तुलनात्मक मूल्यांकन
( हम कटिबद्ध है लोक को स्थापित करके कंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम के सांस्कृतिक प्रदूषकों के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए। इस मानवद्रोही अराजक दौर में उपेक्षित क्यो है जनपक्षधर कविताएं।)
समकालीन सामाजिक परिवेश या राजनीतिक सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों का यथार्थ (उद्देश्यों और लाइन के जिक्र नाकाबिले बर्दाश्त गुनाह है) चर्चा का विषय होता है तब प्रतिबद्धता, जीवन, विचार और वर्ग और श्रम और लोक के प्रति प्रतिबद्धता का सवाल अक्सर गायब ही मिलता है। हमारा उद्देश्य क्या है ? लाइन ? कार्यविधि ? जन सांस्कृतिक संगठन के समांतर कांग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम के सांस्कृतिक अराजक रूपवादी बुर्जुआ बैंकर, बौद्धिक विलासिता से भरी रूपवादी धारा के मानवद्रोही बौद्धिक वरिष्ठों की निर्लज्ज स्थापनाओं का प्रत्युत्तर देने के बजाए सवाल उठा रहे किसी युवा लेखक समीक्षक को हाशिए पर डालने की अपसंस्कृतिक अवमूल्यों वाले इस महकमे के विरुद्ध बहस का गायब होना, प्रतिरोध के नपुंसक मध्यमवर्गीय मनबहलाव का अश्लील प्रदर्शन जिस गति से बढ़ा है- जनवाद या लोक या जनपक्षधरता शब्द महज़ सिर्फ बीमारू शब्दावली में बदल चुके सांस्कृतिक जीवाणु भर रहे हैं। समकालीन या पहले की कविताओं और परिवेशगत प्रयोगों द्वारा स्थापित नवप्रयोगों के बहुत उथले मगर लोक जीवन से संबद्ध और लोक में घटित होने वाली घटनाओं का साकार रूप होता है | लौकिक काव्यगत विशेषता एक यह भी है कि जिस समय घटना घटित होती हैं, हमें इनका आभाष तो होता है मगर बहुत बाद में अवचेतन से निकल औचक ही साकार होने लगती है।
लौकिक परिवेशगत सृजन बुर्जुआ जीवन से कटे इस रूपवादी मानवद्रोही काव्यगत बौद्धिक विलास के प्रतिरोध के बजाए इसके समानांतर लाभ के लालच में प्रदूषित होकर जनद्रोही पक्ष को ना केवल उत्पन्न करता है बल्कि कपट की मजबूत नींव तक तैयार कर के देता है। बहुत खतरनाक है यह सांस्कृतिक कपट की समकालीन जमात..…. जनवादी या प्रगतिशील नकाबों का सरेआम हो जाना, हमारे भीतर के कायर, लालची, कपटी बौद्धिक जानवर का मुखरित हो जाने समान है।
लौकिक या जनपक्षधर सरोकारों, परिवतर्नगत मूल्यों को स्थाई वतस्ली प्रदूषकों से सकारात्मक मूल्यों के छलावे के साथ ही जनद्रोही धड़े का रचनात्मक आक्रमण जिस आत्मीय सम्बन्धों को से गद्दारी करके हावी होने लगा है, जो समकालीन कवि मानवीय मूल्यों और मानवीय न्याय के संघर्ष की बड़ी बड़ी बातें करते हुए जीवन का कुकर्म करके वतस्ली राजमहल में घुटने टेके बैठे हैं और युवाओं के पास अनुयायी बनने के अलावा कोई चारा नहीं। मर जो चुकी है उनके भीतर की जीवन धारा।
फिर भी एक छोटा ही सही, गलत या भटकाव भी है अगर बीच मे तो निरन्तर सुधार जारी रहेगा। हम कटिबद्ध है लोक को स्थापित करके कंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम के इन वतस्ली प्रदूषकों के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए।
