( अमर शहीद पाश के विरुद्ध कुत्साप्रचार में लिप्त खालिस्तान समर्थ धड़े और राजविंद्र सिंह को जवाब)
आज बतीस साल बाद भी जहां अमर शहीद अवतार सिंह पाश जहां लोगों के दिलों में जिंदा है। जहां जीवन के हर एक मोर्चे पर उसकी कविताएं दहकते लावा की तरह उफान मारती हुई शोषक सत्ताओं को हिला डालने का औजार रखती हैं, वहीं मानव जीवन को कलंकित करने वाले 'फासिस्ट' जिन्होंने ना अपनी सूरत सम्हाली और ना ही उन लोगों की जो इनके लिए शहीद हो गए। जी हाँ, आपको इस बात पर आश्चर्य होगा जानकर कि पाश के बारे मे ये जो कट्टरपंथी धड़ा झूठ फैला रहा है। इसका उद्देश्य बहुत खतरनाक है। ये जो जो भी आरोप लगा रहे हैं, वे सब के सब इन्ही के लोगो ने खारिज कर दिए थे। पाश एक अंतरराष्ट्रीय कवि के रूप में स्थापित है अब, और जाने क्यों लोगों को लगता है कि वे उसको बदनाम कर देंगे।
अमर शहीद अवतार पाश जिंदगी और अपने गांव को बेपनाह मोहब्बत करने वाले कवि थे। पूरा नाम है अवतार सिंह संधू यानी क्रांति के कवि ‘पाश’ जो जिंदगी की बांहों में खेला तो मिट्टी के बिछोने पर भी लेटा रहा। फसलों पर खिलते हुस्न की कामना और सरसों का फाळ , जिसकी खुशबू से जीवन की तरह महकने लगते हैं उदास से मौसम। पाश के लिखे खतों, कविताओं और अदबी जंग के दस्तावेजों में गांव की मिटटी की महक है।
उसकी कविताओं में गांव है तो वही गांव संसार है।गंडे, धनिया,चाँद, अमावस्या और काली तो कभी उजली रात, बाल्टी में झागवाला दूध, उनका पूरा अस्तित्वक गांव से जुड़े इन्हीं लौकिक छोटी-छोटी चीजो से मिलकर बना था। पाश पंजाबी भाषा की अमृता प्रीतम के बाद हिंदी में सबसे ज्यादा पढा जाने वाला कवि है। और अंतरराष्ट्रीय छवि होने के बावजूद गांव गुआड़ भी उसी की है।हिंदी में शायद ही इतनी मोहब्बत किसी को मिली हो।
मार्क्सवाद से माओवाद के बीच का क्रांति का सफर बहुत गरिमामय रहा है। पाश की कल्पना में भी कभी क्रांतिकारी रूप में कोई दिखा नही, लेकिन समय से जूझते हुए उसने जीवन को छुआ और बना क्रांतिकारी कवि। पाश बेहद अराजक, खिलंदड़ाअगर भावुक और प्रेमी हृदय व्यक्ति थे। एक ऐसे इंसान जो अराजक्ताओं का बना था घनघोर संवेदनशीलता के बारूद से बना वह मौसमो में पगा था -जो उदास होकर बड़ी मुश्किल से कहता है कि -'अब मैं विदा लेता हूँ।'' इस क्या कहा जाए कि प्रेम का सफर अभी अधूरा ही रह उसके लिए। यह भावुकता की हद बेहद है कि जहां पराकाष्ठा शब्द बेमानी हो जाता है। जिसके अपने खतरे होते हैं। कितने ही लेखकों। कलाकारों के जीवन अनुभवों से हम सब यह जानते हैं।
वह क्रांति की राह की ऊंचाइयों की तरफ बढ़ रहा था उनका पहला कविता संग्रह ‘लौह कथा’ छपा उससे पहले ही वे मक्सिम गोर्की के माँ उपन्यास केो ना केवल पढ़ा बल्कि उसके मुख्य पात्र पावेल से प्रभावित होकर नाम रख लिया पाश (यह जवाब है उस अलगाववादी का जो गांव की किसी पाशो नाम की लड़की के हवाले से पाश नाम रखने की फुकरी मारता रहता है।
