आलमशाह खान
(कमलेश्वर के नेतृत्व में 'सारीका' से चले समांतर कहानी आंदोलन के राजस्थान से महत्वपूर्ण और चर्चित कथाकार)
(एक ऐसा घोर विवादित और बेहतरीन कहानीकार जिसको जान से मार देने तक की धमकियां मिली थी।)
आलमशाह खान का जन्म 31 मार्च 1936 ई. में उदयपुर (राजस्थान) में हुआ
कृतियां - किराये की कोख, पराई प्यास का सफर, एक और सीता
आलमशाह खान राजस्थान (उदयपुर) के ऐसे कहानीकार थे जो समाज मे रहकर उसके साथ हथाई करते हुए उसके निजी, राज और बातों का किसी पेशेवर सर्जन की तरह ऑपरेशन करते थे और फिर उनका समाजशास्त्रीय निचोड़ निकालकर कहानियों के माध्यम से सरेआम करते थे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे अपने समय से बहुत आगे के कहानीकार थे। विकाश, प्रतियोगित और पूंजीवाद की चकाचोंध में खो गए एक ऐसे वर्ग के लोगों के जीवन के चित्रकार थे जिनका अस्तित्व, जिनका श्रम और जिनके जीवन के हर हिस्से का धनपति खून चूस लेते हैं। प्रताड़ित जीवन को शब्द देना आम बात नहीं है। आलमशाह सत्तर के दशक के -'समांतर कहानी आंदोलन' के सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक थे। सन 1974 ई. में कमलेश्वर द्वारा संपादित 'सारिका' पत्रिका में आलमशाह खान की कहानी 'किराए की कोख' छपी थी। यह इतनी चर्चित हुई कि खान रातों रात चर्चित और विख्यात हो गए। कारण का स् कहानी का व्यापक और प्रचण्ड विरोध। इस कहानी के खिलाफ असंख्य पत्र छपे थे। उनको शारीरिक नुकसान पहुंचाने तक कि कोशिश भी हुई। यहां तक कि उनके खिलाफ लेखकों- पाठकों ने मोर्चा तक खोल लिया था। जाहिर सी बात है कि साहित्य में जिसका ज्यादा विरोध होता है वह ज्यादा चर्चित होता है। आलमशाह खान की कहानियों में इसके बाद सबसे बड़ा और ठोस बदलाव आया। अब उनकी कहानी सोशल कंडक्ट टाइप के खोखले आदर्शवाद और नकली नैतिकतावाद से मिलकर खड़ी की गई झूठे मूल्यों की सामाजिक दीवार को वे एक- एक करके तोड़ रहे थे। यह एक रचनाकार का उत्तरदायित्व भी है कि वे सामाजिक प्रपंच को ध्वस्त करके एक सुंदर संसार और महामानव के निर्माण की कल्पना कर, व्यवहार में ढालने की कोशिश करे। सही बात तो यह है कि वे सच्चे अर्थों में वे सामाजिक क्रांतिकारी थे। उनकी ज्यादातर कहानियां इसी सामाजिक ताने- बाने से मिलकर बनी होती है। पढ़ने पर सहज ही पता लगता है कि वे समाज की नसों के भीतर उतर कर आतमलोचना की प्रक्रिया के दौरान कहानी को हासिल करते हैं। साहित्य के मार्क्सवादी सौंदर्यबोध प्रगतिशील लेखन की आत्मा का काम करती है। क्योंकि जब इन कहानियों में संवाद की स्थिति पैदा हो रही होती है तब लेखक का दार्शनिक पक्ष उभर कर आता है।
समांतर कहानी आंदोलन और बाद में अस्सी के दशक के अंतिम दिनों में कहानियो में जो परिवर्तन आया था उसको समझना और बदलाव को कहानी के सभी पक्षों पर एकसाथ लागू करना बहुत टेड़ा काम है। पूंजीवादी अपसंस्कृतिक कलाओं के समानांतर मानवीय जीवन की गरिमा और उज्ज्वलता को स्थापित करना और सामाजिक और राजनीतिक आर्थिक दवाब से घिरे समाज की विध्वंसात्मक होते हुए भी सकारात्मक परिणीति है। आलमशाह खान की कहानियां जीवन के यथार्थ को बडी गहराई से रूपायित करती है। इसलिए ही उनकी वे रचना जो सामाजिक व्याधियों विसंगतियों के फलस्वरूप आती है लोक में कहीं ज्यादा गहरी उतरती है।
