने तक उसके प्रशंसकों ने उसे नज़दीक से देखने के लिए घेर लिया।किसी न किसी तरह पाश को हमने भीड़ से निकाल लिया।आधा'क फर्लांग दूर निकल आए।फिर भी बहुत सारे लड़के पीछे-पीछे आ गए।उनकी सिर्फ एक ही ज़िद थी कि पाश उन्हें एक कविता और सुनाए,उनके प्यार को सम्मान देते हुए पाश ने 'मैं घास हूँ' नामक कविता सुनाई थी।"

   "सन्नाटा छा गया पाश की कविता से" नामक संस्मरण में शमशेर सन्धु लिखते हैं कि,"खालसा कॉलेज लुधियाना में साहित्यिक समागम था।हमे शाम को  मॉडल टाउन की रिहाइश से सन्देश मिला कि सुरजीत पातर के कमरे में पहुँचो।वहां पहुंचे तो माहौल शादी वाले घर की तरह का था।सेखों साब ने सबको चुप करवाया और कहा अब कोई नहीं बोलेगा,अब पाश कविता सुनाएगा।

   पाश ने पहले तो हल्के से हासे और अंदाज़ में कहा,"चन्दरयो इक कविता हुक्म करण लगियां।" किसी भोले बंदे ने आगे से कहा,"काका,कविता हुक्म नीं करीदी, सगों कहिदा हुँदा कविता अर्ज़ कर रिहां।"
फिर कोई और आवाज़ उभरी,"पाश वरगे कवि कविता अर्ज़ नीं करदे हुंदे, हुक्म ही करदे हुंदे आ"फिर सन्नाटा छा गया,पाश ने अपनी गहरी और भरी हुई आवाज़ में कविता सुनाना शुरू किया,----
"मेरे तों आस ना कर्यो 
कि मैं खेतां दा पुत्त हो के
तुहाडे चगळे होये स्वादां दी गल्ल करांगा
मैं तां जद वी कित्ती
खाद दे घाटे
किसी गरीबड़ी दे हिक वांग पिचक गए
गन्नेयां दी गल्ल ही करांगा
मैं बैंक दे सेकेट्री दी खचरियां मुच्छां
सरपंच दी थाणे तक लम्मी पुच्छ 
ते ओस पूरे चिड़ियाघर दी
जो मैं आपणी हिक उत्ते पाळ रख्या है

जां ऐदां दी ही कोई करड़-बरड़ी गल्ल करांगा/मैं जट्टां दे साध होवण ते उरां दा सफ़र हां/मैं बूढ़े मोची दी गुमी होइ अक्खां दी लौ हां/मैं टुंडे हौलदार दी सज्जी हत्थ दी याद हां केवल/मैं पिण्डे वक्त दे चपा सदी दा दाग हां केवल।"
पाश ने कविता क्या सुनाई।वहां सन्नाटा छा गया।जैसे कोई जोरदार बम चलने के बाद कान सां....सां....करने लग जाते हैं।बीस मिनिट तक कमरा सन्नाटे में डूबा रहा।"

   पाश क्रान्ति का कवि था,मेहनतकशों और सीमांत किसानो की आवाज़ था।इंदिरा गांधी की मौत पर पाश ने "बेदखली के लिए विनय पत्र" नामक कविता लिखी थी,-
"मैंने पूरी उम्र जिसके विरुद्ध सोचा
और लिखा
अगर उसकी मौत के शोक में
सारा देश ही सम्मिलित है तो इस देश से मेरा नाम काट दो।"
"धर्म दीक्षा लई विनय पत्र" नामक कविता में वे भिंडरावाला के लिए लिखते हैं-
"मेरा एक ही बेटा है धर्म गुरु
और मर्द बेचारा सिर पर नहीं
तेरे इस तरह गरजने के बाद
मर्द तो दूर दूर तक रहते ही नहीं।"
पाश खुलकर मोहब्बत किया करता था,खुल कर जीता और रहता था।

पाश 1980 से ही आतंकियों के निशाने पर था,मगर उनके नापाक इरादो को कामयाबी नहीं मिल रही थी।पहले राजसत्ता और फिर आतंकवाद का सामना करते पाश का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। पाश की हत्या करने वाले शायद जानते नहीं थे कि उन्होंने सिर्फ पाश के शरीर को मारा है,उसकी कविता को नहीं।आज उन हत्यारों का कोई नामलेवा नहीं है मगर पाश की कविता विश्व परिदृश्य पर गूंज रही है,करोड़ो छात्र नौजवानो के दिल में बसी हुई है और जबान पर चढ़ी हुई है।


