हमारे क्रांतिकारी पुरोधा- (भाग-२)
अमर शहीद कॉमरेड बाबा बूझासिंह
ਅਸਾਂ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਏ ਉਸ ਬੁੱਢੜੇ ਬਾਬੇ ਦਾ ....
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਫੜਕੇ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ ਸਾਡਾ ਮਾਣ ਦੁਆਬੇ ਦਾ.. (ਪਾਸ਼)
असां बदळा लेणा है, उस बुढड़े बाबे दा
जिना फड़के मार दित्ता, साहडा मान दुआबे दा
(शहीद पाश)
शाही किला। .....लाहौर का वो किला इसलिए प्रसिद्ध नही था कि वो पुराना था या इसलिए भी नही कि वो शाही था या लाहोर के इस शाही किले में लाहौर शब्द भी खास नही था। खास जो था वो था वर्तमान का रचाव, वर्तमान रच रहा था इतिहास, जी बिल्कुल इतिहास ही। क्योंकि इस किले में दो महीने बर्फ पर नंगा लेटा कर पुलिस बूझा सिंघ पर तशद्दुद जुल्म करती रही और उनसे उनके संघठन और कार्यवाही का भेद लेना चाहा। उस संगठन जो उनका आत्मसम्मान था, जो भारतिय आजादी के लिए जूझते युवाओ का आदर्श था, वो जिसका नाम ग़दर था। और उनका जुल्म और जब्बर इसी का भेद लेने की चाहत का था। पर पुलिस सफ़ल न हो सकी। अंत उन्होंने बूझा सिंघ को जंगी कैदी घोषित कर दिया। (बड़े भाई अजमेर सिद्धू जी द्वारा बाबा की जीवनी लिखी गई है, उसी में से संदर्भ है।)
इन जाबांजो ने कोमरेडाना जोश के साथ बहुत समय तक इस अंग्रेजी हुकूमत को (वख्त में) झाँसे में रखा। और जबर जुल्म और बढ़ गया, बढ़ता ही गया। और जब महान इंकलाबी अपने मंतव्य से पीछे न हटे तो राजस्थान के देवली कैम्प में दो साल के लिए बूझा सिंघ समेत अनेकों कीर्ति और कम्यूनिस्टों को जेल में डाल दिया गया।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस पार्टी का कौमी प्रधान बनाने का सहरा भी इन कीर्तियों के सर बंधता है। बाबा जी की ऊंची सख्शियत का इस बात से पता चलता है: जिन पांच कीर्तियों (अच्छर सिंघ छीना, राम किशन बी.ऐ. नेशनल, बूझा सिंघ, दसोंधा सिंघ, भगत राम तलवाड़) की ड्यूटी लगी थी कि वह नेता जी को रूस ले जाएंगे और देश को आज़ाद करवाने के लिये रूस के उस समय के राष्ट्रपति कॉमरेड स्टालिन से मदद के लिए नेता जी की मीटिंग करवाएंगे, उनमें बूझा सिंघ भी एक थे।
इतिहास हमेशा प्रभावित करता है वर्तमान को या कहें घटनाओं का क्रम गड़बड़ाता है अतीत। जाने कितना गड़बड़ाया है समय..... जाने कितने जनता के प्यारे क्रांतिवीर शहीद हुए, कौन जाने। किसने जाना कि धर्म के नाम पर जल्लाद बने हैवानों को पूजा जाने लगा है, इस देश मे इतनी खुली छूट क्यो मिल रही मानवद्रोहियों को कि आदमियत के कातिलों की तस्वीर रखना आम बात हुआ, लेकिन शहीद क्रांतिकारी की तस्वीर आपको देशद्रोही साबित करवा देती है। नब्बै वर्षीय अद्मय यौद्धा अमर शहीद बाबा बूझा सिंह की शहादत पर उस कम्युनिष्ट क्रांतिकारी के लहू से तब असंख्य मर- जीवड़े वीर लाल यौद्धाओं का उद्भव हुआ... लाल कीरति झंडे को उठाने वाले असंख्य क्रांतिवीर पैदा हुए, असंख्य लाल सैनिक... उन अदम्य योद्धा को सलाम....
बाबा बूझासिंह की शहादत पर पाश ने जो कविता लिखी, वो ये है.....
ਅਸਾਂ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਏ ਉਸ ਬੁੱਢੜੇ ਬਾਬੇ ਦਾ ....
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਫੜਕੇ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ ਸਾਡਾ ਮਾਣ ਦੁਆਬੇ ਦਾ....