आलमशाह खान सर्वहारा और अर्ध सर्वहारा के जीवन संघर्षो के रचनाकार थे। साहित्य वही पूर्णकालिक और श्रेष्ठ होता है जो लोकधर्मी या जनपक्षधर हो। सामाजिक आर्थिक रूप से विशिष्ट होना, असामाजिक होना ही होता है। लोक में तब ही रमा जा सकता है जब लोक से लौकिक होकर मिला जाए, एलीट होना, आपको हाशिए पर ले जाएगा जहां जीवन और जीवन मूल्यों की कोई कीमत नहीं होती। आलमशाह खान ने दमितों के उस जीवन को छूकर देखा है जिसकी उपस्थिति साहित्य को जीवंत बनाती है, मगर जो उपेक्षित और शोषित है। मध्यवर्गीय सचेतनता के कारण बहुधा एक वैचारिक परिप्रेक्ष्य भी मिल पाता है। लेकिन – जिस हाशिए के इंसान की व्यथा कथा कहने की कोशिश इस कहानी मे की, उसके मन की थाह नहीं मिल पाती। इसी दीठ से आलमशाह खान बेहतर साबित होते हैं।
'आवाज़ की अरथी’ की छग्गी हो या तोत करते भिखमंगे जीवन के तिलिस्म में उलझे हो । ‘लोहे का खून’ का करीम पूंजीवादी व्यवस्था और दकियानूस समाज के भीतर जिस द्वंद्व को देखने की कोशिश करता है वो अधूरी रह गई इच्छाओं की पीड़ाओं सा सालता है।
'दण्डजीवी' सामंतवाद के खिलाफ जनवादी प्रवृतियों के विद्रोह और स्थापना की कहानी है। सामंतवाद जो राजस्थान के हर जातीय और वर्गीय समाज की सबसे बुरी बीमारियों में से एक है और अनेक बीमारियों की जन्मदाता भी है। इस कहानी में खान की सामाजिक प्रतिबद्धता और निष्ठा का तो पता लगता ही है- बल्कि मार्क्सवादी सामाजिक थियरी को भी वे स्थापित करते चले जाते हैं। मानवीय कमजोरी, नैसर्गिक घटनाओं और जड़ सत्ता के ढांचे को कुशलता से बनाया और ध्वस्त किया गया है।
पूंजीवादी संवेदनहीन समाज मे जनवादी या खून लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना बहुत टेड़ा, क्रांतिकारी काम है। जोखिम भरा हुआ। 'एक और सीता' कहानी संग्रह में भी स्त्री पुरुष संबन्धों को सामाजिक मनोविज्ञानिक शैली के साथ ही प्रकट किया गया है। कहा जा सकता है कि आलमशाह खान समाज के कुशल चितारे थे। और उनके लोकानुभव से उपजे इस गुण से स्वाभाविक है कि कहानियों में लोक रंजकताओं का होना उनके सौंदर्यबोध के उच्चतम स्तर को दर्शाता है। ‘पंछी करे काम’, 'दंडजीवी’, ‘आवाज़ की अरथी’ और ‘मुरादों भरा दिन’ आआदि कहानियो के पात्रों का सामाजिक और मानसिक संघर्ष, द्वंद्व जिस स्तर पर प्रकट होता है वह व्यवस्था से मोहभंग का संकेत हैं। जिन्हें बार बार आलमशाह खान अपनी कहानियों में देते चलते हैं। ‘ सबसे बड़ी बात कि वे सामाजिक विद्रूपताओं को किसी माहिर सर्जक की तरह कैच करते हैं। उनका लौकिक नजरिया भले जिस तरह का हो मगर हर बार वे मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक शैली के साथ समाज को देखते पकड़ते हैं।उनकी कहानी 'मुरादों भरा दिन’ कहानी में मुख्य पात्र सत्तर जो अपनी पार्टनर या कहें बीवी को देहव्यापार के लिए जिस तरीके के द्वंद्व और उलझन के साथ तैयार किया गया है वह बड़ा रंजकताओं की चरम स्थिति है। और फिर उसके अंतर्द्वंद्व का बेहतरीन ब्यौरा, आलमशाह खान के अलावा और कर ही कौन सकता है। वे निश्चय ही हिंदी कहानी की धरोहर समान हैं।
० सतीश छिम्पा
इस आदमी को पढ़ो
(वो एक ऐसा रचनाकार जो भाषा के साथ खेलता नहीं बल्कि उसको प्रेम करता है।)
