सावधान, इनके साम्राज्य के लेखक अमर हैं
(सवा क्विंटल वजन के क्रांतिकारी)
महान लेखक बहुत महान होते है- इंकलाब की बात करने वाले अक्सर कलाओं के कोठे पर पूंजीवादी गिलास में फासिस्ट जीभ से जनता, लोक, मूल्यों और प्रतिबद्धता के लहू को पीते दिखते हैं।
मैं जब साहित्य में आया पहली बार, बहुत छोटा था। चवदह- पंद्रह साल का किशोर जो आठवी पास करके नोवीं जमात में आया ही था। तब तक किसी भी लेखक से नही मिला था- नाम नही पता था किसी का भी, प्रेमचंद या शरतचंद्र या अमृता प्रीतम के बारे में भी ज्यादा नही जानता था। पर कहीं पढा था उन्ही दिनों, जाने किसमे कि 'लेखक है लोक की आवाज़,' कविताओं की गरिमामयी उपस्थिति और बवंडर उठा देता है संपादक।
लेखक की कलम सच्चाई की स्याही से रचती है जीवन की रचना। अन्याय का मुंहतोड़ जवाब देती भीतर भावों की सुनामी और शोषण का मुरचा पकड़ कर बौद्धिक कपट की गंदगी को समूल खत्म कर देता है... 'शोषितों की कविताओं की गरिमामयी उपस्थिति और बवंडर उठा देता है संपादक। संपादक, कथाकार, आलोचक, कवि, क्रांतिकारी, युग पलटाव फलां फलां की कलम में बम फट गया, पटाखा बाज गया..... आंदोलन, लोक युद्ध, इंकलाब के नारे लगाते ये युवा, प्रौढ़, वरिष्ठ, कवि-कवयित्री, लेखीकाएं और लेखक... ''कुलबर्गी की शहादत
यह एकदम सच्ची बात है कि मैं अक्सर सोचता था "कलम की ताकत" , स्याही, कागज़ के दिल पर एक इंकलाब। टीवी में देखा, कहीं पर पढ़ा भी। कलम, सच्चाई, ईमानदारी, आक्रोश, युवा खून, अन्याय को पटक कर इतिहास की कचरा पेटी में या कलम की नोक से उठाकर कलाओं के कलावादी अमानुसों को डाल दें हाशिए पर। जन जन की आवाज़, क्रांतिकारी लेखक, भगतसिंह की आवाज़ बना जयपुर का कसूता लेखक.... शब्दो मे जोश था। जब्बर, लोढा टाइप, लेखक को चुनोती देती लेखिकाएं -'उठा देंगे, पटक देंगे, फाड़ कर रख देंगे, हिला देंगे... नारी तू नही है अबला , अब उठा तलवार और घोंप दे.... फाड़ दे, घुसा दे, घुंक़ा दे, ज्वालामुखी है तूं आंधी तूफान और मैं पढ़ता लिखता गया।
हकीकतन कुछ शब्द हैरतअंगेज रहे- जैसे भगतसिंह, यथार्थवाद जमीर या ईमान या क्रांति, हम जंग ए आवामी से कोहराम मचा देंगे। प्रतिरोध, लौकिक सरोकार। जन जन की आवाज़, क्रांतिकारी लेखक, भगतसिंह की आवाज़ बना युवा लेखक.... मुझमे जोश था। जब्बर तूफान और मैं पढ़ता लिखता गया। बनावटी शब्द, एक डेढ़ दशक तक की लंबी यात्रा।