(असां बदळा लेणा उस बुढड़े बाबे दा
जिना फड़के मार दित्ता, साहडा मान दुआबे दा)
शहीद बाबा बूझा सिंह जी जिनको उनके गांव के पास ही शहीद किया गया था। अठासी साल उम्र थी, जवान लोगो जैसा हौसला था। वे गांव से साइकिल पर जा रहे 28 जुलाई 1970 को पुलिस जीप ने टक्कर मारी और बाबा को उठा ले गए, जीप में डालते वक्त बुलंद आवाज में गांव के लोगो को कहा कि "मैं बूझा सिंह कॉमरेड..." ताकि साथियों को पता लग जाए। बाबा को शहीदी प्राप्त हुई..पुलिस ने जो झूठा एनकाउंटर दिख्या था उसमें बताया गया था कि-,"बूझासिंह अपने तीन अन्य साथियों अमर सिंह, दर्शन (दर्शन खटकड़, खटकड़ अब सी.पी.आई.एम. एल.- न्यू डेमोक्रेसी में है) और एक अन्य के साथ गुप्त ऑपरेशन के तहत आगे के गांव के कोंग्रेस के एक बड़े लीडर को मारने जा रहे थे उस समय सूचना के आधार पर इस एनकाउंटर को अंजाम दिया गया था। बोहड़ को काट दिया गया, मार दिया गया था.... मर जीवड़े कभी मरते नहीं है। वे यौद्धा जो धर्म कौम के लिए नही, मनुष्यता, वर्ग और न्याय के लिए कुर्बान होते हैं, अमर होते हैं।
वे एक गदरी यौद्धा थे। हर तरफ सम्मान और नाम था उनका उस समय। वे गदर लहर में शामिल हुए देश को आजाद करवाने के लिए, और फिर कम्युनिष्ट पार्टी में और उसके बाद तेजा सिंह द्वारा बनाई गई लाल कम्युनिष्ट पार्टी में रहे। क्लास और मार्क्सवादी क्रांतिकारी भूमिगत स्टडी सर्किल आदि के माध्यम से बहुत सक्रियता देखने को मिलती। अठासी - नब्बै साल का यह महान यौद्धा एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आग्गु थे जो अंतिम सांस तक सक्रिय रहै थे। रहे....पंजाब में उठे महान किसान कम्युनिष्ट उभार के आइकन क्रांतिकारी रहे और पंजाब में आंदोलन की जमीन तैयार की, राजसत्ता की साजिशों के चलते फर्जी मामला बना कर हत्या कर दी गयी... ( 'हमारे क्रांतिकारी पुरोधा- 'तेजा सिंह सुतंतर'- भाग -१ से सन्दर्भ रूप मे इस संक्षिप्त जानकारी को यहां सीधे रख रहा हूँ, ताकि समझने में दिक्कत ना हो।) बाबा बूझा सिंह गदर आंदोलन के बाद जिस आंदोलन में गर्मजोशी से शामिल हुए वो था पंजाब का मुजारा किसान आंदोलन जो तत्कालीन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के तेलंगाना सशस्त्र किसान आंदोलन का समकालीन उभार था, तेजासिंह सुतंत्र द्वारा स्थापित लाल कम्युनिष्ट पार्टी के भी सदस्य बने, मुजारा आंदोलन आम नही था क्षेत्र भले कम था लेकिन क्रांतिकारी स्प्रिट और प्रतिबद्धता और कतारें, इंकलाब को गाते हुए बढ़ी थी आगे.... आगे... और आगे .... और वे जो अद्मय यौद्धा थे... बहुत सी क्रांतिकारी मिसालें कायम की थी।
आज भी मालवा अंचल के मानसा के पास किशनगढ़ गांव में इस महान क्रांतिकारी आन्दोलन की यादों को जिंदा रखने वाले भावुक क्रांतिकारी और एक स्मारक है। तेलंगाना आन्दोलन के समय उसी तरह का आन्दोलन पंजाब की धरती पर मुजारों (सीमांत, खेतिहर मजदूर और गरीब व भूमिहीन किसान) की संगठित ताकत के बल पर चल रहा था। और यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक महान कम्युनिष्ट किसान क्रांतिकारी प्रचण्ड रूप आक्रोश में बढ़े। वे जो मुल्क को गुलाम रखने वाले ब्रिटिश एंपायर तो 1947ई के बाद लोकल पूंजीवादी साम्राज्यवादी जमात के विरुद्ध पाणा मांड कर खड़े हो गए थे। मुजारा शब्द का ध्वन्यार्थ मेहनतकशों का है। खास बात यह है कि यह आंदोलन जो पंजाब का मुजारा आन्दोलन कहलाता है तत्कालीन पटियाला राज के अन्दर अंग्रेजों से देश की आजादी और बड़े जागीरदारों के खिलाफ उन सीमांत, भूमि हीन किसानों, जो खेत मज़दूर बने अपने शोषण को लाचारी से देखते हुए पल पल भर रहे थे। सीमांत और गरीब मेहनतकशों की बेटियों, बीबियों तक का बलात्कार जैसे शगल बन गया हो- प्रतिरोधक आक्रोश के चलते वे गरीब व भूमिहीन किसानों का संगठित आन्दोलन था जो जमीनों पर काश्त करते थे और नारा था 'जमीन जोतने वाले कि'..... क्रांतिचेताओं के शहादत को हमेशा याद में और ताजा रखने के प्रयासों में उन गांवों की छतों पर अक्सर लाल थंभी के ऊपर कम्युनिष्ट कामगारों- मुजारों के प्रिय लाल झंडे को बनाया गया है.... जिस पर कम्युनिस्टों का निशान हंसिया हथौड़ा बना है। (हमारे पुरोधा भाग -१)
विश्व इतिहास का सबसे सुनहरा या कहें महाकाव्यात्मक उथल पुथल का समय था, साठ के दशक से सत्तर और अस्सी के दशक तक का दौर। भारत सहित विश्व के अनेक देश युवा प्रतिरोध से उफन रहा था। कांगो, घाना, नामीबिया, चाड, कांगो जायरे, वियतनाम, ईरान और इराक इथयोपिया, यूगोस्लाविया (वर्तमान में इसका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।), चेक और स्लोवाकिया, स्पेन, चिली, क्यूबा समेत लातिनी देश महान मुक्ति के सपनो के साथ तोपों और बन्दूको के आगे सीना ताने खड़े थे। शहादतों का दौर था। वियतनाम संघर्ष महान हो ची मिन्ह के नेतृत्व में महान विजय के करीब पहुंच चुका था। इंकलाबी महा जन उभार प्रचण्ड आक्रोश के साथ तब की मौजूदा महाशक्ति अमरीका के घुटने टिकवा चुका था। युवाओ का जोश देखते ही बनता था। और जबर जुल्म इतना कि सड़क पर खड़ा कोई बीस से तीस पैंतीस वर्ष का युवा भले निर्दोष हो, क्रांतिकारी होने के भय से कत्ल कर दिया जाता था। बंगाल और आंध्रा की धरती लाल हो चुकी थी तो कैसे पंजाब नही प्रभावित होता।
