सामंती साहित्यिक क्षेत्र में ब्लैक लिस्ट आवाज़
- "'पाश'' के कारण सीखी पंजाबी भाषा..
●सतीश छिम्पा
एक भटकते- उलझते और निंदित अराजक रचनाकार की यात्रा ....
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(यह आत्मकथात्मक रचना के बीच से फुटकर अंश है। )
● सतीश छिम्पा
दारूबाज है। अश्लील, ठरकी है, झूठ बोलता हुआ हरामी और चोर है। चार सौ बीस है। कपटी है। गालियां बकने वाला लफंगा है। लंपट है हरामी। भाषा बहुत घटिया है- अरे घटिया क्या घटिया, वो हद दर्जे का घटिया है साला सारा दिन देसी दारू में भभकता रहता है। लोगों से पैसे उधार मांग मांग कर दारू पीता है- कमाता धमाता है नहीं। लिखता हूँ, वाला इसका डायलॉग झूठा है। -किसी ने कहा लिखता बहुत अच्छा है। जोधपुर हो या कोई कस्बा हो की लेखिका ने कहा, -" ऊंहूं - कठै लिखै, काम चलाऊ है अश्लील, राजस्थान लेखकों को सामंतवादी कहता है- बेकार।''.... जिस लड़के को यह बात कही गई, पीछे अनेक युवा, वरिष्ठ प्रौढ़ और जाने किन किन ने उसका हौसला बढ़ाया, आजकल उसका काम काण निकालना है।
इसी सुर में सुर मिलाकर जब बीकानेर, जोधपुर, जयपुर के कुछ ऐसे लोग जिनको मैं अच्छे दोस्त होने का वहम पाले बैठा था- उल जुलूल मैसेज करके युवतर और नवांकुर युवा लेखकों के पास स्क्रीन शॉट भेजकर मेरा कुत्सा प्रचार करना और मेरी हर वो लड़ाई जो सच्ची थी को झूठा साबित करना इन लोगों की पॉलिसी थी । बहुत लांछन सहे हैं मैंने।
किसी के लांछन लगाने से कुछ भी नही होता है, लेकिन बहुत कुछ होता है- जब पता हो कि ईमानदारी के साथ यह व्यक्ति गलत नही है- पाक, साफ़ दिल के होते हुए, बेकुसूर। आपका हक छीन कर किसी को दे देना भी क्या कम कर देगा आपका.... फर्क पड़ता है चे ग्वेरा से लेकर भगतसिंह तक बातों में लाने वाले तमाम बौद्धिकों की अवसरवादी सोच- आज सुबह सुबह ही ये लोग पाश की तस्वीर लगाकर बैठे हैं क्या नही जानते कि हमारा प्रतिरोध भी वैसा ही है। उसी विचार और लाइन का। लेकिन समकाल के अलग तरीक़े से। हिंदी राजस्थानी में ब्लैकलिस्ट करवाकर सत्य को पराजित नही किया जा सकता।
कम नही होता है पन्द्रह (अठारह वर्ष, किताब छपने से तीन साल पहले लिखने लगा था।) सालों का सफ़र। बहुत से कड़वे- मीठे अनुभवों के साथ ही जहरीले, जहर बुझे अनुभव भी मिले हैं मुझको इस साहित्यिक यात्रा में। रचनाओ का पत्र पत्रिकाओं में छपना या किताब का छपना इतना महत्वपूर्ण नहीं था मेरे लिए जितना महत्वपूर्ण आदरणीय प्रमोद कुमार शर्मा और राजेश चड्ढा जी और मनोज कुमार स्वामी जी और प्रह्लाद पारीक के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन के कारण अध्ययन की ओर मुड़ना। ये तीन गुरुजन मेरे जीवन के अभिन्न हिस्से हैं। पढ़ने की बहुत तेज गति और किताब चयन का दृष्टिकोण मुझे इन्ही से मिला। इसलिए यह मैं गर्व से कह सकता हूँ कि अपनी इस इकतीस बत्तीस साल की उम्र तक मैने बुरी या औसत किताबें बहुत कम, मजबूरी में ही पढ़ी होगी, अन्यथा विश्व साहित्य और भारतीय भाषाओं के साहित्य की अनमोल कालजयी रचनाओं का मुझ तक आना मुश्किल जरूर था लेकिन नामुमकिन नहीं था। प्रह्लाद जी पारीक का इस श्रंखला में आना मेरे लिए और ज्यादा गजब अनुभव रहा। सोशल और पॉलिटिकल एक्टिविज़्म के कारण आम पाठको से कहीं ज्यादा बेहतर और जरूरी किताबें मुझे पढ़ने को मिला करती थी।
