फिलिस्तीनी मुक्ति समर और कुछ कविताएं- (२)
(गाज़ा)
ओ गाज़ा के शरारती बच्चों
तुम वही हो न जिन्हों ने मेरी खिड़की के नीचे
अपने शोरगुल से मेरी नाक में दम कर रखा था
तुम वही हो न जो अपनी भीड़ और कोलाहल से
हर सुबह को सराबोर कर देते थे
तुम वही हो न जिन्होंने मेरी बालकनी के
गुलदान को तोड़ा था
और उसमें से एकमात्र फूल को चुराया था
वापस आओ और जितनी मर्जी चिल्ला लो
और सारे गुलदानों को तोड़ो
सारे फूलों को चुराओ
वापस आओ ... वापस तो आओ।
( खालेद जूमा, फलस्तीनी कवि)
फिलिस्तीन के मुद्दे पर फासीवादी राजसत्ता के नजरिए से सोचोगे तो फिलिस्तीन ही नही बल्कि दुनियाभर के महान, ईमानदार, सच्चे और पवित्र विचारो के लोग आपको गद्दार और जानवर ही लगेंगे, जैसा तुम्हारे भीतर का सच है। आमतौर पर इज़रायल की जीयनवादी बर्बराना हिंसा अौर हमस की हिंसा को एकसमान रूप से गलत सीिि केरर फिलिस्तीन के लोगों को अहिंसा का प्रवचन देते हैं। ऐसे लोग यदि इस मुद्दे का इतिहास जानने की जहमत उठाएँ तो उन्हें यह दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हो जाएगा हिंसा के लिए पूरी तरह से इज़रायल के जॉयनवादी जिम्मेदार हैं। इज़रायल नामक राष्ट्र का जन्म ही 1948 में फ़िलिस्तीन के लोगों को उनकी ही जमीन से बेदखल करके हुआ था। जबरन कब्जे से जन्मा यह राष्ट्र 1948 से लगातार फिलिस्तीनियों की ज़मीन को किस तरीके से हड़पे जा रहा है वह नीचे की तस्वीर में स्पष्ट है। आज समूची फिलिस्तीन की आबादी वेस्ट बैंक और गाज़ा के दो टुकड़ों में सिमटकर रह गई है। लेकिन इज़रायल इससे भी नहीं संतुष्ट है, वह इन इलाकों में भी गैर-कानूनी रूप से यहूदी बस्तियाँ बसाये जा रहा है । वेस्ट बैंक के भीतर ही फिलिस्तीनियों को अलग-थलग करने के लिए इज़रायल ने एक विशालकाय दीवार बनायी है जो गाज़ा और वेस्ट बैंक में लोगों को बिजली-पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की भी ज़बर्दस्त किल्लत होती जा रही है। आज फिलिस्तीन एक भीषण मानवीय आपदा से गुज़र रहा है। ऐसे में तटस्थता की अब कोई गुंजाइश नहीं बची है। लोकयुद्ध के बीच तटस्थता की बात मुमकिन ही नही होती है।
हत्या एक व्यक्ति की हो चाहे एक पूरे परिवार की, हत्या हत्या ही होती है। मनुष्य जीवन का सबसे भयानक और विभत्स, क्रूर, निर्मम और उदासीन शब्द है। एक व्यक्ति को मारा जाता है तो उसके साथ ही साथ उसके परिजनों, चाहने वालों , रिश्तेदारों, और संपूर्ण आस पड़ोस को मार जाता है। उनकी सोच, समझ, बात सब खत्म, एक मातम एक निर्मम मातम फैल जाता है। घर की हर एक चीज मातम से नहा जाती है। एक भयानक चुप्पी प्रतिशोध के रूप में स्थाई हो जाती है। मतलब कत्ल अपने पीछे निर्मम सन्नाटा, मुर्दा शांति छोड़ जाता है।
दंगों में मरे लोग, एक सामाजिक वर्ग के हिस्सा होते हैं। यह तस्वीर इस देश का सबसे बड़ा धब्बा है जो तुम्हारे मुंह से निकले 'मेरा भारत महान' में से महान शब्द को जमाकर उड़ा देता है। आतंक का अंत जरूरी है।
