विदर्भ डायरी




आवारा की विदर्भ डायरी
आप बहुत खूबसूरत हैं"
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कल एक प्यारी सी दोस्त से बात हो रही थी। वो इस बात को लेकर भावुक होकर दुःखी हुई, अचानक गुस्सा हो गई थी कि आजकल बदनीयत से छूना या चिकोटी काटना या, शरीर के सीक्रेट अंगों पर चुपके से थपकी देने जैसी घटनाएं होती है। एक लड़की कभी भी ऐसी घटनाएं नहीं भूलती और उन लोगों के लिए उसके मन में नफ़रत भर जाती है। उसका मानना था कि अगर आपको कोई लड़की अच्छी लगे, प्यारी लगे तो उसे तंग करने के बजाए उसकी ख़ूबसूरती, मसलन उसके बालों, गालों या आँखों की तारीफ़ कीजिए, उसे अच्छा लगेगा और यह है भी जेंटल तरीका......

उसकी बात सही थी। छेड़खानी या हवस भरा स्पर्श हर हालत में निंदनीय और घ्रणित ही होता है। घटियापन और कमीनगी से भरा हुआ।
      
       बी.ए. फाइनल ईयर के एग्जाम चल रहे थे। और हर साल की तरह इस बार भी मेरा इकोनॉमिक्स में बुरा हाल था। कुछ भी याद नहीं था और मैंने पासबुक के पिछली तरफ के पीले पन्ने (इनमे पूरे पाठ्यक्रम के नोट्स होते हैं) फाड़कर अंट में दबा लिए और बाथरूम के रोशनदान में छिपा दिए, पेपर शुरूहो गया था।  कुछ भी नहीं आ रहा था। फिर भी दो पन्ने भर दिए, करीबन पोण घण्टे के बाद पिसाब की छुट्टी ली और बाथरूम में जाकर सात पॉइंट हथेली पर लिख लिए, प्रश्न की भूमिका लिखी, फिर पॉइंट्स और उनके मनगढ़ंत उत्तर.... ये सिलसिला चलता रहा.... और... और.... और... और  फिर समय पूरा हुआ और मेरा पेपर जोरदार हो गया। बाहर आया तो निरुपमा (कॉलेज की एंजेलिना जोली) ने मुझसे कहा, "तुम नकल कर रहे थे न??"

-"नहीं तो"

-"जानती हूँ कर रहे थे, तभी बार बार बाथरूम में जा रहे थे।" उसने कहा तो हंसकर मैंने बताया कि , "हाँ, कर रहा था।"
   वो जाने लगी तो मैंने उसे रोका और कहा," आप बेहद ख़ूबसूरत हैं। खासकर आपके नयन नक्श और बाल"
वो एक पल चुप रही और बोली,"मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी सतीश, जानते हो मेरी एंगेजमेंट हो चुकी है"

-"अगर मैंने आपकी तारीफ़ की है तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं आप पर लाइन मार रहा हूँ, आप ख़ूबसूरत है तो दिल किया कि आपकी तारीफ़ करूँ और कर दी। 
-"थैंक यू.... मैंने सोचा आप भी दूसरों की तरह..." वो पूरी बात नहीं कह पाई मगर मैं समझ गया था।

-"नहीं, ऐसा नहीं हैं, मैं भी दूसरों की तरह ही हूँ। जान बूझकर या गलतफहमी, जो चाहो मान लो, बहुत सी लड़कियों को तंग किया है और सुनो ... अगर मेरी प्रेमिका नहीं होती या मैं सिंगल होता तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होनी थी आपको प्रपोज़ करने में।" मेरी बात सुनकर जोर से हंस पड़ी वो और बोली,"कमाल ही हो तुम...."  वो दिन है और आज का दिन है। हम बहुत अच्छे दोस्त हैं।
     
      इस पर एक बात और याद आ रही है, जो किसी साथी ने बताई थी, "किसी एन. आर.आई. दोस्त ने बताया था कि एक बार हम किसी अंग्रेज दोस्त के यहाँ डिनर करने गए तो उनकी बेटी को देखकर हमारे साथी ने कहा, "she is very beautiful..."  तारीफ़ सुनकर उनका पूरा परिवार बहुत खुश हुआ था और हमारी खूब पूछ हुई, अच्छा खाना और महंगी शराब परोसी गयी थी। वहीं अगर हम भारत में ऐसी तारीफ़ करते तो छित्तर परेड पक्की ही होनी थी, क्योंकि हम पश्चिम के मुकाबले बहुत पिछड़े हुए हैं, मानसिक स्तर में भी....." 
 
       -"सतीश, यार तेरी आंखें बहुत गहरी और सूनी सी है। एक अजब तरह का आकर्षण है इनमे.... कमाल।" सोनाली तो चली गई कहकर। और मेरा हाल था कि रात भर सो नहीं पाया। माँ डांटते वक्त कहती है, "आंख देख तूं इंगी, कुलिया है जाणै ।'
    -"बटन हैं क्या ?''
   -'' दिद्दा फूट गया के।"
  - "डोभा उघाड़ ले.....'इनके अलावा कभी कोई कॉम्प्लिमेंट नहीं मिला, वो भी लड़की से... . किसानी और कस्बाई मानसिकता का मेल हमेशा ही आत्मघाती होता।
     नहा धोकर टंच मंच होकर, सेंट लगाकर, डीओ और लगा लिया था। निकल लिया प्यारे के घोडों पर सवार होकर, "जब लड़की तेरी तारीफ कर रही है तो पट ही गई समझ सतीश कुमार......." काम आसान सा था।

    -" ... हलो, मुझे लगता है कि मैं आपको चाहने लगा हूँ...''