आज फेसबुक के प्रदूषित दौर में जब बहुत आसानी से और सस्ते में या निशुल्क भी किताबें उपलब्ध हैं, तब भी ये उस स्तर की नहीं हैं जिस स्तर की हमने उस समय मे हासिल की, पढ़ी और मुहिम का हिस्सा हुए, मतलब साहित्य पढ़कर बस कागद काले नहीं करने बल्कि जनांदोलनों में शरीक होते होते, भटकते उलझते हुए एक सही पॉलिटिकल लाइन को चुनना और उस पर काम करना भी महत्वपूर्ण था। एक या दो या जितनी भी फेसबुक या जहां भी लगाई जा रही हो- उनकी कॉमन चीज दिखना मुश्किल नही। मैं किसी तरह का भलेमानुस, ईमानदार और सच्चा तो नही हूँ मगर आप इसको सच मान लें तो क्या घाटा है - जब सबसे पहले पाश को किसी किताब पर देखा- "यह ''पाश'' है। मैं देखता रहा। तलाश किया मगर हिंदी में नही मिला कही- उस समय जब कम उम्र था, मोबाइल दूर हमारे तो घर टेलीफोन भी नही था। कहाँ से मिलता कुछ। लेकिन पाश दिल में उतर गया- क्या किया जाए- एक कहीं कटिंग टाइप पाश की कविता हिंदी में मिली तो, 'मैं हालात से समझौता करके...'' को फ्रेंम करवा लिया और बस दिन निकलने लगे, इच्छा जब्बर थी। पड़ोस में ज्यादातर घर ही पंजाबियों के हैं, मतलब मेरा परिवेश पंजाबी है- मेरे पड़ोस की एक ताई जी और मित्र की माता जी से कभी कुछ तो कभो कुछ गुरमुखी बाबत पूछता रहता- चौथे दिन मैं खुद पाश को बिना किसी सहयोग या सहारे के पढ़ रहे था। यही कारण रहा होगा कि आज भी मैं खालिस बुद्धिजीवी दिमागी व्यभिचार के खिलाफ जाने अनजाने नफरत से भर जाता हूँ। गंदगी के अलावा ये कुछ भी नहीं है। इसका कारण चोरियां भी है, सच मे, जाने कितनी ही किताबें चोर चोर कर पढ़ी है मेने।
उस मुश्किल समय मे जब चोरी चकोरी करना भी आर्थिक झंझटों के चलते जरूरी हो गया था। बहुत कम उम्र, लगभग पन्द्रह- सोलह साल की उम्र में मैं अपने इन गुरुजनो की निजी लाइब्रेरी खंगाल चुका था। प्रमोद गुरुजी के चलते टॉलस्टॉय, चेखव, मोपासां, लाल्टू, परसाई, प्रेमचन्द, शरत आदि महान भारतीय और वैश्विक रचनाकार तो बड़े भाई साहब और गुरुजी राजेश चड्ढा जी से शिव बटालवी, अमृता प्रीतम, पाश, मोहन सिंह, करतार सिंह दुग्गल, अजित कौर, चंगेज आईत्मातोव, खुशवंत सिंह, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, विजयदान देथा बिज्जी, कन्हैया लाल सेठिया आदि पढ़ने को और जानने समझने को मिले तो राजस्थानी साहित्य के संसार के द्वार आदरजोग मनोज कुमार स्वामी ने खोले और मैं अन्ना राम सुदामा, पारस अरोड़ा, मनुज देपावत, रेवंतदान चारण, यादवेंद्र शर्मा चन्द्र आदि को पढ़ पाया।
