''पंजाबी कविता का हरियल रूंख.. सुरजीत पातर"

पंजाबी के महान रंगकर्मी नाटककार गुरशरण सिंह से पत्रकार ने सवाल पूछा कि 'युवा कविता पीढ़ी में आपको सबसे भरोसेमंद कवि कौन लगते हैं। बाबा का जवाब था,-- "अवतार पाश और सुरजीत पातर'' दो ही नाम है।  पंजाब में उठी नक्सली लहर ने वहां कविता का जो बीज बोया था आज उसके फल वैश्विक है।  इस लहर के बाद की पंजाबी कविता के दो जरूरी कवि  पाश और पातर उभरे थे । पंजाबी की नही बल्कि ये दोनों कवि भारतीय भाषाओं की कविताओं के सिरे के कवि हैं। पाश का शुरुआती रुझान नक्सल लहर के कम्युनिष्ट कतारों में रहा था- जिसके चलते ही अपने समकालीन कवियों के बीच वे किसी विस्फोट की तरह उभरकर आते हैं। जेल की कोठरी और यातना ग्रह में सही यातनाएं उसकी कविता में विद्रोह बनकर उभरते हैं जो आम कविताओं के विद्रोह के भांत ठसकर जमता नही बल्कि इंकलाबी स्वर में बदल कर कालजयी हो जाता है। और 'सुरजीत पातर' की बात करें तो उनकी कविता में उनकी अपनी मौलिक और मध्यस्थ तरीके की साफ पहचान बनाई। पातर की कविताओं में पंजाब की मिट्टी की गंध है। वे एक व्यापक संवेदना के कवि हैं। कहा जाता है कि पाश और पातर के बिना भारतीय कविता के ही नही बल्कि ग़ज़ल की उत्कृष्ट परंपरा को स्थापित करने और विकसित परिदृश्य की कल्पना नहीं की जा सकती।


पाश और पातर एक ही दौर के कवि हैं, पर पाश की कविता में मार्क्सवादी प्रभाव और नक्सलवादी आन्दोलन से उभरी नई संवेदना साफ दिखाई पड़ती है। पातर भी सामाजिक सरोकारों के कवि हैं, पर उनकी कविताओं में राजनीतिक स्वर उस रूप में सामने नहीं आता, जैसे तत्कालीन अन्य समवय कवियों में। वैसे बात यह भी उभरती है कि अस्सी के दशक के बीच समय मे-  लालसिंह दिल को छोड़कर बाकी सभी भटकाव के शिकार हुए, सबसे पहले अमरजीत चंदन।


    हर एक का आधार एक सा नही होता, प्रभाव के क्षेत्र भी अलग रखते हैं, पाश ने खुद अपनी डायरी में लिखा है कि,"जो सफ़र मेरी कविता ने किया उसी तरह का सफ़र मेरे जीवन का है। मार्क्सवाद के बारे में गहन शिक्षा सीपीआई एम. एल. के पार्टी स्कूलों में हासिल की, ज़िन्दगी के बारे में प्रगतिशील नज़रिया हासिल करने के बावजूद अगर मुझे 1970 के शुरू में नक्सली कॉमरेडों से मेलजोल  रखने के लिए जेल ना हो गयी होती तो अब तक मैं मोहब्बत, कुदरत और पहचान के निगुणेपन आदि विषयों पर लिखने वाला कवि होता।"


    अभी रात के 2:00 बजे हैं और मैंने 'पंजाबी के इंकलाबी कवियों' बाबत लिखे संस्मरणात्मक रेखाचित्र संग्रह पढ़कर खत्म की है। अक्सर हम कुछ एक नामो को भावुकता के चलते उनके जीवन का गुणगान करने से नही चूकते हैं जिसका नतीजा उनकी कविताओं को भोगना होता है। बटालवी से लेकर पाश तक के सफर में यही होता आया है की बहुत बाद में जाकर कहीं कवियों की कविताओं पर फोकस किया जाने लगा है।  यहाँ जसवंत कँवल से लेकर सुरजीत पातर तक का रूट यूँ ही चल निकलना था, अगर समय रहते रचनाओ पर गंभीर बात नही शुरू होती तो।  


  पातर बिल्कुल ही तटस्थ नही रहे।  सत्तर के दशक विद्यार्थी लहर के दौरान दोस्तों की शहादत पर लिखी यह बहुत चर्चित ग़ज़ल है।

           

