लोक का पर्याय
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● सतीश छिम्पा
( डॉ. रेवंतदान जी के संपादन में डॉ. आईदान जी पर "दाझे मरूथल के हरियल सपने" नामक पुस्तक जो अभी जल्द ही छपने वाली है में संकलित)
थार में एक ऐसा अद्भुत कवि जिसकी कविताओं में बसता है जीवन का जीव दृव्य...
कवि कभी भी करते नहीं
और कविता नहीं होती खत्म कभी
यह उसकी आँखों मे पढ़ा मैंने।
जीवन
खड़ा है उसके बिल्कुल पास
राह ताकते हुए उसके शब्दों की
( नामदेव ढसाल, मराठी दलित विमर्श का बड़ा और क्रांतिकारी नाम है। महाराष्ट्र में दलित पैंथर आंदोलन के प्रणेता भी थे.)
-" राजस्थानी के पुरोधा कवि डॉ आईदान सिंह भाटी की अद्भुत और जीवंत कविता- 'खेजड़ी'..जिसको देव-वृक्ष कह कर सम्बोधित किया गया है। लेकिन कवि उस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने की बजाए सीधे इसके जीवनधर्मी जुड़ाव की बात करता है। जहाँ वह जलती लू-लपटों के बीच थार के पशु-पक्षियों और मनुष्यों का जीवनाधार बनी हुई है। अपनी पत्तियों, अपने फलों और ईंधन से उसने मरुप्रदेश के बाशिंदों को कभी निराश नहीं किया। राजस्थान के अकाल भरे जीवन हालातों के बीच इस वृक्ष का होना एक वरदान की तरह है।इस वृक्ष के मार्फ़त कवि राजस्थान के कठिन भौगोलिक परिवेश,यहाँ के मनुष्य के दुर्द्धर संघर्ष,उसकी जिजीविषा,उसके जीवट,उसके शौर्य और बलिदानों का साक्षी होते हुए इसे एक ज़िंदा काव्य-दस्तावेज़ में परिणत कर देता है।"
(वरिष्ठ कवि सवाई सिंह शेखावत)
आईदान जी मेरा प्रिय कवि है। इं बख्त राजस्थानी रा सिरमौर है। छंद मुक्त होंता थकां ई लयात्मक..'
मनोज स्वामी (राजस्थानी के चर्चित कथाकार संपादक और अनुवादक)
डॉ आईदानसिंह भाटी की कविताओं में हमारी परंपराओं और ग्राम्य जीवन के हदयग्राही दृष्य देखने को मिलते है। आईदानसिंह जी की छंदब़़द्ध की तरह ही मुक्त छंद कवितायें भी कहीं से भी अपना आंतरिक राग और लय का साथ नहीं छोड़ती। अपनी गेयता के कारण ही आपकी कवितायें लोकग्राही है। इन कविताओं को 21 वीं सदी का चेहरा कहा जाता है। जादुई लय, अर्जित भाशा, और लोक दृश्टि से परिपूर्ण आपकी कवितायें उत्कृश्ट मानी जाती है। राजस्थानी कवितायें मरुभूम के आधुनिक लोकजीवन के गीत भी कही जाती है।
(किरण राजपुरोहित)
-"आईदानसिंह भाटी के यहां कविताओं के विषय आयातित नहीं है। वे अपनी कविता गांव से उठाते है, गांव की विषमता, गुवाड़ की, थळियों की, लोक में लौकिक व्यवहार की,- उनकी मरू के स्तंभ वृक्ष खेजड़ी पर लिखी कविता में ये दिखाई पड़ता है"--
( राजेन्द्र देथा)