यह कभी सोचा नही था मैंने की कलावादियों की जुंडली से टक्कर लेने वाला कोई बचेगा ही नही, अकेले डर नही लगता मगर अफसोस होता है कि ये खुद को आदमी कहते हैं। अमानवीय, प्रकाशक भगत सिंह के नारे लगाता हुआ जाने किस खिड़की से अज्ञेय से चेक साइन करवा लें आया, युवा लेखक फाड़कर रख देंगे अन्याय को, और मंच और कुछ रुपये, बिक गया.. एक ये ही मूल्य जो था मेरे पास, सच्चाई और मौलिकता। बार बार विरोध करने के चलते अक्सर ही नही बल्कि हर एक वो अवसर मेरे लिए था, हड़पकर किस को भी पकड़ा देना मुख्य काम है इनका।
धीरे- धीरे जानने, सीखने लगा और बीच मे रहा इनके तो जान पाया कि सब चंडे हुए हैं, मगर वो जो कुर्ता पायजामा पहने जाने कहाँ से आकर, ''लोकधर्मी" कवि बनकर स्थापित हुआ, मुझे आश्चर्य हुआ, मगर वो अब स्थापित था जाने किस लोक लेखक रूप में.... उसका पूरा ग्रुप लोकधर्मी निकला क्रांतिकारी जनकवि और विमर्शों आदि और बीकानेर जो अज्ञेय को भोमिया थरप चुका था- मुक्तिबोध की ठोकर लगी और वो फिर से सीआईए के कॉंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम पर बैठ गया। मेरे सात साल अवसाद के में कुछ हिस्सा इन सम्मानितों का भी रहा है। और फिर जब सीआईए स्थापित हुआ तब बीकानेर को अड्डा बना दिया गया, लेखक और कवि सब के सब ऐसे निकले की जाने कीड़ी नगरा हो। स्पेशल ब्रांच और मैं, जो मैं कौन, बनकर शिकार हो चुका था इनका।
(जाना तभी बचा और प्रतिरोध में खड़ा हुआ गया।)
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कलावाद 'कला कला के लिए' बीमारू धारणा पर आधारित अलौकिक विचार को किसी तिलिस्म, रोमामियत सा बीमारू बौद्धिक, सॉफ्ट फासिज़्म के साथ आत्मा, भावनुभाव से विचार के प्रति एक दृष्टिकोण जिसको नकार दिया गया था। कलावाद को साहित्य एवं कला के क्षेत्र में उपयोगितावाद के विलोम के रूप में जाना जाता है। कला का उद्देश्य किसी नैतिक या धार्मिक उद्देश्य की प्राप्ति नहीं बल्कि स्वंय अपने पूर्णता की तलाश है। कला सौन्दर्यानुभूति का वाहक है इसलिये इसे उपयोगिता की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिये।
समाज, नीति, धर्म, दर्शन आदि के नियमों का पालन कला की स्वच्छंद तथा स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति में बाधक होते हैं। अब यह जो ओम निश्छल जी ने नंदकिशोर आचार्य कविता की बात करते हुए समकालीनता से अलग भाषा का अध्यात्म रचने वाले कवियों में सेे एक कहा हैं। आचार्य के संग्रह 'छीलते हुए अपने को'देखते हुए कहा जा सकता है कि हालांकि भाषा के अध्यात्म पर कब्जा सदैव अशोक वाजपेयी का रहा है पर अजाने ढंग से आचार्य ने पिछले कई वर्षों से अपनी आत्मानुभूतियों को छोटी छोटी कविताओं में इस तरह सिरजा है कि उनके शब्दचित्र महुए के फूल की तरह झरते प्रतीत होते हैं।"..