गाज़ा में अनेक मासूम बच्चों के हत्यारे भारत में तथाकथित विकास के सहभागी है। गाज़ा में जीवन के शत्रु भारत में मनुष्यता के शत्रुओं के मित्र है। गाज़ा में हैवानियत की सन्ताने भारत में जुल्मियों की हुकूमत से हाथ मिलाए हुए है। इज़राइल एक बर्बर हत्यारा है जो भारत की हिंदूवादी फ़ासीवादी सत्ता को हथियार बेचकर धन कमाता है और मासूमो को उजड़ता है। अब ये आप पर है कि आप इस क्रूर गठबंधन का विरोध करके गाज़ा के पक्ष में खड़े होंगे या अपने रूटीन के घिसे पिटे जीवन की अलसाई घटनाओं की तरह ही इस सदी की सबसे बड़ी महात्रासदी को लेंगे।
एदुआर्दो गालेआनो ने नसलकुशी के इस बर्बर इतिहास को 'Open Vance of Latin America' '( लातिन अमेरिका के रिसते ज़ख्म) बहुत गहराई में जा कर भंडाफोड़ किया है। जिसमे उन जहाजियों के बर्बर काम भी उजागर होते हैं जिन्हें हमारे सिलेबस की किताबों में महान बताकर, हमारे सामने इन पूंजीवादी केंचुओं को हीरो रूप स्थापित किया गया है... यथा -" गिरमिटियों की तरह काम करते हुए यहां के मूल निवासी औसतन सात साल तक जीवित रह पाता था। यूरोपीय लोगों द्वारा लाई गई बीमारियों से मूलनिवासी मक्खियों की तरह मरने लगे। विद्रोहियों के पूरे कबीलों को चेचक का टीका लगा दिया जाता था। उनके खेत उजाड़ दिए जाते थे। ताकि वे सोने-चांदी की खदानों में काम करें। यूरोपीय लोगों की सेनाएं घोड़ों पर सवार होकर पशुओं की तरह मूल निवासियों के शिकार पर निकलती थीं। मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। यूरोपीय सेना के वीर सिपाही मूल निवासियों को मारकर उनके अंडकोष काटकर अपने मुखिया के सामने पेश करते थे। हर अंडकोष पर उन्हें इनाम मिलता था। लातिन अमेरिका के खून की एक-एक बूंद चूस-चूस कर यूरोप को चढ़ाई गई। तब जाकर यूरोप के चेहरे पर ये चमक-दमक दिखाई पड़ती है।
यहां तक कि वे मूल निवासी अपने बच्चों को मार देते थे। वे खुद को मार देते थे। जब सोना-चांदी व अन्य धातुएं खतम हो गई तो यूरोपीय लोगों ने यहां पर गन्ने, रबर, कोको व कॉफी की खेती शुरू कर दी। खदानों व बड़े-बड़े बागानों में काम करने के लिए बड़े पैमाने पर मजदूरों की जरूरत थी। अफ्रीका से गुलाम पकड़ कर लाने का एक नया व्यापार शुरू हुआ। अफ्रीका से लातिन अमेरिका लाने के दौरान ही आधे से ज्यादा गुलाम जहाज की अमानवीय जिंदगी में मर जाते थे। जो बच जाते थे उन्हें गुलामों की मंडियों में बेच दिया जाता था।
पूरे विश्व के मेहनतकशों का दुःख दर्द और शोषण से उपजी पीड़ाएं एक सी होती है और पूंजीपतियों की हरामी चालें और लूट के लिए जीवन को खत्म कर देने के इरादे एक जैसे होते हैं। जहां कहीं भी प्रतिरोध होता है या तो सीआईए और या फिर उसके टुकड़ों पर पलने वाले कुत्ते उसे खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जा पहुचते है। सत्तर के दशक में छपी यह किताब लातिन अमरीका सहित तमाम विश्व और भारत में आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी की तब दी, हत्यारों ने रूप बदला है शोषण की नियत और ज़ुल्म का ढंग नही.बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और विनाश की शर्त पर विकास भारत के मेहनतकशों का लहू चूस रहा है।....