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अब जब मानवद्रोही व्यवस्था, जीवन और लोक के सबसे बड़े और बर्बर फासीवादी राजसत्ता पूंजीवादी अपसंस्कृतिक, प्रदूषित मूल्यहीन समाज,और सामाजिक अराजकता, तनाव, असहिष्णुता, भय, लूट, बलवा, अविश्वास मोबलीचिंग- के बल पर खुद को किसी तिलिस्मी वशीकरण की तरह से सुरक्षित कर लिया है और मनुष्य से जनता होने का मूलाधिकार छीनकर 'दास' परम्परा को अप्रत्यक्ष रूप में कायम कर दिया गया है तो- इस तरह के काले अंधकारमय और लहू लुहान समय मे रेवंतदान चारण, मनुज देपावत, आदि की परंपरा को ही आगे बढाने वाले हरीश भादानी इस काले, जहरीले और अराजक समय मे मनुष्य को मनुष्य रूप में फिर से स्थापित करने और जनवादी मूल्यों पर कायम एक दशक या उससे पहले का सामाजिक ताना बाना लोक की चेतना से विस्मृत होने से बचाए हुए हैं। लोकधर्मिता और जीवन और विचारों के प्रति भादानी जी की जो प्रतिबद्धता है- वो राजस्थान में इस हेतु विशिष्ट बनाती है कि वे अपने साथी जमात या समकालीन लेखकों को लोक और जीवन के महत्व को बताते हुए जनपक्षधरता को स्थापित करने में सफल रहे थे।
यह जनपक्षीय सरोकार हो जीवन के प्रति प्रतिबद्धता ही उन्हें हकीकतन 'जनवादी मूल्यों का का कवि' रूप में स्थापित करते हैं। राजस्थान के ज्यादातर आलोचक या तो इस बात को नजरअंदाज करते हैं या उन्हें पता नहीं या फिर ऊंचे कद के कवियों से उन्हें भी रहता होगा-- लेकिन यह कड़वा मगर सच है कि राजस्थान की राजस्थानी कविता को (सत्तर और उसके बाद के दशकों में, तेजसिंह जोधा, पारस अरोड़ा आदि प्रतिबद्ध और मुक्तिकामी प्रतिरोधी कवियों को रजस्थानी- एक के बाद हाशिए पर ही धकेल दिया गया था) उसके सबसे मुखर, मौलिक और कलासिकल रूप से साजिश के तहत विमुख किया गया था। और यहाँ की हिंदी कविता के सबसे महत्वपूर्ण और अद्भुत कवि नामो, संभावनाओ - से ज्यादातर को 'कृति ओर'- के वरिष्ठ कवि संपादक विजेंद्र ने बहुत स्थाई ठोस मंच उपलब्ध करवाए और जनता की जनपक्षधर कविताओं को बहुत आगे तक विस्तार दिया और कविता के मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की धारणा की पुख़्तगी महान है।
भारतीय भाषाओं में जनता, श्रम और लोक और जीवन की कविताओं और जन कवियों की एक उन्नत परम्परा है। इनकी रचनाएँ लोक-मानस के संघर्षों को चिन्हित करती हुई अपनी अमिट छाप छोड़ती हैं और लोक मे अमर हो जाती है।
हरीश भादानी की कविताओं का सफर लोक की जीवंत प्रतिरोधात्मक तासीर को कायम करने में महती भूमिका निभा चुकी थी। मेहनतकशों और अर्ध सर्वहाराओं शोषण, अन्याय, पक्षपात और उपेक्षित और यथास्थितिवादी लोकतंत्र की बीमारू शाखों के तिलिस्म को तोड़ने तक कायम रहा, जो पूंजीवाद के सामने वर्गीय पक्षधरता के लिए कविताओ गीतों से प्रतिरोधक मोर्चा बनाते हैं। पूंजीवादी अपसंस्कृतिक अवमूल्यों को उस वर्ग का नेतृत्वकारी घटक बताकर, प्रतिरोधक युवा साहित्यिक कतारों का ध्यान इस तरफ करवाया गया है। बहुत वीभत्स, अराजक और कुंठाओ संत्रास बीमारू सम्मोहन के अब इस दौर में चल रहा है, सबसे खतरनाक है। राज सत्ता भयानक रूप से अय्यारों को झोंके हुए हैं कलाओं के क्षेत्रों में जहां बोरुंदा जोधपुर से लेकर बीकानेर और जयपुर तक के बुद्धिजीवीवादी मानसिक सुरक्षा दलों का विशाल और भूमिगत जासूसों की तरह के नकाबी अपराधियों की शरणस्थली बन चुकी है, संस्कृति किसी बिमारी से ज्यादा कुछ नही है।