  -" .... सिर करै मतिरियो सो... काल बड़ाई करदी जद होग्यो के ?? लड़की किसी की बड़ाई कर दे, कॉम्प्लिमेंट दे तो तुम लोग ये क्यो सोचते हो कि चालू है, पट जाएगी..." उसने बात खत्म की उससे पहले ही धूजते पैरों से दौड़ लिया घर की तरफ।

        सामाजिक नियमावली जो अतीत से ही पीढ़ी दर पीढ़ी यहां आकर जम गई ही, स्वभाव बन चुकी है। आप प्रगतिशील, जनवादी वामपंथी, सेक्युलर और लिबरल नाम सुनकर प्रभाव में आ जाते हैं। पता तो बाद में चलता है कि यह तो ढोल है।
 
       -"आपकी आंखें बेहद खूबसूरत हैं। होठों की शेप भी, सांवला रंग आपकी इस किसानी स्त्री से शरीर और नक्श पर कत्ल लगता है।" उसने ऊपर से नीचे तक गौर से मुझे देखा और बोली, ".... आपका नाम सतीश है ?

-- "जी"  आश्चर्य हुआ मुझे। मैं कुछ बोलता उससे पहले ही उसने कहा, ''आवारा हंसों का जोड़ा"..... वो चली गई।

 - "कमाल है, ये वही है । फेक आईडी जिसने कविता में जोरदार प्रयोग करके एक बार गी सबको हिला दिया था।"..... 
        सच..... प्यार, साथी और ज़िंदगी से खूबसूरत कुछ भी नहीं हैं।

    ( बहुत बाद में हम बहुत अच्छे दोस्त और साथी रहे, जब तक कि वो जिंदा थी, तब तक)


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क्रांति कैसे होगी कॉमरेड ? मार्क्सवाद क्या होता है सर ?????
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           मैं तब 9  वीं क्लास में था। उम्र  13 या 14 साल रही होगी। कुछ तुकबन्दियाँ करने लगा था। उसी दौरान मेरी पहली रचना (कविता) बालहंस (राजस्थान पत्रिका की बेहतरीन बाल साहित्य की पत्रिका) में छपी थी। नाम था 'सैनिक से'। इसी समय मैं एस. एफ.आई. जो माकपा का छात्र संगठन था में शामिल हुआ। राजनीतिक समझ जीरो थी। इंकलाब जिंदाबाद, मुर्दाबाद में मजा आता था। संघ की शाखा में भी जाता था। इसका विवरण एक अलग पोस्ट में किया जाएगा। एस. एफ.आई. मेरे लायक कुछ नहीं था। हड़ताल हो तभी मजा आता था। हां, इतना जरूर था कि पढ़ने की भूख जगी, मगर इस भूख को शांत करने का माद्दा एसएफआई के पास भी नहीं था। किताबें कैसे, कब, कहाँ से  हासिल की इस पर आप ''किस्सा एक किताब चोर'' जो बाइस रचनाओं का है, चार फेसबुक पर भी है... को पढ़ सकते हैं। मैं थोड़ा बहुत भी पढ़ता तो उतने में ही अनेक सवाल मेरे भीतर पनपने लग जाते थे। जिज्ञासा, इच्छा, एव और जुनून... सवाल दर सवाल, जुनून, हौसला... शाखा में ना तोकेवल जाना छूटा बल्कि नफरत भी हो गई थी। मुझे उस माहौल से तो निकलने में मुश्किल नहीं हुई मगर मार्क्सवाद के अध्ययन में हुई। क्रांति क्या होती है ? कैसे होती है ? क्यों और प्रक्रिया क्या होती है ? जवाब ही नही मिलते थे। किताबें ना होने के कारण। बहुत जल्द मैं इसको भी सहज सरल बना चुका था। दिक्कत फिर भी आ ही गई। लेनिन, स्तालिन से तो बच्चा बच्चा परिचित था लेकिन मैं ट्राटस्की, ख्रुश्चेव, नम्बूदरीपाद, रणदिवे, तेलंगना, नक्सलबाड़ी, हो ची मिन्ह, चे ग्वेरा आदि के ध्वन्यार्थ को समझ नहीं पाता था, एसएफआई का नेतृत्व भी लेनिन, स्तालिन, चे और भगतसिंह के अलावा कुछ जानते नहीं थे। यह अज्ञानता काफी समय रही, चोरी करते हुए अध्ययन, बहस जो फिजूल भी होती थी- के कारण जान गया था और फिर एस.एफ.आई. को उसके  गलत ट्रैक और पोलिटिकल लाइन की कोई रूपरेखा के साथ अनेक अन्य कारण भी थे। सबसे बड़ा, इंकलाब के नारे क्यों लगाते हैं ये लोग जबकि लड़ना चुनाव है। चुनाव ? कम्यूनिष्ट नहीं है ये लोग, और हो गया था अलग।

