फिलिस्तीन का मुक्ति संघर्ष और जुझारू कविता


विश्व प्रतिरोधी कविता.. (१)

फिलिस्तीनी मुक्ति युद्ध की कविताएं और कवि
महमूद दरवेश और समीह अल कासिम
_____________________________________  

                                   ● सतीश छिम्पा
           
( कविता मेरे धड़कते हृदय का रक्त है-- महमूद दरवेश की चर्चित कविता 'चुनोती' से..निर्वासन झेलता हुआ प्रतिबद्ध प्रतिरोध और जीवन का कवि.... हम जश्न मना रहे थे। उत्सव, नाच गाना और शराब और पूंजी जनित अमानवीय अपसंस्कृतिक, फासीवादी अवमूल्यों (रिवाज़े) में गले तक डूबे उन्हें वैश्विक रूप में 'मेरा देश महान' तर्ज पर थापित कर रहे थे। जब विश्व मे प्रत्यक्षतः नही बचा था कोई शक्तिशाली प्रतिबद्ध बैरिकेड, नहीं था कहीं भी महान मानव जीवन, सब दूषित समय के गुलाम बनकर जनता होने के महान भावों की बजाए नागरिक बनने लगे और सभी देश लाशों के ढेर में बदल कर तठस्थ खड़े रहे- सामने बलात्कृत हो रही थी फिलिस्तीन की महान धरती। )

   सन 2015 में राजस्थानी की अनुवाद पत्रिका अनुसिरजण के लिए  फिलिस्तीन के संघर्ष की कुछ  कविताओं का राजस्थानी अनुवाद किया था। और एक विशेषांक भी मैने रक्षक के लिए अनुवाद करके संपादित किया था। यह हर एक भावुक व्यक्ति को भीतर तक गीला कर सकने वाला मसला है। आप मातृभूमि से निष्काषित व्यक्ति की पीड़ा के बारे में शायद जानते होंगे, नही जानते तो 'अब्दुल करीम अल करामी' उर्फ अबू सलमा की इस पीड़ा को महसूस कीजिए...

- "हम लोग लौटेंगे''

 

प्यारे फलस्तीन मैं कैसे सो सकता हूं

मेरी आंखों में यातना की परछाईं है

तेरे नाम से मैं अपनी दुनिया संवारता हूं

और अगर तेरे प्रेम ने मुझे पागल नहीं बना दिया होता

तो मैं अपनी भावनाओं को

छुपाकर ही रखता

दिनों के काफिले गुजरते हैं

और बातें करते हैं

दुश्मनों और दोस्तों की साजिशों की

प्यारे फलस्तीन

मैं कैसे जी सकता हूं

तेरे टीलों और मैदानों से दूर

खून से रंगे पहाड़ों की तलहटी मुझे बुला रही है

और क्षितिज पर वह रंग फैल रहा है

हमारे समुद्र तट रो रहे हैं

और मुझे बुला रहे हैं

और हमारा रोना समय के कानों में गूंजता है

भागते हुए झरने मुझे बुला रहे हैं

वे अपने ही देश में परदेसी हो गये हैं

तेरे यतीम शहर मुझे बुला रहे हैं

और तेरे गांव और गुंबद

मेरे दोस्त पूछते हैं

‘क्या हम फिर मिलेंगे?’

‘हम लोग लौटेंगे?’

हां, हम लोग उस सजल आत्मा को चूमेंगे

और हमारी जीवन्त इच्छाएं

हमारे होंठों पर हैं

कल हम लोग लौटेंगे

और पीढ़ियाँ सुनेंगी

हमारे कदमों की आवाज

हम लौटेंगे आंधियों के साथ और बिजलियों और उल्काओं के साथ

हम लौटेंगे, अपनी आशा और गीतों के साथ, उठते हुए बाज के साथ, पौ फटने के साथ

जो रेगिस्तानों पर मुस्कुराती है, समुद्र की लहरों पर नाचती सुबह के साथ

खून से सने झण्डों के साथ और चमकती तलवारों के साथ और लपकते बरछों के साथ हम लौटेंगे








