राजेश चड्ढ़ा
राजेश चड्ढ़ा लगातार चार दशकों से सृजन कर रहे हैं। किताबो के प्रति समर्पण देखकर हैरानी होती है। जोरदार पाठक जो आत्ममुग्धता से दूर है। यह इसलिए कि बहुत कम ऐसे रचनाकार होते हैं जो खुद के लिखे की नहीं बल्कि, अन्य महत्वपूर्ण रचनाकारों पर चर्चा करते हैं। बाकायदा यह तकिया कलाम भी बन गया है उनके अपने ही लिए जब वे कहते हैं कि, "मैं अंशकालिक लेखक और पूर्ण कालिक पाठक हूँ।''
अराजक समय मे जीवन के प्रति प्रेम और सम्मान का अभाव तो हैं ही अन्य सामाजिक सांस्कृतिक अवमूल्यों का प्रसार भी भयावह है। राजेश चड्ढ़ा जैसे चेतन्य अग्रजों ने ही रचाव के इस जीवंत आधार को ठोस रूप दिया है, और पुरोधाओं के अवदान के प्रति सचेत भी रहते हैं। वे ग़ज़ल कविताएं तो लिखते ही हैं, नाटक और कहानी भी लिखी है। अवध नारायण मुद्गल के समय मे ही वे सारिका के कॉलम 'आते हुए लोग' में छपकर चर्चित हुए थे। सन 1979 मरुधरा के संपादक मण्डल में महेश सन्तुष्ट, नरेश विद्यार्थी, ओम पुरोहित कागद के साथ एक अद्भुत संग्रह का संपादन किया।
वर्तमान में आकाशवाणी
सूरतगढ़ (राजस्थान) में वरिष्ठ उद्घोषक।
कुछ ग़ज़ल.......
कभी हार गये कभी जीत गये
कभी भर भर कर फिर रीत गये
कभी अर्थहीन लय बद्ध हुआ
कभी दूर दूर से गीत गये
कभी दुश्मन ने भी साथ दिया
कभी मन को दुखा कर मीत गये
कभी दर्द के घर तक जा पँहुचे
कभी छोड़-छाड़ कर प्रीत गये
कभी लम्हे की फ़ुरसत ना मिली
कभी ख़ुद से मिले दिन बीत गये
फिर कोई कृष्ण सा ग्वाला हो,
फिर मीराँ फिर प्याला हो ।
फिर चिड़िया कोई खेत चुगे,
फिर नानक रखवाला हो ।
फिर सधे पाँव कोई घर छोड़ें,
फिर रस्ता गौतम वाला हो ।
फिर मरियम की कोख भरे,
फिर सूली चढ़ने वाला हो ।
हम घर छोड़ें या फूँक भी दें,
जब साथ कबीरा वाला हो ।
हवाओ को घर का पता यूं बताना
हवाओं को घर का पता यूं बताना,
मुंडेरों पे जलता दिया छोड़ आना।
गीत-ओ-ग़ज़ल की जो लय ना बने तो,
पीड़ा की बंदिश पे शब्दों को गाना।
पुराने ताल्लुक में दम ना रहे तो,
रिश्तों की मण्डी में बोली लगाना।
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तुम्हीं तलाशो तुम्हें तलाश-ए-सहर होगी,
हमको मालूम है सहर किसे मयस्सर होगी।
पाग़ल हो हाथ उठाए हो दुआ माँग रहे हो,
पिघला ख़ुदा का दिल तो बारिश-ए-ज़हर होगी।
चाँदनी की आस में आँखें गँवाए बैठे हो,
चाँद जलाके रख देगी अगर हमारी नज़र होगी।
छोड़ो हमारा साथ हम इम्तिहान की तरह हैं,
नतीजे वाली बात हुक्मरान के घर होगी।
अपनी तो ज़िंदगी की रफ़्तार ही कुछ ऐसी है,
जीने को यहाँ जिए हैं उम्र अगले शहर होगी।
(Painting from Google)
कश्ती का मुसाफ़िर हूँ, उस पार उतरना है
कश्ती का मुसाफ़िर हूँ उस पार उतरना है,
मल्लाह के हाथों में जीना और मरना है ।
जीना है समंदर के सीने से लिपट जाना,
साहिल की तरफ बढ़ना जीना नहीं मरना है ।
घर छोड़ के जाना तुम गर छोड़ दे घर तुमको,
तारों का निकलना ही रातों का सँवरना है ।
महबूब के चेहरे में है भोलापन कितना,
बस आँख में बस जाऊँ मेरा यही सपना है ।
घर दुनिया नहीं मेरी, दुनिया है घर मेरा,
हद-बेहद दोनों के तूफ़ाँ से गुजरना है ।
दिल की तुझे कह डालूँ, फिर तेरी सुनूँ तुझसे,
राजेश रिषि होकर हमको क्या करना है ।
किसी रौशनी में बिखर गये
किसी तीरगी में संवर गये
किसी की आंख में चुभ गये
किसी के दिल में उतर गये
किसी की राह जुदा रही
कोई गया उधर हम जिधर गये
किसी ने जान निकाल ली
कुछ लोग हम पे ही मर गये
किसी ने घर का भी ना रखा
कुछ साथ ले के ही घर गये
बहुत सुंदर।
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