लिखने की हूंस तब जागी जब मैं चवदह या पन्द्रह साल की उम्र का रहा होऊंगा। फिर शुरू हुआ मेरा लिखने पढ़ने का तूफानी सफर। न जाने कितना ही कचरा, कूड़ा कबाड़ा लिख लिखकर पेड़ों को नुकसान पहुंचाया और जाने कितनी ही रचनाओ को आदरजोग ओम पुरोहित कागद, रामस्वरूप किसान, सत्यनारायण सोनी, मनोज स्वामी, राजेश चढा, भरत ओला आदि अग्रजों ने खारिज की और जाने कितनी ही रचनाएं मैंने खुद लिखकर फाड़ दी।
सन 2005 में जब मैं ग्यारहवीं जमात में था तब मेरा पहला राजस्थानी कविता संग्रह 'डांडी सूं अणजाण' राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति अकादमी, बीकानेर के आर्थिक सहयोग से छपा जिसके लिए हर मुलाकात पर गुरुजी ओम पुरोहित कागद जी मुझे डांटते थे, क्योंकि वह संग्रह एक नोसिखिया सीखतड़ लड़के की जल्दबाजी का बुरा नतीजा थी। मैं हर हाल में उसे भूलकर आगे बढ़ना चाह रहा था जो ज्यादा समय नहीं टिक सका था। उसी दौर में मैं पत्र पत्रिकाओं में छपने लगा था। किशोर उम्र थी, कामुकता और भावुकता में फर्क करना नामुमकिन था। सफल असफल प्रेम कथाएं रोमांचित कर जाती थी और मैं दिनों तक उनके प्रभाव मे बंधा रहता था। इसी दौर में डॉ. सत्यनारायण का कहानी संग्रह 'सितंबर में रात' पढा और उसकी एक कहानी से इतना प्रभावित हुआ कि बिल्कुल उसी की डिट्टो कॉपी कहानी लिख दी, हंस में छपी और बहुत बवाल भी हुआ। मुझसे स्पष्टीकरण मांगा गया और मैंने एक विस्तृत पत्र में सत्यनारायण की इस कहानी का मेरे किशोर मन पर पड़े प्रभाव को स्वीकारते हुए लिख दिया कि हाँ, ये उसी कहानी से प्रभावित कॉपी है। मेरी इस स्पष्ट स्वीकारोक्ति का समर्थन करते हुए अग्रणी वरिष्ठ कवि कैलाश मनहर जी ने प्रसंशा भी की थी। जिसको उस समय के कुछ शोधार्थी पचा नहीं पाए और ऊल जुलूल बकवास और कुत्सा प्रचार में लगे रहे, उनमे से कुछ साथी कालांतर में मेरे भीतर हुए अद्वितीय परिवर्तन से खुश हुए और प्रोत्साहित भी किया मगर इक्का दुक्का आज भी ऐसे हैं जो कुढ़ते रहते हैं। बहस में हार जाने के बाद व्यक्तिगत लांछन लगाने से ये बीमार मानसिकता के सामन्तवादी आज भी नहीं चूकते हैं, लेकिन अब क्या फर्क पड़ता है। बहुत अध्ययन, मनन और चिंतन के बाद मैं इस तरह के प्रभावों से निकल पाया था। इस निकलने में किसी और का नहीं बल्कि मेरा ही प्रतिबद्ध फैसला था। मैं किताबों को घोट घोट के पीने से लग गया था। और मेरी यही प्रतिबद्धता और लगन और आंखों में काली की गई रातों का परिणाम था कि मैंने कविता कहानी और गद्य की अन्य विधाओं में अपनी एक निजी और मौलिक शैली विकसित कर ली, वाक्य विन्यास नया और एकदम मौलिक और ताजा गढ़ लिया, जो मुझ ग्रामीण कस्बाई युवतर के लिए बहुत बड़ी बात थी जिसको राजस्थान के वरिष्ठ मार्क्सवादी आलोचक आदरणीय डॉ. हेतु भारद्वाज ने नोटिस में लिया था। उनका संज्ञान लेना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।
मार्क्सवादी साहित्य से परिचय बड़े भाई कॉमरेड सफी मोहम्मद, सखी मोहम्मद, बड़े भाई कालू थोरी, श्योपत मेघवाल, संजय थोरी आदि अग्रेजो ने करवाया जो अब जीवन शैली है।
