भाषा :- बदरंग कुक्कड़ और न्गूगी वा थ्यांगो.....



 
      बदरंग कुक्कड़ और न्गूगी वा थ्यांगो 
   ( एडुआर्डो गालेआनो, न्गूगी वा थ्यांगो)

                                 (● सतीश छिम्पा)
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      आदमी बचेगा तभी, जब तक बची रहेगी भाषा

      कोई भी आपका 'प्रिय लेखक' इसलिए नहीं बन जाता कि उसने बहुत सी किताबें लिखी है या वो बहुत चर्चित- विवादित या औचक उठा किसी गुबार सा फैलाव रखता है..... बल्कि 'प्रिय बनने की प्रक्रिया' का मतलब है धारा से हटकर, राजसत्ता के जुल्म, अन्याय और शोषण के विरुद्ध निडरता से खड़े होकर लिखना, और ऐसा लिखना की तानाशाह बौखलाकर उसको जब्त या प्रतिबंधित करने की सोचने लगे और पाठक उसको चोरी- चोरी भी पढ़ सकने को सौभाग्य मानने लगें। जिंदा साहित्य। और कुछ ऐसा जो जीवन और मनुष्य का अपमान ना करता हो बल्कि प्रतिरोधक बैरिकेड बनकर उभरता हो।

      विश्व  (भारतीय भाषा वर्ग भी शामिल है।) साहित्य  के हर रचनाकार की रचनाओं का प्लेटफॉर्म एक दूसरे से बिल्कुल अलग होता है, कुछ तो बहुत गहराई और ठोस तरीके से भाषा का महत्व समझाते हुए उसको स्वतंत्रता संग्राम का हथियार भी बनाकर एक महान परम्परा कायम करते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, भौतिक, वैचारिक और स्थितियों के आंकलन का तरीका भी। कुछ रचनाकार एक ही समय मे एक ही घटना पर लिखते हैं तब भी उनकी मनःस्थिति भिन्न बनी रहती है।
         नहीं, यह कोई बहुत मुश्किल या लंबा चौड़ा उबाऊ दर्शन नही बल्कि जीवन के जीने और सोचने और स्वभाव की तरलता पर निर्भर करता हुआ लोकरजंकीय स्थापनाओं के साथ ही रोमांचकता उभारता है।  अक्सर मेरे परिचित और मित्र लोग कहते हैं कि तूं विश्व साहित्य क्यों पढ़ता है?. मेरा एक ही जवाब होता है कि साहित्य जो भी, जब भी मिले, पढ़ता हूँ मगर आपको साहित्य से ज्यादा या प्रश्न ही बदलकर पूछना चाहिए कि वैश्विक दर्शन क्यों पढ़ते हो। विश्व साहित्य क्यो जरुरी  है या तुम समकालीनों का क्यों नहीं पढ़ते आदि- आदि, नहीं, यह सच बात नही हैं कि समकालीनों को नहीं पढ़ता-- इक्का दुक्का छोड़कर इन दिनों चर्चित, निंदित और हाशिए के युवा और प्रौढ़, वरिष्ठों की काफी रचनाएं पढ़ी है- दिक्कत पढ़ने की नही बल्कि इनके लिए बना दी गई पिच है जिसके चलते इनको प्रसिद्धि मिलती है- योग्य को नजरंदाज तक कर दिया जाता है इसलिए इन पर चर्चाओं का मुझे कोई खास मतलब नही लगता। और यह भी एक और कारण है कि इन कुछ दिनों से मैं लगातार दर्शन पढ़ रहा हूँ- साहित्य तो बौद्धिक उथली जरूरतों और विषयवस्तु की गहराई- ठोस भाव आदि लिए हुए जो दर्शन है वो भी इसकी वजह से बहुत आसानी से कैच किया जाता है। 