ये शख्स जिसकी बेकार की पंक्तियाँ नीचे लगा (को थोड़ा कलात्मक टच देकर) रखी है, अक्सर इसी तरह की हवा हवाई बातें करता रहता है।
औरत बाज पाश और संतराम उदासी
( राजिंदर सिंह के माध्यम से यह इसका जो फ़िजूल आरोप है, जवाब इसी के लिए है)
नक्सल उभार के प्रमुख दो कवि पाश और संत राम उदासी भी दो अलग-अलग आर्थिक वर्गों की फितरतों के उदाहरण हैं। लोक गायक संत राम उदासी का आंदोलन से जुड़ाव बहुत गहरा और लोक मुक्ति के सपनो के साथ था, वे पूरी तरह से धर्म के अनुष्ठानों और परंपराओं से भी जुड़े थे। लेकिन पाश केवल प्रचार के लिए आंदोलन में शामिल हो गए। पश धनी परिवार से था। वह आंदोलन से जुड़ा, मगर आत्म-महिमा और वीरता के प्रदर्शन के साथ आगे बढ़ आया। यह ग्रुप क्रांतिकारी नहीं बल्कि विद्रोही था। धर्म के खिलाफ, परंपरा के खिलाफ, रिवाजों के खिलाफ, रिश्तों के खिलाफ और समाज के खिलाफ विरोध उनकी वीरता की पहचान थे। उन पर कानून का कोई राज नहीं था। हर चीज के खिलाफ विद्रोह करना उनके लिए एक क्रांतिकारी बनना था। हाइड्रोजन के साथ बाल कलर करना, धूम्रपान करना, शराब पीना, मेंड्रिक्स की गोलियां लेना, लड़कियों से बात करना आदि उनके लिए ये सभी क्रांतिकारी गतिविधियाँ थीं।
नाटककार गुरशरण सिंह ने अपने पत्र 'सरदाल' के नवंबर 1970 के अंक में इस कम्युनिष्ट समूह के बारे में लिखा: - "अंत में एक सलाह यह भी बनती है(हालांकि विद्रोह किसी भी सलाह या इसी तरह के कर्मों में विश्वास नहीं करता है।) युवा पीढ़ी के कुछ कवियों का जीवन कभी-कभी निराशाजनक होता है। शराब पीना और एक-दूसरे को पिलाना, झगड़ना उनके जीवन का एक हिस्सा है। यह 'दिशाहीन' समाज को क्या देन देकर जाएंगे। चूंकि वे अन्य स्थापित मूल्यों के खिलाफ विद्रोह करते हैं, तो इससे महानता तो हासिल नही ही होती।
अवतार सिंह पाश के जीवनीकार डॉ तेजवंत गिल ने भी माना:
--“नक्सली आंदोलन में शामिल होने वाले युवा रोमांटिसिज़्म, एडवेंचर पसंद और -भावनात्मक युवाओं से नैतिक, दृढ़ और संकल्पशील होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। लेकिन ये लोग देश की नियति को बदलने के लिए दृढ़ भी थे। जाने अनजाने हिप्पी संस्कृति के प्रचारक थे। क्रांति की प्रक्रिया बड़ी गंभीरता, त्याग और जिम्मेदारी की मांग करती है। क्योंकि क्रांति लोगों को करनी पड़ती है, क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के लिए लोगों की परंपराओं, रीति-रिवाजों और विरासत से जुड़ना भी जरूरी है। जबकि संत राम उदासी अपने लोगों के साथ पूरी तरह से जुड़े हुए थे, वे अनुष्ठानों, परंपराओं और विरासत के लिए भी अविश्वसनीय रूप से प्रतिबद्ध थे। यही