आज पूरा एक साल हो गया, भयानक शराबी दौर से निकले हुए को, बहुत कुछ खोया है उन सात सालों में मैंने, मगर सच्चाई नही खोई- ज़मीर नही खोया- भीतर का मनुष्य मेरा जिंदा रहा, आज तक भी वो जिंदा है। मैंने उन पवित्र शब्दों को शर्मिंदा नही किया, नही होने दिया किसी महान ध्वन्यार्थ को निरर्थक, अपमानित नही होने दिया..... और आदमी ही रहा.... मैं साहित्यिक समाज मे काट कर फैंका गया हाशिए का रचनाकार जरूर साबित किया जा चुका हूँ। मैं उन कुछ अग्रज रचनाकारों के मिथ्या घमंड और सॉफ्ट फासिज़्म और बुर्जुआ- शोषक स्वभाव का जरूर शिकार बना हूँ- मैं समकालीन सामंती बौद्धिक जमात के घमंड (राजस्थान के हाल फिलहाल स्थापित नामो) और थोथे फुकरापंती को ढोते हुए- तमाम अभावों, मानसिक व्याधियों और सामाजिक दायित्वों को , एक रचनाकार रूप में पूरा नही निभा पाया मगर इस अंधकार में मैं सबूत बचा लाया- मैं संक्रमण से निकल आया सुरक्षित- बिना डरे- यह मेरी कमाई है।
मेरे अग्रजों ने पल पल मेरा साथ दिया, मुझे अकेला नही होने दिया, मुझे भावुक विचलन और कुंठाओं से निकाला, घुटनो पर बैठे मेरे आत्मसम्मान को ठोस आधार दिया..... मुझे निरंतर काम जारी रखने और तमाम समस्याओं के चलते हुए भी निरंतर दर्शन की तरफ, दार्शनिक- वैचारिक अध्ययन की ठोस जमीन तैयार करके दी..... वो दौर जो विचलन में धीमा पड़ा..... दिन की तमाम दुश्चिंताओं के बावजूद रात की स्टडी सिटिंग फिर शुरू हुई, बिना की थकान के, जैसे लौट आया हो सन 2016-17 का अद्भुत दौर। जब पढ़ने के नए जोश के समांतर मैं टिका रहा, अडोल रूप, सफल भी हो ही गया। मेरा फिर से दर्शन की तरफ मुड़ना, सतीश कुमार का एक नया या कहें पुनर्जन्म होना था। दिमागी जालों- जंजालों से निकलना बहुत मुश्किल था। मुझे सूरतगढ़ हर हाल में छोड़ना ही छोड़ना था - (हमेशा के लिए नही, कुछ समय, साल- साल के लिए- जब तक कि इससे भी ज्यादा मजबूत ना कर लूं अपनी बुनियाद को.... हकीकतन समय और नियति और भाग्य के बीमारू शब्दों के भरोसे के जाल से निकल ना जाऊं.... वर्धा, तब तक मेरे लिए होम साइकैट्रिस्ट का जोरदार काम कर रहा है।) -
वो बेवड़ा हरामी सतीश अरे बहुत ऊंचे घराने की लड़की है शायद इसकी दोस्त- बकवास व्यक्ति है। ऐसी और भी अनेक बातें है जो अक्सर मेरे लिए, मेरे पीठ पीछे कही जाती थी। लेखकों की तो बात ही छोड़ो, उनकी बातचीत में लोक, बदलाव, प्रयोग, शैली, शिल्प, मार्क्सवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद जैसे जरूरी मुद्दे बातचीत का विषय होता ही नहीं है। विषय होता है, 'सतीश उस बॉय कट लड़की के साथ जयपुर जा रहा था, डबल स्लीपर में उसी के साथ लेटा था- वो हरामी एक बोतल दारू दोपहर तक पी जाता है-। डोलते हुए ये रात कहाँ जा रहा था। माउंट आबू गया तब वो जाटों की लड़की उसके साथ क्या कर रही थी। कब किसके साथ सेक्स किया या कब कितने कॉन्डम खरीदे या दिन में दो- तीन बार तो हो ही जाता होगा या बेवड़ा है साला। ये एक ऐसा दौर था जो मेरे जीवन का सबसे मुश्किल, घातक और क्रूर था। अक्सर सोचता, प्रण लेता और कुछ कर दिखाने का सोचता, मगर फिर से वही सब कुछ। भावात्मक रूप से इसने मुझे खोखला खाली कर दिया था।
-"सतीश :- ?????",
- "हाँ, सतीश, बावळी बूच है, स्याणो बणै पण पार कोनी पड़ै
शायद, सतीश हो ऐसा, या ना भी हो... जरूरी नही है कुछ होना या कुछ नही होना। मैं बहुत परेशान था अभी कुछ दिन पहले ही । बेईमानी नही करना जानता, तेज तर्रार नही हूँ मैं, क्या इसके कारण या इसके की मैं लाग लपेट नही जानता, जाने किन कारणों के चलते मैं उन बौद्धिक बेईमानो के हत्थे चढ़ गया कि वापस अर्ध विक्षिप्तता में फंसने लगा था। एक उम्मीद, एक उजास एक नाम, एक नाता जो मेरे साथ रहता है हर एक समय , उसने उन दुर्दांत पीड़ाओं से भरे वे दिन जो असहनीय थे, हल्के कर दिए।
मैं इन दिनों खुद से खुद ही लड़ने लगा हूँ, चीजें निकलती जा रही है हाथों से, मैं दो बार या .तीन या चार और अनेक प्रयासों में असफल रहा हूँ। मैं आज तक के इस साहित्यिक यात्रा में ईमानदारी और सच्चाई के कारण जो जो नुकसान भोग चुका हूँ, वो नुकसान अविस्मरणीय है। मैं जकड़ा हूँ ग्रन्थियों से। अब मुझसे यह सहन नही हो पा रहा है, बहुत बहुत ही पीड़ा दायक है। मेरा दिमाग सुन्न होने लगा है।
मैं अक्सर इसी सोच में रहता हूँ, कि अपराध क्या है ? वैचारिक प्रतिबद्धता की बात करते हुए लेखकीय गुणों को महान बताने वाले क्यों अक्सर जीवन का अपमान करने वाले होते हैं।
... जबसे मेरा दिमागी अंधेरा मिटा है, सकारात्मक हुआ हूँ और ईमानदारी से काम करने लगा हूँ तो मुझे जिस अनदेखा पन का सामना करना पड़ रहा है, वो भयानक है, मैं जानता हूँ। आत्मघाती है। यह भी बनी बात है कि जब आप इन उलझनों में उलझते हैं, भावनात्मक संबल की आस में जब झाँकते हैं कहीं और सब के सब अपने अपने अंधेरो में अंधेरे की महिमा गाते आपको अनदेखा कर देते हैं। शायद यह नियति है सच, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ, फिर भले वो गुरुदत्त हो, मायकोव्स्की, स्वदेश दीपक, लवलीन या जो हो..... हमे समान करना पड़ता है सच्चाई के साथ उठकर उन झूठो से जो हकीकतन सच्चे माने जाते है। यह दौर खतरनाक है ।
सतीश छिम्पा
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