नक्सलवाड़ी के किसान उभार का तात्कालिक कारण 1967 में उठे स्थानीय, छोटे स्तर पर प्रतिरोधक आक्रोश स्वर का उस समय किसान बिगुल की हत्या था , जिससे खेतिहर मजदूर, भूमिहीन, सीमांत या कहें सभी सर्वहारा और अर्ध सर्वहारा उसमे शामिल हुए। ये वो ही चिंगारी थी जो तेलंगाना सशस्त्र किसान महाउभार (भूमिहीन खेत मजदूर) से उठी थी- जो दशक भर के बाद से ही बारूदी ढेर या कहें दबा छुपा महा दावानल के धधकने का तात्कालिक कारण ही बना था , -- नक्सलबाड़ी महान कम्युनिष्ट उभार किसी अद्वितीय अविश्वसनीय तरीके से हुआ जो महान मुक्ति का समर था, बदकिस्मती कि यह ढाई महीने ही चल पाया था और रौंदकर दबा दिया गया था, जिसने तमाम अमानवीय धारणाओं और बर्बरताओं को हिलाकर रख दिया था। किसान आंदोलन के दबते ही पार्टी लाइन बना रहे केंद्रीय सदस्यों के सामने फिर खुल गया इस महान संघर्ष का राह, छात्र उभार से, जो एक दावानल की तरह उठा और यही वह समय था जब बौद्धिक जमात की भी आंखे खुली। लहू की नदियां बहा दी गई थी पश्चिम बंगाल की सड़कों पर।
यह उसी महान जन उभार का ही अगला पायदान माना जा सकता है जो इससे पहले तत्कालीन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (भा.क. पा.) जो उस समय मार्क्सवाद लेनिनवाद के बुनियादी दर्शन और लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत में आस्था रखने वाली एक सही पॉलिटिकल लाइन वाली पार्टी थी, जो उस समय तक ख्रुश्चेव जैसे मानवद्रोही के संशोधनवाद के प्रभाव से बची हुई थी- के नेतृत्व में भारतीय इतिहास का पहला महान लोकयुद्ध तेलंगाना सशस्त्र किसान उभार उफान पर आया था जो विचलन से क्षद्म लक्ष्य रखकर पार्टी लाइन बनाने की उस समय कोशिश हुई हो ऐसा भी नहीं था- सन 1953 ई में यहां जो उथल पुथल या बदलाव का ढांचा तैयार हुआ वो सर्वहारा के महान शिक्षक स्टालिन की मौत के बाद सत्ता में आए संशोधनवादी निकिता ख्रुश्चेव क्रान्ति विरोधी या कहें साम्रज्यवाद पूंजीवादी ताकतों का भेदिया था जिसने क्रांति को खत्म कर दिया और पूंजीवादी ताकतों के राह का सबसे मजबूत और स्थाई और महान प्रतिरोध को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के प्रतिस्पर्धी (पूंजीवाद की पुनर्स्थापना कर दी) नीति के माध्यम से महान अक्टूबर क्रांति का अंत कर दिया गया था।
जो मार्क्सवादी भारतिय बुद्धिजीवी या संसदीय वाम के प्रवक्ता यह मानते हैं कि महान क्रांति का अंत नब्बै के दशक में हुए विखण्डन से हुआ, उन्हें एक बार फिर विश्व इतिहास का बहुत बारीकी और गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए- और इसको भी जानना चाहिए कि इस सत्ता के हिमायत में दौलन के शिकार दस्ते ने अनेक बार दुस्साहस भरी भीतरी चाल चली है-- यही सन 1953 ख्रुश्चेव के भारतीय उत्तराधिकारी बी.टी.रणदिवे और पी.सी. जोशी और बाद के टेम में संशोधनवादी मध्यम मार्गी धड़े के आदर्श नेता भी बनकर उभरे ने संसद की राह लेते हुए तेलंगाना में अनेक युवा क्रांतिकारियों का रक्त बहाए जाने को अनदेखा कर दिया या, इस अविश्वसनीय जनद्रोही धड़े के इस हत्यारे रुख का सामने आ जाना भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की सबसे बड़ी गद्दारी साबित हुई जिसका अगला अमानवीय पड़ाव पश्चिम बंगाल में कोंग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार ने जुल्म की इंतिहा कर दी और माकपा के बीच से आए इतिहास के सबसे बड़े और काले दुखांत और विचलन और कतारों के बीच विद्रोही स्वर की मुखरता और निरंतरता के जिम्मेदार लोग जो थे ने खून का वीभत्स खेल खेला था।
पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। मास्टर हरपाल से लेकर जसवंत कंवल और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। बलदेव सिंह मान, सतनाम, अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे। उनमें से कई तो कालजई कविताओं के रचयिता भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे सब जो उस समय या उसके बाद खालिस्तानी अतिवाद के शिकार हुए वे अद्भुत सर्जक निकले। सन्तराम उदासी, पाश, खटकड़ और लालसिंह दिल जैसे अनेक बेहतरीन क्रांतिकारी कवि थे।
कम्युनिष्ट लहर खत्म हो जाने के बाद पंजाब में फिर एक महान मुक्तिकामी लहर उठी, प्रीथीपाल सिंह रंधावा जैसे छात्र नेताओं के नेतृत्व में छात्र प्रतिरोध का उफान। यहां बर्बरता ने नंगा नाच नाचा। सत्ता और धार्मिक अतिवादी, लोकल बुर्जुआ किसी भी छात्र, प्रतिरोधी को बख्शना नही चाहते थे।
ये दहकते दिन लाल लहू से नहाकर तांडव कर रहे थे..... मजदूर और गरीब और जवान उठ खड़े हुए और इन्ही में से एक थे अमर शहीद बाबा बूझा सिंह।
भयानक गरीबी, आर्थिक असमानता, अन्याय और भूखमरी की कगार पर पहुंचने ही वाले
परिवार को सुख शांति से रोटी उपलब्ध करवा सकने की इच्छाओं को लेकर बाबा बूझा सिंह विदेश चले गए जाने किस तरह वे अर्जेंटाइना में पहुंचे। घर की तंगहाली को दूर करने के सपने देखता बाबा बूझा सिंह विदेश कमाई करने गए थे जो वहां जाकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण गदर आंदोलन के गदर संगठन में शामिल होकर घर की बजाए देश की तंगहाली दूर करने में जुट गए। ये ही वो समय था जब उनके सामने अध्ययन और अध्ययन की उच्च स्तरीय जरूरी सामग्री आने लगी। मार्क्स से लेनिन तक के नाम ना केवल सुने बल्कि उन्हें पढा और आत्मसात भी किया। बाबा गदरी जवानों के साथ चंद लोगो मे एक थे जो सोवियत संग गए, पढ़ने और विचार को जानने के लिए।
