(१) अजीज़ आज़ाद.....
०सतीश छिम्पा
(.. मरुधरा, बीकानेर का एक ऐसा शायर जिसने देश भर में लोकधर्मी ग़ज़लों के ताण नाम कमाया। हरीश भदानी और आज़ाद ये दो सितारे हैं बीकानेर के।)
बीकानेर का मोहल्ला चूनगरान की आबोहवा या तासीर या मिट्टी के कण का असर है ये, पता नहीं क्या है कि इस मुहल्ले से कई महान लिखारे निकले हैं। और सबसे ऊपर के जीने पर शायर, कथाकर अज़ीज आज़ाद भी हैं। समाज, राजनीति, लोक और मानव को फासिस्ट अपनी तरह ही सड़ा बदबूदार, बीमार, नपुंसक और घ्रणित सामंतवाद, नरोदवाद और सामंतशाही के परम्परागत अवगुण 'जातीय दंभ' को खारिज करके लोक का, लोक को लेकर, लोक युद्ध या कहें जन मोर्चा के समानांतर प्यार की एक प्यारी दुनिया भी बसाई है। शब्द और प्रेम लोक के लिए, लौकिक मुहावरा अपनेआप सिरजते हैं- जिसमे जीवन की स्थापना के अलावा किसी भी प्रकार के दूजे, अमानवीय अवमूल्यो का सर्वथा नकार है। वे अपने परिवेश के भीतर बहुत गहरे तक डूबे हुए हैं- और यही उनकी लोकपक्षधर्ता और जनवादी मूल्यों को स्थापित करने के मुश्किल काम का मगर सहज मार्ग हैं। विसंगतियां और अराजकता के इस काले दौर को अब भी हावी नही होने दिया जा रहा है तो इनके पीछे का कारण लोकधर्मी साहित्यकार हैं।
बहुत से लोग जन्म, जगह और पुरखों और अग्रजों और दोस्तों के कारण संपन्न और लूंठे होते हैं। उनका संपन्न शहर उनको और ज्यादा संपन्न बना देता हूं। वैसे सांस्कृतिक साहित्यिक राजनीतिक और जीवन के प्रति प्रतिबद्ध रूप में मिले इन जिंदा संस्कारों को न केवल समझना, जीवन मे ढालना और फिर अगली पीढ़ी को सौंप देना, यह है जीवन का सुंदर गरिमामय चक्र। अजीज़ आज़ाद बीकानेर की इसी महान विरासत जिनमे जनकवि हरीश भदानी, यादवेंद्र शर्मा चन्द्र, सरल विशारद और संवर दइया आदि जरूरी नाम शामिल थे को हासिल करना एक बात है, संवर्द्धन करते हुए सहेजे रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।
तुम हो खंज़र भी तो सीने में समा लेंगे तुम्हें
प’ ज़रा प्यार से बाहों में भर कर तो देखो
०●०
अब मिलने के नाम पर सलाम रह गए
आदमी कहाँ हैं कोरे नाम रह गए
मुद्दत हुई है देश तो आजाद सुना था
हम आज भी गुलाम के गुलाम रह गए
वो चाँद को किस तरह पाएंगे दोस्तों
जो रोटी तक पाने मे नाकाम रहा गए
लोग खाली पेट लेकर कूच कर गए
अनाज के भरे हुए गोदाम रह गए
०●०
तुम ज़रा प्यार की राहों से गुज़र कर देखो
अपने ज़ीनों से सड़क पर भी उतर कर देखो
तुम हो ख़ंजर भी तो सीने में समा लेंगे तुम्हें
पर ज़रा प्यार से बाँहों में तो भर कर देखो
मेरा दावा है कि सब ज़हर उतर जायेगा
तुम मेरे शहर में दो दिन तो ठहर कर देखो
०●०
चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए
मगर उनकी तो ये ज़िद है हमें तो अब ख़ुदा कहिए
सलीकेमन्द लोगों पे यूँ ओछे वार करना भी
सरासर बदतमीज़ी है इसे मत हौसला कहिए
तुम्हारे दम पै जीते हम तो यारों कब के मर जाते
अगर ज़िंदा हैं क़िस्मत से बुजुर्गों की दुआ कहिए
हमारा नाम शामिल है वतन के जाँनिसारों में
मगर यूँ तंगनज़री से हमें मत बेवफ़ा कहिए
