लाल परचम सी कविता...

 यह लहू उबलता रहेगा...


  ● गौतम अरोड़ा

  (संपादक :- अपरंच)


( वैचारिक दीठ से  प्रतिबद्ध मुक्तिकामी और लाल परचम लहराती ये कविताए एक शुद्ध कम्युनिस्ट कॉ सतीश छिम्पा की  ओलखाण (पहचान)  है । आज साहित्य जगत में इतना जिगरा भी कम लोगों में है कि वे सरेआम  खुलकर खुद के कम्युनिस्ट होने की घोषणा कर, खुद की साहित्यिक हत्या कोे बुलावा दे दे । सतीश में यह माद्दा है , उसे बहुत अच्छी तरह पता है, कि उसे नकारने और हाशिये पर धकेल देने के लिए  साहित्यिक फौज तैयार है , पर वो बेलाग लिखता है !!)


 राजस्थानी लेखकां ने गुमेज होवणो चाहिजै कै आपा रै खाते सतीश छिंपा जैडो साहित्य रौ विद्यार्थी है । म्है सतीश ने अजै विद्यार्थी या पढेसर ईण सारू भी  कैवु कै अजै सतीश रौ बेस्ट आवणौ बाकी है । उन माय आपार संभावना है । उन जित्तो अध्ययनशील सक्रिय लेखक राजस्थानी ई नीं दूजी भारतीय भासावां मांय भी कम देखण ने मिले ।

   साहित्यकार रै मांयली संभावना रौ समंदर तद ताई एक लहर माथै सवार हुय' र आप मांय सू की बेहतर काढ़'र नी देवे जद तांई वो खुद समझण सीखण अर गुणन ने तैयार नीं व्है अर इण कसौटी माथै हर साहित्य प्रेमी सतीश रौ तौल कर सके ।

 हर लेखक रौ निजु जीवन उणने कैई खाँचा में बाटे, की लोग उन खाँचा माय लेखक रै निजु गुण अवगुण अर आदतां  ने देखता थकां उण रै साहित्यिक अवदान माथै टीप करण सूं बचे, कई लोग बिना फायदा कलम नीं चलावाणी चावै तो कैई लोग वैचारिक पूर्वाग्रह मांय टीप सू बचे । सतीश आं सब बाता रौ सिकार है ।

   आज फेसबुक माथै "ये लहू उबलता रहेगा" माथै एक टीप पढ़ी अर पछै सारी कवितावां । शायद सतीश री खिमता ने तौलता बगत हर आलोचक ने उणरी ए बेहतरीन कवितावां सांमी राख'र पछै उण री कीणी भी दूजी रचना रौ मूल्यांकन या राजस्थानी-हिंदी रा बाकी युवा लिखारां री रचना रौ मूल्यांकन करणों चाहिजै । क्योंकि ऐ कवितावां उणरै साहित्यिक दीठाव रौ पड़बिम्ब है । न तो ए कवितावां किणी पुरस्कार सारू लिखिजी न किणी वरग ने खुस करण सारू ।

      फिलिस्तीन री जनता रै हक री बात करती वां री झूंझ ने सांमी लावती ए कवितावां कैई सवाल साहित्य जगत माथै भी खड़ा करै--

और इंसानियत की नयी पौध

हाथों में पत्थर लेकर

मिसाइलों और बमों का 

मुकाबला कर रही थी

तब

हाँ बिल्कुल तब ही

तुम किसी सेमिनार में 

तालियाँ बटोर रहे थे।


सतीश रौ सबद शिल्प और कथ इत्तो मथ 'र निकले कै उणरी सिरजण प्रक्रिया ने लेयर मन मांय उमाव पैदा व्है ---


भूख के विरुद्ध रोटी का सम्बल 

और न्याय के युद्ध में लाल मोर्चा है कविता

पत्थर की मूर्तियों को तोड़कर 

शोषण का पानी निकाल देने का हौंसला है 

कविता फिलीस्तीन है

कविता वियतनाम है

कविता नक्सलबाड़ी है

कविता तेलंगाना है

कविता मेरी हिमाकत है।


वैचारिक दीठ स्यू खालिश मुक्तिगामी अर लाल परचम लैरावती ए कवितावां एक शुद्ध कम्युनिस्ट कॉ सतीश छिम्पा री ओलखाण है । आज साहित्य जगत मांय इत्तो जिगरो भी कम लोगां मांय है ,कै वै खुल'र खुद रै कम्युनिस्ट होवण री घोषणा कर खुद री साहित्यिक हत्या ने बुलावो देवे । सतीश माय ओ माद्दौ है , उणनै पतो है कि उणने नकारण सारू, हाशिये पटकण सारू साहित्यिक फौज तैयार है , पण वो बेलाग लिखे । 

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  लिखते रहो सतीश , समय तुम्हारा है ।। एक समय आएगा जब हिंदी और राजस्थानी दोनो में तुम्हारे लिखे को नकारना असंभव होगा ।। लिखने के साथ पढ़ते भी रहो जो तुम कर ही रहे हो ।।

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  फिदेल कस्त्रो ने कहा है एक जगह कि 'विचारों का वध संभव ही नही है", विचार कभी मरता नही !!

 फिलिस्तीन भी एक विचार है फांसीवाद के खिलाफ और जीत का सवेरा भी आएगा और तब उस सूर्य की कुछ किरणें गिरेगी मेरे प्रिय सतीश तुम्हारे चेहरे पर भी---


जो बार बार पराजित होकर भी

विजय के लिए

उठता है 

गिरता है

बहता है

और अन्तत: वियतनाम बन जाता है।


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