राज सत्ता के बर्बर दमन और अनदेखी के विरुद्ध उठे प्रचण्ड आक्रोश की लहरों के साथ इंकलाबी लाल परचम उठाए युवा क्रांतिकारियों को उस समय ताजा उठे नक्सलबाड़ी किसान उभार से आस बंधी और वे सभी युवा जो जीवित थे, क्रांति की महिमा से वाकिफ़ थे, इस लहर में शामिल हुए। यह अलग मुद्दा है कि कुछ तानाशाही और मूर्ख नेतृत्व के कारण एक महान उभार कुछ ही समय मे दमन का शिकार होकर खत्म हो गया।
यह लहर पश्चिम बंगाल के बाद आंध्रप्रदेश और फिर पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी थी। इसमें पंजाब सहित देश के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। इस क्रांतिकारी लहर ने जब तक दुःसाहस की लाइन नहीं पकड़ी तब तक यह एक खालिस मानव मुक्ति का युद्ध थी जिसमे अनेक कवि, लेखक, कलाकार, रंगकर्मी आदि खुलकर शरीक हुए और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति भी इसमें शामिल थे। हाकिम के अन्याय और अत्याचार से व्यथित होकर वे भी शामिल हुए थे। अनेक कवियो की कविता का जन्म भी इसी समर में हुआ। हरभजन सोही, अमर सिंह अचरवाल और दर्शन खटकड़ जैसे और बहुत से युवा इसमे शामिल थे
लाल सिंह दिल जो बेहतरीन क्रांतिकारी के साथ कवि भी थे जिनका घर किसी खंडहर की तरह हो गया था। इस महान क्रांतिकारी कवि को पंजाबी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में हाशिए पर डाल रखा है। इनके अब तक के संग्रह जो मैंने मूल पंजाबी में पढ़े हैं, वे निम्न है, 'सतलज की हवा', 'बहुत सारे सूरज', 'सत्थर', और आत्मकथा 'दास्तान' (दास्तान मैंने नहीं पढ़ी अभी), हालांकि वे चर्चित थे मगर उस तरह से नहीं जिस तरह से उन्हें होना चाहिए था। जबकी पाश की प्रसिद्धि उनकी शहादत के कारण भी हुई थी। यह बाद का मुद्दा है कि किसी ने सार सुध नहीं ली। महान लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत से दोलित होकर भटक जाना आदि या विचलन में उल्टी दिशा की तरफ मुड़ जाना भी एक मुख्य कारण था।
पाश और जयमल पढा, संतराम उदासी और दिल भारतीय समाज के थल्लड़े वर्ग के शोषण के विरुद्ध राजसत्ता के प्रतिरोधी तूफान की तरह खड़े हुए तो बाद में उनके संघर्षों के कवि भी थे। आपने अगर उन्हें नहीं पढ़ा तो जरूर पढ़ें, हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है।
अमर शहीद बाबा बूझासिंह के लिए दुखी हो कर अफ़सोस करते हुए भारतीय भाषाओं का बाबा बोहड़- जसवंत कंवल कहते हैं कि 'मैं बोझ लिए मर जाऊंगा, आत्मा मेरी खुर रही है बूझा सिंह के लिए क्यों नही लिख पाया मैन कभी" .... कोई अगर पूछे कि तुम्हारा पसंदीदा उपन्यास कौनसा है तो शायद नही बता पाऊंगा, पाठक कोई नही बता सकेगा, वो उनकी श्रंखला बताएगा , दबाव से बताऊं तो वो एक उपन्यास, जिसका सिरलेख 'लहू दी लौ’ है और जो पंजाबी में ही नही बल्कि अंग्रेजी में भी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी खूब पढ़ा गया।। टॉलस्टॉय के नाम से प्रसिद्ध थे।
जसवंत सिंह कंवल पंजाब में उठी नक्सलवाड़ी लहर से संबद्ध थे। यह बुजुर्ग जवान क्रांतिकारी लेखक अपने आप मे एक युग है। नक्सलबाड़ी में शामिल थे तो खालिस्तानी खाड़कु लहर से भी कुछेक मुद्दों को छोड़कर सहानुभूति रखते थे। नक्सलवादी आंदोलन का खुला समर्थन करने वाले कँवल ने उपन्यास 'लहू की लो' पँजाबी में इस संघर्ष के दस्तावेजों की तरह लिखा। पंजाबी के इस बाबा बोहड़ का जन्म सब 1919 को फिरोजपुर (वर्तमान मोगा ) के गांव ढुड्डीके में हुआ था।
सन 1967 ई में पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर ने दस्तक दी थी। उस लहर ने कई गहरे प्रभाव पंजाब के जनजीवन पर छोड़े जो भूले नही जाते और जख्म कायम हैं। जसवंत सिंह कंवल का लिखा उपन्यास ‘लहू दी लौ’ भी इनमें से एक है। इसके अनगिनत संस्करणों की पाँच लाख से ज्यादा प्रतियां पढ़ी गई। 1970 के बाद जसवंत सिंह कंवल ने इसे लिखा था। जब इसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए तैयार हुई तो पंजाब में इसे किसी ने नहीं छापा। फिर आपातकाल लागू हो गया था तो संभव ही नही रहा।
आखिरकार उन्होंने ‘लहू दी लौ’ सिंगापुर से छपवाया और गुप्त रूप से उसे पंजाब लाया गया। प्रतिबंधित हिट हुए भी उस समय मे ये ब्लैक में 700 रूप में बिकने वाला यह संसार का एकमात्र ही उपन्यास है। पंजाब में तो बहुत बाद में यह आपातकाल हटने के बाद प्रकाशित हुआ, तब भी लोगों ने इसे खूब खरीदा और पढ़ा। लहू दी लो इंकलाबी पराक्रम और दुखांत और पंजाब के किसानों के संघर्ष, उनकी मुश्किलों और उस दौर में नक्सलवाद की बहस तलब प्रासंगिकता का गान था। हालांकि बहुत से फूहड़ वैचारिक फैशनेबुल कॉमरेड्स तेलगु पलायनवादी कवि गदर से और वरवर राव से बाबा की तुलना करते हैं- वे नही जानते कि वे कितना बुरा और अश्लील सोचते हैं।
पंजाब में कम्युनिष्ट लहर के इंकलाबी पंजाबी कवियों आदि योद्धाओं से परिचय कराने के लिए साथी अजमेर सिद्धू को सलाम। अजमेर सिद्धू मेहनतकश वर्ग के हिमायती रहे हैं। सर्वहारा, के प्रति प्रतिबद्ध। ''गदर से लेकर नक्सली तक'' (शहीद बाबा बूझा सिंह जी की जीवनी), 'लालसिंह दिल, सन्तराम उदासी की जीवनी भी इन्होंने ही लिखी- ''क्रांति लई बळदा कण कण" नाम से उदासी पर गजब काम किया है। मूल रूप से कहानियां लिखते हैं। अजमेर के चार कहानी संग्रह छप चुके हैं।
क्रमशः.... (भाग - ३) जारी....