कविता को लेकर दिए गए बहुत बड़े- बड़े, डरावने वायदे और थोथे शब्दों से कविता बीमार हो जाती है। कविता को बहुत सहजता और सरलता से लेना चाहिए, जैसे धूमिल लेते हैं कि, 'कविता भाषा मे आदमी होने की तमीज है।' इसको हम राजस्थान की समकालीन कविता में आए आक्रोश, विद्रोही तेवर और बहुत महीन मगर ठोस प्रतिक्रियावादी स्वरूप के इसके मौलिक स्वरूप में लेकर राजनीतिक रूप से परिभाषित करें तो 'कविता, शब्दों, भावों, मूल्यों और राजनीतिक प्रतिबद्धता के बिना, बिना बारूद, खाली कारतूस से ज्यादा कुछ नहीं है।
अब जब फ़ासिस्ट राजसत्ता ने पूंजीवादी अपसांस्कृतिक, प्रदूषित मूल्यहीन समाज,और सामाजिक अराजकता, तनाव, असहिष्णुता, भय, लूट, बलवा, अविश्वास मोबलीचिंग- के बल पर खुद को किसी तिलिस्मी वशीकरण की तरह से सुरक्षित कर लिया है और मनुष्य से नागरिक होने का मूलाधिकार छीनकर एक तरह का अघोषित आपातकाल कायम कर दिया गया है तो- इस तरह के काले अंधकारमय और लहू लुहान समय मे रेवंतदान चारण, मनुज देपावत, आदि की परंपरा को ही आगे बढाने वाले डॉ. आईदान सिंह भाटी इस काले, जहरीले और अराजक समय मे मनुष्य को मनुष्य रूप में फिर से स्थापित करने और जनवादी मूल्यों पर कायम एक दशक या उससे पहले का सामाजिक ताना बाना लोक की चेतना से विस्मृत होने से बचाए हुए हैं। लोकधर्मिता और जीवन और विचारों के प्रति डॉ आईदान सिंह भाटी की जो प्रतिबद्धता है- वो राजस्थान की समकालीन राजस्थानी और हिंदी कविता में उन्हें इस हेतु विशिष्ट बनाती है कि वे अपने साथी जमात या समकालीन आत्ममुग्ध कवियों को भी निःसंकोच-- अड़ेके में लेकर फेंटै चाढ़ देते हैं। यह जनपक्षीय सरोकार और जीवन के प्रति प्रतिबद्धता ही उन्हें हकीकतन 'जनवादी मूल्यों का कवि' रूप में स्थापित करते हैं। राजस्थान के ज्यादातर आलोचक या तो इस बात को नजरअंदाज करते हैं या उन्हें पता नहीं या फिर ऊंचे कद के कवियों से उन्हें भी किसी तरह के लाभ का इंतजार रहता होगा-- लेकिन यह कड़वा मगर सच है कि राजस्थान की राजस्थानी कविता को (सत्तर और उसके बाद के दशकों में, तेजसिंह जोधा, पारस अरोड़ा आदि प्रतिबद्ध और मुक्तिकामी प्रतिरोधी कवियों को रजस्थानी- एक के बाद हाशिए पर ही धकेल दिया गया था) उसके सबसे मुखर, मौलिक और कलासिकल रूप से साजिश के तहत विमुख किया गया था। और यहाँ की हिंदी कविता के सबसे महत्वपूर्ण और अद्भुत कवि नामो, संभावनाओ (जिनमे जन कवि हरीश भादानी भी शामिल है... क्योंकि भादानी जी के लिए जो- जो या जितनी भी संभावनाएं थी, उन्हें हड़प लिया गया था।)- से ज्यादातर को अतिआत्ममुग्ध लोगों ने हड़प करके बहुत से नुकसान किए हैं।