जीवन को छू लेना या जीवन की जीवंत रातों से हथाई करना - जब भी सीख लेता है कोई, या शब्दों की पंजीरी से जीवन का महाकाव्य लिखना या अतीत के सबक को रिमांडर लगाकर फिर से याद करना वर्तमान या भविष्य में, घटनाओं, चीजों, भावों, या उस उत्पाद का जिसके स्रोत तुम खुद हो। यह आम नही है कि शब्द, वाक्य या पूरा एक पैरा ग्राफ उदास सा, सूना और उजाड़ और बेतरतीबी से भरा हो - आगे बढ़ते हुए चलते हैं तो लगता है कोई बहुत घना साया या शायद अंधेरा साथ चलता हुआ नजर आता है। दरअसल यही सघन साया या अंधेरा सत्यनारायण की कहानियों में, रिपोर्ताज़ में या उनकी डायरी में लगातार नजर आता है। आप शिल्प में मत उलझा कीजिए, क्योंकि यहां तो एक भवुक व्यक्ति भावुक वर्णन करता है उसे जो पढ़ता है- अतिभावुक होकर निकल जाता है। सत्यनारायण का लिखा हर एक रिपोर्ताज़ एक मुकम्मल कहानी है।
अगर आपने एक चेतन्य पाठक की तरह सत्यनारायण का गद्य पढ़ा होगा तो निश्चय ही आप बता देंगे कि एक- दो भावों के साथ जुड़े कई कई भाव औऱ वो भी दो निश्चित शैलियों (जो सत्यनारायण की सदा बहार है) के साथ ही साथ कई औचक आई मगर लय में बहती बहुत शांत भाव से बेचैन पैदा करती हुई। मैं पिछले लग भग डेढ़ दशक से सत्यनारायण के लेखन की समीक्षा देख पढ रहा हूं। ये एक बात मुझे बहुत सालती है कि आलोचक (भले कितने ही बुजुर्ग या उससे अलग एलीट हो) उनके लेखन में किस तत्व को पकड़ता है। किस भाव की आत्मा को छूकर वो बतलाता है कि, "हाँ, ये बिल्कुल यहीं, यहीं है जीवन यहीं धड़क रहा है जीवन।"..... दुनिया के किसी भी भाषा का किसी भी विधा का साहित्य हो, उसका मूल्यांकन बिना द्वंद्वात्मक दर्शन के बिना मूल्यांकन किया ही नहीं जा सकता है। बल्कि, हठधर्मी मूढ़ टाइप के विश्वविद्यालयों के केम्पस से निकले आलोचक हर एक समीक्षा में वे सब चीज बता देते हैं जिनकी कोई जरूरत ही नहीं होती
सत्यनारायण। एक ऐसे रचनाकार जो ख़ुद जितने संकोची है, उनकी कलम उतनी की मुखरित और दुस्साहसी है। उनके पात्र समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए एक ऐसे वर्ग से आते हैं जिसकी गिनती इस पूंजीवादी फ़ासीवादी समय मे होती ही नहीं है। बाहरी संसार से भीतरी जगत की हथाई बैठाने में सफल- असफल होते हुए संवादहीनता को ही कथ्य बना लेते हैं। यह बहुत मुश्किल है - आप भावों को किस स्तर तक उठाओगे, वे औचक ही धाड़ से गिर जाएंगे। यह भी होगा जैसे चंद्रकांत देवताले कहते है, "भाषा से ठिठोली मत करो, शब्दो संग खेलते हुए गहराई में मत उतरो, की कसावट से बात की चूड़ी ही मर जाए।", इस मामले में डॉक्टर साब बहुत एहतियात बरतते हैं। आप उनके किसी भी रिपोर्ताज़ का कोई भी शब्द निकाल लीजिए, रचना वहीं रुक जाएगी, आगे नहीं बढ़ पाएगी। मुझे याद नहीं कि ये किसका काम है,लेकिन बेहतरीन है। क्योंकि सत्यनारायण ने गद्य के इस पक्ष की हकीकत बताते हुए सही मुड्डे पर लिखा है। प्रश्न - आपके अनेक रिपोर्ताज़ संग्रह आ चुके हैं जिनमें यायावर की डायरी, यह एक दुनिया, इस आदमी को पढ़ो, और रात को लेकर आया आपका संग्रह ‘ यहीं कहीं नींद थी’ बहुत सराहे गए हैं । इसी के साथ आप डायरी विधा में भी लिखते रहे हैं । आपकी पुस्तक ‘तारीख की खंजरी’ बहुत चर्चित रही है । लेकिन इन वर्षों में प्रकाशित हो रही डायरी या आत्मकथा में आप कितनी सच्चाई पाते हैं ?