 गाज़ा जनसंहार को याद करो! मत भूलो, मत माफ़ करो!
  वे लोग जिन्होंने आज तक केवल द्वितीय विश्व युद्ध को हिटलर, मुसोलिनी, फ्रांको आदि के उभार और मित्र राष्ट्रों में ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीकी पूंजीवादी साजिशाना नीति और महान स्तालिन के नेतृत्व में बोल्शेविक प्रतिरोध की महान विजय के बारे में पढ़ा या जाना हो तो उन्हें इसके बीज रूप को जरूर समझना चाहिए। पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया (अब चेक और स्लोवाकिया दो राष्ट्र हैं।) ऑस्ट्रिया, यूगोस्लाविया (इसका अस्तित्व नाटो के हमले के बाद ध्वस्त हो गया और अब तो यह खत्म ही कर दिया गया है।)   आदि से जब जर्मन नाजी यहूदियों को घेर घेर कर मार रहे थे तब स्थितियां बहुत विपरीत हो गई थी- जो स्तालिन के नेतृत्व में जब बोल्शेविकों ने जर्मन को पराजित करते हुए नाजी अमानुष दंभ को मिट्टी में मिला दिया था। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने इनको 1948 ई में बिना अनुमति फिलिस्तीन में बसाया गया था और अक्सर ही जो लोग फिल‍िस्‍तीन के मुद्दे के इतिहास से नावाकिफ़ होॉॉ आमतौर पर इज़रायल की हिंसा अौर हमस की हिंसा को एकसमान रूप से निंदनीय बताते हैं और फिलिस्‍तीन के लोगों को अहिंसा का प्रवचन देते हैं। ऐसे लोग यदि इस मुद्दे का इतिहास जानने की जहमत उठाएँ तो उन्‍हें यह दिन के उजाले की तरह स्‍पष्‍ट हो जाएगा हिंसा के लिए पूरी तरह से इज़रायल के जॉयनवादी जिम्‍मेदार हैं। इज़रायल नामक राष्‍ट्र का जन्‍म ही 1948 में फ़‍िलि‍स्‍तीन के लोगों को उनकी ही जमीन से बेदखल करके हुआ था। जबरन कब्‍जे से जन्‍मा यह राष्‍ट्र 1948 से लगातार फि‍लिस्‍तीनियों की ज़मीन को किस तरीके से हड़पे जा रहा है वह नीचे की तस्‍वीर में स्‍पष्‍ट है। आज समूची फिलिस्‍तीन की आबादी वेस्‍ट बैंक और गाज़ा के दो टुकड़ों में सिमटकर रह गई है। लेकिन इज़रायल इससे भी नहीं संतुष्‍ट है, वह इन इलाकों में भी गैर-कानूनी रूप से यहूदी बस्तियाँ बसाये जा रहा है (चित्र 2)। वेस्‍ट बैंक के भीतर ही फिलि‍स्‍तीनियों को अलग-थलग करने के लिए इज़रायल ने एक विशालकाय दीवार बनायी है (चित्र 3)। गाज़ा और वेस्‍ट बैंक में लोगों को बिजली-पानी, स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की भी ज़बर्दस्‍त किल्‍लत होती जा रही है। आज फिलिस्‍तीन एक भीषण मानवीय आपदा से गुज़र रहा है। ऐसे में तटस्‍थता की अब कोई गुंजाइश नहीं बची है। उत्‍पीड़क और उत्‍पीड़‍ित के बीच तटस्‍थता की बात करने वाले लोग जाने-अनजाने उत्‍पीड़क के ही पाले में खड़े होते हैं।
      इस सदी के सबसे बर्बर जनसंहारों में से एक, गाज़ा पर इज़रायली हमले के बाद ज्यादा समय नही बीता है। मगर बमों से क्षत-विक्षत, आग में जले हुए, उड़े हुए अंगों और ख़ून से लथपथ बच्चों के नन्हे शरीर आज भी दहलाने वाले मंजर की तरह आंखों के सामने से हटते नहीं हैं। गाज़ा और फ़िलिस्तीनी लोगों पर इज़रायली हमले अब भी लगातार जारी हैं। पिछले साल जुलाई और अगस्त में 50 दिनों तक चले इस हमले में करीब ढाई हजार फ़िलिस्तीनी लोग मारे गये थे जिनमें 500 से ज़्यादा बच्चे थे। और तो और एक ही दिन में एक ही जगह 85 बच्चों की लाशों का ढेर.......