आज जहां प्रतिरोध के नाम पर कुछ कवि वर्चुएल वर्ल्ड में स्टेटस लिखकर, सामंती पगड़ियों को खुश करने में जुटे हैं और अन्याय, शोषण, असमानता चरम पर है। यह अकारण नहीं है कि फ़ासिस्ट सरकार ने शैक्षिक, कला मर्मज्ञों को गुंडा वाहिनियों के रूप में जनपक्षधर स्वर को दबाने के लिए नही बल्कि भटकाने के लिए तैनात कर रखा है । इस घोर फ़ासीवादी अपसंस्कृतिक समय में हर वो चीज खतरे में है जो जीवन की बात करते हैं। इस अपसंस्कृतिक अवमूल्यों के फासिस्ट समय मे अब हमें याद आने ही चाहिए हरीश भादानी और उनकी प्रतिबद्ध काव्य परम्परा और यात्रा....... एक जरुरी बात यह भी है कि किसी मूवमेंट के दौरान उसी के तत्वों को कविता में ढाला जाता है तो जाहिर है वे उसी विचारधारा या बिरादराना संगठन के होंगे-- लेकिन इसी तरह के मूवमेंट से प्रभावित होकर मध्यममार्गी लोग कविता रचे तो उस कविता को उसी धारा के साथ ही जोड़ा जाता है, कवि यहां गौण है।
भारतीय भाषाओं में छठे और सातवां दशक इंकलाबी- क्रांतिकारी कविताओं का दौर था- और अस्सी के दशक विद्रोही मगर दिशाहीन विध्वंसात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करते हुए अंत मे बदलाव के मार्फ़त कविता को नया और श्रेष्ठ वैचारिक और द्वंद्ववादी रूप देते हैं। अगर हम वैचारिक धरातल पर ही खड़कर देखें तो जिस कविता को जनवादी कविता के मुलम्मे में गढ़कर रखा है वो हकीकतन मार्क्सवादी/ इंकलाबी कविता है। यह विडंबना ही है यहां की ज्यादातर लोग जनवाद को मार्क्सवाद समझे बैठे हैं। मार्क्सवादी अवधारणा जिस महान परिवर्तन के समांतर है जिससे इसका फलक वैश्विक होता है- जबकि जनवाद, डेमोक्रेसी- इसी की वजह से अनेक कवियों का मूल्यांकन ही गड़बड़ झाला है। यह ना ही अतिशयोक्ति है और ना ही आत्ममुग्ध बयानबाजी है कि कविताओ के सही और सटीक मूल्यांकन के लिए वैज्ञानिक तर्कणा विकसित करना बहुत जरूरी है जो वाक्यों के भीतर जमी विचारधारा को पकड़ जान सके यह बहुत सूक्ष्म और गहराई मांगता है- मगर अभी समय है आलोचनाओ में वैज्ञानिक दीठ को स्थापित करने में
इस आधुनिक कबीर या कहें सच्चे और ठोस मायनो में जनकवि का व्यक्तित्व और सांस्कृतिक स्तर एकमेक थे, दोगलापन नही था। सरल विशारद जो उनके करीबी साथी रहे हैं आज भी याद करते हैं। वातायन का संपादन (यह अगले अंश में आएगा) अद्भुत काम था जिसका आगे जिक्र करूँगा
..लोकपक्षधर रचनाकार की प्रतिबद्धता और चेतना के सांस्कृतिक स्तर की थाह उसके दार्शनिक अध्ययन और लोकानुभव के जिवंत भंडार से उठती प्रतिरोधक गति और उसके सहज स्फूर्त मगर द्वंद्वात्मक दीठ की तर्कणा से निर्मित भावबोध पर निर्भर करती है और इसी के साथ समांतर रूप में विकास करते हुए उसकी श्रंखलाएं स्थापित होती है। यहां अकादमिक पाठक इन सबसे गुरेज करता हुआ राजनीतिक विश्लेषण से बचकर निकलने की भूल जरूर करता है। वो कविताओं के भीतर के विचार को थामता है। रचनाकार, एक प्रतिबद्ध और ईमानदार रचनाकार लोक की साझी पीड़ाएँ, संताप और संघर्ष को बहुत अहतियात से बढ़ाता हैं। लोक को लोकराज के बारे में जागरूक करता हुआ जन सरोकारों का साझा मंच तैयार करने की दिशा में पहला कदम उसकी रचनाएं उठती हैं।