●_ असल में मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, मलयज आदि अनेक लेखकों की डायरियां आ चुकी हैं । लेकिन मेरी नजर में मलयज की डायरी सबसे बढ़िया है । अपनी डायरी में मैंने तथ्यों, रोजमर्रा के जीवन की घटनाओं की जगह, जिन साहित्यकारों और उनकी रचनाओं का अध्ययन किया है, उन संवेदनात्मक अनुभवों और अनुभूतियों को व्यक्त किया है । मेरी डायरी सृजनात्मकता के ज्यादा नजदीक है । लेकिन जो अपने जीवनानुभवों का यथार्थपरक चित्रण अपनी डायरी या आत्मकथा में करते हैं , ऐसे में डायरी ईमानदारी से लिखना बहुत मुश्किल है क्योंकि उसमें अपने आप को खोलना पड़ता है । इसका उदाहरण है मोहन राकेश की डायरी । इसे उनके गुजरने के बाद काटपीट कर छापी गई क्योंकि उसमें उन्होंने अपने नजदीकी लेखकों पर खुलकर लिखा था ।)
'इस आदमी को पढो', --'यहीं कहीं नींद थी।'.. जैसे रिपोर्ताज़ संग्रह हिंदी में आना सिर्फ बहुत बड़ी बात ही नहीं बल्कि अद्भुत और जरूरी काम है। उनके रिपोर्ताज़ हो या कहानी हो हर एक का शीर्षक इतना अलग और विशिष्ट है कि रचना के साथ पूरा न्याय करता है। सत्यनारायण के रिपोर्ताजो में भले वे किसी भी जगह या किसी भी वक्त जा रहे हो :- उनके संगी साथी होते हैं वे जो 'समाज के हाशिए' पर धकेल दिए गए है। वे जब किसी श्मशान में औघड़ से हथाई कर रहे हो या अकेले कहीं भटक रहे हों, उनकी चाल में उलझकर जीवन सामने आ जाता है -- और फिर सिरजन होता है एक और बेहतर रचना का। वे अक्सर जीवन के डा'म सहते हुए लोगो पेट की आग बुझाने के जाने क्या क्या करना पड़ता है।
डॉ. सत्यनारायण की सबसे बडी खूबी है उनकी कविताएं (मैं कवि रूप की बात नहीं करुंगा, बात सिर्फ रिपोर्ताज़ पर ही है) जैसा कि कई बार यह बात मैं दोहराता हूँ कि जब एक कवि गद्य लिखना शुरू करता है तो उसके शब्द दर शब्द से कविताएं झरती हक़ी। स्वयं प्रकाश, उदय प्रकाश, सत्यनारायण , आदि बहुत से अद्भुत लिखारे कविता की तरह गद्य को भी सिरजते हैं। रिपोर्ताज़ों में सत्यनारायण किसी भी पात्र के जीवन का खाली हिस्सा या उसका अतीत, किसी का जिक्र नहीं करते, सिवाए इसके की वो जहाँ बैठे है, ढ़ेर बहुत है। सत्यनारायण एक ऐसे रचनाकार है जो भाव हीन अकादमिक मशीनी लेखकों आलोचकों के ताबे आने वाले रचनाकार नहीं है
'यह एक दुनिया' ऐसे समय काल में जब जीवन का उत्सव राज सत्ता के बर्बर जुल्म से स्थगित कर दिया गया जो फिर भी जीवन को स्थापित करता है। और जनवाद या लोकपक्षीय या लोकधर्मिता के ताण अपनी हर एक रचना लोक की आत्मा, मन के भीतर उतारते हैं। इसी कारण पात्र जीवंत रहते हैं।
उनकी ज्यादातर रचनाओं में बहुत सी जगह मुखरित आक्रोश है तो कहीं बेचैनी, तेड़फ़्...मौन। ध्यान देना लाजमी है कि सत्यनारायण के पात्र आक्रोशित बहुत मोन के साथ ही होते है। अक्सर चुप्पा रहने वाले ये रचनाकार सत्यनारायण के हर एक पात्र में स्त्री के प्रति उम्मीद सहज दिखता है। राजाराम भादू ने लिखा है कि 'इस एक और दुनिया को अभिव्यक्त करने के लिए केवल शिल्प की ही सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करना होता बल्कि भाषा के स्तर पर भी आगे बढ़ना होता है। इसके लिए इसी वर्ग और अंचल की भाषा से निकट का रिश्ता स्थापित करना होता है। इन लोगों का प्रतिबिम्बन इसी भाषा में सँभव था जिसमें सत्यनारायण सफल रहे हैं।
सतीश छिम्पा
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