आप जीवित हैं भाषा में

 

.. आपकी यादों को सलाम


                             ● सतीश छिम्पा


(तस्वीर में ऊपर की तरफ सन 2005 ई. में जब बारहवीं जमात में था तब पहला कविता आया राजस्थानी कविताओ का- सोलह सत्तरह साला किशोर की किताब के लोकार्पण में  गुरुजी का आना उस समय मेरे लिए सेलिब्रेशन वाली बात हुई। इस कार्यक्रम में मनोज जी स्वामी, गुरुजी प्रमोद जी शर्मा, सोहनलाल जी रांका और सत्यनारायण सोनी भी थे।)                           


      साल ठीक से याद नहीं.... शायद 2003- 04 रहा होगा। मैंने ओम पुरोहित कागद जी की पहली कविता पोथी "धूप क्यों छेड़ती है मुझे " जो सन 1985-86 ई. में छपी थी को चुराकर पढ़ा था। शहर के साहित्यकारों को बाद में जानने लगा था, इसलिए अपनी कच्ची रचनाओं को (एकांकी) गुरु जी श्री ओम पुरोहित कागद जी से सुधरवाने के लिए हनुमानगढ़ चला गया था। दुर्गा कॉलोनी में उस ऐतिहासिक घर में, जहाँ अनेक लाजवाब कृतियों को रचा था गुरु जी ने। मेरी बदकिस्मती थी कि उनसे उस दिन मुलाकात नहीं हो पाई थी, क्योंकि उनकी कहीं ड्यूटी लगी हुई थी। बाद में उन एकांकियों को आदरणीय प्रमोद जी शर्मा से सही करवाया था, और बाद में मैंने उन रचनाओं को फाड़ दिया था।

          कागद जी से पहली मुलाकात सूरतगढ़ में ही आंचलिक साहित्यकार सम्मेलन में हुई थी। मुलाकात क्या हुई कि एक बहुत ही प्यारा रिश्ता बन गया था। वे मुझसे अपने बेटे की तरह स्नेह रखते थे। हमारी विचारधारा अलग थी जो कभी इस रिश्ते के बीच मनभेद के रूप में नहीं आई थी। वे मुझे हमेशा सावधान करते कि अपनी ऊर्जा को बचाए रखो, व्यर्थ में लड़ो मत किसी से, सम्बन्ध खराब मत किया करो। स्याणो बण। कलाओं की दुनिया मे इस हद तक कि भावुकता नही होती है कि वे आपके भीतर की सच्चाई और ईमानदारी को देखकर छू सके- तुमसे कम योग्य, ढपोळ शंख भी यहाँ तुम्हे या किसी को भी हाशिए पर डाल सकता है। साहित्यिक गुट बाजी को वे हमेशा गलत मानते रहे। मानना चाहिए भी। उनके साथ इसी वजह से ही तो हुए यह कि उनकी सबसे अच्छी और अद्भुत कविता पोथी अकाल चित्र -''थिरकती है तृष्णा।'' आज की हिंदी कविता की कुछ बेहतरीन पोथियों में से एक है। थार की प्यास और निष्ठुर स्वभाव को जैसे झेला हो उन्होंने देह पर नही आत्मा पर। और एक छाप जो हमेशा उसी तरह कायम रही।


उनकी नसीहते हुआ करती, "पढो ज्यादा, लिखो कम "

" किसी के बहकावे में मत आया कर "


          वे गजब के पाठक भी थे इसलिए गरिमा समझते थे। अब जो खत्म हो गई है वो 'पाठक मंच' की परंपरा उनके ताण हमारे अंचल में बहुत फली फूली थी। अब तो पाठक मंच की यह उज्ज्वल, गरिमामय और महान परम्परा खत्म हो गई है

इस पूंजीवादी साम्राज्यवाद के दौर में फ़ेसबुक और व्हाट्सए यूनिवर्सिटी के तूफानी दौर में वे सभी चीजें परिदृश्य से गायब ही हो गई जो कलाओं और साहित्य को आम सामाजिक जीवन मे स्थापित करतो हो। इसी तरह सूरतगढ़, विजयनगर, अनूपगढ़ और गंगानगर में हर समय खुली रहने वाली साहित्यिक राजनीतिक और दर्शन से संबंधित किताबों की दुकानों के ताले लग गए हैं।


     इसी श्रेणी की एक औऱ बहुत ज्यादा जरुरी परम्परा जिसका तो आजकल में लिखना या पढ़ना शुरू करने वाले युवा और युवतर लेखकों ने तो ''पाठक मंच' का नाम भी नहीं सुना होगा। 


  इधर गंगानगर और हनुमानगढ़ में किसी समय में पाठक मंचो का बोलबाला था। यहां तक कि एक ही हफ्ते में कई बार दो या तीन किताबों पर बारीबंटे पाठक मंच आयोजित हो जाते थे। लेखक और पाठक आमने- सामने होते और बड़ा भारी सवाल जवाबों और तर्क का  माहौल होता था। कभी किसी पाठक मंच में किसी किताब को अगर सिरे से ही नकार दिया जाता तो भले ही लेखक मन ही मन खून के आंसू बहा रहा हो,  एकबार अगर किताब की आलोचना शुरू हो गई तो फिर उसको पोस्टमार्टम करने के बाद  ही मुक्ति मिलती, अगर लेखक गंभीर और प्रतिबद्ध रचनक्कार है तो वो उस किताब को फाड़कर नये सिरे से  लिखना शुरू करता था।