       इससे कुछ पहले यह हालत थी कि मैं अक्सर लेखन और उससे जुड़े दूसरे मुद्दों, स्वयं के संवेग जनित अतिभावुकता आदि भावों से परेशान रहता।  इसलिए हर बार एक अध्यापक जो लेखक भी थे को अपनी हर लिखी कविता पढ़वाता था। एक बार जब मैंने अपनी कविता दिखाई ताकि वे जरूरी संशोधन कर दे।  कविता पढ़ने के बाद उन्होंने कहा,
"जानते हो मेरी क्या विचारधारा है?" मैं नहीं जानता था।

-"मैं राष्ट्रवादी हूँ।" उन्होंने आगे कहा, "और तुम्हारी कविता मार्क्सवाद से प्रभावित है।"

-"मार्क्सवाद क्या होता है सर ? ?" मैंने मासूमियत से पूछा। जबकि बहुत जल्द विद्यार्थी बन गया था उसके बाद मार्क्सवाद का, जो आज भी हूँ।

-"ये जो तुम कविता में दिहाड़ी, भूख, गरीबी की बात कर रहे हो, यही मार्क्सवाद है।"

-"पर सर ये तो सच्चाई है सर, मेरे पापा, चाचा, पाडोसी और बहुत से लोग दिहाड़ी ही करते हैं। सात रिपिया सैंकड़ा ब्याज भी....''

-"तुम प्रकृति पर लिखो, हमारी धरोहर खेजड़ी पर, किले, गढ़, ढाब और गंगासिंह और धोरों और पेड़ पौधों और सौंदर्य पर लिखो।" उन्होंने कहा, मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ा।

पर आज जब मैं मार्क्सवाद को जान चुका हूँ, जान भी रहा हूँ, पढ़ चुका हूँ, और निरन्तर  पढ भी रहा हूँ और मार्क्सवादी हो गया हूँ और लगातार आत्मालोचना के ताण इसमे और सुधार के लिए प्रयास भी कर रहा हूँ। उस दिन की उनकी बात को इसीलिए तो भली प्रकार समझता हूँ कि वे ऐसा क्यों बता रहे थे।

   अक्सर जनांदोलनों के समय मेरी उपस्थिति और सक्रियता से चिढ़कर वे ट्यूशन वाले बच्चों को कहते हैं, "रंडीबाज है, बदचलन.... घटिया आदमी है आवारा किस्म का...." 
..... और वे युवा ये सब मुझे बताते हुए या बातें करते हुए जाने किस फ़िल्म के डायलॉग को चबा चबा कर कहते हैं, "आवारा होना ये है तो हम भी बनेंगे आवारा....''

(तस्वीर मई दिवस की है। कुछ पहले शहीद दिवस की भी।)



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स्वरा भास्कर मुझे तुमसे इश्क हो गया है.....

     (स्वरा भास्कर इसलिए जरूरी नही हो जाती कि वो निडरता से सच को खुलकर बोलती है बल्कि वो जरूरी हो जाती है क्योंकि उसको पता है बहुत अच्छे से कि इसकी वजह से उसका कॅरियर चौपट हो जाएगा। बड़बोली कंगना रणौत से स्वरा की तुलना करना स्वरा के किरदार का अपमान है।)

      निडर, निसंकोच और प्रतिबद्ध अदाकारा स्वरा फासिज़्म के विरुध खुलकर बोलने वाली एक जीवित अभिनेत्री है। इसकी जिंदा बातें और प्रतिरोध के कारण इसके किरदार से इश्क होना लाज़िम है।

     स्वरा भास्कर के पास चेतना है। चेतन्य विचार। फासिस्ट दौर में उसने हमेशा शोषण तंत्र के सबसे निर्मम भाग, मतलब नेतृत्व, सरकार ही नही बल्कि व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाए। और वो लगातार इन ज्वलंत राजनीतिक- सामाजिक मुद्दों को लेकर  मुखर रही हैं। सीएए और जेएनयू में हुई हिंसा को लेकर स्वरा भास्कर लगातार अपना विरोध जता रही थी, जिस वजह से वह बहुतों के निशाने पर भी हैं। ऐसे फासिस्ट अंधड़ में उम्र की लिहाज शर्म भूलकर  राज शांडिल्य ने भी अपने ट्विट में स्वरा के खिलाफ अभद्र शब्द का इस्तेमाल किया, जिसके बाद स्वरा ने भाषा की गरिमा कायम रखते हुए उन्हें करारा जवाब दिया है। राज शांडिल्य ने ट्विट में लिखा- "सस्ती चीजों पर ध्यान न दें...स्वरा भास्कर से महंगा दैनिक भास्कर बिकता है।" शायद उन्हें भी अपनी भाषा आपत्तिजनक लगी होगी, क्योंकि निर्देशक ने तुरंत ही ट्विट को डिलीट कर दिया। स्वरा भास्कर ने भी उनके ट्विट पर करारा जवाब देते हुए लिखा- अगली बार रोल ऑफर करने और आपकी फिल्म के ट्रेलर को शेयर करने की रिक्वेस्ट वाले मैसेज भेजने से पहले आप भी सस्ती हरकतों के बारे में थोड़ा सोच लेना। बहुत प्यारी और यूनिक अभिनेत्री हैं।