इस धरती के पूरे इतिहास की एक एक जड़ तक की थाह लेने के बाद इसमें अलग अलग समयों में, भूखंडों से लेकर जनता तक का खात्मा कर देने के मिथकीय और यथार्थ के तथ्य बेसुमार मिल जाएंगे मगर उसमे नसलकुशी का एक भी उदाहरण नही मिलता। इतिहास में समय के साथ ही साथ बहुत से मुल्क बने और ढहा दिए गए, विस्थापन से पलायन तक अनेक पीड़ादायक घटनाएं हमारे सामने आई और गई। नई पुरानी सरहदों की लक़ीरें खींची और मिटा दी गईं।
भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर सूडान, चाड, तंजानिया आदि अनेक उदाहरण हम दे सकते है। अभी डेढ़ दो दशक पहले तक यूरोप में यूगोस्लाविया नाम का एक देश हुआ करता था। अब वो नाटो की बर्बराना नसलकुशी के चलते ध्वस्त हो चुका है। उसकी सरहदें दूर की बात है, अस्तित्व तक नही बच पाया। यह युद्धों के इतिहास में ख़ूब चर्चित रहा है। अब तो कागज़ पर भी नाम नही है। यूगोस्लाविया के विखण्डन के बाद उससे कई देश अस्तित्व में आए इसमें :- क्रोएशिया, सर्बिया, मोंटेनेग्रो, मैसेडोनिया, बोस्निया-हर्ज़ेगोविना शामिल हैं।
सिर्फ यही नही, इससे भी पूराणा है इन दौत्यो के अत्याचारों का इतिहास। नसलकुशी और साम्राज्यवादियों के घिनोने और क्रूर कांडों और आमनवीय जुल्मों बाबत अगर विस्तार से जानना है तो आपको एदुआर्दो गालेआनो की किताब 'लातिन अमरीका के रिसते ज़ख्म..' जरूर पढ़ना चाहिए, जिस व्यक्ति, कोलम्बस आदि को हमारे सामने नायक की तरह पेश किया जाता रहा है, उन घिनोने जानवरो ने मौत का तांडव किया था गुलाम बना ली गई जमीनों के मूलनिवासीयो पर। कोलम्बस ने महासागरों को पार करके पहली बार लातिन अमरीका की धरती पर कदम रखा था। यह उस पूँजीवादी दमन और शोषण की शुरुआत थी, जिसने पूरे विश्व का परिदृश्य ही बदल दिया। लातिन अमरीका से उसके सारे प्राकृतिक संसाधन लूट लिये गये। इस काम के लिए अफ्रीका से गुलामों को जहाजों में भर–भरकर वहाँ लाया गया और उनसे जानवरों की तरह काम लिया गया। यह किताब पूँजीवाद के शुरुआती गौरवशाली इतिहास के पीछे छिपे काले सच को बेनकाब करती है। यह किताब उन लोगों की कहानी बयान करती है जिन्होंने इस चमक–दमक की कीमत चुकायी और जिसे अकादमी सरकारी इतिहास की किताबों में शुमार नहीं किया गया, क्योंकि यहां भुस्थलों के मालिकाना हक और लूट और विध्वंस, अन्याय, अनाचार, जुल्म और जबर की शुरुआत होती है समुद्र यात्री कोलंबस द्वारा खोजे क्षेत्र पर। वो इंडिया की खोज में निकला मगर भटककर लातिन अमरीका जा पहुंचा, जहां लोगों का रंग लाल था इसलिए उन्हें रेड इण्डियन कहने लगा। उसके बाद तो द्किह फ्रांसीसी, अंग्रेज, पुर्तगाली आदि अनेक लोगों ने यात्रा की। इटली के निवासी अमेरिगो वेपुस्सी ने अमरीका को खोजा। जो मानचित्रण के समय Amerigo होने के बाद इसका यही पक्का नामकरण हो गया। जो धीरे धीरे बदलकर अमेरिका कहा जाने लगा। सन 1507 में यह क्षेत्र अमेरिका कहा जाने लगा।
क्रिस्टोपफर कोलंबस जब 12 अक्टूबर 1492 को वर्तमान सन साल्वाडोर के सागर तट पर उतरा तब वहां के स्थानीय जनजाति के लोगों ने अतिथि के रूप में उनका खुले हृदय से एवं मैत्री भाव से स्वागत किया। उन आदिवासियों ने उस यात्री दल के सभी सदस्यों को अपने ढंग का उपहार देकर अतिथि के रूप में उनका सम्मान किया। कोलंबस ने स्पेन के राजा को लिखा है की वे लोग कितने शांतिपूर्ण और सद्भावी है जिसके आधार पर मैं निश्चयपूर्वक कहता हूं कि सारे विश्व में उनसे उत्तम अन्य कोई राष्ट्र नहीं हैं। वे अपने पड़ोसियों से आत्मीयता पूर्ण व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी अत्यंत मधुर एवं सौम्य मुस्कराहट के साथ होती है। यद्यपि वे नग्न रहते हैं फिर भी उनका व्यवहार अत्यंत शालीन तथा प्रशंसा योग्य है। ऐसे उद्गार व्यक्त करने के बाद भी उन स्पेनिशों ने उन पर भीषण अत्याचार, शोषण व जनसंहार का जघन्य व घृणित व्यवहार किया।