एक बीमार दर्शन को जीवन दर्शन कहने वालों से बचना जरूरी है।
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विज्ञान, तर्क, दीठ, द्वंद्वात्मक, संघर्ष, पदार्थवादी चेतना, पदार्थ - सचेतनता या चेतन, अवचेतनावस्था.... ये शब्द थोथे नहीं है- ना हल्के हैं, जबकि इन्हें बना दिए जाने की भरपूर कोशिश (हास्यास्पद है ना) कि गई है, की भी जा रही है। हम विज्ञान को नही बल्कि एक लेखक, एक व्यक्ति को तुच्छ स्वार्थों के चलते कलावादी पूंजीवादी अपसंस्कृतिक अवमूल्यों के प्रदूषण में लौट लगाते हुए देखते हैं- हम देखते हैं कि आलोचक, न्यूटल है, मतलब उसकी आलोचना या स्थापित किए जाने की कोशिशों में नंदकिशोर आचार्य, कैलाश वाजपई से लेकर रमेशचंद्र शाह तक और फिर ज्योत्स्ना मिलन से उमट या संजीव मिश्र तक सभी होंगे, बीच मे मोहता या किसी सॉफ्ट फासिस्ट का आना बड़ी बात नही है। बड़ी बात और खराब बात तो ये हैं कि इस तरह के लोग हरीश भादानी, विजेंद्र, जुगमंदिर तायल और अन्य जीवित विचारो के समृद्ध जन या लोकधर्मी कवियों और कविताओं पर भी लिख रहे हैं। यह कैसा वैचारिक भटकाव या बौद्धिक कपट है कि इनके विरुद्ध कोई आवाज़ भी नही उठा रहा- और यहां जो एक था आवाज़ उठाने की कोशिश करने वाले वे ज्यूरी में बैठ कर इनाम बांट रहे हैं। क्या सच मे हम दार्शनिक धरातल या, दार्शनिक चेतना या सैद्धांतिकी महज नाम है। प्रतिरोध, प्रतिबद्धता कहाँ है ये महान शब्द .... यह कपट आम नही है कि बौद्धिक अय्याशों ने जनवाद को कलावादी कुकर्म में शामिल किए जाने का जश्न तक मनाया है, एक पुरस्कार की आड़ के।
क्या यह बौद्धिक दिवालियापन नही है कि जब वैचारिक हठधर्मिता के बीच सैद्धांतिक मुद्दों को हम आपसी समझाइस या सौदेबाजी से निपटा रहे हैं। चेतना या कहूँ उस द्वंद्वात्मक दीठ या अन्य जो भी हो, इन सबके कारणों की विवेचना करता है द्वनद्वात्मक दर्शन जो यथार्थ की परख के लिये एक सही और सघन, ठोस दृष्टिकोण है। दार्शनिक चिन्तन मूलतः जीवन की ही नही बल्कि विज्ञान और उसके केन्द्रीकारी मूल तत्वों को जड़ता से निकाल संचालित करते हुए अनेक पहलुओं के एक साथ निस्तारण की जमीन तैयार करता है। अब खत्म सब। आगे बढ़ना ठीक।
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बहुत समय तक यही मक्कारी चलती रही और जाने कब मैं इंकलाब, स्याही और कलम और किताबों के साथ एक ही मुश्त अवसाद के सात साल काट आया, जी, स्वदेश दीपक तो नही मगर मेरे ही तरह के मौलीक अनुभव दे गए। जो लड़का कभी किसी को गाली तक नही दे पाता था, वो लेखिकाओं, दोस्तों और परिचित लड़कियों और महिलाओं के साथ कॉल से या सोशल मीडिया के जरिए जो बदतमीजी, लंपटता, और घटिया बातचीत करके तंग जो करता था, उसका कोई पाप विमोचन पत्र नही, बल्कि खुद से ही खुद को निकाल कर लाना था । हर एक लड़की को बिना डरे प्रपोज़ करना लंपटकिय बात, गाली आदि और भय, दुःस्वप्न, हार और हताशा और अकेलेपन का शिकार हुए पता नहीं लगता। मुझे