     स्वरा भास्कर क्यों इतनी बेहतरीन और संजीदा ऐक्ट्रेस है, क्यों वो चीजो को बारीकी से पकड़ती है ? संवेदना की गहन गूंझळ को कैसे छू लेती है। फासिस्ट लंपट गुंडावहिनियो के हमलों, कुत्सा प्रचार के विरुद्ध आज अचानक एक वीडियो सामने आया जिसमे वो होस्ट को अपना घर दिखा रही है और अचानक वे स्वरा की लाइब्रेरी के पास पहुँच जाते हैं। होस्ट बोलती है कि इसमें से आपकी पसंदीदा किताब निकालो तो स्वरा भास्कर अवतार सिंह पाश की सम्पूर्ण कविताएं निकालती है जो हिंदी में आधार प्रकाशन ने छापी है और कहती हैं कि " पाश मेरे प्रिय कवि हैं , अब मैं विदा लेता हूँ, लोहा, सबसे खतरनाक प्रिय कविताएं हैं", वहीं जब होस्ट स्वरा के घर में घुसती है तो एक कविता पोस्टर दिवार पर लटका दिखता है, केदारनाथ जी की 'मई दिवस' कविता का जो सम्भवतः पंकज दीक्षित सर का बनाया है। मई दिवस कविता को सम्हालना तो दूर की बात है बॉलीवुड के हीरो हिरोइन इस की संवेदना के नज़दीक ही नहीं फटक सकते।
          बहुत से अभिनेता अभिनेत्रियों में किताबो के लिए रूचि है, मगर नन्दिता दास या स्वरा भास्कर की प्रतिबद्ध भूमिका सबसे अलग और आद्भूत है। रंगमंच और सिनेमा की इस पीढ़ी में स्वरा जैसे इक्का दुक्का ही कलाकार है जो जिंदा सोच रखते हैं। नसीरुद्दीन शाह एक साक्षात्कार में कहते हैं कि " रंगमंचीय कलाकार को लोक के जिस सबसे गहरे अनुभवों के बीच उतरना होता है वहां उसके विज़न की भी परख होती है जो विस्तृत नही होगा कभी भी बिना किताबों के....."


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     अराजकता सिर्फ जीवन मे ही नही, लेखक में भ है। यह डायरी जो है, बेतरतीब सी, बस यही है जीवन भी। तुम्हे क्यो नहीं पसंद उस अराजक का होना ??
बीमार आवारा, घनघोर शराबी- .. आवारा  की डायरी. -
यह दुनिया दगा, कपट और छल से भरी हुई है। कपट से भरे कपटी लोग और साथ जहर से भी भरे है। उनमें किसी भी तरह की प्रतिभा नहीं है। वे पूंजी और मिडिया के कारण मुख्य धारा में बने हुए हैं। अमानुष विचारों को ढोते मुर्दा लोग।
         जहां खुलकर प्यार करना। प्यार का इज़हार करने को छेड़ना समझा जाता है। जहाँ  एक परिवार द्वारा अपनी बेटी को ब्लैकमेलिंग का हथियार बनाकर घरों को उजाड़ने के लिए जो साजिशें रची जाती है। एक कोई लड़की या लड़का बेरोज़गारी के कारण जिल्लत सहते हैं। किसी क्रांतिकारी लेखक को हाशिए पर पटक दिया जाता है। कोई जो नौकरी के लिए जिस्म का सौदा कर लेते हैं।  .... वे इसी दुनिया का हिस्सा है।" उसने फ़िल्मी हीरो की तरह डायलॉग बोले तो मैंने सिगरेट का गुल झाड़कर पूछा -" तो तुम नयी और ख़ूबसूरत दुनिया बनाने के लिए क्या कर रहे हो"

-" मेरे दोस्त ये दुनिया बहुत कठोर है, उबड़ खाबड़ है, भावों और सपनों की कातिल है। शब्द की तौहीन करने वाला जाहिल समाज क्या जाने कि प्यार का इज़हार करते शब्द, दुनिया के सबसे सुंदर शब्द हैं। फिर भी मैं पढ़ता हूँ, सपने देखता हूँ, जब मेरे बस में कुछ नहीं रहता तो शराब पीकर बेसुध हो जाता हूँ "

-" पार्टनर ऐसे तो ख़ूबसूरत दुनिया बनेगी नहीं"

-" बनेगी मेरे भाई जरूर बनेगी, वो वक्त भी आएगा।
     तुम देखना एक दिन जब दिन हमारे होंगे......।"

  कहते हुए वो जो मेरा एक हिस्सा था उधर, उस  बाएं तरफ़ के खेतों की ओर चल दिया। सोचा, जो लोग इसके साथ चले थे साम दाम और हर बुरी चालों के चलते स्थापित हो गए हैं। यह कितना प्रतिभाशाली था/ नहीं अभी भी है।... और फिर  मैंने आसमान की तरफ देखा, बगुलों की डार से एक बगुला बिछड़ गया और इधर-उधर गोते खा रहा है, मैं घर की तरफ़ बढ़ गया.... घर ?? कहाँ है घर?? मालिक कौन है- रात डंडे मारे गए सपनो के और फिर अस्पताल

       
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  ( यह टूम तो गई काम से-- सुबह चार बजे से दारू पीना शुरू करता है....'' जाने दे बेवड़ा क्या लिखेगा, यह एक बहुत बड़ा राजस्थानी लेखक था, हटा इस गंद को साला। और यह सेटिंगबाज संपादक था।