कारण है कि उनके नैतिक मूल्यों और पाश के नैतिक मूल्यों के बीच एक बड़ा अंतर था। संत राम उदासी के लिए, जहाँ गाँव की लड़की ही नहीं, बल्कि इलाके की हर लड़की की बहन थी, जबकि पाश के लिए, गाँव की हर लड़की प्यार के लायक थी। उनके प्रशंसकों का कहना है कि उनका नाम अवतार सिंह संधू था लेकिन उन्हें गाँव की पाशो नाम की एक लड़की से प्यार हो गया, इसलिए उन्होंने इस प्यार को हमेशा याद रखने के लिए अपना नाम उस लड़की के नाम पर रखा। पाश रखा। लेकिन डॉ तेजवंत गिल कहते हैं कि उनके शिक्षकों में से एक का नाम 'प्रवीश' था, जिससे उन्होंने अपना नाम रखा।
पाश का अपने घर के आसपास की लड़कियों के साथ भी संबंध था। यदि कोई गैर-राजनीतिक व्यक्ति या गांव का सामान्य लड़का है, तो उसके मामले में इन संबंधों को अपराध नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि गांव के युवा लड़कों और लड़कियों के बीच आकर्षक संबंध सामान्य हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है। यहां तक कि वे संभोग के बिंदु तक पहुंचने के लिए सामाजिक मानदंडों से परे पहुंच जाते हैं, लेकिन पाश गांव में एक साधारण लड़का नहीं था। उनका नाम नक्सली आंदोलन से जुड़ा था, उसको जेल में डाल दिया गया और सत्ता द्वारा एक कवि के रूप में स्थापित किया गया। वह जो पच्चीस साल का था, जिसमें एक बहुत गहरी गंभीरता, जिम्मेदारी और मानव भाव का आना और हावी होकर व्यवहार में ढलना था लेकिन वह इसके बजाए वहां गांव की गलियों के कोने पर लड़कियों का खुलकर इंतजार कर रहा था।
उसके आस-पास के लोगों को यह पता नहीं था कि पाश असल मे था क्या, उसकी भद्दी हरकतों से अनजान थे सब। यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि क्रांतिकारी या कवि के रूप में उनके मन में किस तरह का 'सम्मान' होगा, और न ही यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि उनका लोगों के साथ किस तरह का सहानुभूति या रिश्ता था। यदि उन्हें आंदोलन के प्रति थोड़ी सहानुभूति होती, तो वे पच्चीस वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले सौ बार सोचते थे कि वे इस तरह के आवारा का मन करें।
राजनीतिक विचारो या कहें विचारधाराओं में मतभेद सामान्य बात हैं मगर विरोधी दो धुरों में टकराव या कहें खूनी संघर्ष भी अगर हो जरूरी तो भी समस्या नही। क्योंकि टेबल वार के बाद ही सड़कों का नम्बर आता है। यह मतभेद तो होना बहुत ही सामान्य बात है, किसी को कोसना या उसकी निंदा करना किसी की राय या झूठ, कुत्सा बीमार विचारों को व्यक्त करना और चरित्र को लेकर झूठ फैलाना अपने आप में एक गलत परम्परा है। और यही कुछ किया जाता रहा है लगातार पंजाब के खालिस्तान समर्थक बुद्धिजीवियों और अलगाववादी स्लीपर सेल्स द्वारा, जिन्हें यह तक नही पता कि उनके इस झूठ प्रचार ने उनके भीतर के कुछ सच्चे ( बेहतरीन मनुष्यों जो खाड़कूओं में शामिल होते हुए भी, नापाक विचार नही रखते थे। अब उन लोगों तक की बदनाम वे कर रहे हैं।)