अस्सी के दशक के बाद की विद्रोही पीढ़ी जो आज इस समय तक मे सक्रिय है, के ज्यादातर लोग और काव्यलोचको को इस 'बौद्धिक बेईमानी का ज्ञान हुआ तो वे अपनी जनपक्षधर कविता के लिए अकादमिक आलोचकों पर ज्यादा भरोसा नहीं किया। हालांकि यह भी एक कड़वा सच है कि राजस्थान में हिंदी और राजस्थानी कविता में बड़ा भारी अकाल है। यहां जो इक्का दुक्का काव्यलोचक है तो भी वे इतने प्रतिबद्ध नहीं है कि अपनी वैज्ञानिक तर्कणा से काव्य गुणों, लौकिक अश्लील शाब्दिक परम्परा को त्यागकर प्रतिरोध या जीवन की कविता को सहेजे, परोटे। यहां के आलोचक दिवालिया मानसिकता के हैं- कोरा साहित्यिक अध्ययन और उसी अनुरूप मनन चिंतन के बाद जो लिखते हैं, उसमे प्रतिबद्धता के अभाव में कोर शाब्दिक तिलिस्म भर होता है। मैं आज तक इस बात को समझ नहीं पाया कि ये 'दर्शनक वैज्ञानिक भौतिकी और तार्किक अन्वेषण को किसी विद्यार्थियों की तरह पाठ्यक्रमानुसार पढ़ते क्यों नही, :- अगर पढ़ते भी हैं तो उसको उपयोग में लाकर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के वैज्ञानिक सिद्धांत को केंद्र में रखकर तार्किक दीठ क्यों नहीं स्थापित करते हैं।
इन अकादमिक आलोचक- समालोचक कविता और कविता के प्रतिमानों को समझे बगैर ये मुंह उठाकर किसी पर भी लिख देते हैं। कलावाद का गढ़ कहा जाने वाला बीकानेर इसी कोढ़ के कारण उन्नत स्तर और जन के समक्ष जन की तरह पेश होने वाली कविताएँ हरीश भादानी के बाद सरल विशारद के पास आकर थम जाती है-- क्या इसका कारण इन कवियों की दीठ है ??, नहीं, क्योंकि कवियों ने अपनी जनवादी (मध्यमार्गी प्रगतिशीलता) कविताओं को हर स्तर से स्थापित करके आगे बढ़ाया है तो खलिस मार्क्सवादी कविताएं प्राकृतिक रूप से जन जन के मन मे उतर जाती है-- इस काव्यत ठहराव का बस एक ही कारण है,- विचारहीन मध्यमार्गी आलोचक। इन्होंने जो नुकसान गलत तरह के मूल्यांकन कर कर के कविता के नाम पर इतने लफ़्फ़ाज़ों को स्थापित कर दिया है कि आज के पाठक के सामने राजू बिजारणियां जैसे औसत कवि और विनोद स्वामी जैसे लोकधर्मी, द्वंद्वात्म कविताओं को राजस्थानी में स्थापित करने वाले अद्भुत कवि के बीच उन्हें कोउ फर्क ही नजर नहीं आएगा-- कितनी बड़ी साजिश है वे कि एक भाषा की पूरी काव्यगत दुनिया को तुच्छ लालच के चलते प्रदूषित करके बीमार बनाया जा रहा है।
राजस्थानी में यही एक कमी है कि यहां साहित्य को राजनीति से अलग करने की बचकाना कोशिश में यहां के भोमिए इसकी जड़ें काट रहे हैं । आलोचकों का बौद्धिक दिवालियापन इतना ज्यादा है कि ये लोग नंद किशोर आचार्य, गिरधर राठी, अनिरुद्ध उमट जैसे कलावादी मध्यमार्गी सॉफ्ट फासिज़्म और पारस अरोड़ा, आईदान सिंह भाटी, ऋतुराज, रामस्वरूप किसान और सरल विशारद जैसे जनवादी जनचेतना के सशक्त कविता परम्परा में कोई भेद ही नहीं कर पाते हैं। और यह दिमागी प्रदूषण इनका यहां तक ही नहीं है बल्कि बहुत आगे तक विस्तारित है। इन अकादमिक टाइप मध्यमार्गी आलोचकों ने जो- जो स्थापनाएं की है... वो सबके सामने है-- क्योंकि इन लोगों के चुनाव को देखकर इनकी बुद्धिलब्धि का आंदाजा हो जाता है कि बिल्कुल औसत सी.पी. देवल, अर्जुन देव चारण, चेतन स्वामी, मधु आचार्य आशावादी और भी बहुत से नाम है जिनमे कीणी भी नहीं है मगर आज उनको इन्होंने भोमिए थरप रखा है। पतन है यह। देश के स्तर पर यहां से भेजे जाने वाले रँगरूट वहां जाकर किसी भी गंभीर और तार्किक मुद्दे पर बात तक नहीं कर सकते हैं।