वर्तमान में सोशल मीडिया पर कवियों और आलोचकों की जो फौज तैयार हुई है इसमें से ज्यादातर युवा या प्रौढ़ बौद्धिक विलासिता के घटाटोप में लोक और लौकिक सरोकारों का मंच इसी आभासी दुनिया को मानते हुए स्थापित होने के अश्लील प्रयत्नों में भटककर एक स्वस्थ परम्परा को नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं। राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरा राष्ट्र उथल- पुथल का शिकार था- मुख्यधारा के राजस्थानी और पंजाबी, मराठी और हिंदी कवि- बुद्धिजीवी वामी जनवादी (मार्क्सवादी नहीं- मध्य मार्गी सामाजिक जनवादी, बीच के रास्ते वाले) इस उथल पुथल को महीन दीठ से देखते हुए- बाद में खतरा टल जाने पर मानवद्रोही फासिस्ट अवमूल्यों को किसी स्लीपर सेल की तरह बहुत गहराई में इस मध्य मार्ग को मुक्ति का लबादा ओढ़ाकर बीमार कर देने का प्रयत्न कर रहे थे। भादानी जी इस लाइन के बहुत ठोस प्रतिरोधक बैरिकेड समान थे जो सामाजिक जनवादी विचारों के भीतर मुक्ति की सांस्कृतिक लाइन को पुष्ट करते थे। इसके परिणाम स्वरूप कविताओ की नकाबी क्रांतिकारिता को सरेआम किया जाना संभव हुआ। ताकि कलावादी घुसपैठ को कलाओं के पोलिटिकल मोर्चे पर ध्वस्त करके लोक के साझा सांस्कृतिक सरोकारों को गलत व्याख्या करके अनैतिक स्थापनाएं करने वालों से बचाया जा सके।
इस काल की कविताओं की विशेषता भादानी जी की कविताओं में रेडिकल की बजाए मध्यमार्ग के उपाय को कुछ जगह स्थापित करती है- जरूरी भी था क्योंकि हर एक कल्चरल बेरिकेड का आधार तो ठोस नही ही था। यह एक स्वस्थ दीठ थी।-
सत्तर के दशक में जब आपातकाल की काली घटाएं छाई हुई थी तब इस पर लिखना राजनीतिक कारणों से जोखिम भरा था। मुख्य कारण नक्सलबाड़ी उभार, पंजाब मार्क्सवादी छात्र उभार और जयप्रकाश नारायण की मध्यमार्गी समग्र क्रांति का नारा, इन सबके बीच एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि के रूप में कलाओं के जनपक्षधर मोर्चे पर सतर्क खड़े नजर आते हैं। वे कुछ ना होने के बजाए कुछ होना, मध्यम मार्ग को खारिज नही करके प्रतिरोधक सांस्कृतिक मोर्चे को वैचारिक अवस्थिति और अलग अलग वैचारिक स्थिति (अंतर्द्वंद्व का बहुत गहरा और सघन स्तर, कालांतर में कविता की आत्मा बन जाता है) बहुत उन्नत और ठोस, गंभीर विषयों पर छोटी मोटी वैचारिक भिन्नता होते हुए भी लक्ष्य की राह और साहित्यिक रूपों व धुनों का प्रयोग भी उसी जरूरत के अनुसार होता है। द्वंद्व को ठीक से पदार्थवादी तत्वों के सांस्कृतिक सम्मिश्रण का निदानात्मक प्रयोग से सहज इस वैज्ञानिक तरीके के साथ, प्रयोग में लाकर स्थापित वे ही कर सकते थे। इसके अलावा उनकी कविताओं का लोकरजंकीय स्वर भी सघन और ठहरे भाव अधीन उन्नत रूप में द्वंद्वात्मक रूप में आता है।
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रोटी नाम सत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
ऐरावत पर इंदर बैठे
बांट रहे टोपियां
झोलिया फैलाये लोग
भूग रहे सोटियां
वायदों की चूसणी से
छाले पड़े जीभ पर
रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की
करोड़ क्रोड़ कूडियां
खाकी वरदी वाले भोपे
भरे हैं बंदूकियां
पाखंड के राज को
स्वाहा स्वाहा होमदे
राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बाजरी के पिंड और
दाल की बैतरणी
थाली में परोसले
हथाली में परोसले
दाता जी के हाथ
मरोड़ कर परोसले
भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
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मैंने नहीं कल ने बुलाया है !