       इन कुछ दिनों से जब मैं महान बहस, स्टेट एन्ड रिवोल्यूशन, ख्रुश्चेव झूठा था, नक्सलबाड़ी, फर्स्ट नक्सलाइट :- कानू सान्याल,  मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र पढ़ने, नोट्स लेने, चर्चाओं की तैयारी और सर्किल के लिए तथ्यों को सहेज रहा था तब महसूस हुआ कि चार- पांच साल पहले तक इसी तरह के क्लासिक्स मसलन ऐतिहासिक भौतिकवाद, दर्शन की दरिद्रता, पार्टी संबंधी और विचार की पृष्ठभूमि तक समझने में जोर लग जाता था। एक किताब को दो या तीन बार पढ़ना पड़ता था, अब ऐसा नही है। इसकी वजह कहीं न कहीं ये सतही अध्ययन भी रहा है-- जिसने समझ विकसित तो की ही है बाकी उसके साथ ही साथ उन सब शब्दों के ध्वन्यार्थ समझने में और तर्कणा को भी तीखी करने में भी इसका हिस्सा रहा है ।


      तीसरी दुनिया मे भाषा को बचाने और स्थापित करने के अनेक प्रयास हुए हैं।

पेटल्स ऑफ ब्लड’ मेरे सबसे पसंदीदा उपन्यासों में है और वो भी इसलिए कि न्गूगी की भाषाई प्रतिबद्धता एक ऐसे समय मे उभरकर मुखरित हुई जो तानाशाहों का स्वर्णकाल था। आनंदस्वरूप वर्मा द्वारा अनुदित यह एक ऐसा उपन्यास जिसको पढ़कर आदमी का मर चुका जमीर भी उठकर भाषाई गुंडा वाहिनियों को जवाब दे सके। इसकी रचना प्रक्रिया  बाबत बताते हुए- न्गूगी -‘‘इस उपन्यास के लेखन के दौरान यह देख कर मैं हतप्रभ रह गया कि केन्या की गरीबी की वजह कोई अंदरूनी नहीं है-वह इसलिए गरीब है क्योंकि यहां की सारी संपदा का इस्तेमाल पश्चिमी जगत के विकास में हो रहा है। बात बहुत साफ है। पश्चिम जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान और अमेरिका द्वारा एक यूनिट पूंजीनिवेश के बदले में साम्राज्यवादी बुर्जुवा हमारे यहां से दस यूनिट संपदा अपने देशों को ले जाता है। 


उनकी सहायता, उनके द्वारा दिया गया कर्ज और उनके द्वारा किया गया पूंजीनिवेश एक ऐसे रासायनिक उत्प्रेरक का काम करते हैं जो केन्या की संपत्तिहरण की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं-बेशक, इससे छिटक कर बाहर गिरने वाला अंश यहां मुट्ठीभर‘खुशकिस्मत’ लोगों के हाथ आ जाता है। मैंने महसूस किया कि साम्राज्यवाद कभी भी किसी देश अथवा जनता का विकास नहीं कर सकता…‘पेटल्स ऑफ ब्लड’ में मैं यही दिखाना चाहता था कि साम्राज्यवाद कभी भी हम केन्याइयों का या हमारे देश का विकास नहीं कर सकता। ऐसा करते समय मैंने भरसक केन्या के मजदूरों और किसानों की इस अनुभूति के प्रति ईमानदार रहने की कोशिश की जिसे उन्होंने 1895 से ही अपने संघर्षों के जरिए प्रदर्शित किया है।’’''


 तीसरी दुनियां के दो महाद्वीप लैटिन अमेरिका और अफ़्रीका के दो पिछड़े हुए राष्ट्रों उरुग्वे और केन्या में ऐसे ही दो विद्रोही और अद्भुत रचनाकार हुए, एदुआर्दो गालेआनो और न्गूगी वा थ्योंगो। गालेआनो ने जहां परम्परागत शैली से हटकर क़िस्सागो और रिपोर्टिंग अंदाज़ में लिखा तो थ्योंगो ने उपन्यासों, नाटकों और लेखों के माध्यम से उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, पूंजीवाद के विरुद्ध लिखा। आप थ्योंगो के 'फूल की पंखुड़ियां', 'मातीगारी' उपन्यास पढ़ें या 'औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति' विचार श्रृंखला, वे बिल्कुल सधे हुए तरीके से सत्ता की चालों पर वार करते हैं। पकड़े जाते हैं, जेल भी जाते हैं मगर अन्याय के विरुद्ध उनका यह संघर्ष जारी रहता है। भाषा के प्रति समर्पण, राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व को बचाने की अपनी मुहिम में वे लगे ही रहते हैं।