{-- विशेष सूचना :- यहां जो मैंने तुलनात्मक तरीके से नाम दिए हैं, उन्हें यूँ ही नही शामिल किया है बल्कि इस लेख के पांचवे हिस्से में डॉ. आईदान सिंह भाटी, रामस्वरूप किसान, अम्बिका दत्त, मंगत बादल, मोहन आलोक, चन्द्र प्रकाश देवल और अर्जुन देव चारण का बाकायदा विस्तार रूप में मूल्यांकन किया गया है, जो आगे आएगा)
डॉ. भाटी की ना केवल कविता बल्कि व्यक्तित्व भी निडर- निःसंकोच और विद्रोही है। कविता के मुलायम शब्दों के बीच- विद्रोह का ऐसा दावानल है कि हर तरह के अपसंस्कृतिक अवमूल्यों और अनैतिकताओं से मुखरित होकर शाब्दिक ऊर्जा के बल पर दमन तक कर देते हैं। डॉ. भाटी का हाल ही में छपा, 'जलते रेगिस्तान में दाजे पांव संग्रह की बानगी.....
‘हे कवि! तुम अभी भी खड़े हो
टुकुर-टुकुर ताकते हुए।
उन्होंने तो लौटा दिया है अपना सम्मान!
और तुम नचिकेता की मुद्रा में
पूछ रहे हो सवाल ?
वाजश्रावाओं ने कर लिया है आरक्षण स्वर्ग में पुरस्कार रूपी बूढ़ी गायों का दान करके।’
यहां नकार होते हुए भी जिस शालीनता के साथ उसको व्यक्त किया गया है--- ये ही कविता के द्वंद्वात्मक प्रतिरोधी गुण है- जो जनपक्षधरो कि एक स्वस्थ और महान परम्परा को आगे तक लेकर जाती है।
इस बात को स्वीकारने में कोई हानि या अतिशयोक्ति नहीं है कि राजस्थान की हिंदी और राजस्थानीं कविता- यहां के परिवेशगत सामाजिक और वर्गीय सांस्कृतिक स्तर पर बहुत ज्यादा गहरे तक जड़ें जमाए बैठे फासीवादी अमानवीय अवगुण के बावजूद भी यहाँ जनपक्षधर रचनाकारो की एक भरी पूरी पीढ़ी विकसित हुई थी। हरीश भादानी, जयसिंह नीरज, भगीरथ भार्गव, जुगमन्दिर तायल, तेजसिंह जोधा, पारस अरोड़ा, आईदान सिंह भाटी, गोवर्धन शेखावत, रामस्वरूप किसान, जनकराज पारीक जैसे बेहतरीन और कविता के सांस्कृतिक जनवाद के सौंदर्य शास्त्र को (जिसका विश्व विकास लखको द्वारा ही क्या गया था।) पुख्ता करते हुए उसको आगामी पीढ़ी तक बिना संशोधन के लेकर आए है। तभी तो डॉ. आईदान सिंह भाटी अपने कवि साथी और जनता का जनता के लिए कवि 'हरीश भादानी' को इस तरह याद करते हैं :-
"विकल रेत गा रही थी हरीश भादाणी के गीत।
नारायण का मन भी तब
बुन रहा था ख्वाब
‘रेत में नहाने का।’’
