विदर्भ की धरती और भूमिहीन किसान.....


कौन है अन्नदाता? 

कुलुक किसान या मज़दूर!!!

पंजाब के युवा साथी सुखविंदर की एक पोस्ट इस संदर्भ में जब वायरल हुई तब अचानक एक साथ स्टडी सर्किल्स, जन संघठनो, छात्र इकाइयों समेत हरेक जीवित तबकों में इस पर बहुत गंभीर अध्ययन- मनन- चिंतन शुरू हुआ, हल्की बहस, गंभीर उत्तेजक बहस जो बाद में वाद विवाद तक पहुंची और लगातार चलने के बाद नतीजे संवाद की स्थिति में आए- तब उस प्रदूषित धारणाओ को खारिज करके, निर्मम समाधन की कठिन विचलन भरी प्रक्रियाओं के बाद यह एक महान शब्द  जिसको नरोदवादी कुलुकों ने प्रदूषित तो किया साथी ही बीमार भी, यह बहुत भ्रामक है। तीन बीघा या पांच बीघा वाला भी खुद को किसान कहता है और दो सौ बीघा जमीन वाला कुलुक भी खुद को किसान कहता है...  जबकि हकीकत यह है कि असल मेहनतकश सीमांत किसान (कम जमीन वाला) जिसे घर चलाने के लिए खेती के साथ-साथ दिहाड़ी जैसे दूसरे छोटे- मोटे काम करने पड़ते हैं, होते हैं, या खेत मज़दूर (चौथिया, पांचिया जो फसल के चौथे या पांचवे हिस्से के लिए कुलुक के यहां मज़दूरी करते हैं, खेत के साथ साथ उनके डांगर पशुओं के लिए हरा चारा भी लाते और कुत्तर करते हैं, पशुओं को दुहते भी हैं) अकाल, अतिवृष्टि या सत्ता की नीतियों की मार सबसे ज्यादा इन्हें ही झेलनी पड़ती है। कुलुकों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे सिर्फ 'किसान' शब्द के नाम पर नेतृत्व करते हैं। जनान्दोलनों में इनकी भूमिका नगण्य होती है और ये सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी होने के साथ ही साथ बर्बर और तानाशाही व्यवहार के ही होते हैं, जहां कई जगहों पर खेत मज़दूर की घरेलू अस्मिता तक को नष्ट कर दिया जाता है। मज़दूर ही है अन्नदाता.... मज़दूर ही है निर्माता.....

जिस भी व्यक्ति को यह निजी हमला लगे तो उनसे निवेदन है  कि मैं उन सभी को इसमे शामिल किए हुए  एक ताकड़ी अगर तोलने लगूंगा तो मैं क्या उसमे शामिल नही ? यह निजी आक्षेप नही है। ल ये तो वही बात हुई कि पूंजीवाद का विरोध करते हुए पूंजीपति को पकड़ लेना...या....  ब्राह्मणवाद को कोसते हुए ब्राह्मण जाति विशेष पर आ अटकना। आप महान है कोई बात नही, स्वीकार्य है मगर ध्यान से, सम्हलकर किसी से बात करनी हो तो शब्दों को थोड़ा बस में रखकर किया जाना चाहिए।

आप सभी साथियों ने कुछ ही दिन पहले भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा और विचलनकारी श्रमिक पलायन सड़कों पर देखा ही है। मानव इतिहास का यह बहुत गहरा मुद्दा है जिसको हम भारतीय पूंजीवादी स्टेट के आर्थिक किंसियन मॉडल को ध्वसत किए बिना कुछ भी  संभव नही है। और महान बदलाव, क्रांति बिना इसको ध्वस्त करना एकदम नामुमकिन है- भले उम्र भर कोई जिंदाबाद मुर्दाबाद करता रहे... कींस के ट्रिकल डाउन या कहें रिस रहे लाभांश  जो बहुत गहरी असमानता की कारक है, जिसकी वजह से ये पलायन कर रहे मजदूर (हकीकतन सीमांत या छोटे किसान जो इस मॉडल के चलते मजदूर बन गए) या कहें अमीर ज्यादा अमीर और गरीब ज्यादा गरीब। इलाज इस व्यवस्था का होना चाहिए क्योंकि स्थाई समाधान के बिना संभव नही है मानव मुक्ति।...

विदर्भ की इस भक लेणी धरती के खेतों पर  मौत का साया है जो  कई दशकों से जारी है। एक के बाद एक आने वाली हर सरकार ने -चाहे केंद्र की हो या राज्यों की-कृषि क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के बड़े वायदे किए, पर किसान आत्महत्या के आंकड़ों में बदलाव उस क्षेत्र की मुश्किलों और उद्देश्यों के अंतर्गत की गई उपेक्षा को दर्शाता है।