तुम्हीं पे नाज था हमको वतन के मो’तबर लोगों
चमन वीरान-सा क्यूँ है गुलों को क्या हुआ कहिए
किसी की जान ले लेना तो इनका शौक है ‘आज़ाद’
जिसे तुम क़त्ल कहते हो उसे इनकी अदा कहिए
तुम ज़रा प्यार की राहों से गुज़र कर देखो
अपने ज़ीनों से सड़क पर भी उतर कर देखो
धूप सूरज की भी लगती है दुआओं की तरह
अपने मुर्दार ज़मीरों से उबर कर देखो
तुम हो ख़ंजर भी तो सीने में समा लेंगे तुम्हें
प’ ज़रा प्यार से बाँहों में तो भर कर देखो
मेरी हालत से तो ग़ुरबत का गुमाँ हो शायद
दिल की गहराई में थोड़ा-सा उतर कर देखो
मेरा दावा है कि सब ज़हर उतर जायेगा
तुम मेरे शहर में दो दिन तो ठहर कर देखो
इसकी मिट्टी में मुहब्बत की महक आती है
चाँदनी रात में दो पल तो पसर कर देखो
कौन कहता है कि तुम प्यार के क़ाबिल ही नहीं
अपने अन्दर से भी थोड़ा-सा सँवर कर देखो
०●००●००●००●
ग़ज़ल
शगूफ़े रोज़ छोडे जा रहे हैं
हवा में सनसनी फैला रहे हैं
यहाँ सुलझे हुए कुछ लोग हैं जो
मसाइल और भी उलझा रहे हैं
असल मुद्दे भुलाने के लिए ही
कईं फ़ितने उठाए जा रहे हैं
अभी भी सिरफिरे कुछ लोग हैं जो
मुहब्बत के क़सीदे गा रहे हैं
बुज़ुर्गो की नसीहत कौन माने
पुराने फ़लसफ़े समझा रहे हैं
"अज़ीज़"अब क्या कहे उन सिरफिरों को
गडे मुर्दे उठा कर ला रहे हैं
बीकानेर के ही महत्वपूर्ण युवा रचनाकार नदीम अहमद नदीम इस अद्भुत शायर के लिए कहते हैं कि -"अज़ीज़ आज़ाद का नाम उन चंद अदीबों की फेहरिस्त में शुमार किया जाता है जिनकी रचनाओं में समाज का फिक्र बहुत मुखरता से इंगित हुआ है ,आजाद साहब ने ग़ज़लों के अलावा कविताएं और कहानियां भी लिखी । उनका एक शेअर तो इतना प्रसिद्ध हुआ की वो लोक की उक्ति या कहें कोथ में ढल गये किसी महान वाक्य की तरह हो गया ।
उनको अवाम का शाइर कहा जाए तो गलत नही होगा। उन्होंने कई कालजयी रचनाओं का सृजन किया। अज़ीज़ आज़ाद के लेखन का सही मूल्यांकन होना अभी भी शेष है।" (यह आलेख जिसका यह संक्षिप्त अंश यहां दे रहा हूँ यह लिखना नामुमकिन था अगर बड़े भाई और साथी Nadeem Ahmed जी का सहयोग ना मिलता जैसे सामग्री और अन्य रचनात्मक सहयोग तो शायद नहीं लिख पाता, आपका दिली शुक्रिया साथी।)
नदीम भाई ने जो कहा वो बिल्कुल सटीक और सही है । बीकानेर के साहित्य में दशकों से चले आ रहे एक अजब मगर बीमार मानसिकता का इतना ज्यादा उभार है कि उस समय तो हरीश भदानी जैसे जनकवियों के होने के कारण ये दबे रहे मगर इन अमानवीय तत्वों ने साहित्य को जिस तरीके से प्रदूषित किया है, उसे देखकर लगता है कि आगामी के सालो तक यहां जरूरी, ज़िंदा और महान रचनाओ और रचनाकारों का मूल्यांकन नज़दीकी दिनों में संभव नहीं है। इन फासिस्ट प्रवृतियों के मिनख की खाल में छिपे अजब सी ही कोई चीज से जीतने के बाद मुक्तिकामी साहित्य के स्थापना के बाद इन महान रचनाकारों का मूल्यांकन संभव हो पाएगा।