अवारा, शराबी, सड़कछाप, बदमाश और लंपट आदि जो अलंकार मिले, इससे और इसके वर्ग की कामुक जमात से मिला जब मैंने इनका खिलौना बनना अस्वीकार कर दिया- मुझे ठीक होकर निकलना था। कुछ प्यारे सज्जन भी है जो मेरा यकीन करके हर एक बुरे वक्त में साथ निभाया और सहयोग किया। आज जब मैं हर तरहः से स्वस्थ और सजग ताजगी से भरा हूँ तो इसका कारण वे स्त्रियां ही हैं जिनके कारण मैं आज दर्शन और कलाओं के क्षेत्र में थोड़ा गौर करके उनसे कदम ताल मिला रहा हूँ।
लेखक, कवि या कहें बुद्धिजीवियों कोई उनकी रचनाएं पढ़कर अगर क्रांतिकारी माने तो उसको अपनी हर एक बात और चीजो के बारे में फिर से सोचना चाहिए- क्योंकि यहां सपनो का ही नही, भावनाओ का भी कत्ल होता है। कह सकते हैं कि अपराध या पाप की धारक है यह जमात । हर समय एक अज्ञात कपट,, हीन भावनाओ और साथ ही कुठाओं को महसूस करते हुए मैं - क्या पता मैं भी मर जाता और बस कवि बनकर ही बचत। .....याद नही करना चाहता वो, भयानक रूप से दारू पी कर लड़ना, झगड़ना और अवसाद और भारीपन- हताशा , अवसाद की अति और अराजकता, दिमागी पंगुपन का कारण या बे कारण सब के सब फिजूल थे। क्योंकि यह तो दो ही साल छलाँ जबकि नरक पूरे सात साल का भोग है मैंने जिसका दोष उस धनपति लेखिका, जिसका मैं सहज शिकार हो गया था का भी नही था तो उनका भी नही था जिनको सामाजिक डांगर कहा जाना ठीक रहता है । इसी जमात की देन थी यह।
भाई प्रेम सुनो पहली बात तो यह है कि अभी जो वीभत्स खूंखार दौर जिसमे हम जी रहे हैं इससे बचाव सिर्फ मार्क्सवादी प्रतिबद्धत प्रतिरोध से ही संभव है और सबका तो नही कहता मगर ज्यादातर प्रतिरोधी आवाज़ जीवित आदम की ही होती है। और हर एक जीवित का यही एक पक्ष मजबूत होता है। मैं उन्ही शब्दो की पुनरावृत्ति करके अपनी बात कहू तो शायद ज्यादा ठोस तरीके से कह पाना संभव ही नही। जो लातिन अमरीकी लेखक जूलियो रैमन रिबेरो ने कहे थे.... हालांकि प्रभावित इस वक्तव्य से भी हूँ लेकिन अपनी मौलिकता के साथ कि " मैं क्यों लिखता हूँ। हर एक मानवद्रोही व्यवस्था, आदत और स्थितियों से युद्ध लड़ने के लिए और खुद को असहाय, बोहेमियन और कमजोर और बीमार सा समझने और मानने जैसे गलत भावों से अलग रखने के लिए। खुद को सांस्कृतिक प्रदूषण से बचाने के लिए। जो बेचैनी, उहापोह, दोगाचिंति, द्वंद्व और अराजकता, आक्रोश, अपराधबोध और हीन भावना मुझे घेरे रहते हैं। व्यथित करते हैं और सुकून से दूर रखते हैं उनको बनाए रखने और स्थाई याददिहानी के रूप में सहेजने के लिए और खुद को जिंदा रखने के लिए लिख लेता हूँ। बेहतर से भी बेहतरीन भावों को रोपकर सुरक्षित रखना, जिंदा होना है। कोई ऐसी बात या विचार जो कहने के लिए हो मगर कह पाना संभव नही हो..... मैं लिख देता हूँ। मैं अपराधबोध को आत्मालोचना से काटकर , जीवन और जीवन की गरिमा को स्थाई रखने और जीवित शब्दों को विचारों तक कि यात्रा करने और ठोस रूप में स्थापित करते हुए स्थाई करने के लिए कटिबद्ध हूँ।"