मैंने नहीं कल ने बुलाया है !
ख़ामोशियों की छतें,
आबनूसी किवाड़े घरों पर,
आदमी-आदमी में दीवार है,
तुम्हें छैनियाँ लेकर बुलाया है !
मैंने नहीं कल ने बुलाया है !
सीटियों से
साँस भर कर भागते
बाजार-मीलों दफ़्तरों को
रात के मुर्दे,
देखती ठण्डी पुतलियाँ-
आदमी अजनबी
आदमी के लिए
तुम्हें मन खोल कर मिलने बुलाया है !
मैंने नहीं कल ने बुलाया है !
बल्ब की रोषनी
शेड में बंद है,
सिर्फ़ परछाई उतरती है
बड़े फुटपाथ पर,
ज़िन्दगी की ज़िल्द के
ऐसे सफ़े तो पढ़ लिए
तुम्हें अगला सफ़ा पढ़ने बुलाया है !
मैंने नहीं कल ने बुलाया है !
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( जीवन से कट कर भटकती हैं कविताएं :- कलावाद, जहां जीवन नही धड़कता)
नन्दकिशोर आचार्य को उनके संग्रह “छीलते हुए अपने को’’ पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया जाना किसके लिए प्रसन्नता का विषय है यह किसी से छिपा हुआ नही है। यह कलावादी आलोचकों, लेखको, जिनमे रमेशचंद्र शाह से लेकर अशोक वाजपेयी तक के वे सभी जीवन से कटे हुए कवि लेखक शामिल है जिनके लिए लोक या कहें जन से लगाव की जगह इक्कलखोरी या जिसको साहित्यिक शब्दावली के एकांत के क्षण में 'स्व' के रचाव में रचा बसा सृजनधर्मी"-- जैसा बड़ा भारीभरकम आतंक पैदा करता वाक्य अपनी गरिमा लगता है। ये सभी उस तमाम मानवद्रोही साहित्यिक या कहें जनद्रोही, लोक के विरुद्ध पैदा किया गया अश्लील कलावादी सांस्कृतिक अपशिष्ट जो कैलाश वाजपेयी को पुरोधा मानते हुए- बीकानेर से भोपाल और आगे जहां वत्सल प्राण वो एक बहुत घ्रणित मानवद्रोही और जीवन के साथ सबसे बड़ी गद्दारी के रूप में उभर कर आया 'कॉंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम'-- जब हम लोकधर्मी, जनपक्षधर और चिंतक (दुश्चिंतक) वैचारिक दार्शनिक जैसे भारी भरकम शब्दावली प्रयोग में लेते हैं तब हमें इस बात की पड़ताल करना बहुत जरूरी हो जाता है कि इस सांस्कृतिक जीवन्द्रोही गिरोह का अपसंस्कृतिक उत्स अज्ञेय से होता हुआ वाया निर्मल वर्मा, अशोक, कैलाश वाजपई, रमेशचन्द्र शाह से आगे बीकानेर में किस से और कहां जुड़ता है- पड़ताल की जानी चाहिए।
कलावाद 'कला कला के लिए' बीमारू धारणा पर आधारित अलौकिक काल्पनिक जगत को रचकर अमानवीय विचार को किसी तिलिस्म, रोमामियत सा बीमारू बौद्धिक, सॉफ्ट फासिज़्म के साथ आत्मा, भावनुभाव से विचार के प्रति एक दृष्टिकोण जिसको लोक या कहें लोकपक्षधर मानवीय कविता के उज्ज्वल बोध ने ना केवल नकार दिया बल्कि निर्मम आलोचना तक भी की गई।