हमारे क्रांतिकारी पुरोधा- (भाग-२)
अमर शहीद कॉमरेड बाबा बूझासिंह
● सतीश छिम्पा
ਅਸਾਂ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਏ ਉਸ ਬੁੱਢੜੇ ਬਾਬੇ ਦਾ ....
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਫੜਕੇ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ ਸਾਡਾ ਮਾਣ ਦੁਆਬੇ ਦਾ.. (ਪਾਸ਼)
असां बदळा लेणा है, उस बुढड़े बाबे दा
जिना फड़के मार दित्ता, साहडा मान दुआबे दा
(शहीद पाश)
शाही किला। .....लाहौर का वो किला इसलिए प्रसिद्ध नही था कि वो पुराना था या इसलिए भी नही कि वो शाही था या लाहोर के इस शाही किले में लाहौर शब्द भी खास नही था। खास जो था वो था वर्तमान का रचाव, वर्तमान रच रहा था इतिहास, जी बिल्कुल इतिहास ही। क्योंकि इस किले में दो महीने बर्फ पर नंगा लेटा कर पुलिस बूझा सिंघ पर तशद्दुद जुल्म करती रही और उनसे उनके संघठन और कार्यवाही का भेद लेना चाहा। उस संगठन जो उनका आत्मसम्मान था, जो भारतिय आजादी के लिए जूझते युवाओ का आदर्श था, वो जिसका नाम ग़दर था। और उनका जुल्म और जब्बर इसी का भेद लेने की चाहत का था। पर पुलिस सफ़ल न हो सकी। अंत उन्होंने बूझा सिंघ को जंगी कैदी घोषित कर दिया। (बड़े भाई अजमेर सिद्धू जी द्वारा बाबा की जीवनी लिखी गई है, उसी में से संदर्भ है।)
इन जाबांजो ने कोमरेडाना जोश के साथ बहुत समय तक इस अंग्रेजी हुकूमत को (वख्त में) झाँसे में रखा। और जबर जुल्म और बढ़ गया, बढ़ता ही गया। और जब महान इंकलाबी अपने मंतव्य से पीछे न हटे तो राजस्थान के देवली कैम्प में दो साल के लिए बूझा सिंघ समेत अनेकों कीर्ति और कम्यूनिस्टों को जेल में डाल दिया गया।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस पार्टी का कौमी प्रधान बनाने का सहरा भी इन कीर्तियों के सर बंधता है। बाबा जी की ऊंची सख्शियत का इस बात से पता चलता है: जिन पांच कीर्तियों (अच्छर सिंघ छीना, राम किशन बी.ऐ. नेशनल, बूझा सिंघ, दसोंधा सिंघ, भगत राम तलवाड़) की ड्यूटी लगी थी कि वह नेता जी को रूस ले जाएंगे और देश को आज़ाद करवाने के लिये रूस के उस समय के राष्ट्रपति कॉमरेड स्टालिन से मदद के लिए नेता जी की मीटिंग करवाएंगे, उनमें बूझा सिंघ भी एक थे।
इतिहास हमेशा प्रभावित करता है वर्तमान को या कहें घटनाओं का क्रम गड़बड़ाता है अतीत। जाने कितना गड़बड़ाया है समय..... जाने कितने जनता के प्यारे क्रांतिवीर शहीद हुए, कौन जाने। किसने जाना कि धर्म के नाम पर जल्लाद बने हैवानों को पूजा जाने लगा है, इस देश मे इतनी खुली छूट क्यो मिल रही मानवद्रोहियों को कि आदमियत के कातिलों की तस्वीर रखना आम बात हुआ, लेकिन शहीद क्रांतिकारी की तस्वीर आपको देशद्रोही साबित करवा देती है। नब्बै वर्षीय अद्मय यौद्धा अमर शहीद बाबा बूझा सिंह की शहादत पर उस कम्युनिष्ट क्रांतिकारी के लहू से तब असंख्य मर- जीवड़े वीर लाल यौद्धाओं का उद्भव हुआ... लाल कीरति झंडे को उठाने वाले असंख्य क्रांतिवीर पैदा हुए, असंख्य लाल सैनिक... उन अदम्य योद्धा को सलाम....
बाबा बूझासिंह की शहादत पर पाश ने जो कविता लिखी, वो ये है.....
ਅਸਾਂ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਏ ਉਸ ਬੁੱਢੜੇ ਬਾਬੇ ਦਾ ....
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਫੜਕੇ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ ਸਾਡਾ ਮਾਣ ਦੁਆਬੇ ਦਾ....