   पन्ना, जाने कैसे बेतरतीबी छाई है.  
            वार्ड नंबर  11 या  तीन या टुंडला या अबोहर या एथेंस या स्पार्टा,  दिल्ली या हल्दीघाटी या खानवा का मैदान या कोई सा भी हो 'पन्ना'- इतिहास बीमारियों को ढोता नहीं है। इतिहास की तिलिस्मी दुनिया या गूजळक या भूलभुलैया या आकर्षण या जो भी हो, मुझे खींच ले जाता है- वियना नही देखा कभी मैंने मगर स्टीफ़न स्वाइग से साक्षात्कार कर रहा हूँ- या होता हूँ, मैं सतीश या शेखर, क्या कुछ फर्क पड़ता है ?... एक बीमार बंदे से मुलाकात जो अर्धविक्षिप्त है और खुद को कहता है-  सृजनधर्मी , शायद हो कोई गुमनाम युवा लेखक जिसकी डायरी की अज्ञात तारीख़ों में दर्ज है-- आदमी मारा जाता है, भेड़िया धर्म के बंकर में रहता है सुरक्षित..... बेतरतीब संवादों की बेतरतीब डायरी और अर्धविक्षिप्त आदमी के सवाल.....  ........
    
हिल गया जो दिमाग
                          
.......शराबी, लंपट, घमंडी, बदतमीज और भी जाने कितने ही अलंकार है उसके हिस्से.... वो जिसका नाम शेखर है या है सतीश या जो भी हो- जिसका भी हो.... " जिसका नही, मेरा, सिर्फ मेरा'' ,-

बकवास

     -- वह अक्सर  अकेला रहना पसंद करता है/ निज बोल नही बोलता है तो धमकाया जरूर जाता है, खुद ही के अंतर से, करता हूँ--. शेखर को अब ना जाने किसने  मन के मे बैठा लिया। उफ़्फ़, सच मे ही बावळी लोल है...
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 - १

       'माहे मीर'' का यह कथन काफी चर्चित है, और मुझमे घनघोर आत्ममुग्धता के अराजक लक्षण" आजकल जो लोग लिख रहे हैं उन सबमे तुम सबसे ज्यादा योग्य और अपने आप में बेहतरीन ग़ज़लगो हो। यह वे लोग भी जानते हैं जो तुम्हे मिटा देना चाहते हैं। मगर अफ़सोस कि तुम नहीं जानते और जिस दिन जानोगे, अदब में कयामत आ जाएगी।"
    मैं अकेलेपन का शिकार हुए बिल्कुल अकेला बैठा हूँ। अब तो इसको पसन्द भी करता हूँ। लोक में ऐसे आदमी को इक्कलखोर कहा जाता है, शायद मैं इक्कलखोर ही हूँ। कारण क्या हो सकता है इसके पीछे- यह कोई मायने नही रखता है। मेरी सपनो की बहुत ही ख़ूबसूरत दुनिया। एक ऐसी दुनिया जहां किसी का कोई दखल न हो। किसी का किसी से कोई वैर विरोध न हो, कोई अन्याय, शोषण और नफरत न हो, जहां हर ओर प्यार, मोहब्बत और सम्मान की भावना हो। योग्यता का सम्मान हो। ख़ूबसूरती को सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। कोई गरीब न हो, कोई इज्जत और कोई बेइज्जत न हो। मुझे ये सब सोचना, देखना अच्छा लगता है। मुझे पेड़ों, पहाड़ों, नदियों, झरनो और सागर का असीम विस्तार, हिरण, गाय, बच्छे, शेर, मोर, कोयल के सपने देखना बहुत भाता है। ख़ूबसूरती और प्रेम के यथार्थ और आदर्श रूप को देखना अच्छा लगता है। उस लड़की के होठों को चूमते हुए निकल जाना अंतिम छोर तक....  बरसात के मौसम और फूलों का खिलना, कोपलों का दमकना और तितलियाँ, तारे और धरती, मेरे सपनो के केंद्र में रहते हैं। सपनो में मैं उड़ता हूँ, समुद्र में तैरता हूँ, दौड़ता हूँ, चलता हूँ, टहलता हूँ...  फ़िल्म देखता हूँ, गाने गाता हूँ, प्यार करता हूँ... . लोक रंग के किसी रंगीन कार्यक्रम मे जीवन के उत्सव को मनाता हुआ मैं रेड वाइन के पेग लगाता हूँ। महफिलें सजाता हूँ। जहां होड़ आगे निकलकर धन कमाने की नही बल्कि हो अपने कम्यूनों के अधिकाधिक श्रेष्ठ और मजबूत बनाने की। उड़ता हुआ मैं तारों को छूकर धरती से मिला देता हूँ.....
    एक हजार उधार, पव्वा एक और फिर सड़क पर- सुबह पता लगा- बेवड़ा गिर गया था....