इस समय जब मुसोलिनी, बटिस्टा आदि के पदचिन्हों पर चलकर राजसत्ता में आया सदी का सबसे क्रूर और बर्बर सत्ताधीश के कमजोर और गलत फैसलों के कारण देश जहां यातनागृह की अमानवीय कष्टदायका मगर फिर भी हास्यास्पद जोकरों, मानव की शक्ल में नर पिशाच बर्बरों और मानवद्रोही साम्प्रदायिक राष्ट्रवादियों का भूतहा मकान भर रह गया है। दंगाई भीड़ का, कातिलों का राजनीतिक अड्डा बनता गया है। ऐसे क्रूर फ़ासिस्ट आतंक के समय मे डॉ. आईदान सिंह भाटी जैसे कवियों की कविताओं और कविताओं का लोकधर्मी पक्ष आश्वस्त करता है कि, 'ठहरो, हडबड़ाओ मत, सांस लो, डरो मत.... हम लड़ेंगे इस अन्याय से, जीतेंगे न्याय युद्ध का हर मोर्चे।' डॉ. भाटी जनपक्षीय जनवादी (प्रजातांत्रिक) मूल्यों के कवि हैं। इस काव्यांश में प्रतिरोध की जो भाषा काम मे ली गई है वो अस्सी के दशक में 'खासकर राजस्थान की हिंदी कविता' के विस्तार से प्रभावित कविता पीढ़ी की 'जनवादी कविता' के फैलाव के बाद लुप्त या कहें सुप्त हो गई थी- स्टेटमेंट टाइप विद्रोही कविता का दौर आया- मगर बहुत कम लेकिन ठोस प्रतिरोध को कायम रखने वाला यह लहजा, जीवन के गरिमामय अतीत को परोट कर मनुष्य को मनुष्य बने रहने का कठोर हुक्म देते हुए किसी 'विस्फोट' की तरह उभरती है।
.आ धरती, धूसर माटी ।
रंग अलेखूं
परबत घाटी ।
धवळ-वेस मरजादा आळी,
जिण भुगती ही रातां काळी ।
उण माटी में,
उण आंगण में,
बुद्धां री करूणा लैराई,
महावीर अहिंसा अरथाई,
मोरपांख गीताजी गाई ।
उण माटी में
उण धरती में
व्याप गई ही अलख उदासी
बीखरगी ही पांख प्रेम री ।
अन्धकार हो सत्यानासी ।
मरजादा पग व्हिया पांगळा ।
मिनखपणै नै सुरसा गिटगी ।
डाकीचाळौ देस व्यापग्यौ ।
अन्धकार अंतस ऊतरग्यौ ।
‘
डॉ. भाटी थार और थार के कठोर जीवन, हर तबके में व्याप्त सड़ा बसबुदार, बीमार, नपुंसक और घ्रणित सामंतवाद और सामंतशाही के परम्परागत अवगुण 'जातीय दंभ' को खारिज करके लोक का, लोक को लेकर, लोक के लिए, लौकिक मुहावरा सिरजते हैं- जिसमे जीवन की स्थापना के अलावा किसी भी प्रकार के दूजे अवमूल्यो का सर्वथा नकार है। दरअसल डॉ. भाटी थार और थार के कठोर, जटिल और उलझे हुए परिवेश के भीतर बहुत गहरे तक डूबे हुए हैं- और यही उनकी लोकपक्षधर्ता और जनवादी मूल्यों को स्थापित करने के मुश्किल काम का सहज मार्ग हैं। भाटी का मानना है कि 'वर्तमान' की भयावह स्थितियां, विसंगतियां और अराजकता के इस काले दौर को तब तक समाप्त नहीं किया जा सकता, जब तक अतीत के हमारे गलत फैसलों को आतमलोचना से निर्मम तरीके से खारिज करके भूल सुधारे नहीं की जाती। वे मानते हैं कि कविता अपने जनवादी या जनचेतना के रूप में ही स्थापित होकर अराजक स्थितियों के विरुद्ध सांस्कृतिक और सामाजिक, राजनीतिक मोर्चा तैयार करे। डॉ. भाटी की कविता 'क्रांति' क्रांति की ध्वन्यात्मकता को गलत समझने या जान बूझकर गलत स्थापना करने वालों और आम जन की वैचारिक दीठ को मूल्यांकित करने के प्रयास में, उसके स्वभाव की बड़ी कमजोरी को व्यक्त कर दिया है।
वह आएगी
पर आएगी किसी की पीठ पर चढ़कर
क्यों कि वह है लंगड़ी
सब इन्तज़ार कर रहे हैं उसका ;
आकाश से नहीं
दिलों में उठ रहे हैं बवंडर