(२)
पाश जब जेल में कैद थे झूठे कत्ल केस में ये बात पुलिस भी जानती थी कि पाश बेकसूर है, और यह भी कि ये नाबालिक भी है और उसकी शुरुआत की इक्का दुक्का विद्रोही कविता के बारे में भी..... मगर नक्सल लहर की दहशत इतनी थी कि पुलिस और सत्ता पाश को खतरनाक मान रही थी और एक घुप्प अँधेरी कोठड़ी में उसे बंद कर दिया गया था। जहां खटमल और अँधेरा ही उसके साथी थे। और उन्ही मुश्किल दिनों में कविताएँ पाश के भीतर ठांठे मारने लगी थी। मगर कागज़ और कलम उस "खतरनाक" आदमी को कौन देता। अपने मुलाकाती सज्जनो को उसने कहा कि "जैसे भी हो कागज़ कलम पहुँचाओ" और फिर अगली मुलाकात में एक अजीब सी तरकीब से कागज़ कलम अंदर पहुंचे। दरअसल एक खाकी और एक सफ़ेद लिफ़ाफ़े में दो सन्तरे और दो केले भेजे गए। इन्ही कागज़ों पर पाश को कविताएँ लिखनी थी। और केलों में खोंसी गयी थी 2 रिफिलें।

    इसी झूठे कत्ल केस की सजा रूप में कैद पाश को भीतर का हिलोरे खाता आक्रोश कविता में ढलता नजर आया। उसी दौर के लिए पाश के दोस्त और पड़ोसी सन्त सन्धु लिखते हैं कि "जब मैं पाश से मिलने जाता था तो वो मुझे अपनी लिखी कविताओं की रफ़ ड्राफ्टिंग देता था और मैं उन्हें पत्र पत्रिकाओं में भिजवाता था।" पाश विद्रोही या बागी कवि ही नहीं बल्कि क्रान्ति के लिए जीने वाला क्रांतिकारी कवि  कवि भी था... हालांकि वे लहर से सीधे नहीं बल्कि सिम्पेथाइजर के रुप में जुड़े हुए थे। बाद में जब पाश रिहा हुए तो उन्ही कविताओं का उनका 1970 में कविता संग्रह आया था "लोह कथा".... खेतों के बेटे और क्रान्ति के हिमायती पाश का यह पहला कविता संग्रह था।

 (३)
रात के समय किसे जगाते,हम (अवतार पाश और शमशेर सन्धु) पाश के घर की दिवार फांद के अंदर पहुँच गए क्योंकि बंटवारे के समय चौबारा बड़े भाई ओंकार संधू के हिस्से चला गया था। भीतर एक चारपाई थी बहुत ही ढीली.... हम उस पर लेट गए, मगर नींद कहाँ...
कुछ देर बाद.....ये क्या ?? मेरा कंधा आंसुओं से भीग गया। घोर आश्चर्य, हमेशा चहकते, हंसते मुस्कुराते रहने वाला पाश रो रहा है। वो कुछ समय बाद उठा और पौड़ियों पर बैठ बुदबुदाने लगा....
"हमारा परिवार यूँ ही बंट बुंट गया.... बापू को मुझसे बहुत उम्मीद थी, मगर मैं अच्छा बेटा न बन सका.... बड़े भाई को मुझसे उम्मीद थी मगर मैं कमाऊ भाई न बन सका, मैं यूँ ही रहा.... हर रोज़ मैं खुद का कत्ल करता हूँ....."
        
   ( शमशेर संधू (संपादक ट्रिब्यून) की लिखी किताब  'इक पाश आ वी' से साभार)



पाश का एक ख़त

पाश ने यह ख़त 19 अप्रैल 1984 को अपने बहनोई धीदो गिल (हरशरण गिल) को सम्बोधित करके लिखा था।
धीदो और साथियों

        एक चिट्ठी कल आपको लिखी थी। तब मैं अजीब से गुस्से, जोश और उत्तेजना में था। बात यह हुई कि मुझे ताज़ा ताज़ा वारेंट मिला था। नकोदर कॉलेज के कुछ विद्यार्थी मुझे चौकस करने के लिए आए थे कि भिंडरावाले के नए लड़ाकों ने नकोदर इलाके के चार जनों को मारने की योजना बनाई है।मेरा नाम विशेष तोर पर इसमें है। देखते हैं, इसमें सफल होते हैं कि नहीं। वैसे इन दिनों उनसे कुछ भी झूठ या असम्भव नहीं रह गया है। नक्सलियों के सभी ग्रुपों को दौड़ा रहे हैं । (नागारेडी लाइन का हरभजन सोही ग्रुप, सत्यनारायण सिंह ग्रुप, चारु ग्रूप, चैटर्जी ग्रुप.. दरअसल ये आसान टारगेट थे क्योंकि निडर थे निहत्थे और अकेले आया जाया करते थे। ० यह टीप अनुवादक ने बात साफ करने के लिए की है।)    हिंदुओं और निरंकारियों पर तो शायद रिहर्सल मात्र थी। असली टक्कर तो आजकल संत की नज़र में इंकलाबियों के साथ है। इस प्रक्रिया में सरकार भी पूरी निहाल है।