  जाने कब होश में आया

 दिल करता है आग लगा दूं। नेस्तोनाबूत कर दूं, विध्वंस से मिटा दूं इस समाज को, इस वहशी लोगों के समाज को...  उफ़्फ़ ये हकीकत। आप जितने ज्यादा सीधे सरल होते हैं उतनी ज्यादा आपकी जड़ें काटी जाती आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे- उतना ही आपका सम्मान होगा। कुकर्म तक भुला दिया जाता है। सरकारी अधिकारी या उच्चाधिकारी हैं तो आप आलोचकों की नज़र में नाजिम हिकमत या नेरुदा या निराला या दुष्यंत होंगे। किसी स्थापित और चर्चित लेखक की जात के हैं तो एक ही दिन में आपकी किताबों का मूल्यांकन हो जाता है। 
   जिसके लिए, जिस मेहनतकशो के लिए कविता लिखने वाले, उन मजलूमो के लिए दो सेर आटा तक नही दे सका.
     निराशा, हताशा, पस्त, दुख, संताप, अकेलापन और गुस्सा और आक्रोश और इकलाब, विद्रोह मेरे भीतर बार बार ज्वालामुखी के लावा से दहकते हैं। दिन खतरनाक है जैसे मायकोव्स्की के अंतिम दिनों की तरह या हावर्ड फ़ास्ट के शहीदनामा के सजायाफ्ता मजदूर में, या द इडियट के निकोलायविच सा .. बेचैन सा।  लेखन में कुछ स्थापित नामों से असहमतियों के स्तर की असहमति नही बल्कि घनघोर नफरत करता हूं। यह दुनिया दगा, कपट और छल से भरी हुई है। कपट से भरे कपटी लोग और साथ जहर से भी भरे है। उनमें किसी भी तरह की प्रतिभा नहीं है। वे पूंजी और मिडिया के कारण मुख्य धारा में बने हुए हैं। अमानुष विचारों को ढोते मुर्दा लोग 
         -''लड़ाई मत किया करो यार-- कभी देखा है किसी को  बोलते हुए या किसी को सुना है- प्रतिरोधक होकर खुलेआम बोलते हुए ?'' 

एक दिन चला जाऊंगा
कहानियों पर सवार होकर
कल्पनाओं से दूर बहुत दूर.......
तब-मत खोजना उस भूख से भयभीत, जीवन के संक्रमण से डरे हुए, पीड़ाओं और पनियाई
लाल आँखों वाले किसी लड़के को

        क्या हुआ था उस दिन- उस दिन जब पूरे दिन आंधियां चलती रही और बादल जिन्हें बरसना था मरुधरा और मैदान और घग्घर नदी के इस बहुत सुंदर और रमणीय और कामनाओ को जगा देने वाली सबसे प्यारी धरती, धरती के इस बहुत प्यारे हिस्से जिसको हम कहते हैं नखलिस्तान -- बरसना था और झूमना था। नहाना था शेखर को- नहीं, मेरा नाम ही शेखर है- बावळी टाट..... क्या हुआ था उस दिन या उस समय या उस जगह जहाँ कभी कुछ समझ ही नही आता.... पता लगा-- वो जो सदियों की गुलामी तोड़ने, अन्याय और ज़ुल्म का मुंह मोड़ने आदि का का नारा ललकारा स्टाइल में फैंकते, लाल टोपी और लाल जैकेट आदि के फैशन को मार्क्सवाद या कम्युनिष्ट की पहचान कहने वाले जब पुरस्कार के लिए किसी दल्ले के सामने कोड कोड में कोड्डे होकर अपनी गुदा पर ठप्पा लगवाकर बन जाते- सरकारी या अकादमिक कवि रूप भेड़िये- संपादक बने इस तरह के भेड़िया जो आदमखोर कवि की कल्पना का पिछवाड़ा ठोककर डाटा लगा देते हैं....  उफ़्फ़..

तुम फ़िक्र मत करना मेरे शहर
मैं नहीं लौटूंगा, नहीं लौटूंगा तेरी जगमगाती दुनियां में
नहीं आऊंगा तेरे प्यार के बाज़ार में सजी दुकानों पर
नहीं- मेरे शहर
मैं अब नहीं लौटूंगा तुम भी किसी भावुकता से भरे
अकेलेपन को ढोते बच्चे में मत खोजना
मेरे बचपन के उदासी भरी आंखों और चेहरे के अक्स

उम्मीदें जहाँ हार जाती है..... ज़िंदगी वहाँ मौत बन कर हमे बाँहों में कसती...
    सल्फास मिली नहीं, फंदा डाला नही, स्प्रे ताले में है-- और मैं, मैं डर गया, हिम्मत नही पड़ी---, अगर आज ये कारा हो जाता तो क्या कोई भी इंकलाबी या जीवित युवा, सहज इस दिशा बाबत सोच कायम रख पाता- साथी कह नही सकते क्योकि ज्यादा पता नहीं।

        कितनी बार इन सब बेतरतीब कागज़ो और डायरियों को तरतीब देकर लिखा, सहेजा, बचाव किया और फिर हर बार फ़ंटेसी, कहानी या जीवनी या जो भी हो, ढालने की कोशिश की, मगर नही, मैं मेरे 'मैं' के लिए जिस 'शेखर' रख रहा था वो अजब था- गाड़ी सेट नही बैठी..... उफ्फ, यह बेचैनी, अब खुद ही पढ़ें; नीचे एक अध-पागल जो जाने क्यों  और कौन सा अफ़साना था जिसको अभी ही, बिल्कुल अभी सब सुन रहे थे। 
    जैसे कील दिया गया हो उन्हें या किसी तिलिस्म में बांधा गया हो। एक किसी कवि जिसका किस्सा लोग हवाओं की सरसराहट में तलाशते हैं। कयास लगाते थे- वो एक  बीमार कवि था। एक ऐसा शराबी  कवि जिसने खुद से ही खुद को खत्म कर लिया था। 

    मोहब्बत या बेरोजगारी या क्रांति या उपेक्षा, दलगत राजनीति करते लेखक, गांजा, पोस्त या शराब या जो भी हो, वही कारण था उसका, उसकी बर्बादी में हाथ था
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   बीमार कवि का पन्ना