ऐसा ही एक खालिस्तान समर्थक यह व्यक्ति और है जो झूठों का बादशाह है। अब इसकी इन झूठी बातों को देखें, 'कुछ दिन पहले अचानक, जब मैंने एक टीवी चैनल पर तथाकथित क्रांतिकारी कवि पाश के भीतर के कवि और क्रांतिकारी रूप के लिए तारीफो की गुड्डी बनते देखी, तो मैं दंग रह गया। यह पहली बार है जब मैंने महसूस किया है कि जब समय की चेतना सो रही होती है, तो उसका पाप कहाँ कहाँ भरा जा सकता है। यह वही व्यक्ति है जिसका नाम "पाश" है, जो संत (भिंडरांवाला) को गाली देता था साथ ही बूबणा (पाखण्डी) भी कहता था। वह शराबी था, नशे की गोलियां खाता था और खाड़कूओं (खालिस्तानी) का सीधे अपमान करना इसकी स्टेट प्रयोजित देशभक्ति थी और यही नही बल्कि इसके साथ ही साथ उसने संयुक्त राज्य अमेरिका में खालिस्तानी आतंक के विरुद्ध एक एंटी-47 नामक पर्चा रूपी मोर्चा भी बनाया और उसी के माध्यम से वह सिख विरोधी बातें फैलाने की कोशिश करता था।
यह जानने के लिए कि पाश स्वयं क्या था और उसकी क्रांति क्या थी, समय खराब करने वाला काम है। बहुत लंबा व्याख्यान की तरह का, इसलिए संक्षेप में यह कहना पर्याप्त होगा कि जब पंजाब के कम्युनिस्टों ने अपना क्रांतिकारी और सामाजिक, सांस्कृतिक महत्व खो दिया और लोगों के दिमाग में गिर गये, तो इन्होंने भारत सरकार की प्रशंसा करना और भारत सरकार द्वारा सिखों पर किए जा रहे अत्याचारों पर चुप्पी साधना शुरू किया और यही उनकी क्रांति बन गई। सबसे खराब भाषा का उच्चारण करके खालिस्तानियों को खारिज करने की कोशिश और बकवास करना उनका मुख्य कर्तव्य बन गया था। और पाश तो इस कुकर्म का सबसे बड़ा उदाहरण था।
मेरी व्यक्तिगत राय में, पंजाब का उग्रवादी संघर्ष पंजाब के प्रति केंद्र की तामसिक नीतियों, जोर आउट जब्बर और विभाजन की प्रतिक्रिया था, जबकि पाकिस्तान जैसे भारत के दुश्मन के लिए भारत के अंदर इस तरह के किसी भी कदम को उकसाना स्वाभाविक था। लेकिन जो लोग, पाश की तरह ही आवरा, लोफर थे और अपमान का दंश झेलते थे और उग्रवादी आंदोलन का विरोध करते थे वे किसी भी तरह से युद्ध नहीं लड़ते थे। डूम्सडे स्पष्ट रूप से एक एकजुट खुंडिया के लिए उत्प्रेरक है और एक गांगेय शक्ति के रूप में उनके बाद के उद्भव। उम्मीदवार होना शराब, शबाब और तंबाकू के सड़े हुए धुएं में लिप्त इन तथाकथित क्रांतिकारियों का गुरुओं, पंजाब या उसके हितों से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हें पंजाब के वफादारों में कैसे गिना जा सकता है क्योंकि वे पंजाब की पानी लूट कर पंजाब को मारने वाली शक्तियों का आँख बंद करके समर्थन कर रहे हैं?