कलावाद को साहित्य एवं कला के क्षेत्र में जीवन और विचार तन्तुओं के बीच के स्पेस को भरते अपशिष्ट या कहूँ कि उपयोगितावाद के विलोम के रूप में जाना जा सकता है। इनके यहां कला का उद्देश्य किसी काल्पनिक अवमूल्यन के साथ कि बीमारू नैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के साथ ही स्वंय अपने भीतर आत्म की पूर्णता की तलाश कहलाता है, एक तलाश जिसमे आदमी शरीक नहीं है। कला सौन्दर्यानुभूति का वाहक है इसलिये इसे कलावादी अपसंस्कृतिक अवमूल्यों पर नहीं परखा जाना चाहिये। वरिष्ठ लेखक ओम निश्छल जी ने जो जो अलंकार इनके लिए लगाए हैं उनके विपरीत नंदकिशोर आचार्य कविता की बात करते हुए समकालीन रचाव से अलग भाषा के भावनात्मक क्षेत्र के आधार पर भावुक अतिरेक को रचने वाले कवियों में सेे एक कहा जा सकता है जहां लोक, जीवन, संघर्ष आदि सब कुछ का खतरनाक अभाव रहता है।
नंद किशोर आचार्य के 'छीलते हए.....'' को पढ़ने पर सबसे पहला सवाल जो उठता है- भाषा का है। उसके बाद के सवाल का ठोस आधार जीवन है - जबकि आचार्य शायद आकाशीय काल्पनिक घोड़ों को दौड़ाते रहते हैं। यह व्यंजना नही है.... आदमी से कटी भाषा, कविता जो कपट के बेसुरे प्रलाप से ज्यादा कुछ नही है। इन सबसे भी ज्यादा रुग्ण तो उनकी इन छोटी कविताओं में उभरकर आ रही ऐसी आत्मानुभूतियां जो किसी तिलिस्मी टोटका या कहें भाषा के सबसे निचले स्तर पर अमूर्त कलावादी विचार तंतुओं का रोपण सिरजा है जो नकारत्मकता के साथ भाषा मे सही तौर पर अपमानित अमानवीय भावों का अश्लील गुंफन भर है। हम एक ऐसे खतरनाक समय मे एक घनघोर मानवद्रोही और बीमार दर्शन को जीवन दर्शन मान कर भीतर का मानव मार डालते हैं लेकिन अब इन सब से बचना बहुत जरूरी है।
एक आलोचक लिखता है कि आचार्य विराट दृष्टि के सहज साम्य और लौकिक संबद्धता के स्थूल लौकिक मूल्यों के जड़ या कहें मोन चिंतक या कवि नही हैं। भाषा जहां मोन होती है वहां मुखरित होकर उभरता है- आचार्य का भीतरी संसार जो मोन, शून्य के साथ आत्मा को समाहित किए पवित्र अर्थो को परिलक्षित करते हुए अलौकिक विराट को बहुत महीन अर्थों में समायोजित करते हैं। उनका कविता संग्रह 'आती है जैसे मृत्यु' और यह ''छीलते हुए'' इस महान चिंतक की चिंताओं को अलौकिक, अदीठ, विराट, महान आत्मा, आत्म संवाद आदि जिन भारी भरकम शब्दावली के साथ परोसा जाता रहा है- जो गाहे बगाहे वाग्देवी आदि से प्रकाशित होकर उन्ही इक्का दुक्का विराट मानसिकता के महान आलोचक के बीच जीवन की मौत या प्रदूषित होकर इहलोक परलोक में घिसट रहे मानवीय समूह का मजाक बनाकर परोसते ये रूपवादी, कलावादी साहित्यिक या कह सकते हैं जातीय वर्ग के पक्षधर अमानवीय जमात के कुकर्मो का एक हिस्सा है कि आज राजस्थान के कविता संसार मे हम इस तरह के साहित्यिक बीमारू अवमूल्यों को इन तथाकथित विद्वानों के बौद्धिक विलासी रूग्णताओं भरे इस फासिस्ट समय को पुख्ता करता मानवद्रोही लिखतों को फैलाने का गुनाह कर रहे हैं।