      उस बीमार कवि से मुलाकात...  जिसका नाम शेखर ( और एक बीमारी खुद मेरे अस्तित्व की थी जो हर बार या कहूँ, हीरो, बौद्धिक स्टार या ऐसा ही कुछ समझने के फेर में मैं हास्यास्पद हो जाता हूँ इस शेखर नाम के खुद मेरे ही किरदार से) था, जो टॉलस्टॉय के उपन्यास 'इडियट' वाली जादुई नारी नस्तास्या फिलिप्पोवना से इश्क करता है-- जो हकीकतन नामुमकिन तो नही मगर मुश्किल था- गुलाबी होठों के चुंबन से- प्यार, संभोग और पलायन... पलायन ?? पलायन शायद नहीं--- सुबह सुबह हैंगओवर से बचाव के लिए एक पव्वा दारू या-- पूरे दिन पीते रहना और- जब जब भीतर भूकंप उठते तो 'बिफोर रेन'-की श्यामवर्णीय कमसिन तो नही मगर ज्वाला सी दिखती  नंदिता दास के होठों की शेप पर फिदा होकर  कविता लिखता है, बुरा क्या है ? .... भला भी तो नही है ना । चल छोड़ो यार-- कभी कभी वो जो दीप्ति नवल जैसी सांवली सलौनी साथी की चाहत रखता हुआ कल्पना के बिस्तर पर उसको महसूस करता हुआ पड़ा रहता है रात भर (बस मैं ये ही एक जुल्म खुद के साथ बर्दाश्त नही कर सकता हूँ और भगाकर आवरण रूपी शेखर को, खुद आता हूँ) प्यार भरे सपनो संग, और जैसे सपनो की बहुत सघन, पवित्र और मीठी सी काम इच्छाएं जैसे ही हावी होकर मुझे, मुझमें ही स्थाई करने की कोशिश करती है- उसकी बहुत गहरी, बड़ी बड़ी कामुक मगर शरारती आंखे- थोड़ा टेढ़ा करके गर्दन को जब देखा कातिल तकणी से और वे सपने जो हमेशा हमेशा के लिए वहां स्थाई होने थे-- रात के स्वप्नदोष से झरकर बन गए दाग- चाँद में अब भी दिख रहे हैं जैसे- मर चुके शुक्राणुओंं की लाशें....

   आदमी अब कहाँ है
-" यह टूम तो गई काम से-- सुबह चार बजे से दारू पी रहा है....'' कौन था, पागल साला।

     मैंने उसको देखकर पुकारा शेखर नाम लेकर  तो, ''शेखर ? कॉमरेड ?''...... उसने कहा । सही सोचा था शायद । वही शेखर जो लाल लाल आंखों और बेतरतीब सी जिंदगी जी रहा घनघोर अराजक कवि। शेखर या खुद मैं ??? जाने क्यों आज बरसात नही हुई।

   -"यह निहायत गलत है या सही, पता नही, नीलम दोस्त है और दिवाकर की प्रेमिका - (नाम बदल हए हैं।) एक या दो बार गलतफहमी या जो हो उसे समझा जा सकता है- आज अठाइस दिन हुए- अनवांटेड की कितनी गोलियां दे दी- या वो दूसरे वाली.... वो चली गई, दिवाकर का ब्रेकप क्या मैंने करवाया था- साले....

    सब कुछ उजड़ा हुआ हो जैसे


विदर्भ डायरी का पुस्तक दिवस पन्ना

विश्व पुस्तक दिवस..... ( World Book Day) 
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                                      ● सतीश छिम्पा

किताबें-
करती हैं बातें
आज की कल की... एक एक पल की
खुशियों की ग़मो की... फूलों की बमो की
प्यार की मार की..... जीत की हार की

क्या तुम नहीं सुनना चाहते किताबों की बातें
किताबें कुछ कहना चाहती है
तुम्हारे पास रहना चाहती है

                        ● सफ़दर हाशमी

"बेहतर दुनिया का रस्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है"

        .... दुनिया की हर आदत से बेहतर और पवित्र है किताब पढ़ने की आदत, आप अगर रोज एक किताब पढ़कर सोते हैं या पढ़े बिना आपको नींद नहीं आती तो आप जीवन की सबसे ख़ूबसूरत शै के साथ हैं। किताबों से किया गया प्यार कभी आपको निराश नहीं करता, यह आपको बेहतर बनाता है। जेब मे भले धेला ना हो मगर आप जब किताब मेलों और किताबों की दुकानों की ओर खिंचने लगते हैं तब समझिए कि आप सुंदरता की ओर बढ़ रहे हैं।
                        एक दौर था जब लोग किताबें पढ़ने में पढ़ाने और चर्चाओं को पसंद करते थे। बहस मुबाहिसे और पाठक मंचों का स्वर्णिम दौर था। साहित्यिक पुस्तकें और पत्र- पत्रिकाएँ ढूंढ़कर पढ़ते थे। पंसारी की दुकान तक पर सरस्वती, चांद, लहर, अणिमा, हंस, साप्ताहिक हिंदुस्तान और सारिका, धर्मयुग, नई कहानी और कविता आदि जैसी पत्र पत्रिकाएँ उपलब्ध हो जाती थी। लोग बाग अध्ययन और चर्चा करते थे। बातों के केंद्र में विमर्शों के मुद्दे तय हुआ  करते थे। विमर्श होते थे.... चर्चाएँ...  हथाईयाँ होती थी। छोटे से छोटा या कहूँ नया लेखक भी पहचान लिया जाता था। क्लासिक्स का जमाना था। विश्व साहित्य के अनुवाद हुआ करते थे। समकालीन आत्ममुग्ध बीमार मानसिकताओं वाली युवा पीढ़ी की तरह तंग नजरिया और गंभीरता का नकली आवरण, नकाब तब नहीं हुआ करता था। वे हकीकतन बेहतर लोग थे।