      यहाँ क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा और सहित्यिकी कि मुहीम चली थी जिसके कारण वे भाषाएं जो लुप्तप्राय है- वहां बच गयी जबकि हम यह आज तक नहो समझे और... बदरंग कुक्कड़ बनाकर छोड़ दिए गए हैं। (इसका जिक्र आगे होगा।)
 
      आप गालेआनो की मूल भाषा मे रचित मगर हिंदी अनुदित:- आग की यादें (मेमोरी ऑफ फायर), लैटिन अमेरिका के रिसते ज़ख्म (ओपन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका) या 'किस्सों का शिकारी 'पढ़िए वे सत्ता पर किस्सों और बातों के माध्यम से हमला करते हैं। वे उरुग्वे ही नहीं अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे, बोलिविया सहित तमाम लातिनी राष्ट्रों के तानाशाहों और अमरीकी पिट्ठुओं को नंगा करते हैं। 'लातिन अमरीका के रिसते ज़ख्म' के सबसे ज्यादा अनुवाद हुए हैं। गालेआनो उतनी ही बार अपने देश से निर्वासित भी हुए हैं। सबसे बड़ी बात कि इन दोनों ही रचनाकारों को जंगों, तख़्ता पलटों और तानाशाहों की सदी जीने को मिली, जिसका इन्होंने उसी तरीके से विरोध भी किया।       
      न्गूगी वा थ्योंगों की किताब 'औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति - शिक्षा और संस्कृति की राजनीति'। अगर आपने न्गूगी वा थ्योंगो का उपन्यास 'खून की पंखुड़ियां' पढ़ा है तो यह किताब भी आपको जरूर पढ़नी चाहिए। कला, साहित्य, शिक्षा और संस्कृति पर यह एक पठनीय किताब है। कोई भी किताब कालजयी तभी होती है जब उसकी विषयवस्तु या घटनाएं 'स्थानीय होते हुए भी वैश्विक' हो। इस किताब में भाषा का मुद्दा भी स्थानीय होते हुए वैश्विक है, जो अफ़्रीका से होता हुआ दक्षिण एशिया, मध्य पूर्वी यूरोप, लातिन अमरीका, ऑस्ट्रेलिया तक जाता है।

  -  मातिगारी की कहानी एक दमनकारी राज्य में किसी लेखक के हालात की विडम्बना को तो बताती ही है। यह उपन्यास अक्टूबर 1986 में पहली बार केन्या में छपा था। इसके शीघ्र ही बाद राष्ट्रपति मोई के पास यह ख़बर पहुंची कि 'मध्य केन्या के किसान मातीगारी नामक एक व्यक्ति की चर्चा कर रहे हैं, जो सत्य और न्याय की मांग करते हुए पूरे देश मे घूम रहा है। मोई ने इस व्यक्ति को फौरन गिरफ़्तार करने का आदेश जारी किया। बाद में पुलिस ने बताया कि मातिगारी तो एक पुस्तक का चरित्र है। तो भी फरवरी 1987  में मातीगारी को 'गिरफ़्तार' कर लिया गया और नैरोबी की सभी दुकानों और प्रकाशक के गोदामों से इसे हटा दिया गया।"          

      विश्व भाषाओं की बात भी करें तो पाएंगे कि हमारे ही नही बल्कि अन्य जन समुदायों को भी गूंगा किया जा रहा है। इसका प्रभाव बहुत भयानक रहेंगे- बच्चे सीखने की प्रक्रिया तो दूर हम उनके भीतर भय तक पैदा कर देते हैं। यह मेरे शिक्षक जीवन काल के ग्यारह वर्षों का अनुभव है कि घर के जो अधकचरे  लोग इनके नुकसान के जिम्मेदार होते ही होते हैं। दरअसल वे उन्हें अंग्रेज बनाने के चक्कर मे बदरंग कुक्कड़ बनाकर छोड़ देते हैं- ये हकीकत जरूर पढ़ें....