     हजारों लोग ज़ख़्मी या अपंग हो गये जिनमें 3000 से ज़्यादा बच्चे हैं। मरने वालों में तीन-चौथाई नागरिक थे। 5 लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो गये जिनमें से ज़्यादातर आज भी आबाद नहीं हो सके हैं क्योंकि इज़रायली ज़ायनवादी घरों-स्कूलों-अस्पतालों को फिर से बनाने से लेकर बिजली-पानी-ज़रूरी सामानों की आपूर्ति बहाल करने तक हर क़दम पर बाधा डाल रहे हैं। फ़िलिस्तीनी बस्तियों-गाँवों को उजाड़कर इज़रायली अमीरों को बसाया जा रहा है। दुनियाभर में थू-थू और जनता के भारी विरोध के बावजूद अमेरिका की शह पाये हुए ज़ायनवादी एक पूरी क़ौम को मिटा देने की पागलपनभरी मुहिम जारी रखे हुए हैं।

      भारतीय फ़ासिस्ट सत्ता इस बर्बर जियनवादी इज़रायल के साथ रक्त संबंध तक घोषित कर चुका है जो व्यापार के मार्फ़त उसकी व्यापारिक और सैनिक ताकत बढ़ाने में मदद करती ही। अमेरिका के बाद इज़रायल भारत को हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर बन गया है। ज़ायनवादी फ़ासिस्टों और हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्टों का संबंध जग जाहिर है।
००००००
 
     दक्षिण और दक्षिण पश्चिम एशिया का जियनवादी साम्राज्यवादी जुल्म के विरुद्ध मुख्य प्रतिरोधी स्वर है महमूद दरवेश...... उम्मीदों, सपनों, नई दुनिया बनाने के सपनो के साथ महमूद दरवेश जीवन के उज्ज्वल पक्ष और न्याय के लिए जूझते जुझारू यह जीवित कवि .. सन 1948 में फिलिस्तीन की धरती पर इजराइल नामक जियनवादी आतंक की स्थापना के बाद से आगामी हर एक घटना को पढा, सुना और देखा और झेला था । एक देश फिलिस्तीन जो अब इस धरती पर है ही नही- विश्व मानचित्र में हौ तो सिर्फ मलबे के ढेरों के चित्र ही है।

        वतन से अपने ही घर से निकाल बाहर किया जाना या निर्वासन को भोगना, सबसे बड़ी पीड़ा होती है। और फिर इसी तरह के अनेक दिनों की पीड़ाओं और निर्वसन जनित बेचैनी के साथ प्रतिरोध के कवि बनकर उभरे थे। नेरुदा, मायकोव्स्की, लोर्का और नाजिम हिकमत की श्रेणी के उन्ही के समकक्ष थे महमूद दरवेश..।  