     अब सब अतीत हुआ। क्योंकि बाजार ये अच्छी तरह से जान गया है कि अपने मुनाफे में इजाफे के लिए कैसे इन सामाजिक प्राणियों की रुचियों को बदला जा सकता है। आप चाहे कितने ही चंट चालाक या डेढ़ स्याणे बनिए, वे फिर भी टोचरी में दे ही देंगे, कोई न कोई उत्पाद। बाजार में माल की कमी नहीं, इसीलिए श्रम के लिए मज़दूर भी कहाँ कम है। यह तो आप पर हैं कि आप कहाँ तक टिककर काम कर सकते हैं। मानसिक द्वंद्व, आर्थिक, सामाजिक और दैहिक द्वंद्वों के बीच, इसी तरह के पूंजी के पंक में पड़े बाजार में मुझको रोज़गार के लिए उतरना ही था। आज नहीं तो कल। किताबों ने उस समय जब अध्ययन बहुत कम ही था  या कहूँ शुरुआती समय मे था। मुझे बनाया और उभारा था।

     वो समय, आत्महत्या या भाग जाना, पलायन का विचार उफ्फ,  मुश्किल दिनों से क्यों न गुज़र रहे हो..... आत्मबल  आपको हमेशा संघर्ष की प्रेरणा देती है। हौसला देती है। जब आप भूख और बेरोज़गारी से मोर्चा ले रहे होते हो तब "चार्ली चैप्लिन" की आत्मकथा आपको ऊर्जा देती है। कठोर से कठोर दिनों में ऑस्त्रोव्स्की आपको जज़्बे से भर देता है और अँधेरे दिनों में नाजिम हिकमत की कविताएँ आपके सपनो को पंख लगा देती है.... और फिर अवसाद के बाद और हरा हो जाता है जीवन। अवसाद के कठोर दिनों में जब आप सम्हल नहीं पाते हैं और अंधेरों की और मुड़ जाते हैं, तब लगता नहीं कि ये अँधेरा कभी छंटेगा, मगर एक दिन जब कोई नर्म, मुलायम उम्मीद आपके भीतर उतरकर पलने लगती है, तब उजाले आपको अपनी बाँहों में लेने के लिए बढ़ते हैं....  दिन मुश्किल होते हैं और आप अपघात के करीब होते हैं, लोग समझते हैं कि आपका काम तमाम हो गया, आप खत्म हो गए कि एक दिन आप किताबों की ओर मुड़ जाते हैं और उठ खड़े होते हैं, तब जीवन आपके लिए फिर से सहज रूप धर लेता है। प्यार आपको बाहों में लेने को मचलने लगता है। दुनिया के वे दो तरह के लोग जो आपको प्यार करते हैं तो निर्मम तरीके से आपको रौंदकर मार देना जो चाहते हैं, विवश देखने के अलावा कहीं कुछ भी नहीं कर सकते हैं। 
 
         मुझे यह कहने में या स्वीकारने में कोई हिचक नहीं हैं कि मैं आज भी किताबों के लिए, दुर्लभ मगर महत्वपूर्ण किताबो के लिए जोखिम उठा लेता हूँ। विश्व पुस्तक मेला (प्रगति मैदान, दिल्ली) का वह दौर आज तक मैं भूला नहीं हूँ जब एक धेला तक मेरी जेब मे नहीं था और में अवध असम गाड़ी में बिना टिकिट दिल्ली पहुंचा था। बिना किसी से संपर्क, घबराया, अजब सी विक्षिप्तों की तरह की शक्ल, अक्ल और बाल.... क्या करूँ और क्या ना करूँ में उलझा ही था कि एक कोई ऐसा दिख गया कि मेरा सब कुछ जो नामुमकिन था, हल हो गया (यह किस्सा अलग से कभी लिखूंगा) था। .... और जब मैं वापस सूरतगढ़ लौट रहा था तब मेरे पास बहुत सी किताबें थी, ऐसी किताबें जिनकी तासीर तक पहुंचना राजस्थानी युवाओं की रुचि का विषय ही नहीं रहा।

                किताबें चोरी करना मेरी मजबूरन बनी आदत का एक बड़ा हिस्सा है। आज भी ना मिलती हो किताब तो चुरा लेता हूँ। किताबों के बारे में बीमार आदर्श भरी बातें बहुत चुभती है। किताबें पढ़ने की रुचि का मतलब कहानी उपन्यास ही नहीं भाई, इससे तो फिर टीवी ही देख लो, वो भी अच्छा है। बहुत से अन्य विषय, दर्शन का अध्ययन ज्यादा जरूरी है। जाने कितने ही मित्र परिचितों से उधार ले लेकर किताबे खरीद और पढ़ चुका हूँ। सूरतगढ़ में मार्क्सवादी स्टडी सर्किल भी मैंने ही शुरू किया था- एक ऐसी पहल जो अब तक राजस्थान में हुई ही नहीं। एक मुहिम जो जीवित युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास है।


● सतीश छिम्पा


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