केंद्रीय साहित्य अकादमी का उनको पुरस्कार दिया गया है- यह बड़ी बात नही है। आरंभ से ही अक्सर ये सब कॉमनली उभरते आए हैं- जनद्रोही समय मे इन्हें मुख्यधारा में रखा जाना बड़ी बात नही है। बड़ी बात है कि खुद को लोकधर्मी या जनपक्षधरता का तमगा लगाकर महान बनने की कोशिश करते इस बौद्धिक जमात या कपट का इस जनद्रोही अवमूल्यों को स्थापित करने की चेष्टा करना। लोक से संबद्धता जहां है ही नही उस चिंतन को कोई महान बनाने के प्रयास करे तो इनका दूरगामी उद्देश्य सहज समझ आता है। महज यह कहा देना की आचार्य की कविता आत्मोपचार की तरह लगती है- हल्की स्थापना है। आत्म प्रलाप और अमानवीय बौद्धिक पक्ष को उभारने का मतलब है कि हम राजस्थान की महान काव्य परम्परा जिसमे विजेंद्र, नंद चतुर्वेदी, ऋतुराज, हरीश भादानी, अजीज़ आज़ाद और मोहम्मद सदीक जैसे महान रचनाधर्मियों का अपमान कर रहे हैं।
आचार्य की कुछ कविताएँ संग्रह 'केवल एक पत्ती' से
जो कुछ कहना हो उसे
–खुद से भी चाहे—
व्यंजना में कहती है वह
कभी लक्षणा में
अभिधा में नहीं लेकिन
कभी
कोई अदालत है प्रेम जैसे
कबूल अभिधा में जो
कर लिया
–सजा से बचेगी कैसे!
हर कोई चाहता है
साधू ने भरथरी को
दिया वह फल—
अमर होने का
भरथरी ने रानी को
दे दिया
रानी ने प्रेमी को अपने
प्रेमी ने गणिका को
और गणिका ने लौटा दिया
फिर भरथरी को वह
—भरथरी को वैराग्य हो
आया
वह नहीं समझ पाया:
हर कोई चाहता है
अमर करना
प्रेम को अपने.
मेरी तरह
सीने में गहरे
सूखी धरती के
बहती रहती है जलधार
सदा बसा रहता है
अपनी स्मृतियों में
उजाड़
आकाश के कानों में
गूंजा ही करती सब समय
सन्नाटों की पुकार
इन सबने क्या
मेरी तरह
किया था कभी
तुम से प्यार?
यादों में
एक उदास गंध है
सूख कर झरे सपनों की
दरख़्त के
खुशबू के रंगों की
यादों में
डूबा है जो.
सपना जो नहीं होता
झूठा है वह सच
सपना नहीं जो होता—
सपने में ही जीना
सपने को चाहे सच होना है उसका
झूठ को जियो कितना ही
सच नहीं होता वह
जिऊँ चाहे सपने-सा
तुम्हें
सच तुम ही हो मेरा.
सपने में- एक
देखा सपने में
मैंने
अपने को
देखते हुए सपना
–और ईश्वर हो गया
जागता हुआ सपने में.
सपने में 2
सपने में देखा जो
तुमने
अपना सपना देखते
मुझको
सुला लिया उस को
गहरी नींद में अपनी
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