यहीं देखा जा सकता है अजीज़ साहब के प्रभाव को कि 'अपने मुर्दार जमीरों से...' जैसी ग़ज़ल की चमक आज तक अपने पूरे सुरूर में हैं। आप देख सकते हैं कि कहाँ लिख पाया है आज तक और कौन लिखकर वो एक शे'र आसमानी ऊंचाइयों तक पूगा है। उस गज़लगो ने देशभर का ध्यान अपनी ओर कर लिया था।
अज़ीज़ आज़ाद
जन्म: 21 मार्च, 1944 बीकानेर ( राज. ) में।
प्रकाशित कृतियां: टूटे हुए लोग ( उपन्यास ), उम्र बस नींद सी ( ग़ज़ल संग्रह ) भरे हुए घर का सन्नाटा ( ग़ज़ल संग्रह ), हवा और हवा के बीच ( कविता संग्रह )
राजस्थान उर्दू अकादमी जयपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'तज़करा शोरा-ए-बीकानेर' ( उर्दू लिपि ) का संपादन।
आकाशवाणी और दूरदर्शन से निरन्तर प्रसारण, गायक रफीक सागर की आवाज़ में एक ग़ज़लों की कैसिट 'आज़ाद परिन्दा' रिलीज़।
राष्ट्रीय स्तर तक के मुशायरों एवं कवि-सम्मेलनों में निरंतर शिरकत, राजस्थान उर्दू अकादमी जयपुर के कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य, पी. यू. सी. एल. के जिला अध्यक्ष तथा अन्य कई साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी।
सम्पर्क :..... मोहल्ला चूनगरान, बीकानेर- 5 ( राज .)
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(२) हरदर्शन सहगल.....
● सतीश छिम्पा
(बीकानेर के महान रचनाकारों को हाशिए पर ही रखते आए ये स्थानीय लिक्खाड़, राजानंद जी के देहांत पर श्रधंजलि देते हुए बहुत अश्लील और वीभत्स लग रहे थे। अगर प्रायश्चित करना है तो अब हरदर्शन जी सहगल को सम्हाल लीजिए, मोनोग्राफ़ या जो भी बन पड़े इन पर वो ईमानदारी से काम कीजिए ताकि तुम्हारे पापा धुल सके।)
बीकानेर के हरदर्शन सहगल ने भरपूर लिखा है। जहाँ तक मुझे याद आता है इनकी दर्जनभर से ज्यादा किताबें छप चुकी हैं। मगर फिर भी राजस्थान के इस रचनाकार को हाशिए पर रखा गया है। सहगल पर आज इसलिए लिख रहा हूँ कि इतना कुछ लिखने के बावजूद भी आज आम पाठक उनका नाम तक नहीं जानता है। मैं तब स्नातक अंतिम वर्ष (सन 2008 ई.) में पढ़ता था। और उस समय राजस्थान पत्रिका के रविवारीय में मेरी दो कहानी और विजेंदर जी और मेरे ही द्वारा लिए गए समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट के साक्षात्कार छप चुके थे। मैंने उनकी बहुत सी कहानियां उस समय मधुमती, संबोधन और शायद कोटा से निकलने वाली अभिव्यक्ति (संपादक कॉमरेड शिवराम जी) आदि पत्रिकाओं के पुराने अंकों में पढ़ चुका था। और उसी के हौसले पर मैं उस समय सन 2008 ई. में बीकानेर स्थित उनके घर उनका साक्षात्कार लेने गया था। जो बाद में उसी साल राजस्थान पत्रिका के रविवारीय में छपा था। (आज उसकी कटिंग यहां लगाने की इच्छा थी मगर वो घर रखा हुआ है। अगर किसी के पास है तो कृपया भेज दीजिए) वे कहानीकार तो खैर है ही लेकिन बेहतरिन व्यंग्यकार भी है। 'झूलता हुआ गयारह दिसंबर' उम्दा किताब है तो वही 'तीसरी कहानी' संग्रह की ज्यादातर कहानियां बेहतरीन है। शिक्षा विभाग के संकलन का एक बार सहगल साहब ने संपादन किया था जिसमे मेरी भी एक कहानी छपी थी।