     नाजिम हिकमत, हबीब जालिब, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शलभ श्री राम सिंह , मजाज़, कैफ़ी आज़मी, आदि और भी कुछ नाम जो एशिया खासकर दक्षिण पश्चिम एशिया के कुछ महान कवियों शायरों में से एक है- लेकिन इस एक बहुत विशेष और वैचारिक स्तर पर उन्नत और मजबूत युवा और आगे बुढ़ापे तक भी इस महान मुक्तिकामी ज़िंदा  फिलिस्तीनी कवि तथा लेखक को बहुत साल निर्वसन दंड भुगतना पड़ा था। महमूद दरवेश के समकालीन और बाद के कवियों  ने भी इजरायल के आतंक और अंतरराष्ट्रीय दादागिरी के विरुद्ध बहुत कुछ लिखा मगर दरवेश अपने स्टैंड और विज़न के चलते फिलिस्तीन के राष्ट्र कवि बनते हैं--  जबकि इस अमानवीय, बर्बर दरिंदगी से भरे भयानक जियनवादी   आतंक के विरुद्ध अनेक मुक्तिकामी कवियों ने कविताएं लिखी है। बहुत से कवि आज भी मोर्चे पर डटे हैं। हसन ज़कतान तो विश्व कविता में अपनी स्तरीय और ठोस उपस्थिति दर्ज करवा चुके है जिनकी कविताओं में ग़मी  भी आक्रोश के साथ तो उफनकर झंझा की तरह आते हैं। एक कविता बानगी तौर पर----- 
        

(हसन ज़कतान )

रेगिस्तान में
तलाशते कहीं नख़लिस्तान
उतरती है एक फुसफुसाहट
कविता बन, दिल में
देवदूतों की नींद की ख़ातिर
घासों और पत्थर के मेहराबों की ख़ातिर

लहराती, बल खाती घास
करती है प्रार्थना
मेरा वतन की ख़ातिर
मेरा वतन, जो नहीं मारता किसी को यूँ ही

वह ज़मीन
बाँध रक्खा है जिसने मुझे

करती है इशारा
करूँगा देरी अगर, जरा भी मैं
खो जायेगा इशारा
जो बतायेगा रास्ता
और ले जायेगा मुझे

अपने घर तक
अपनी माँ तक
अपने वतन तक




    हम देखते हैं कि मातृभूमि के प्रति उसके लोग, बच्चे, दरख़्त जैतून के और अनेक लोकगीतों को प्प्यार करते हुए, सहेजते हुए प्रतिरोध को ठोस बनाते हैं। अंधा रास्ता जो अभी तक अंधा ही है, कविताएं उजास भरती है  यही कुछ कमाल नासिर रचते और स्थापित करते हैं।
आख़िरी बात

प्रिय,

अपने पहले बच्चे को
गोद में खिलाते हुए
अगर ख़बर सुनना यह,
मेरा इन्तज़ार करते हुए,
मत रोना
क्यों कि लौटना नहीं होगा मेरा फिर से
जीना तकलीफ़ और मुसीबतों के बीच

कुछ भी नहीं

अगर पुकारता हो अपना वतन

प्रिय,

पढ़ो ये ख़बर, अगर
मेरे साथियों की दहशत भरी आँखों में
ख़ुदा के लिए
उन्हें देना तसल्ली
अपनी दिलकश मुस्कराहट से
गोकि तब्दील हो गयी हैं
मेरी बहारें सर्द जाड़ों में
ताकि बरक़रार रहे तुम्हारी बहारें
उन्हीं बहारों के नाम
लिख देता हूँ
साथियों के सपनों को
हाँ, करता हूँ इसकी वसीयत
खुदा को हाज़िर नाज़िर जान

उन खुदाई नेमतों की क़सम जो सिखाती है मुहब्बत
हर गुज़रते पल के साथ
वही मुहब्बत
जो छा गई है मेरी आत्मा, मेरे ख़ून में

दोस्तों के लिए
हमवतनों के लिए
मैं मर ही नहीं सकता
जिऊँगा ख़्वाबों में
शान से तने सीनों में
पैदा होगा हमेशा