(असां बदळा लेणा उस बुढड़े बाबे दा
जिना फड़के मार दित्ता, साहडा मान दुआबे दा)
शहीद बाबा बूझा सिंह जी जिनको उनके गांव के पास ही शहीद किया गया था। अठासी साल उम्र थी, जवान लोगो जैसा हौसला था। वे गांव से साइकिल पर जा रहे 28 जुलाई 1970 को पुलिस जीप ने टक्कर मारी और बाबा को उठा ले गए, जीप में डालते वक्त बुलंद आवाज में गांव के लोगो को कहा कि "मैं बूझा सिंह कॉमरेड..." ताकि साथियों को पता लग जाए। बाबा को शहीदी प्राप्त हुई..पुलिस ने जो झूठा एनकाउंटर दिख्या था उसमें बताया गया था कि-,"बूझासिंह अपने तीन अन्य साथियों अमर सिंह, दर्शन (दर्शन खटकड़, खटकड़ अब सी.पी.आई.एम. एल.- न्यू डेमोक्रेसी में है) और एक अन्य के साथ गुप्त ऑपरेशन के तहत आगे के गांव के कोंग्रेस के एक बड़े लीडर को मारने जा रहे थे उस समय सूचना के आधार पर इस एनकाउंटर को अंजाम दिया गया था। बोहड़ को काट दिया गया, मार दिया गया था.... मर जीवड़े कभी मरते नहीं है। वे यौद्धा जो धर्म कौम के लिए नही, मनुष्यता, वर्ग और न्याय के लिए कुर्बान होते हैं, अमर होते हैं।
वे एक गदरी यौद्धा थे। हर तरफ सम्मान और नाम था उनका उस समय। वे गदर लहर में शामिल हुए देश को आजाद करवाने के लिए, और फिर कम्युनिष्ट पार्टी में और उसके बाद तेजा सिंह द्वारा बनाई गई लाल कम्युनिष्ट पार्टी में रहे। क्लास और मार्क्सवादी क्रांतिकारी भूमिगत स्टडी सर्किल आदि के माध्यम से बहुत सक्रियता देखने को मिलती। अठासी - नब्बै साल का यह महान यौद्धा एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आग्गु थे जो अंतिम सांस तक सक्रिय रहै थे। रहे....पंजाब में उठे महान किसान कम्युनिष्ट उभार के आइकन क्रांतिकारी रहे और पंजाब में आंदोलन की जमीन तैयार की, राजसत्ता की साजिशों के चलते फर्जी मामला बना कर हत्या कर दी गयी... ( 'हमारे क्रांतिकारी पुरोधा- 'तेजा सिंह सुतंतर'- भाग -१ से सन्दर्भ रूप मे इस संक्षिप्त जानकारी को यहां सीधे रख रहा हूँ, ताकि समझने में दिक्कत ना हो।) बाबा बूझा सिंह गदर आंदोलन के बाद जिस आंदोलन में गर्मजोशी से शामिल हुए वो था पंजाब का मुजारा किसान आंदोलन जो तत्कालीन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के तेलंगाना सशस्त्र किसान आंदोलन का समकालीन उभार था, तेजासिंह सुतंत्र द्वारा स्थापित लाल कम्युनिष्ट पार्टी के भी सदस्य बने, मुजारा आंदोलन आम नही था क्षेत्र भले कम था लेकिन क्रांतिकारी स्प्रिट और प्रतिबद्धता और कतारें, इंकलाब को गाते हुए बढ़ी थी आगे.... आगे... और आगे .... और वे जो अद्मय यौद्धा थे... बहुत सी क्रांतिकारी मिसालें कायम की थी।
आज भी मालवा अंचल के मानसा के पास किशनगढ़ गांव में इस महान क्रांतिकारी आन्दोलन की यादों को जिंदा रखने वाले भावुक क्रांतिकारी और एक स्मारक है। तेलंगाना आन्दोलन के समय उसी तरह का आन्दोलन पंजाब की धरती पर मुजारों (सीमांत, खेतिहर मजदूर और गरीब व भूमिहीन किसान) की संगठित ताकत के बल पर चल रहा था। और यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक महान कम्युनिष्ट किसान क्रांतिकारी प्रचण्ड रूप आक्रोश में बढ़े। वे जो मुल्क को गुलाम रखने वाले ब्रिटिश एंपायर तो 1947ई के बाद लोकल पूंजीवादी साम्राज्यवादी जमात के विरुद्ध पाणा मांड कर खड़े हो गए थे। मुजारा शब्द का ध्वन्यार्थ मेहनतकशों का है। खास बात यह है कि यह आंदोलन जो पंजाब का मुजारा आन्दोलन कहलाता है तत्कालीन पटियाला राज के अन्दर अंग्रेजों से देश की आजादी और बड़े जागीरदारों के खिलाफ उन सीमांत, भूमि हीन किसानों, जो खेत मज़दूर बने अपने शोषण को लाचारी से देखते हुए पल पल भर रहे थे। सीमांत और गरीब मेहनतकशों की बेटियों, बीबियों तक का बलात्कार जैसे शगल बन गया हो- प्रतिरोधक आक्रोश के चलते वे गरीब व भूमिहीन किसानों का संगठित आन्दोलन था जो जमीनों पर काश्त करते थे और नारा था 'जमीन जोतने वाले कि'..... क्रांतिचेताओं के शहादत को हमेशा याद में और ताजा रखने के प्रयासों में उन गांवों की छतों पर अक्सर लाल थंभी के ऊपर कम्युनिष्ट कामगारों- मुजारों के प्रिय लाल झंडे को बनाया गया है.... जिस पर कम्युनिस्टों का निशान हंसिया हथौड़ा बना है। (हमारे पुरोधा भाग -१)
विश्व इतिहास का सबसे सुनहरा या कहें महाकाव्यात्मक उथल पुथल का समय था, साठ के दशक से सत्तर और अस्सी के दशक तक का दौर। भारत सहित विश्व के अनेक देश युवा प्रतिरोध से उफन रहा था। कांगो, घाना, नामीबिया, चाड, कांगो जायरे, वियतनाम, ईरान और इराक इथयोपिया, यूगोस्लाविया (वर्तमान में इसका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।), चेक और स्लोवाकिया, स्पेन, चिली, क्यूबा समेत लातिनी देश महान मुक्ति के सपनो के साथ तोपों और बन्दूको के आगे सीना ताने खड़े थे। शहादतों का दौर था। वियतनाम संघर्ष महान हो ची मिन्ह के नेतृत्व में महान विजय के करीब पहुंच चुका था। इंकलाबी महा जन उभार प्रचण्ड आक्रोश के साथ तब की मौजूदा महाशक्ति अमरीका के घुटने टिकवा चुका था। युवाओ का जोश देखते ही बनता था। और जबर जुल्म इतना कि सड़क पर खड़ा कोई बीस से तीस पैंतीस वर्ष का युवा भले निर्दोष हो, क्रांतिकारी होने के भय से कत्ल कर दिया जाता था। बंगाल और आंध्रा की धरती लाल हो चुकी थी तो कैसे पंजाब नही प्रभावित होता।