जब मैं मिला था तब तक उनकी चर्चित आत्मकथा 'डगर डगर पर मगर' नही छपी थी, वे उसका अंतिम ड्राफ्ट तैयार ही कर रहे थे, लेकिन उन्होने इसका जिक्र बहुत विस्तार देकर किया था। जब बाद में आत्मकथा छपकर आई तब काफी सराही गई थी।
हरदर्शन सहगल की आत्मकथा, "डगर डगर मगर'' से एक छोटा सा अंश प्रस्तुत है.....:-
-" भले ही उपेक्षित रहा हूँ मगर इसी पर संतोष कि किसी की हाजरी नहीं भरी। साधारण पाठकों के प्रशंसा पत्रों से बड़े बड़े लिफाफे भरे पड़े हैं। कभी कभार उन पत्रों पर भी नजर जा अटकती हैं जिनमें मेरे पत्रों के प्रत्युत्त्ार हैं। उन्हें पढ़कर मुझे लगता है कि हें मैं किसी संपादक को बख्श्ता नहीं था। क्या मैं झगड़ालू प्रवृत्त्ाि का इनसान हूं। इन्द्रप्रस्थ भारती के बैक कवर पर पढ़ा- इस पत्रिका में देश के महत्वपूर्ण लेखक छपते हैं। मैं साहित्य लेखन में भले ही होशियार न हूं, लेकिन आज तक पत्र-लेखन में तुरत-फुरत हूं। मैंने उसी समय संपादक जी को खत लिख दिया; ''कृपया महत्वपूर्ण और गौण लेखकों की सूची भी जारी कर दें। बाकी के सारे संपादक तो मेरे पत्रों से कुढ़ भी जाते थे। मैंने पत्रों को 'नोटिसकार्ड‘ बनाकर भी कई संपादकों को लिखा था कि फ्लानी तारीख तक मेरा पारिश्रमिक न पहुंचा तो अदालती कार्रवाई की जाएगी। पत्र में कुल इतने अक्षर हैं। कहीं पर काट छांट नहीं हुई है। वाह वह जमाना। संपादकों के उत्त्ार आते- आप ऐसा क्यों लिख देते हैं। मेरा आज भी यही मत है कि लेखक को पारिश्रमिक मिलना ही चाहिए। संपादक जब हर मद्द पर खर्च करता है, तब सिर्फ लेखक को ही क्यों पारिश्रमिक से वंचित रखता है। दूसरा, ज्यादातर महल्लाें, घरों की स्थिति यह है कि वे लेखक को निकम्मा काम करने वाला (जीव) मानते हैं। जब पैसा आता है तो रचना तथा रचनाकार का महत्व बढ़ जाता है। सार्थक कार्य। मगर फिर वाह, 'महत्वपूर्ण गौण‘ को पढ़कर, नारायणदत पालीवाल, सं․ इन्द्रप्रस्थ भारती-तुम्हारी जय हो- ने मुझे लिख भेजा था ''-- आपका पत्र पढ़कर निहायत खुशी हुई। इस ज़माने में भी (इस जमाने में उनका तात्पर्य था जब लेखक (?) संपादकों के आगे पीछे दुम हिलाते घूमते हैं) ऐसी खरी बात कहने वाले लेखक भी मौजूद हैं।''
सहगल साहब का अवदान और इस बाबत जानकर भी हैरान होता हूँ की ये किस तरह की घटिया साहित्यिक राजनीति है जिसने इस तरह के जीवंत रचनाकार को हाशिए पर रख छोड़ा है। राजानंद जी गुजर गए। क्या यही गुमनामी में गुजर जाना हरदर्शन सहगल की भी नियति है ????? लेकिन मैं फिर भी राजस्थान समेत सभी क्षेत्रों के युवा लेखक, पाठक, आलोचक और संपादको से एक निवेदन करता हूँ कि वे इन साहित्यिक गुंडों, गुंडावाहिनियों को जवाब देकर अपने आगीवाण को मुख्य धारा में स्थापित करने और नए लेखकों और पाठकों से कि जिन्होंने सहगल साहब का नाम तक नहीं सुना, उन्हें जरूर पहले खुद और फिर बाद में साथियो को पढ़ाना चाहिए। हमारी विरासत, हमारे ये पूर्वज ही है। आओ साथी नींव की तरफ लौटें।
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(३). राजानंद..... अभी के लिए परिचय ही काफी है.....
वे जिन्हें कपटपूर्ण साजिशों के बल पर भुला दिया गया.