महमूद दरवेश और उनके समकालीन या वरिष्ठ या युवाओं में अनेक असरदार नाम है जैसे अब्दुल लतीफ अक्ल, अब्दुर्रहीम महमूद
हसन जमामी, नासिर मोइन, अब्दल सजेद हसन ज़कतान आदि अनेक प्रतिबद्ध प्रतिरोधी कवि हैं। दरवेश जा वैश्विक दृष्टिकोण भी उनको अलग और महान बनाता है और यह भी की  दरवेश अपनी कुछ विशिष्ट  शैली, विचार और प्रतिबद्धता और राजनीतिक समझ और विचलन से बिल्कुल मुक्त संस्कृतिक स्तर पर उद्वेलित होकर के
एक नया विचार पैदा करती है-- महमूद दरवेश की कविताएं बसंत का गीत गाते हुए, उदासियों  को इस ठंडे तरीके से लाते है जिसके भीतर असंख्य महिलाओं,  मा, बाप , भाई रिश्तों और अनेक लाशों के ढेर पर खड़ा हुआ राजा अट्हास करता दिखता है- आक्रोश नजो सीधा सहज हो वो ठोस होकर हाजिर होता है। और फिलिस्तीन के स्थानीय संघर्ष, दुख, पीड़ाओं और कत्लेआम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेजाकर उस पर ध्यान दिलवाते हैं-

धरती पिस रही है हमें,
फंसा रही है हमें आखिरी पगडंडियों में,
सिकोड़ कर अपना बदन,
हम कर रहे है कोशिश निकल पाने की।

       दरवेश अपनी इस कविता ''पिस रही धरती'' में विचलन के तिलिस्म को जिस मुलायम तरीके से लाते हैं- यह अद्भुत, अद्वितीय है-- सांवेगिक गहराई है यहां 
और यही विशेषता उनको   फिलिस्तीन का राष्ट्र-कवि बनाकर खड़ा करती है। 
             कविताएं जो अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को इस मुद्दे की तरफ ध्यान दिलवाती है- ज़िंदा लोगों को झकझोरती है- सवाल करती है- पश्चिम की तरफ मुंह करके- जैसे कभी किया था उसी समय के एक जीवित मगर अब संयुक्त राज्य अमेरिका का फौजी ठिकाना बनकर मर चुके राष्ट्र 'सऊदी अरब' से या तुर्की से.. ...

महमूद दरवेश की कुछ कविताए जो संसार  पधर
पर चर्चित होकर लोकपक्षधरता को मजबूत करती है, उनमे से एक है, "पहचान-पत्र"..

पहचान-पत्र

दर्ज़ करो!
कि मैं एक अरब हूं
और मेरी पहचान-पत्र संख्या है पचास हज़ार
आठ बच्चे हैं मेरे
और नवां आ रहा है – गरमियों के बाद।
नाराज़ हो तुम?

दर्ज़ करो!
कि मैं एक अरब हूं
काम करता हूं खदान में अपने साथी मज़दूरों के साथ
आठ बच्चे हैं मेरे
उनके लिए लाता हूं
रोटियां, कपड़े और किताब
चट्टानों से लड़ कर….
आता नहीं मैं तुम्हारे दर पर मांगने कुछ भी
नहीं करता शर्मिंदा खु़द को तुम्हारी चैkखट पर
नाराज़ हो तुम?

दर्ज़ करो!
कि मैं एक अरब हूं
नाम है मेरा…मगर कोई पदवी नहीं
धैर्य रखता हूं ऐसे मुल्क में
जहां लोग हैं बेचैन
मेरी जड़ें धंस चुकीं थीं ज़मीन में
जब वक्त था अजन्मा
बाकी था शुरू होना युगों का
चीड़ और जैतून भी नहीं उगे थे
न थी घास धरती पर।
मेरे पिता संभ्रांत नहीं
हलधर परिवार की संतति मैं
और दादाजी महज एक खेतिहर
न जन्म कुलीन न पालन पोषण।
सीखी मैंने सूरज की अकड़
ककहरे के पहले।
पहरेदार की झोंपड़ी है मेरा घर
घासफूस, टहनियों से बना।
मेरी हैसियत से संतुष्ट हैं आप?
नाम है मेरा मगर पदवी नहीं।