मेंहनतकश तबके बाबत मुझे सरकारी और गैर सरकारी (एनजीओ)  रिपोर्ट कभी भी विश्वसनीय नही लगती  कारण फील्ड का अनुभव है। सीमांत छोटे किसानों (अर्ध सर्वहारा, दिहाड़ी भी करते हैं।)  और कृषि मजदूरों की आत्महत्या के आंकड़े यहां भयावह है। इनकी रिपोर्ट की माने तो भी किसानों की आत्महत्या में लगभग 42 प्रतिशत की भयानक बढ़ोतरी हुई है तो कुल मज़दूर अपघात समेत 38 % का आंकड़ा जाता है, जबकि मेहनतकश सीमांत किसान (कम जमीन वाला) जिसे घर चलाने के लिए खेती के साथ-साथ दिहाड़ी जैसे दूसरे छोटे- मोटे काम करने पड़ते हैं, होते हैं, या खेत मज़दूर (चौथिया, पांचिया जो फसल के चौथे या पांचवे हिस्से के लिए कुलुक के यहां मज़दूरी करते हैं, खेत के साथ साथ उनके डांगर पशुओं के लिए हरा चारा भी लाते और कुत्तर करते हैं, पशुओं को दुहते भी हैं) अकाल, अतिवृष्टि या सत्ता की नीतियों की मार सबसे ज्यादा इन्हें ही झेलनी पड़ती है। कुलुक इन सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी होने के साथ ही साथ बर्बर और तानाशाही व्यवहार के ही होते हैं। विदर्भ में श्रम विभाजन उपरांत वर्गीय कठोर और खुरदरा स्वभाव है जो खतरनाक है।

 एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड' में प्रकाशित एनसीआरबी की इस रिपोर्ट के अनुसार 2014 में जहां आत्महत्या करने वाले छोटे किसानों की संख्या 5,650 और कृषि मजदूरों की संख्या 6,710 थी, वहीं 2015 में 8,007 किसानों ने जबकि चार 4 हजार 595 कृषि मजदूरों ने मौत को गले लगा लिया. किसान आत्महत्या के मामले में एक साल में 42 प्रतिशत की चिंताजनक वृद्धि हुई है। श्रमिक तो भांग के भाव जा रहे हैं। कारण बरसात की अनियमितता और कठोर भूमि, वातावरण आदि अनेक कारण है जो कर्ज, सम्मान और कृषि संबंधित मामले जैसे सूखा, फसल की उपज में कमी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार कारक के रूप में सामने आया है।...  

अन्नदाता किसान..... यह शब्द बहुत भ्रामक है। तीन बीघा या पांच बीघा वाला भी खुद को किसान कहता है और दो सौ बीघा जमीन वाला कुलुक भी खुद को किसान कहता है...  जबकि हकीकत यह है कि असल मेहनतकश सीमांत किसान (कम जमीन वाला) जिसे घर चलाने के लिए खेती के साथ-साथ दिहाड़ी जैसे दूसरे छोटे- मोटे काम करने पड़ते हैं, होते हैं, या खेत मज़दूर (चौथिया, पांचिया जो फसल के चौथे या पांचवे हिस्से के लिए कुलुक के यहां मज़दूरी करते हैं, खेत के साथ साथ उनके डांगर पशुओं के लिए हरा चारा भी लाते और कुत्तर करते हैं, पशुओं को दुहते भी हैं) अकाल, अतिवृष्टि या सत्ता की नीतियों की मार सबसे ज्यादा इन्हें ही झेलनी पड़ती है। कुलुकों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे सिर्फ 'किसान' शब्द के नाम पर नेतृत्व करते हैं। जनान्दोलनों में इनकी भूमिका नगण्य होती है और ये सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी होने के साथ ही साथ बर्बर और तानाशाही व्यवहार के ही होते हैं, जहां कई जगहों पर खेत मज़दूर की घरेलू अस्मिता तक को नष्ट कर दिया जाता है।

भाई संदीप को यह लगा कि मैं उन सभी को इसमे शामिल किए हुए सबको एक ताकड़ी तोल रहा हूँ। नहीं, ये तो वही बात हुई कि पूंजीवाद का विरोध करते हुए पूंजीपति को पकड़ लेना...या....  ब्राह्मणवाद को कोसते हुए ब्राह्मण जाति विशेष पर आ अटकना। आप महान है कोई बात नही, स्वीकार्य है मगर ध्यान से, सम्हलकर किसी से बात करनी हो तो शब्दों को थोड़ा बस में रखकर किया जाना चाहिए।

आप सभी साथियों ने कुछ ही दिन पहले भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा और विचलनकारी श्रमिक पलायन सड़कों पर देखा ही है। मानव इतिहास का यह बहुत गहरा मुद्दा है जिसको हम भारतीय पूंजीवादी स्टेट के आर्थिक किंसियन मॉडल को ध्वसत किए बिना कुछ भी  संभव नही है। और महान बदलाव, क्रांति बिना इसको ध्वस्त करना एकदम नामुमकिन है- भले उम्र भर कोई जिंदाबाद मुर्दाबाद करता रहे... कींस के ट्रिकल डाउन या कहें रिस रहे लाभांश  जो बहुत गहरी असमानता की कारक है, जिसकी वजह से ये पलायन कर रहे मजदूर (हकीकतन सीमांत या छोटे किसान जो इस मॉडल के चलते मजदूर बन गए) या कहें अमीर ज्यादा अमीर और गरीब ज्यादा गरीब। इलाज इस व्यवस्था का होना चाहिए क्योंकि स्थाई समाधान के बिना संभव नही है मानव मुक्ति।

                                         सतीश छिम्पा

 

 



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