इन पूंजीवादियों ने 50-60 वर्षो में जोर जुल्म अत्याचार व अग्नेयास्त्रों तथा छल व बल से वहां अपना विशाल साम्राज्य खड़ा कर दिया। सन 1493 में कोलंबस को दूसरी बार 17 बड़े जहाजों में 1500 सैनिकों के साथ फिर भेजा गया। उस बार कोलंबस ने पोर्टेरीको सहित अन्य कई द्वीपों पर अपना अधिपत्य जमा लिया। उसने उनसे वहां के मूलनिवासी-जनजातियों को गुलाम बनाकर जमीन खोदकर सोना निकालने का काम क्रूरतापूर्वक करवाया।
और बहुत कम बदलाव के साथ यही कुछ हो रहा है फिलिस्तीन के साथ।
गाजा पट्टी एक छोटे सा फिलिस्तीनी क्षेत्र जो अब विश्वविख्यात हो चुका है। अरबी भाषी इलाका है। इस धरती पर इजरायल के जुल्मो और बर्बर दमन और नसलकुशी के विरुद्ध 'हमास' नामक स्वतन्त्रता संग्रामी संगठन प्रतिरोधक बैरिकेड्स बनाने के निरंतर प्रयास करता आ रहा है, मगर असफल। जिसको भारत समेत तमाम फासिस्ट्स ने इजरायल विरोधी आतंकवादी समूह के नाम से बदनाम कर रखा है।
1948 में बाद जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने बिना अनुमति के ही फिलिस्तीन में ही इजरायल को बसाया था, और यहां पड़े हैं बीज, जिसके बाद से फिलिस्तीन और इजरायल के बीच संर्घष जारी है जिसमें एक अहम मुद्दा जुइसवादी कट्टर बर्बर राज्य के रूप में आतंक फैला रहा इजराइल जबरन काबिज हुआ है। इजराइल की स्थापना के समय से ही इजरायल और दूसरे अरब देशों के बीच संघर्ष का कारण साबित हुआ है। जून 1967 में जब दूसरी जंग हुई तो 6 दिनों तक चली, जिसमें इजरायल ने फिर से गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया। इजरायल का यह कब्जा 25 सालों तक चला लेकिन दिसंबर 1987 में गाजा के फिलिस्तीनियों के बीच दंगों और हिंसक झड़प के कारण और इजरायली सैनिकों पर कब्जा करने से एक विद्रोह का रुप दे दिया और इन सबके पीछे हाथ इजरायल का ही था। वो गुलामी का सबसे बुरा दौर था ।
1993- 94 में इजरायल ने ज्यूस स्टेट और फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) द्वारा हस्ताक्षरित ओस्लो समझौते की शर्तों के तहत उनकी अथॉरिटी (पीए) को गाजा पट्टी में शांति नुमा कार्यक्रम का चरणबद्ध स्थानांतरण शुरू किया था।
सन 1998 से 99 और उसी कड़ी में साल 2000 की शुरूआत में, पीए और ज्यूस स्टेट के बीच वार्ता नकाम होने के कारण हिंसा अपने चरम रुप में पहुंच गया जिसे खत्म करने के रुप एवज में इजरायल के प्रधानमंत्री एरियल शेरोन ने अगले ही साल के अंत में एक योजना की घोषणा की थी जिसके तहत गाजा पट्टी से इजरायल सैनिकों को वापस हटने और स्थानीय निवासियों को बसाने पर केंद्रित है।
जून 2007 में हमास ने एक बार फिर गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया और फतह (फिलिस्तिन राजनीतिक समुह) की अगुवाई वाली आपातकालीन कैबिनेट ने पश्चिम बैंक का अधिपत्य स्वीकार करते हुए वहां की समस्त कार्यवाही को जबरिया नियंत्रित कर लिया था। फिलीस्तीनी अथॉरिटी अध्यक्ष महमूद अब्बास ने घोषणा की जिसमें कहा गया गया कि गाजा अब हमारी आजादी की शुरुआत की जगह है जो अब से हमास के नियंत्रण मे रहेगा।
