आज 13 दिसम्बर, हिंदी के सर्वाधिक चर्चित, विवादित और बेहतरीन कहानीकार का जन्मदिन है। राजकमल चौधरी का उपन्यास 'मछली मरी हुई' उस समय सबसे चर्चित रहा जब हर तरफ शुचितावादी भरे हुए थे।
राजकमल चौधरी.....
● सतीश छिम्पा
परिवार हो या समाज हो, वे तेज बहाव के स्वच्छंद मगर सघन जीवन की गति पर अंकुश नही लगा पाते। बंदिशें जीवन के मूल स्वर को रोक नही पाती। प्रेम का अथाह वेग हो या एकांत में रम रहा वैरागी मन हो या सामाजिक राजनीतिक चेतना से लैस दहकती सड़कों पर तेजी से चलती, मुट्ठियाँ कसते हुए आती जवानी हो या महज अराजक जीवनचर्या हो- बहुत कुछ बहा ले जाती है अपने साथ मे। जीवन से ठसाठस भरे, स्वच्छंद मगर अराजक जीवन निर्बाध भले दौड़ता हो मगर जरा सा भावुक हमला उसको पस्त कर जाता है। यह सिर्फ राजकमल चौधरी के लिए ही नही वरन दोस्तोवस्की, रमेश बक्षी, मजाज़ और अनेक अन्य जीवन के जीवंत बेटों की कथा है।
राजकमल चौधरी की शादी पारिवारिक दबाव में शशिकांता चौधरी से हुई थी। अब जब अकादमिक शिक्षा के बाद दबाव पड़ा घर ग्रहस्ती का तो शिक्षा विभाग में नौकरी हासिल की। वो जो जीवन से भरा- निर्बाध, अथाह वेग था- कहाँ वो नौकरी को अपना माई- बाप मानने वाला था। वे इस पर आश्रित भी नही हुए और ना ही इसको जीवन का अंतिम लक्ष्य मानकर एक 'क्लास' विशेष की मनोगत 'उच्चता' को हावी होने दिया। पेट की आग को शांत करने भर का साधन मानकर नौकरी करने वाले अक्सर जीवन के सौतेले बेटे साबित होते हैं या कर दिए जाते हैं :- मगर विस्फोटक सृजनात्मकता का उत्स भी यहीं से होता है जो प्राकृतिक भी होता है। कॉलेज की शोभना हो या एकाधिक विवाह- कहीं न कहीं कुछ बेचैनी जरूर रही होगी जीवन के इस दुस्साहसी बेटे के मन मे- तभी तो 'मछली मरी हुई' जैसा ऊंचे और बड़े फलक का उपन्यास रच पाए।
हिंदी की कहानियों या उपन्यासों में विकृत योन इच्छाओं के लोगों को पात्र के रूप में ले आने की पहल करना कोई आसान काम नहीं था। बड़ा भारी दुस्साहस का मामला था। साठ के दशक की शुरुआत में राजकमल चौधरी के उपन्यास 'मछली मरी हुई' से भिन्न योनिच्छाओ को चित्रित करने की शुरुआत हुई थी। जिसमे दो बहनों के आपस मे यौन संबंधो को रेखांकित किया गया था। फिर राजेंद्र यादव की कहानी 'प्रतीक्षा' आई और फिर सुभाष अखिल की कहानी 'दरमियाना' (यह बाद में उपन्यास में बदल दिया गया था।) जो किन्नर समुदाय पर था और फिर मोटे तौर पर अस्सी के दशक में ठीक ठाक चलन का संकेत मिलने लगा था।
राजकमल चौधरी का उपन्यास 'मछली मरी हुई' उस समय सबसे विवादास्पद और चर्चित रहा। साठ के दशक का समाज आज के समय की (भले ही बहुत कम हो) तरह खुले सोच, बेहतरीन सांस्कृतिक सम्मिश्रण और जरा सा भी उन्नत समाज नहीं था। मॉर्डन या प्रगतिशील नहीं था, और ऐसे समय मे 'मछली मरी हुई' जिसमें लेस्बियन (स्त्री समलैंगिक) संबंधों को भी रेखांकित किया गया हो :- जैसा उपन्यास लिखना बहुत भारी दुःसाहस ही था। आज भी लोग उस तक पहुंचने का सोच तक नहीं पाते हैं। साठ के दशक में जब हिंदी कहानी में वर्जित विषयों के लिए जहां स्पेश ही नहीं था वहीं राजकमल चौधरी ने :'मछली मरी हुई', में कड़वा और नंगा यथार्थ परोस दिया था जो जरूरी मगर वर्जित था। यह उपन्यास जबरदस्त बहस का मुद्दा बन गया था - जो अन्य विषयों के साथ लेस्बियन मुद्दे को भी सहेजे हुए था। हालाँकि उन पर बोल्ड लेखन का लेबल लगाया जाता है मगर वे सही मायनों में मनुष्य जीवन के रचनाकार थे, उसकी तमाम खूबियों और कमजोरियों के साथ।
आपने अगर कभी रुझकर उन्हें पढा है तो प्रेम में सौंदर्य और कामुक क्षणों के वर्णन के साथ ही प्रेमिल या अनुर्वर पात्र की मनोस्थिति के वर्णन की उनकी खूबी के कायल हुए बिना नही रहे होंगे। उदाहरण के तौर पर उनकी कहानी 'जीभ पर बूटों के निशान' का एक अंश :-
“ वह बालों को हल्का झटका देकर, निगाहों को टेढ़ी कर, ओंठ सिकोड़कर, दबी आवाज़ में बातें करना नहीं जानती है। उसमे पागल बना देने वाला हुस्न नहीं है, बेहोश कर देने वाली अदाएं नहीं हैं क्योंकि वह बीवी है, हिन्दुस्तानी बीवी जो खाना पका सकती है, थके पाँव दबा सकती है, पंखा झल सकती है। मगर चेहरे पर बहुत सारा प्यार बिखराकर, साँसे गरम कर, नथुने फाड़कर, कंधे फैलाकर, आँचल बिखराकर यह नहीं कह सकती कि उसे मुझसे बहुत प्यार है, बहुत बहुत। इसलिए शशि पर कोई गीत नहीं लिखा जा सकता, कोई कहानी नहीं लिखी जा सकती, कोई उपन्यास नहीं रचा जा सकता, अब तक रचा भी नहीं गया है। रचना की नायिका पद के लिये चाहिए कोई परकीया राधा, रावण द्वारा हर ली जाने वाली सीता, या फिर तरह-तरह की कुंठाओं, या तरह तरह की दमित वासनाओं वाली कोई आधुनिक भद्र महिला "
अक्सर भारतीय भाषाओं खासकर उत्तर भारतीय भाषाओं के साहित्य में निर्बाध और यथार्थ का शुध्द रूप ( अतियथार्थ नहीं- महज़ यथार्थ ) लेखन पर 'बोल्ड लेखन या सेक्स कथा लेखक' का ठप्पा लगाकर शुचितावादी उनके जीवंत लेखन को छोटा करने की ओछी कोशिश में अपने झूठ- सच को ऊंचा करके कलाओं में स्थापित होकर अजीब सी संतुष्टि पाते हैं जबकि यह हकीकत उन्हें मालूम है कि पाठक उन्हें दो साल बाद ही भूल जाता है।
हिंदी के पहले दुःसाहसी लेखक को जन्मदिन पर सलाम
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