उथल-पुथल मची हुई है
लोग उठाने लगे हैं
राज्य, धर्म पर अँगुली ।
डॉ. भाटी की कविता दीठ और लोक का काव्यगत अनुभव और लोकपक्षधर्ता के कारण इनकी कविता जीवन के प्रति प्रतिबद्ध है और इस मूल्य को जिसको कलावादी माफिया गिरोह के स्कूल के आवमूल्यों और अन्य मृत कविताओं वाले कवियों कि, 'कविता ही जीवन हैं, अलंकार सांसे है।' टाइप की मध्यकालीन कलावादियों की प्रदूषित मान्यताओं को खारिज करके कलाओं की जगह जीवन को स्थापित करते हैं।
डॉ. भाटी की कविता की आत्मा जनवादी व्यंग्यात्मकता को ठोस तरीके से स्थापित करते हैं और लोक रंजकीय भाषा भावनात्मक और वैचारिक संवेगों और दर्शन के मेल को अलग करके उसे अतिभावुकता का शिकार होने से बचा लेती है। यहां निदानात्मक प्रक्रिया की बजाए द्वंद्वात्मक दर्शन आधारित गीतात्मक लय के साथ कविता स्थापित होते हैं। डॉ. भाटी भाषा के साथ खेलते नहीं है-- ना ही कलावादियों की तरह उसको दुरूह बनाने के लिए किसी 'अज्ञात कारण' की पूंछ पकड़ते हैं। उनकी भाषा (डॉ. भाटी की ये भाषा अद्भुत और उच्चतम स्तर पर भावों से संवाद स्थापित करती हूं।) जिस स्तर और ऊंचाई पर स्थापित होती है वो चन्द्रसिंह बिरकाली या निराला के मुहावरे के बगल में स्थापित होती है। कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि डॉ. भाटी ने जिस मुहावरे को ईजाद किया है, वो समकालीन कविता में कहीं दिखाई ही नहीं देता (इसी तरह के लौकिक मुहावरे का ईजाद रामस्वरूप किसान की कविता में स्थाई रूप उतरा हुआ है।) और वर्गीय, सामाजिक चेतना को वैचारिक स्तर पर द्वंद्वात्मक प्रयोगों के साथ स्थापित करके, कविता की लौकिक धारा और उस क्रांतिकारी या रेडिकल (पंजाबी के कवि शहीद पाश और संतराम उदासी को कविताओं में जो दुस्साहसिक रूप में आते हैं, उससे अलग, अहिंसात्मक विचार के साथ प्रतिबद्ध) धारा में जो विध्वंसात्मक ना होकर सृजनात्मक है-- के बीच सामंजस्य का समर्थन करती है। यहां पर थार की कठोर जीवनशैली, प्राकृतिक व्याधियां और अस्तिव से जूझते हाशिए के लोग और उनकी धारणाओं को समावेशित करके जिस 'जन' के 'भीतर' कलावादी बीमार परम्पराओं की कमजोर जन कड़ी और प्रदूषित कुपोषित मानवद्रोही आस्तिक्ता को जिस प्रकार जीवन में स्थापित कर डालने के असफल प्रयास करते रहे हैं- वहां डॉ. भाटी की कविता की आत्मा का जन और सोशल मूवमेंट्स की विजुएल्टी इन परम्परागत अनैतिक अवमूल्यो के संक्रमण से बच जाते हैं।
( एक चीज जो अभी, राजस्थान की समकालीन कविता में सबसे ज्यादा प्रभावित करती है वो है भाटी की कविता शैली, परम्परागत डिंगल और नई प्रयोगधर्मीता के मेल से अद्भुत बनाते हैं। )
दो राय नहीं है कि डॉ, भाटी राजस्थान के कवि वर्ग के हरावल दस्ते के बेहतरीन कवि हैं।
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