ज्यादातर लोग यह भी नहीं जानते कि पाश का असली नाम अवतार सिंह संधू था, क्योंकि वह अपने ही गाँव की पाशो नाम की लड़की से प्यार करता था, इसलिए उसने अपना नाम पाश में बदल लिया। उनके साथियों ने प्रचारित किया कि वह अमेरिका से क्रांतिकारी संघर्ष या देशभक्ति के लिए पंजाब जाने के लिए शहीद हुए थे, जबकी सच्चाई यह है कि उन्हें अमेरिका से भारत भेज दिया गया था और यहां तक कि जिस दिन उन्हें खाड़कूओं ने मार डाला था। वह वापस अमेरिका फर्जी तरीके अपना कर जाने वाला था। 22 मार्च, 1988 को, उसकी छत के चौबारे में इन आवारा लोगों का पूरा ग्रुप नशे में था क्योंकि सरकार से मिले अंगरक्षकों द्वारा दर्शन खटकड़ की सुरक्षा की जाती थी, जिससे पाश और उनके साथियों को भी सुरक्षा मिलती थी। उस रात वे 'क्रांतिकारी चरित्र' के अनुसार, शराब पीकर आए और सबके सामने ही छत पर उन्होंने सिख खाड़कूओं को गालियां दी। भद्दी गालियों और अपशब्दों की बात खड़कु जत्थेबंदी तक पहुंच गई और फिर 23 मार्च, 1988 को उसे और हंसराज को खाड़कूओं ने गोली मार दी थी। यह उनकी नकली शहादत का सच था। इस नकली शहादत के बाद ही उन्हें भारतीय स्टेट मशीनरी के द्वारा शहीद के रूप में स्थापित किया गया और दुनिया भर में जाना जाने लगा।
(सबसे बड़ा झूठ है यह और यह रहा इसको जवाब)
23 मार्च और पंजाब का लोर्का
अमर शहीद पाश की डायरी के अनुदित अंश और व्यक्तिचित्रात्मक आलेख जो यहा खड़कु समर्थक इस व्यक्ति की बात का जवाब है......
(चयन और अनुवाद :- सतीश छिम्पा)
9 सितम्बर 1950 को तलवंडी सलेम, जिला जलंधर में जन्मे थे अवतार सिंह संधू मगर पाश का जन्म हुआ था 1967 के नक्सल किसान उभार से, खेतों के इस बेटे ने ना सिर्फ खेतों बल्कि कविताओं में भी अपना लहू और पसीना बहाया था। पाश जो पंजाब का लोर्का थे, लोर्का की तरह ही शहीद हुए थे। मगर पाश मरा कब करते हैं, फिदेल के शब्दों में कहूँ तो " विचारों का वध सम्भव नहीं", पाश आज भी युवाओं, छात्रों के दिलों में जीवित है। हत्यारों का अस्तित्व मटियामेट हो गया और यह लाल यौद्धा अमर है।
(अमर शहीद अवतार सिंह पाश की डायरी के कुछ अंश)
7 जनवरी 1982
" वो मेरा वर्षों को झेलने का गौरव देखा तुमने
इस जर्जर शरीर में लिखी
लहू की शानदार इबारत पढ़ी तुमने
कविता हो ना हो, इतिहास को यूँ साँस लेते हुए
मृत शरीर की ज़िंदा लोथ के साथ
मात्र शरीर के धागे से जुड़ा होना, देखा तुमने "
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27 दिसम्बर 1971
" आज का दिन गुल दाउदी के फूलों जैसा था, सुगंध रहित। मैं इस में गुलमोहर के नक्श तलाशता हूँ।"
(प्रभ जी आप आए, बस आए और आ ही गए)
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11 अगस्त 1972 (डायरी, पाश)
" मैं सोचता हूँ, रूस में अगर कोई लेनिन ना होता तो वहां गोर्की का पैदा होना बिलकुल ही असम्भव था। घटनाओं को संतुलित रखकर समय को आगे बढ़ाना किसी बहुत महान सियासतदान का काम है। और अगर समय ऐसे ना बढ़ता तो गोर्की की मनुष्य मात्र की अच्छाई प्राकृतिक सी होकर रह जाती।