० सतीश छिम्पा
आज याददिहानी कॉलम में बीकानेर के एक ऐसे रचनाकार की बात कर रहे हैं जो 90 के दशक तक अपने सृजन के स्वर्णिम दौर में था। बाद में कपट और छल से इनको पूरी तरह भुला दिया गया। जी हां, मैं बात करने जा रहा हूँ उम्र के 88 वें वर्ष में प्रवेश कर चुके वरिष्ठ उपन्यासकार, कथाकार, कवि, आलोचक, कॉलमिस्ट, पत्रकार, नाटककार, रंगकर्मी व रंग निर्देशक डा. राजानंद की मैं अपने समय में बिसरा दिए गए इन रचनाकारो की बात इसलिए करता हूँ ताकि युवाओं को इनके बारे में ज्यादा से ज्यादा पता चले। ये वे रचनाकार हैं जिन्हें आलोचना द्वारा जानबूझकर उपेक्षित किया गया था। इस तरह के बेहतरीन लिखारों की बात करना बहुत जरूरी है। डा. राजानंद साहित्य के कपट और छल से दूर ही थे। भले विचारधारा ना मिले लेकिन फिर भी सप्तक कवि, आलोचक, नाटककार डा.नंदकिशोर आचार्य का जिक्र मैं कर रहा हूँ क्योंकि उन्होंने अपनी सद्य प्रकाशित आलोचना कृति ’रचना का अंतरंग’ डा. राजानंद को समर्पित की है। राजानंद के गद्य की तरह ही उनकी कविताओं में में भी व्यष्टि से समष्टिगत दर्शन और सरलता से बहुत ही सूक्ष्म अनुभूतियों को प्रकट करते हैं।
देखा जाए तो रांगेय राघव, मनोहर श्याम जोशी, पानू खोलिया और शरद देवड़ा आदि की श्रेणी में आने वाले इस रचनाकार की कोई सुध ही नहीं ली जा रही।
नाम :- डॉ. राजानंद
जन्म :- 15 अगस्त 1931
उम्र - 88 वर्ष
शिक्षा - एम.ए., पी.एच.डी., बी.एड.
कृतियां :-
कविता संग्रह :- 'शायद तुम्हे पता नहीं', 'तब क्या सोचोगे'
उपन्यास :- (कुल 15 उपन्यास)
'प्यासे प्राण, नीली झील: लाल परछाइंया, रूप-अरूप, यहां से वहां तक, घड़ी दो घड़ी, एक बार फ़िर, बिखरे-बिखरे मन, इदम्, अंशावतार, ये होशवाले लोग, औरत में औरत, ना सुख धूप न छांव, पूर्वजा
कहानी संग्रह :- 'मम्मी ऐसी क्यों थी', 'कल किसने देखा।'
नाटक :-बहादुर शाह जफर तथा अन्य एकांकिया, सदियों से सदियों तक, अश्वत्थामा, रोशनी घर, राजानंद के नाटक, योगमाया, गणगौर, आदमी हाजिर है, गुंगबोंग मर गया, चौकियां कौन तोड़ेगा। चंदा बसे आकाश, सरस्वती कहां खो गई(नाटक), शहद का महल, जब तक सांस तब तक आस( बाल नाटक), स्वाहा! स्वाहा! (नुक्कड़ नाटक)
आलोचना :- संवेदना के बिंब
विविध '- गांधी युग: दशा-दिशा, गांधी दर्शन और शिक्षा, गांधी और भारत संस्कृति की धर्मिता(विविध) के अलावा वातायन, सप्ताहांत के लिए पत्रकारिता व रंग रंग बहुरंग(शिक्षा विभाग राज.) का सम्पादन।
पुरस्कार व सम्मान : एक बार फ़िर(कहानी संग्रह) के लिए राजस्थान साहित्य अकादेमी का रांगेय राघव पुरस्कार, इदम्(उपन्यास) के लिए उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार के अलावा राजस्थान साहित्य अकादेमी व राजस्थान संगीत नाटक अकादेमी के कार्यकारिणी अध्यक्ष
शोध:- महात्मा गांधी के दर्शन और साहित्य पर।
( विशेष :- लेख, बाल साहित्य और विविध क्रियाविधियों की सात किताबें और है।)
डॉ. राजानंद
बी/30, मुक्ता प्रसाद कॉलोनी, बीकानेर।
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