     यह भी एक बड़ी विडंबना है कि सूरतगढ़ और आसपास के इलाकों में लास्ट ''पाठक मंच'' मैंने ही करवाया था, शायद सन 2006 में  ओम पुरोहित जी कागद के अनूठे कविता संग्रह 'थिरकती है तृष्णा' पर सूरतगढ़ के एक निजी स्कूल में करवायां था, जिसमे गुरुजी ओम पुरोहित जी कागद भी उपस्थित थे और इलाके के सभी बुद्धिजीवियों ने भी इसमें उत्साह से हिस्सा लिया था।


  अब कहा है पाठक मंच, कहां कोई भी किसी भी स्तर की साहित्यिक चर्चा। लोप तो नही हुई है मगर प्रदूषित हो गई है सोशल मीडिया के दौर में।


"शराब मत पीया कर या कम पी या पिये तो मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया कर"


        साल 2005 में जब मेरा पहला कविता संग्रह छपा तो उसका कागद जी ने बहुत अफ़सोस किया कि काश मैं छपने से पहले एक बार पांडुलीपि उन्हें दिखा देता तो यह रचनाएं  कुछ ठीक हो जाती- सच मे वे कविताएं, कविताओं का अपशिष्ट ही थी।


       सन 2008 में जब मैं राजस्थान पुलिस कांस्टेबल का पेपर पास करने के बाद फिजिकल के लिए हनुमानगढ़ गया था और दौड़ आदि पास करने के बाद सिट-अप में रह गया था तब भूख और दुःख से बिलबिलाता रात दस बजे कागद जी के घर पहुंचा। तब उनके यहां मेहमान आए हुए थे और मैं बेशर्मी से उन्हें कह रहा था कि भोत भूख लगी हुई है। माता जी भगवती जी पुरोहित ने तमाम व्यस्तताओं के बावजूद उस समय मुझे भोजन करवाया और गुरूजी मेहमानों को छोड़ मेरी पीड़ाओं और जिज्ञासाओं का समाधान करने में लग गए थे।

           मैं बहुत नासमझ व्यक्ति था- बचपना था- आज भी हालात कुछ ज्यादा ठीक नही है। हां, जो परिवर्तन वे मुझमे, मेरे व्यवहार में चाहते थे- उनकी मौजूदगी में नही आ पाया बदलाव क्योंकि अर्धविक्षिप्तता का दौर अजीब तिलिस्म सा पैदा करता रहा है- जबकि आज अमूल चूल बदलाव के साथ सकारात्मक काम बहु चल रहे हैं।  कागद जी ने हमेशा मुझसे स्नेह रखा और मैं हर समय उनसे लड़ता रहा।वैचारिकता को सम्बन्धों के बीच ले आया मगर फिर भी उन्होंने कभी मेरा बुरा नहीं माना ना ही बुरा सोचा, उनके साथ घटा वो आकस्मिक वरतारा जिससे पांच- छः महीने पहले ही मेरे कहानी संग्रह ''वान्या अर दूजी कहाणियां'' का विमोचन होना था और यह पहली ही बार हुआ कि मेरी किसी किताब के लोकार्पण समारोह में कागद जी नहीं थे, मैं मूर्खतावश उनसे लड़ाई कर चुका था। मगर कहते हैं न कि पूत कपूत हो सकते हैं मगर मायत नहीं-वैसा ही हुआ।


    एक दिन मोबाइल कॉल आई, "तेरै स्यूं मिलण गो भोत जी करै, ट्रैन में हूँ, सूरतगढ़ दस पन्द्रह मिनिट में पूग स्यूँ" उन्होंने कहा मगर मैं नहीं पहुँच पाया......और कुछ ही दिन बाद मिली वो मनहूस ख़बर जो इस सदी की सबसे खतरनाक और उदास खबर थी, कागद जी  अब शब्दों, भावों और कविताओ में बस गए थे। अभिभावक जो अब नहीं रहे, आधार- हौसला नहीं रहा, गुरुजी और बड़े भाई, दोस्त नहीं रहे.....  वो इस सदी का सबसे मनहूस दिन था... दिन का सबसे घटिया समय और उसका बर्बर हिस्सा था। मैं निरंतर किन्ही  घनघोर  समस्याओं में फसा हुआ भय और विचलन में  दिन काट रहा था- और उसी समय के आसपास मैं भीतर तक टूट बिखर गया था । दिमागी, सामाजिक और आत्मिक- हर तरफ से हारा हुआ और थका हुआ मैं निरन्तर कोर्ट की तारिख़ पर तारीख भुगत रहा था। बहुत कमजोर, असहाय या कहूँ मैं जीवन मे पहली बार निरीह और लुटापिटा महसूस कर रहा था। और उसी समय यह मनहूस सूचना मिली कि- "कागद जी"...... मैं स्तब्ध। जाने किस तंतु की मार से अधमरा मेरा भीतर- मांची की ईस पर सिर टिकाकर आंसू बहाने लगा। लगातार, लगातार और बस जारी ही रहा हो जैसे... माँ मुझे चुप करा रही थी.... वहां सब असमंजस में थे.. ये किसलिए इस तरह रो रहा है- फिजूल की तारीखें या कोई अन्य कारण है-- '' आज मैं अकेला हूँ..." उस दिन तारीख़ पर जाते समय मैंने डायरी में लिखा था। 

    ..... और बस इसी जलालत भरे कोर्ट केस के चक्कर में मैं उनके अंतिम संस्कार में भी नहीं जा पाया था। बहुत बाद में जब गया भी था तो.. अपराधी की तरह उस घर में जहाँ अब माता जी रहती हैं गुरु जी के शब्दों, बातों, ठहाकों और यादों और उनकी किताबों के बीच.....


० सतीश छिम्पा

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