दर्ज़ करो!
कि मैं एक अरब हूं
चुराया है तूने मेरे पुरखों का बागीचा
और मेरी उपजाऊ ज़मीन
और मेरे बच्चे भी
छोड़ा नहीं कुछ भी हमारे लिए- बस ये चट्टान …
ले लेगी क्या इन्हें भी सरकार-
जैसा सुना है मैंने।

इसलिए पहले सफे के कपाल पर लिख दो-
नफरत नहीं करता मैं लोगों से
न ही ज़ोर-ज़बर्दस्ती
लेकिन अगर भूख सताएगी मुझे-
खा जाऊंगा मांस
मुझे महरूम करने वाले का
सावधान….
सावधान….
मेरी भूख से
मेरी लाल लाल आंखों से।

      समीह अल कासिम...... (२)

          हम जश्न मना रहे थे। उत्सव, नाच गाना और शराब और पूंजी जनित अमानवीय अपसंस्कृतिक, फासीवादी अवमूल्यों (रिवाज़े) में गले तक डूबे उन्हें वैश्विक रूप में 'मेरा देश महान' तर्ज पर थापित कर रहे थे। जब विश्व मे प्रत्यक्षतः नही बचा था कोई शक्तिशाली प्रतिबद्ध बैरिकेड, नहीं था कहीं भी महान मानव जीवन, सब दूषित समय के गुलाम बनकर जनता होने के महान भावों की बजाए नागरिक बनने लगे और सभी देश लाशों के ढेर में बदल कर तठस्थ खड़े रहे- सामने बलात्कृत हो रही थी फिलिस्तीन की महान धरती। 


      फिलिस्तीन की जनता जब कत्ल की जा रही थी। हत्या और बलात्कार चरम पर थे तब.... फिलिस्तीन की पीड़ाओं और आक्रोश को स्वर देने वाला महान मुक्तिकामी कवि जो उसका सबसे लाडला बेटा था.. उसने अपनी जबान का एक और हिस्सा खो दिया। वो जो, ‘मुक्ति के कवि’ या आजादी या जीवन के कवि रूप में मशहूर थे। उनका नाम समीह अल क़ासिम था, को खो दिया।

         अगस्त, 2014 को उनका निधन हो गया।

समीह का जन्म 11 मई 1939 को हुआ था।

  विवादित मगर महान किस्सा है क्योंकि  उनके शब्दों में वास्तव में उनका जन्म नवम्बर 1948 में उस कत्लोगारत के समय हुआ जब इज़रायल के जुल्मो का पहला ही द्मऔर शुरू हुआ था।, और धरती पर क़ब्ज़े और बलपूर्वक बेदखली के कारण लाखों फ़िलिस्तीनी लोग अपने वतन से निकालकर बेघर-बेदर कर दिये गये थे। बर्बर दमन-घनघोर जुल्म की रातें, अन्याय के दिन और आदमियत की लाशों की ये छवियाँ उनकी स्मृतियों में सदा हरी रहेंगी। और इन्हीं से जन्म हुआ था उनके भीतर के प्रचण्ड प्रतिरोध और महान जज़्बे का निर्माण जिसकी वजह ये कविताएँ मुक्तिकामी फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध संघर्ष का मुक्तिगान बन गयीं।  इज़रायल में रहने के दौरान सैन्य सरकार की कठोर पाबन्दियों से लड़ते हुए क़ासिम फ़िलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष का पुरज़ोर समर्थन करते रहे। जेल, नज़रबन्दी और यातनाओं से डरे बिना वह आज़ाद फ़िलिस्तीन के लिए आवाज़ उठाते रहे। महमूद दरवेश  के साथ मिलकर उन्होंने विश्व प्रतिरोधक साहित्य के मंच पर फ़िलिस्तीन की पहचान निर्मित की। आज भले वे ना हो हमारे बीच मगर क़ासिम आज भी है कविताओं में जीवित। भौतिक रूप हमारे बीच नहीं हैं -- लेकिन फ़िलिस्तीन की मुक्ति के लिए उठने वाली हर आवाज़ में, अन्याय के प्रतिरोध में उनके शब्द हरे हो जाते हैं।

विजेता की संगीन पर सूर्य की किरणें

एक तिरस्कृत नंगी लाश थी

रक्ताक्त मौन

ख़ून से सने चेहरों के बीच

विद्वेष

प्रार्थना की माला

मिथकीय डीलडौल का

एक आक्रमणकारी चिल्लाता है

तुम नहीं बोलोगे?