सन 2006 से सन 2014 तक मेरे रचनाकार का स्वर्णिम समय था। जब मैं बहुत तेज गति के साथ साहित्य और दर्शन और मार्क्सवादी आधार किताबें और क्लासिक्स पढ़ रहा था, वैचारिक प्रौढ़ता और स्थायित्व का यह समय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा था। मैं निरंतर बहसों में हिस्सा ले रहा था। मेरी रचनाएं राजस्थान पत्रिका में तो लगातार कड़ी रूप में छपने लगी थी और संबोधन, जनपथ, कृति ओर, वागर्थ, कहन, अलाव, अभिव्यक्ति, कथादेश, भास्कर, जगतिजोत, मधुमती, माणक, दैनिक नवज्योति आदि में लगातार छपने लगी थी। सन 2008 ई में स्नातक अंतिम वर्ष में मैने राजस्थान की हिंदी कहानीकारों की कहानियों का संपादन किया जो कि ठीक ठाक हो गया था। सन 2009 ई. में मैने जनवादी जनचेतना की 'किरसा' अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका का संपादन शुरू किया जिसके कुल पांच अंक छपे और फिर आर्थिक कारणों से बंद करना पड़ा। अब वापस उसका प्रकाशन शुरू करने जा रहा हूँ। 2010 में मेरा हिंदी प्रेम कविताओं का संग्रह 'लिखूंगा तुम्हारी कथा' छपकर आ गया था। यह एक किशोर से युवा होते लड़के के अनगढ़ भावों की अनगढ़ कविताए थी जो इसीलिए चर्चित रही क्योंकि इसमें शाब्दिक चालाकियां और सुधार नही किया गया था।
सन 2010 ई से लेकर सन 2016 ई. तक मैं जीवन के भयंकर अनुभवों और सामाजिक पारिवारिक उलझनों, दिक्कतों, मानसिक संघर्षो और भावुक भटकावों के चलते निराशा और अवसाद का बड़ा भारी शिकार हो गया था। अनेक पीड़ाओं से होते हुए, अच्छे बुरे, घिनोने, घटिया अनुभव हासिल करता मैं लगातार अध्ययन, मनन, और लेखन में सक्रिय रूप से जुटा रहा। मेरे मित्र मेरी इस मानसिक हालातो से अनजान थे या इसकी गंभीरता को समझ नहीं पा रहे थे और मुझसे धीरे- धीरे कटते और अलग होते चले गए। शराब, कर्ज, असफलताएं, कुंठाओं से होता हुआ मैं एक और किताब लिख देता हूँ सन 2013 में छपी राजस्थानी कविता पोथी 'एंजेलिना जोली और समेस्ता'।
खुद से खुद का युद्ध लड़ते हुए मैं अनेक गलतियां, भले और बुरे कामो को करते हुए, लोगों, दोस्तों और परिचितों और स्त्री मित्रों को अपशब्द कहता, बदतमीजी करता हुआ और अनेक पीड़ाओं को भोगते बढ़ता जा रहा था। हालांकि इस बीच बहुत बड़े भावुक आघात भी लगते रहे। इतने खतरनाक कि सम्हलना नामुमकिन था। वान्या (नाम बदला हुआ) का गुजर जाना मुझे झकझोर गया था। वार्या (नाम बदला हुआ) जो अभिन्न मित्र और प्रतिबद्ध कॉमरेड थी का ससुराल में संदिग्ध हालात में मौत होने, बहुत बड़ा झटका था। गुरुजी आदरणीय ओम पुरोहित कागद जी का जाना इन सब मे एक दुखदाई घटना थी। गंगानगर- हनुमानगढ़ और बीकानेर, डूंगरगढ़ की साहित्यिक राजनीति और वरिष्ठ और युवा लेखको का कपट, चालबाजियां और दण्द फंद बहुत बुरा और घटिया था और है भी।