नक्सलवाड़ी के किसान उभार का तात्कालिक कारण 1967 में उठे स्थानीय, छोटे स्तर पर प्रतिरोधक आक्रोश स्वर का उस समय किसान बिगुल की हत्या था , जिससे खेतिहर मजदूर, भूमिहीन, सीमांत या कहें सभी सर्वहारा और अर्ध सर्वहारा उसमे शामिल हुए। ये वो ही चिंगारी थी जो तेलंगाना सशस्त्र किसान महाउभार (भूमिहीन खेत मजदूर) से उठी थी- जो दशक भर के बाद से ही बारूदी ढेर या कहें दबा छुपा महा दावानल के धधकने का तात्कालिक कारण ही बना था , -- नक्सलबाड़ी महान कम्युनिष्ट उभार किसी अद्वितीय अविश्वसनीय तरीके से हुआ जो महान मुक्ति का समर था, बदकिस्मती कि यह ढाई महीने ही चल पाया था और रौंदकर दबा दिया गया था, जिसने तमाम अमानवीय धारणाओं और बर्बरताओं को हिलाकर रख दिया था। किसान आंदोलन के दबते ही पार्टी लाइन बना रहे केंद्रीय सदस्यों के सामने फिर खुल गया इस महान संघर्ष का राह, छात्र उभार से, जो एक दावानल की तरह उठा और यही वह समय था जब बौद्धिक जमात की भी आंखे खुली। लहू की नदियां बहा दी गई थी पश्चिम बंगाल की सड़कों पर।
यह उसी महान जन उभार का ही अगला पायदान माना जा सकता है जो इससे पहले तत्कालीन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (भा.क. पा.) जो उस समय मार्क्सवाद लेनिनवाद के बुनियादी दर्शन और लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत में आस्था रखने वाली एक सही पॉलिटिकल लाइन वाली पार्टी थी, जो उस समय तक ख्रुश्चेव जैसे मानवद्रोही के संशोधनवाद के प्रभाव से बची हुई थी- के नेतृत्व में भारतीय इतिहास का पहला महान लोकयुद्ध तेलंगाना सशस्त्र किसान उभार उफान पर आया था जो विचलन से क्षद्म लक्ष्य रखकर पार्टी लाइन बनाने की उस समय कोशिश हुई हो ऐसा भी नहीं था- सन 1953 ई में यहां जो उथल पुथल या बदलाव का ढांचा तैयार हुआ वो सर्वहारा के महान शिक्षक स्टालिन की मौत के बाद सत्ता में आए संशोधनवादी निकिता ख्रुश्चेव क्रान्ति विरोधी या कहें साम्रज्यवाद पूंजीवादी ताकतों का भेदिया था जिसने क्रांति को खत्म कर दिया और पूंजीवादी ताकतों के राह का सबसे मजबूत और स्थाई और महान प्रतिरोध को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के प्रतिस्पर्धी (पूंजीवाद की पुनर्स्थापना कर दी) नीति के माध्यम से महान अक्टूबर क्रांति का अंत कर दिया गया था।
जो मार्क्सवादी भारतिय बुद्धिजीवी या संसदीय वाम के प्रवक्ता यह मानते हैं कि महान क्रांति का अंत नब्बै के दशक में हुए विखण्डन से हुआ, उन्हें एक बार फिर विश्व इतिहास का बहुत बारीकी और गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए- और इसको भी जानना चाहिए कि इस सत्ता के हिमायत में दौलन के शिकार दस्ते ने अनेक बार दुस्साहस भरी भीतरी चाल चली है-- यही सन 1953 ख्रुश्चेव के भारतीय उत्तराधिकारी बी.टी.रणदिवे और पी.सी. जोशी और बाद के टेम में संशोधनवादी मध्यम मार्गी धड़े के आदर्श नेता भी बनकर उभरे ने संसद की राह लेते हुए तेलंगाना में अनेक युवा क्रांतिकारियों का रक्त बहाए जाने को अनदेखा कर दिया या, इस अविश्वसनीय जनद्रोही धड़े के इस हत्यारे रुख का सामने आ जाना भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की सबसे बड़ी गद्दारी साबित हुई जिसका अगला अमानवीय पड़ाव पश्चिम बंगाल में कोंग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार ने जुल्म की इंतिहा कर दी और माकपा के बीच से आए इतिहास के सबसे बड़े और काले दुखांत और विचलन और कतारों के बीच विद्रोही स्वर की मुखरता और निरंतरता के जिम्मेदार लोग जो थे ने खून का वीभत्स खेल खेला था।
पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। मास्टर हरपाल से लेकर जसवंत कंवल और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। बलदेव सिंह मान, सतनाम, अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे। उनमें से कई तो कालजई कविताओं के रचयिता भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे सब जो उस समय या उसके बाद खालिस्तानी अतिवाद के शिकार हुए वे अद्भुत सर्जक निकले। सन्तराम उदासी, पाश, खटकड़ और लालसिंह दिल जैसे अनेक बेहतरीन क्रांतिकारी कवि थे।
कम्युनिष्ट लहर खत्म हो जाने के बाद पंजाब में फिर एक महान मुक्तिकामी लहर उठी, प्रीथीपाल सिंह रंधावा जैसे छात्र नेताओं के नेतृत्व में छात्र प्रतिरोध का उफान। यहां बर्बरता ने नंगा नाच नाचा। सत्ता और धार्मिक अतिवादी, लोकल बुर्जुआ किसी भी छात्र, प्रतिरोधी को बख्शना नही चाहते थे।
ये दहकते दिन लाल लहू से नहाकर तांडव कर रहे थे..... मजदूर और गरीब और जवान उठ खड़े हुए और इन्ही में से एक थे अमर शहीद बाबा बूझा सिंह।
भयानक गरीबी, आर्थिक असमानता, अन्याय और भूखमरी की कगार पर पहुंचने ही वाले
परिवार को सुख शांति से रोटी उपलब्ध करवा सकने की इच्छाओं को लेकर बाबा बूझा सिंह विदेश चले गए जाने किस तरह वे अर्जेंटाइना में पहुंचे। घर की तंगहाली को दूर करने के सपने देखता बाबा बूझा सिंह विदेश कमाई करने गए थे जो वहां जाकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण गदर आंदोलन के गदर संगठन में शामिल होकर घर की बजाए देश की तंगहाली दूर करने में जुट गए। ये ही वो समय था जब उनके सामने अध्ययन और अध्ययन की उच्च स्तरीय जरूरी सामग्री आने लगी। मार्क्स से लेनिन तक के नाम ना केवल सुने बल्कि उन्हें पढा और आत्मसात भी किया। बाबा गदरी जवानों के साथ चंद लोगो मे एक थे जो सोवियत संग गए, पढ़ने और विचार को जानने के लिए।