और फिर से शुरू हुआ बर्बर ज्युईन के जुल्मो का अंतहीन दौर जिस में इजरायल ने गाजा पट्टी को खतरे या आपात क्षेत्र घोषित कर दिया और इसके साथ ही गाजा पर कई प्रतिबंधों को मंजूरी दी जिसमें बिजली कटौती, भारी प्रतिबंधित आयात और सीमा को बंद करना शामिल था। खाना, पानी, दवा सब के सब खत्म, लाशों के ढेर जो बाद में हुए कुछ मामूली हमले को बड़ा बनाकर, कुछ ही समय के बाद गाजा पर इन प्रतिबंध को और बढ़ा दिया गया और इसके अलावा पूरी तरह से गाजा पट्टी के साथ अपनी सीमा को मजबूत करते हुए आपात सुरक्षाओं के नाम पर फिर हमला कर दिया था। सन 2016 का हमला साबित कर गया कि इंसानियत खत्म हुई अब हावी हैवानियत है। दरिंदे कहीं भी हो सकते हैं। जरूरी नही सिर्फ भारत में होना। उनका रंग आकार प्रकार भिन्न होता है- मगर हरकते फितरतें और तासीर एक होती है। उन्हें धर्म के नाम पर बहता लहू देखकर रोमांच हो आता है। एक ख़ुमारी सी चढ़ जाती है- और फिर ये दरिंदे भड़काऊ भाषणों और अतार्किक और गलत तरीके से इतिहास को पेश करके अपनी कौम को बड़े बहादुराना और बलिदानी तरीके से रिप्रजेंट करते हैं।
ये मनुष्यता और जीवन से इतर धर्म, जाति, नस्ल, रंग, भाषा, लिंग और क्षेत्र तक ही सिमित रहते हैं।और इनके बहाने से, गहरे षड्यंत्र से हत्याएं करते हैं और हत्या अपने पीछे गहरी निराशा और सूनेपन के साथ प्रतिरोध की भावना दुःख,स्त्रांस और ग्लानि को छोड़ जाती है। फिर जीवन के अपमान का जश्न मनाया जाता है। क्योंकि जीवन और धर्म की लड़ाई के एक मोर्चे पर जीत धर्म की हो जाती है। सदियों से यही तो चला आ रहा है।
मगर कैसा धर्म? किसका धर्म? हिन्दू, सिख, ईसाई, इस्लाम...... ?????? नहीं, केवल इन धर्मो के बुर्ज़ुआ लोगों का, अमीर धनपतियों का जो अपने निजी स्वार्थों के लिए धर्म का हथियार के रूप में इस्तमाल करते हैं और नौजवानो के दिमाग में भुस भरकर उनकी चेतना से बराबरी, आर्थिक समानता, शोषण कुपोषण, बेरोज़गारी, ग़रीबी, अन्याय, ज़ुल्म आदि शब्द मिटा देते हैं, बाकी कुछ बचता है तो बस कि "तुम्हारा धर्म खतरे में है" और "तुम्हारे धर्म पर ज़ुल्म हुआ है"। किसी भी कौम के नौजवान सबसे पहले भटकते हैं।उन्हें धर्म की फिजूल की लड़ाई क्रान्ति का महान मार्ग लगती है और धार्मिक गुंडेनुमा आग्गु क्रांतिकारी की तरह जादुई व्यक्तित्व का धनी जबकि वो तो एक मरा हुआ विचार ढोने वाला कीड़ा होता है जिसे "हमारा धर्म महान, धर्म गुरु महान" के अलावा और कुछ आता ही नही है।और एक दिन वो भी कुत्ते की मौत मारा जाता है।
इनका पहला टारगेट होते हैं तर्क को स्थापित करने और ज़िंदा सवालों पर सोचने वाले मनुष्यो- कम्युनिस्ट... चाहे हिंदुत्ववादी हो, मुल्ला मुजाहिद्दीन हो, क्षेत्रवादी हो या कांग्रेस छाप आतंक... पहला निशाना कुलबर्गी, जावेद ख़ालिक़, अवतार सिंह पाश और सफ़दर हाशमी ही होते हैं। ये सबसे पहले उन्ही की हत्याएं करते हैं जो ज़िन्दगी के सम्मान की बात करते हैं। मेहनतकश आवाम की बात करते हैं। क्योंकि जब तक तर्क और विज्ञान को स्थापित करके जीवन को सम्मान देकर क्रान्ति की बात करने वाले ज़िंदा हैं, कोई जीवन का अपमान नही कर सकता।
गाज़ा में बच्चों के हत्यारे
भारत में तथाकथित विकास के सहभागी है
गाज़ा में जीवन के शत्रु
भारत में मनुष्यता के शत्रुओं के मित्र है
गाज़ा में हैवानियत की सन्ताने
भारत में जुल्मियों की हुकूमत से हाथ मिलाए हुए है
इज़राइल एक बर्बर हत्यारा है जो भारत की हिंदूवादी फ़ासीवादी सत्ता को हथियार बेचकर धन कमाता है और मासूमो को उजड़ता है
अब ये आप पर है कि आप इस क्रूर गठबंधन का विरोध करके गाज़ा के पक्ष में खड़े होंगे या अपने रूटीन के घिसे पिटे जीवन की अलसाई घटनाओं की तरह ही इस सदी की सबसे बड़ी महात्रासदी को लेंगे।
● सतीश छिम्पा
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