अक्सर जब इस बात का ज़िक्र चलता तो जयपुर ब्रांड युवा कविजुड़ मजाक उड़ाया करते थे। मुझको लेकर चाल चलते ये राजस्थानी लेखक संपादक हर हाल में मेरा साहित्यिक कत्ल करने पर आमादा है खासकर परलीका, चुरू, बीकानेर, डूंगरगढ़ और जयपुर के शातिर साहित्यिक ठेकेदारों की टीम। इसी कपट के चलते मुझसे भी ओछे, औसत, और उथले युवा लेखकों को ज्यादा सुविधा और मंच और मौके दिए जाते रहे हैं और दिए भी जा रहे हैं। खुद को प्रतिरोधी धारा के क्रांतिकारी बताने वाले ये ठरकी, इतने गिर गए और वो भी यहां तक कि ये महाकवि अधिकारियों के पैरों में लमलेट होते हुए भी दिख गए हैं। मगर मुझको इनकी चिंता नहीं, अंत मे मेरा अध्ययन और चिंतन और लेखन ही विचारों को सुदृढ़ता के साथ स्थापित करेगा।
लोगों को हैरत रहती है कि मैं उस अंधेरे खतरनाक दौर से किस प्रेरणा के चलते निकल आया था। हालांकि इसका सारा श्रेय मित्र साथियो और मार्क्सवादी रचनाओ को जाता है। निकोलाई ऑस्त्रोवस्की और बोरिस पावलव को भी इसका श्रेय जाता है।
सन 2016 में मेरा राजस्थानी कहानी संग्रह 'वान्या अर दूजी कहाणियां' छपा जो छपते ही अपनी शिल्प, कथ्य और वर्जित विषयों के क्लासिकल पेशकारी के चलते जोरदार तरीके से चर्चित हुआ, इस एक किताब ने राजस्थानी समकालीन युवा कहानी की दिशा को मोड़कर रख दिया था। यह मेरी सबसे बड़ी कमाई थी। और इसी के साथ फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष को समर्पित कविता संग्रह 'लहू उबलता रहेगा' भी छपा था। दरअसल ये सब कुछ मेरे उस अंधेरे दौर के दरमियान हुआ था जब मैं आत्महत्या तक करने का ना केवल फैसला बल्कि प्रयास तक करने लगा था। मगर कुछ दिली दोस्तों और माँ पिताजी और भाइयों के हौसले के चलते मैं इस संघर्ष में अंत तक बना रहा और फिर एक ही झटके में इससे ना केवल बाहर आया, बल्कि जीतकर उभरा। जैसे कोई नया जन्म हुआ हो, जैसे पुनर्जागरण, जैसे जीवन के घिस चुके मूल्यों का फिर उज्ज्वल हो जाना। मैं अब एक मार्क्सवादी क्रांतिकारी की दीठ से जीवन के प्रति समर्पित युवा बनकर लौट आया था। और फिर सन 2019 में आया मेरा कविता संग्रह 'आधी रात की प्रार्थना।' यह भी ठीक ठाक चर्चित रहा है। इसी साल मैं किसी मानवद्रोही निरंकुश स्त्री की तिलिस्मी, कपट भरी बातों में आकर अपना भावनात्मक नुकसान फिर कर बैठा था। अब मैं वर्धा (महाराष्ट्र) में आकर रहने लगे चुका हूँ। यहां का माहौल जीवन्त और ऊर्जादायक है। यहां हर समय रचनात्मक रुख बना और कायम रहता है। और अब हाल ही में मार्च 2020 ई. में आया है बहुप्रतीक्षित कविता संग्रह 'सुन सिकलीगर' और एक लंबे समय से लिखा जा रहा आत्मकथात्मक उपन्यास 'आवारा की डायरी' भी इसी महीने आ रहा है।''
अब जबकि मैं बहुत सरल, सीधा और गरिमामय जीवन बिताने लगा हूँ तो जीवन ने खोल दिए हैं दुनिया के विस्तृत आकाश के विस्तार के राह और समय भी मेरा हमजोली बनकर सहलाता है मेरे सपनों को और प्रोत्साहित करता है विस्तृत, ऊंची उकाबी उड़ान के लिए।
( ● सतीश छिम्पा, वार्ड नंबर 11, त्रिमूर्ति मन्दिर के पीछे, सूरतगढ़ (राजस्थान) पिन 335804,
हाल घड़ी निवास :- वर्धा, महाराष्ट्र)
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