भारत में नए लेखक गोर्की से मिलते जुलते नाम रखने की कोशिश कर रहे हैं, पर यहां लेनिन कहाँ हैं। लेखक आखिर समय का पैर भी नहीं उठा सकते हैं। मनुष्यों को मुहब्बत करना बहुत मुश्किल है और इससे सुंदर कुछ भी रचा नहीं जा सकता।"
लोर्का,जिसकी कविता 'एक बुल फाइटर की मौत' कविता सुनकर तानाशाह फ्रांको ने कहा था,"यह आवाज़ चुप होनी चाहिए।" और फ्रांको के पिट्ठुओं ने लोर्का का कत्ल कर दिया,मगर लोर्का न सिर्फ स्पेन में बल्कि विश्व में अमर हो गया,उसी तरह पंजाब में 23 मार्च 1988 को तलवंडी सलेम में अपने खेत में लगे ट्यूबवेल पर नहाते वक्त मित्र हंसराज के साथ अवतार सिंह सन्धु पाश की आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी लहर के आग्गु क्रांतिकारी कवि पाश न केवल पंजाबी बल्कि विश्व कविता में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं,पाश ने खुद लिखा है कि,"जो सफ़र मेरी कविता ने किया उसी तरह का सफ़र मेरे जीवन का है।मार्क्सवाद के बारे में गहन शिक्षा सीपीआई के पार्टी स्कूलों में हासिल की,ज़िन्दगी के बारे में प्रगतिशील नज़रिया हासिल करने के बावजूद अगर मुझे 1970 के शुरू में नक्सली कॉमरेडों से मेलजोल रखने के लिए जेल ना हो गयी होती तो अब तक मैं मोहब्बत और पहचान के निगुणेपन आदि विषयों पर लिखने वाला कवि होता।"
"किरचां खिंडा दिंदी सी पाश दी कविता" नामक संस्मरण में पाश के दोस्त शमशेर सन्धु लिखते हैं कि,-
"जगराओं के एल.आर.एम. कॉलेज में कवि दरबार था जिसमे पाश को लाने की जिम्मेदारी मेरी थी।कवि दरबार शुरू होने लगा तो पाश कहने लगा, "मैं तो आधे'क मिनिट की कविता सुना के खे'ड़ा छुड़ा लूंगा। तेरे आड़ी का मान रख लूंगा पर मुझे बार-बार स्टेज पर और कविताएँ सुनाने के लिए मजबूर मत करना। पाश ने वहां जो छोटी सी 9 लाइनों की कविता सुनाई उसकी याद ज्यों की त्यों तरोताज़ा है। पाश ने अभी एक ही लाइन अपनी गरजती आवाज़ में बोली थी कि खचाखच भरा पांडाल नारों से गूंज उठा। पाश ने एक हाथ लहरा कर विद्यार्थियों को शांत करने की कोशिश की पर विद्यार्थियो का तो जैसे खून खोलने लग गया। नारे और ऊँचे और ऊँचे होते गए......
(अमर शहीद प्रिथीपाल सिंह रंधावा.....1978 ई)
"इंकलाब
ज़िंदाबाद,ज़िंदाबाद
प्रिथीपाल रंधावा
अमर रहे,अमर रहे
पाश की कविता
ज़िंदाबाद,ज़िंदाबाद।"
नारों की गूँज कुछ कम हुई तो पाश ने छोटी पर पूरी कविता सुनाई।कविता क्या थी,जैसे कोई शक्तिशाली बम फट गया हो,जैसे चारों तरफ किरचें खिंड गयी हो।कविता थी 'पंजाब स्टूडेंट यूनियन' के आग्गु प्रिथीपाल रंधावा के बारे में,जिसका कत्ल हो गया था।
प्रिथी नूं
"जिदण तूं प्रिथी जम्मिया
केहड़ा दिन सी माँ"
कविता खत्म करके पाश कॉलेज के पांडाल से बाहर की ओर रवाना हुआ तो यूँ लगा जैसे सारा पांडाल ही उसके पीछे चला जा रहा हो।कॉलेज के गेट तक पहुँचने तक उसके प्रशंसकों ने उसे नज़दीक से देखने के लिए घेर लिया।किसी न किसी तरह पाश को हमने भीड़ से निकाल लिया।आधा'क फर्लांग दूर निकल आए।फिर भी बहुत सारे लड़के पीछे-पीछे आ गए।उनकी सिर्फ एक ही ज़िद थी कि पाश उन्हें एक कविता और सुनाए,उनके प्यार को सम्मान देते हुए पाश ने 'मैं घास हूँ' नामक कविता सुनाई थी।"