ठीक है:

तुम्हारे ऊपर कर्फ्यू लगाया जाता है—

अल्लादीन की आवाज़ बिखर जाती है

शिकार की चिड़ियों का जन्म होता है

मैंने सेना के वाहन पर पत्थर फेंके

पर्चे बाँट

इशारा किया

मैंने ब्रश और पड़ोस से कुर्सी लेकर

नारे लिखे

मैंने बच्चों को भी इकट्ठा किया

और हम लोगों ने क़सम खायी

शरणार्थियों के निर्वासन से

कि हम लड़ेंगे

जब तक विजेताओं की संगीनें

हमारी गली में चमकती रहेंगी

अल्लादीन दस साल से ज़्यादा नहीं था

III

अकासिया के पेड़ उजाड़ दिये गये

और रफ़ा के दरवाजे

दुखों से सील कर दिये गये

या लाख से

या कर्फ्यू से

(उस लड़की को रोटी

और एक घायल आदमी के लिए

पट्टी लेनी थी जो आधी रात के बाद लौट रही थी,

उस लड़की को एक गली पार करनी थी

जिस पर नज़र रख रही थीं

अजनबियों की आँखें, तेज़ हवा और बन्दूक की नलियाँ)

अकासिया के पेड़ उजाड़ दिये गये

और एक घाव की तरह

रफ़ा में एक घर का दरवाज़ा

किसी ने खोला

वह उछली

और जासमीन की झाड़ी की गोद में जा गिरी

एक बार आतंक के बीच

जा रही थी सावधानी से कि

खजूर के एक पेड़ ने

उसे बचाया था

हर क़दम पर, बस उछलो—

एक गश्ती दल

तेज़ रोशनी

खाँसी

-कौन हो तुम

रुको


पाँच बन्दूकें उस पर तन गयी थीं

पाँच बन्दूकें

सुबह

हमलावरों की अदालत बैठी

उन्होंने उसे पेश किया

अमीना

‘अपराधी’

आठ साल की बच्ची

 संयुक्त राष्ट्र में

ओ जगह-जगह से आये सज्जनो

इस भरी दुपहरी में

आपकी ख़ूबसूरत टाइयाँ

और आपकी उत्तेजनापूर्ण बहसें

हमारे समय में

क्या भला कर सकती हैं

ओ जगह-जगह से आये सज्जनो

हमारे दिल में काई जम गयी है

और इसने

शीशे की सारी दीवारों को

ढँक लिया है

इतनी सारी बैठकें

तरह-तरह के भाषण

इतने जासूस

वेश्याओं जैसी बातें

इतनी गप्पबाज़ियाँ

हमारे समय में

क्या भला कर सकती हैं

सज्जनो

जो होना है सो होने दें

मैं दुनिया तक पहुँचने के रास्ते खोज रहा हूँ

मेरा ख़ून पीला पड़ गया है

और मेरा दिल

वायदों के कीचड़ में फँस गया है

ओ जगह-जगह से आये सज्जनो

मेरी शर्म

एक पर्दा बन जाये, मेरा दुख एक साँप

ओ जगह-जगह से आये काले चमकते जूतो

मेरा ग़ुस्सा इतना बड़ा है

कि कह नहीं सकता

और समय इतना कायरतापूर्ण

और जहाँ तक मेरा सवाल है—

मेरे हाथ नहीं हैं

Post a Comment

Previous Post Next Post