राज सत्ता के बर्बर दमन और अनदेखी के विरुद्ध उठे प्रचण्ड आक्रोश की लहरों के साथ इंकलाबी लाल परचम उठाए युवा क्रांतिकारियों को उस समय ताजा उठे नक्सलबाड़ी किसान उभार से आस बंधी और वे सभी युवा जो जीवित थे, क्रांति की महिमा से वाकिफ़ थे, इस लहर में शामिल हुए। यह अलग मुद्दा है कि कुछ तानाशाही और मूर्ख नेतृत्व के कारण एक महान उभार कुछ ही समय मे दमन का शिकार होकर खत्म हो गया।
यह लहर पश्चिम बंगाल के बाद आंध्रप्रदेश और फिर पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी थी। इसमें पंजाब सहित देश के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। इस क्रांतिकारी लहर ने जब तक दुःसाहस की लाइन नहीं पकड़ी तब तक यह एक खालिस मानव मुक्ति का युद्ध थी जिसमे अनेक कवि, लेखक, कलाकार, रंगकर्मी आदि खुलकर शरीक हुए और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति भी इसमें शामिल थे। हाकिम के अन्याय और अत्याचार से व्यथित होकर वे भी शामिल हुए थे। अनेक कवियो की कविता का जन्म भी इसी समर में हुआ। हरभजन सोही, अमर सिंह अचरवाल और दर्शन खटकड़ जैसे और बहुत से युवा इसमे शामिल थे
लाल सिंह दिल जो बेहतरीन क्रांतिकारी के साथ कवि भी थे जिनका घर किसी खंडहर की तरह हो गया था। इस महान क्रांतिकारी कवि को पंजाबी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में हाशिए पर डाल रखा है। इनके अब तक के संग्रह जो मैंने मूल पंजाबी में पढ़े हैं, वे निम्न है, 'सतलज की हवा', 'बहुत सारे सूरज', 'सत्थर', और आत्मकथा 'दास्तान' (दास्तान मैंने नहीं पढ़ी अभी), हालांकि वे चर्चित थे मगर उस तरह से नहीं जिस तरह से उन्हें होना चाहिए था। जबकी पाश की प्रसिद्धि उनकी शहादत के कारण भी हुई थी। यह बाद का मुद्दा है कि किसी ने सार सुध नहीं ली। महान लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत से दोलित होकर भटक जाना आदि या विचलन में उल्टी दिशा की तरफ मुड़ जाना भी एक मुख्य कारण था।
पाश और जयमल पढा, संतराम उदासी और दिल भारतीय समाज के थल्लड़े वर्ग के शोषण के विरुद्ध राजसत्ता के प्रतिरोधी तूफान की तरह खड़े हुए तो बाद में उनके संघर्षों के कवि भी थे। आपने अगर उन्हें नहीं पढ़ा तो जरूर पढ़ें, हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है।
अमर शहीद बाबा बूझासिंह के लिए दुखी हो कर अफ़सोस करते हुए भारतीय भाषाओं का बाबा बोहड़- जसवंत कंवल कहते हैं कि 'मैं बोझ लिए मर जाऊंगा, आत्मा मेरी खुर रही है बूझा सिंह के लिए क्यों नही लिख पाया मैन कभी" .... कोई अगर पूछे कि तुम्हारा पसंदीदा उपन्यास कौनसा है तो शायद नही बता पाऊंगा, पाठक कोई नही बता सकेगा, वो उनकी श्रंखला बताएगा , दबाव से बताऊं तो वो एक उपन्यास, जिसका सिरलेख 'लहू दी लौ’ है और जो पंजाबी में ही नही बल्कि अंग्रेजी में भी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी खूब पढ़ा गया।। टॉलस्टॉय के नाम से प्रसिद्ध थे।
जसवंत सिंह कंवल पंजाब में उठी नक्सलवाड़ी लहर से संबद्ध थे। यह बुजुर्ग जवान क्रांतिकारी लेखक अपने आप मे एक युग है। नक्सलबाड़ी में शामिल थे तो खालिस्तानी खाड़कु लहर से भी कुछेक मुद्दों को छोड़कर सहानुभूति रखते थे। नक्सलवादी आंदोलन का खुला समर्थन करने वाले कँवल ने उपन्यास 'लहू की लो' पँजाबी में इस संघर्ष के दस्तावेजों की तरह लिखा। पंजाबी के इस बाबा बोहड़ का जन्म सब 1919 को फिरोजपुर (वर्तमान मोगा ) के गांव ढुड्डीके में हुआ था।
सन 1967 ई में पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर ने दस्तक दी थी। उस लहर ने कई गहरे प्रभाव पंजाब के जनजीवन पर छोड़े जो भूले नही जाते और जख्म कायम हैं। जसवंत सिंह कंवल का लिखा उपन्यास ‘लहू दी लौ’ भी इनमें से एक है। इसके अनगिनत संस्करणों की पाँच लाख से ज्यादा प्रतियां पढ़ी गई। 1970 के बाद जसवंत सिंह कंवल ने इसे लिखा था। जब इसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए तैयार हुई तो पंजाब में इसे किसी ने नहीं छापा। फिर आपातकाल लागू हो गया था तो संभव ही नही रहा।
आखिरकार उन्होंने ‘लहू दी लौ’ सिंगापुर से छपवाया और गुप्त रूप से उसे पंजाब लाया गया। प्रतिबंधित हिट हुए भी उस समय मे ये ब्लैक में 700 रूप में बिकने वाला यह संसार का एकमात्र ही उपन्यास है। पंजाब में तो बहुत बाद में यह आपातकाल हटने के बाद प्रकाशित हुआ, तब भी लोगों ने इसे खूब खरीदा और पढ़ा। लहू दी लो इंकलाबी पराक्रम और दुखांत और पंजाब के किसानों के संघर्ष, उनकी मुश्किलों और उस दौर में नक्सलवाद की बहस तलब प्रासंगिकता का गान था। हालांकि बहुत से फूहड़ वैचारिक फैशनेबुल कॉमरेड्स तेलगु पलायनवादी कवि गदर से और वरवर राव से बाबा की तुलना करते हैं- वे नही जानते कि वे कितना बुरा और अश्लील सोचते हैं।
पंजाब में कम्युनिष्ट लहर के इंकलाबी पंजाबी कवियों आदि योद्धाओं से परिचय कराने के लिए साथी अजमेर सिद्धू को सलाम। अजमेर सिद्धू मेहनतकश वर्ग के हिमायती रहे हैं। सर्वहारा, के प्रति प्रतिबद्ध। ''गदर से लेकर नक्सली तक'' (शहीद बाबा बूझा सिंह जी की जीवनी), 'लालसिंह दिल, सन्तराम उदासी की जीवनी भी इन्होंने ही लिखी- ''क्रांति लई बळदा कण कण" नाम से उदासी पर गजब काम किया है। मूल रूप से कहानियां लिखते हैं। अजमेर के चार कहानी संग्रह छप चुके हैं।
क्रमशः.... (भाग - ३) जारी....
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