         वो खुद दसवीं पास था। मगर संयोग से सरकारी नौकरी लग गया और आर्थिक रूप से सम्पन्न हो गया। अब जैसे कि स्वाभाविक है कि पूँजी उसके जमीर के डुक्क मारने लग गई। बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल्स में भर्ती करवा दिया और कड़ी हिदायत दी कि कोई बागड़ी (राजस्थानी भाषा की बोली जो मेरी भी माँ बोली है।) में बात नहीं करेगा, हिंदी ही बोलेगा या फिर अंग्रेजी। बच्चे तो बच्चे थे, डर गए और जैसी आती थी, बोलने भी लग गए। मैं अक्सर उनके घर जाता तो यही भाषा सुनने को मिलती, " मम्मी वाटर झलाना जल्दी से", "दीदी बेगी सी इधर आओ वो देखो गोधा वॉकिंग", "पापा this is माड़ी बात" और वो उन्हें देख देख कर खुश होता कि मेरे बच्चे गंवारों (मायड़ भाषा को वो गंवारों की भाषा कहता है) कि भाषा नहीं बोलते।

            एक दिन हम लोग उन्हीं के घर में बैठे हुक्का पी रहे थे कि उनका लड़का दौड़ता हुआ अपनी मम्मी के पास आया और बोला, " मम्मी मम्मी फ़ास्ट चलो, देखो ऊंट के ढुंगों में लकड़ा फसा हुआ है।" सुनकर वे दोनों धणी लुगाई बुरी तरह शर्मिंदा हो गए और वो बोला "बेटा ऐसा नहीं बोलते, वो लकड़ा दरअसल पीनणी है, इससे हल जोड़ा जाता है।" मैं बुरी तरह पेट पकड़ कर हंस रहा था। यह अफ़सोस भी था कि इस मूर्ख ने अंग्रेज बनाने के चक्कर में जाने क्या बना दिया बच्चों को, वे अब बदरंग कुक्कड़ बन गए हैं।


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क्यों पिछड़ते है प्राइमरी तक की पढ़ाई में हमारे टाबर यह भी पढ़ कर देख लें
"मुनीर....शहतीर" ये दो वाक्य मैंने बोर्ड पर लिखे और एक लड़के को खड़ा किया कि ये शब्द कैसे बने। कौन कौन सी मात्राएँ कहाँ लगी तो उसने बताया म गै पग में उ गी मात्रा अर न पर ई गी मात्रा अर र मुनीर.... अर श अर ह गै पछै त पर ई गी मात्रा अर र शहतीर।
  प्राथमिक शिक्षा मातृ भाषा राजस्थानी में न होकर हिंदी में होने के कारण ही हमारे बच्चे कुछ भी समझने में बहुत टेम लेते हैं। जबकि यही पैटर्न हिंदी भाषी बच्चों के लिए बेहतर रहता है।
एक और बात।
मैंने पूछा, "अरे ये पेन किसका है?"
नत्थू हुड्डा- "गुरूजी ओ पेन हमका है"

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-"गुरुजी ओ छोरा हमका तमका तंग है। झींटिए पट रहा है।".. ये एक छोरी ने कहा।
  ये धक्का और अन्याय नही तो क्या है ।

  न्गूगी वा थ्यांगो , गालेआनो,  वैजेल और जितने भी प्रतिरोध मोर्चे हैं वे अब इस मुद्दे को गंभीरता के साथ व्यवहार में लेने लगे हैं। यह सुखद है।
       
       
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