"सन्नाटा छा गया पाश की कविता से" नामक संस्मरण में शमशेर सन्धु लिखते हैं कि,"खालसा कॉलेज लुधियाना में साहित्यिक समागम था।हमे शाम को मॉडल टाउन की रिहाइश से सन्देश मिला कि सुरजीत पातर के कमरे में पहुँचो।वहां पहुंचे तो माहौल शादी वाले घर की तरह का था।सेखों साब ने सबको चुप करवाया और कहा अब कोई नहीं बोलेगा,अब पाश कविता सुनाएगा।
पाश ने पहले तो हल्के से हासे और अंदाज़ में कहा,"चन्दरयो इक कविता हुक्म करण लगियां।" किसी भोले बंदे ने आगे से कहा,"काका,कविता हुक्म नीं करीदी, सगों कहिदा हुँदा कविता अर्ज़ कर रिहां।"
फिर कोई और आवाज़ उभरी,"पाश वरगे कवि कविता अर्ज़ नीं करदे हुंदे, हुक्म ही करदे हुंदे आ"फिर सन्नाटा छा गया,पाश ने अपनी गहरी और भरी हुई आवाज़ में कविता सुनाना शुरू किया,----
"मेरे तों आस ना कर्यो
कि मैं खेतां दा पुत्त हो के
तुहाडे चगळे होये स्वादां दी गल्ल करांगा
मैं तां जद वी कित्ती
खाद दे घाटे
किसी गरीबड़ी दे हिक वांग पिचक गए
गन्नेयां दी गल्ल ही करांगा
मैं बैंक दे सेकेट्री दी खचरियां मुच्छां
सरपंच दी थाणे तक लम्मी पुच्छ
ते ओस पूरे चिड़ियाघर दी
जो मैं आपणी हिक उत्ते पाळ रख्या है
जां ऐदां दी ही कोई करड़-बरड़ी गल्ल करांगा/मैं जट्टां दे साध होवण ते उरां दा सफ़र हां/मैं बूढ़े मोची दी गुमी होइ अक्खां दी लौ हां/मैं टुंडे हौलदार दी सज्जी हत्थ दी याद हां केवल/मैं पिण्डे वक्त दे चपा सदी दा दाग हां केवल।"
पाश ने कविता क्या सुनाई।वहां सन्नाटा छा गया।जैसे कोई जोरदार बम चलने के बाद कान सां....सां....करने लग जाते हैं।बीस मिनिट तक कमरा सन्नाटे में डूबा रहा।"
पाश क्रान्ति का कवि था,मेहनतकशों और सीमांत किसानो की आवाज़ था।इंदिरा गांधी की मौत पर पाश ने "बेदखली के लिए विनय पत्र" नामक कविता लिखी थी,-
"मैंने पूरी उम्र जिसके विरुद्ध सोचा
और लिखा
अगर उसकी मौत के शोक में
सारा देश ही सम्मिलित है तो इस देश से मेरा नाम काट दो।"
"धर्म दीक्षा लई विनय पत्र" नामक कविता में वे भिंडरावाला के लिए लिखते हैं-
"मेरा एक ही बेटा है धर्म गुरु
और मर्द बेचारा सिर पर नहीं
तेरे इस तरह गरजने के बाद
मर्द तो दूर दूर तक रहते ही नहीं।"
पाश खुलकर मोहब्बत किया करता था,खुल कर जीता और रहता था।
पाश 1980 से ही आतंकियों के निशाने पर था,मगर उनके नापाक इरादो को कामयाबी नहीं मिल रही थी।पहले राजसत्ता और फिर आतंकवाद का सामना करते पाश का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। पाश की हत्या करने वाले शायद जानते नहीं थे कि उन्होंने सिर्फ पाश के शरीर को मारा है,उसकी कविता को नहीं।आज उन हत्यारों का कोई नामलेवा नहीं है मगर पाश की कविता विश्व परिदृश्य पर गूंज रही है,करोड़ो छात्र नौजवानो के दिल में बसी हुई है और जबान पर चढ़ी हुई है।
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