      माली (मालविंदर सिंह मल्ली, पहले नक्सल कम्युनिष्ट फिर भटकाव के कारण खालिस्तानी और नक्सल एकता की बात करने लग गया. आज भी जीवित है यह, फेसबुक पर सक्रिय है। ० टीप अनुवादक की है।) आदि ने एक एक्शन कमेटी बना कर इनसे हथियार बंद टाकरा लेने की योजना बनाई थी पर हर बार टक्कर होने से पहले ही हार जाते थे।जो जो ग्रुप मालवे में खुद को बहुत मज़बूत मानकर चल रहे थे सबका यही हाल है। और सब से ज्यादा ताकत भी सन्त की मालवे के गाँवो से ही उठी है। इस सारे काम में अगर किसी इंकलाबी ने कुछ किया है तो वो भट्टी दुसांझ (दर्शन दुसाँझ, हत्या कर दी गई थी उग्रवादियों द्वारा।) आदि ने ही किया है। सुर्ख़ रेखा (कम्युनिस्ट) की गिनती कई बार पन्द्रह हजार से भी ज्यादा हो जाती है। ये लोग इस तरीके से अचानक ही सामने आए हैं कि आम लोग कहते हैं कि 'इस वक्त पंजाब में दो ही पार्टियां है सिंघों की और सुर्ख़ रेखा वालों की।
      अब भला मैं किस तरह की चौकसी बरतूं ? साल पहले एक आदमी जिसके पास स्टेन गन और रिवॉल्वर थे, मुझे कहता कि चाहिए तो ले जा, पर मैंने भाई से बात की मगर वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे थे।  अब मैं हर रात घर बदल बदल कर सोता हूँ। और दिन में भी पन्द्रह बीस आदमी मेरे साथ रहते हैं। अगर वे लैस होकर आ गए तो आदमी भी क्या करेंगे।

स्कूल से छुट्टी भी नहीं ले सकता क्योंकि फिर नया मास्टर रखना पड़ेगा जो कि गुंजाईश में नहीं है।

       आगे के हालात बताता रहूंगा।
                                 आपका
                                     पाश


"तलवंडी सलेम नूं जांदी सड़क" किताब से

(पाश की कुछ मीठी गल्लां बातां.....)
रूह में तो "वो" बैठी है......
पाश जब मिल्खा सिंह की जीवनी लिख रहे थे तो उनसे काम में देरी हो रही थी तो एक दिन "देश प्रदेश" के सम्पादक तरसेम ने उन्हें कहा कि,"पाश तूं जीवनी लिखते समय अपनी रूह में मिल्खा सिंह को बैठा लिया कर।"
     पाश हमे बुदबुदाते हुए कहता,"बताओ भला मैं मिल्खा सिंह को अपनी रूह में कैसे बैठा लूँ,मेरी रूह में तो बहुत अरसे से "वो" बैठी है,तुम सबको तो पता ही है......मैं किसी और को नहीं बैठा सकता"
'इक पाश एह वी' से
अवतार पाश को सलाम
संजीदा पाश......

रात के समय किसे जगाते,हम (अवतार पाश और शमशेर सन्धु) पाश के घर की दिवार फांद के अंदर पहुँच गए क्योंकि बंटवारे के समय चौबारा बड़े भाई के हिस्से चला गया था।भीतर एक मांची थी बहुत ही ढीली....हम उस पर लेट गए,मगर नींद कहाँ...
कुछ देर बाद.....ये क्या,मेरा कंधा आंसुओं से भीग गया.....हमेशा चहकते,हंसते मुस्कुराते रहने वाला पाश रो रहा है...वो कुछ समय बाद उठा और पौड़ियों पर बैठ बुदबुदाने लगा....
"हमारा परिवार यूँ ही बंट बुंट गया....बापू को मुझसे बहुत उम्मीद थी,मगर मैं अच्छा बेटा न बन सका....बड़े भाई को मुझसे उम्मीद थी मगर मैं कमाऊ भाई न बन सका....मैं यूँ ही रहा....हर रोज़ मैं खुद का कत्ल करता हूँ....."
इक पाश एह वी

मुझे अवतार सिंह पाश से जुड़ा एक संस्मरण बराबर याद आ रहा है जो तलवंडी सलेम नूं जांदी सड़क किताब में संकलित है।हुआ यूँ कि पाश को मालवा इलाके की किसी साहित्य संस्था का कार्यक्रम के लिए न्योता मिला था।वे गये मगर वापस आने का उनके पास पूरा किराया नहीं था।वे किश्तों में,हिच हाइकिंग करते हुए जलन्धर पहुंचे और वहां से पैदल अपने गांव तलवंडी सलेम में....यह सिर्फ पाश ही नहीं,सन्तराम उदासी और लालसिंह दिल के साथ भी होता रहता था।हवाई जहाजों में सफर करने वाले और चिल्ली चिकन खाकर अलसाने वाले लेखक शायद जमीन पर रहने वाले लोगों और रचनाकारों की पीड़ाएं नहीं समझ पाते कि  कैसे कोई युवा लेखक रचनाओं में अपने दिल और देह और पसीने और अँधेरे दिनों को बिखराता है।
सतीश

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