यकीन नही करते हैं लोग की साहित्यिक समाज मे आज इस दिन तक जाने क्या क्या आरोप लगे हैं मुझ पर, मेरे जीवन का कैसा विभत्स पोस्टमार्टम किया गया है। मेरे बारे में कितना ज्यादा गिरा हुआ बोला गया है -- मेरी आत्मा को छलनी करने, साहित्यिक समझ या अतीत में मेरे शराबी व्यवहार, और मेरे अध्ययन को लेकर कितने तंज कसते हुए मेरी वैचारिक प्रतिबद्धता और मेरे इस जनवादी(लोकतांत्रिक) मिशन, मुहीम, कलाओं के मोर्चे पर लड़े जा रहे इस महा समर, इस कविता, जीवन और कलाओं को भयंकर संक्रामकता से बचाए रखने के लिए तैयार किया गया यह मोर्चा कइयों की आंख की किरकिरी है।
आप चालाक है तो ठीक है, बचत में रहेंगे। झालर हैं तो कोई भी एरा गेरा आकर वाट लगा जाएगा । अरसे तक बहुत नुकसान उठाया है मैंने गलत का विरोध और पुरजोर विरोध करके। अपने भी नाराज़ हुए और बाहर वाले तो हाशिए पर पटकने के लिए जैसे तैयार ही बैठे हैं। मैं क्या करूँ मैं समझौता परस्त नही हो सकता। चाहे जितना, मतलब सारा दिन झूठ बोलता हूं- लेकिन जैसे ही लिखने बैठता हूँ- मेरे भीतर मेरा ज़मीर उग्र होकर कुप्रवृत्तियों के गोदाम को उजाड़ देता है। मैं इस बात से दुखी नही कि मैंने ये किया तो ये हुआ, बिल्कुल नहीं। यह तो जारी ही रहेगा। पीड़ा तब होती है जब आप किसी को अपना अग्रज और लोकधर्मी और जनपक्षधर और ईमानदार मानते हुए उसके लिए हर तरह का लिख लिख प्रसारित करते हैं। दुश्मनी फिजूल में मिलती है। बहुत समय समर्पित रहने के बाद अचानक पता चलता है कि यह आदमी की जगह जातिवादी प्रदूषण कहाँ से आ गया। टूट जाता है भीतर तक बहुत कुछ। लेकिन इससे निकल लिया जल्दी जाता है और आप फिर अपने उन अपनो के पास जाकर शर्मिंदगी के बोझ से दबते हुए माफी मांगते हैं कि क्यों नही दुश्मन को पहचाना, अपनो को क्यो नाराज़ किया ? मगर अपने समझते हैं बहुत गहरी भावनाएं भी। हम जीवित हैं यह बहुत लूंठी बात है।
किसी भी तरह का स्वार्थ या निजी वैर विरोध किसी के साथ नहीं है। इच्छाएं है बस, कि इस कपट और पूंजीवादी अपसंस्कृतिक अवमूल्यों का इस दौर मे विध्वंश कर दिया जाए ताकि मेहनतकशों को उनके विमर्शों को जगह मिले, दलित विमर्श तूफान की तरह वाद और विवाद पैदा करे ताकि इस वैज्ञानिक पद्धति से कुछ और नवीन और मौलिक उद्देश्य और निष्कर्ष और रचनाएं पैदा हो।
क्रमशः
० सतीश छिम्पा
पूँजीवादी व्यवस्था, संस्कृति और साहित्य के अँधेरों को एक साथ वही व्यक्ति उजागर कर सकता है,जो उससे गुजरा है। आपके संघर्ष, आप बीती संस्मरण और आपके वर्तमान ज़ज्बे को पढ़कर लगता है कि आप एक जिंदादिल इंसान, आशावादी क्राँतिकारी और जुझारू साहित्यकार हैं। मुर्दों के शहर में आप जैसे कुछ जिंदों को देखकर आभाष होता हैं कि मैं अब भी मरा नहीं हूँ... हम लड़ेंगें साथी, और तब तक लड़ेंगें जबतक तपते रेगिस्तानों में बाढ़ न आ जाए.... इंक़लाब..जिंदाबाद...अनिल कुमार 'अलीन'
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