 ਕੁਝ ਕਿਹਾ ਤਾਂ ਹਨੇਰਾ ਜਰੇਗਾ ਕਿਵੇਂ

ਚੁੱਪ ਰਿਹਾ ਤਾਂ ਸ਼ਮਾਦਾਨ ਕੀ ਕਹਿਣਗੇ।

ਗੀਤ ਦੀ ਮੌਤ ਇਸ ਰਾਤ ਜੇ ਹੋ ਗਈ 

ਮੇਰਾ ਜੀਣਾ ਮੇਰੇ ਯਾਰ ਕਿੰਞ ਸਹਿਣਗੇ।


ਇਸ ਅਦਾਲਤ 'ਚ ਬੰਦੇ ਬਿਰਖ ਹੋ ਗਏ

ਫੈਸਲੇ ਸੁਣਦਿਆਂ ਸੁਣਦਿਆਂ ਸੁਕ ਗਏ। 

ਆਖੋ ਏਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਉੱਜੜੇ ਘਰੀਂ ਜਾਣ ਹੁਣ

ਇਹ ਕਦੋਂ ਤੀਕ ਇਥੇ ਖੜ੍ਹੇ ਰਹਿਣਗੇ।


ਯਾਰ ਮੇਰੇ ਜੁ ਇਸ ਆਸ 'ਤੇ ਮਰ ਗਏ

ਕਿ ਮੈਂ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਦੁੱਖ ਦਾ ਬਣਾਵਾਂਗਾ ਗੀਤ 

ਜੇ ਮੈਂ ਚੁੱਪ ਹੀ ਰਿਹਾ ਜੇ ਮੈਂ ਕੁਝ ਨਾ ਕਿਹਾ

ਬਣਕੇ ਰੂਹਾਂ ਸਦਾ ਭਟਕਦੇ ਰਹਿਣਗੇ।


ਜੋ ਵਿਦੇਸ਼ਾਂ 'ਚ ਰੁਲਦੇ ਨੇ ਰੋਜ਼ੀ ਲਈ 

ਉਹ ਜਦੋਂ ਦੇਸ਼ ਪਰਤਣਗੇ ਆਪਣੇ ਕਦੀ 

ਕੁਝ ਤਾਂ ਸੇਕਣਗੇ ਮਾਂ ਦੇ ਸਿਵੇ ਦੀ ਅਗਨ

ਬਾਕੀ ਕਬਰਾਂ ਦੇ ਰੁੱਖ ਹੇਠ ਜਾ ਬਹਿਣਗੇ।


ਕੀ ਇਹ ਇਨਸਾਫ਼ ਹਉਮੈਂ ਦੇ ਪੁੱਤ ਕਰਨਗੇ 

ਕੀ ਇਹ ਖ਼ਾਮੋਸ਼ ਪੱਥਰ ਦੇ ਬੁੱਤ ਕਰਨਗੇ।

ਜੋ ਸਲੀਬਾਂ ਤੇ ਟੰਗੇ ਨੇ ਲੱਥਣੇ ਨਹੀਂ 

ਰਾਜ ਬਦਲਣਗੇ ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨ ਲਹਿਣਗੇ।


ਇਹ ਜੁ ਰੰਗਾਂ 'ਚ ਚਿੱਤਰੇ ਨੇ ਖੁਰ ਜਾਣਗੇ

ਇਹ ਜੁ ਮਰਮਰ 'ਚ ਉੱਕਰੇ ਨੇ ਮਿਟ ਜਾਣਗੇ।

ਬਲਦੇ ਹਥਾਂ ਨੇ ਜਿਹੜੇ ਹਵਾ ਵਿਚ ਲਿਖੇ 

ਹਰਫ਼ ਉਹੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲਿਖੇ ਜਾਣਗੇ।


ਇਹ ਵੀ ਸ਼ਾਇਦ ਮੇਰਾ ਆਪਣਾ ਵਹਿਮ ਹੈ

ਕੋਈ ਦੀਵਾ ਜਗੇਗਾ ਮੇਰੀ ਕਬਰ 'ਤੇ 

ਜੇ ਹਵਾ ਇਹ ਰਹੀ ਕਬਰਾਂ ਉੱਤੇ ਤਾਂ ਕੀ 

ਸਭ ਘਰਾਂ 'ਚ ਵੀ ਦੀਵੇ ਬੁਝੇ ਰਹਿਣਗੇ


सुरजीत पातर की रचनाप्रक्रिया उन्हें विशिष्ट बनाती है। और ग़ज़ल के नुक्ते अद्भुत। बहुत बार स्थानीय अलगाववादी धड़े के तमाम कुप्रयासों के बावजूद पातर और उनकी कविताएँ और प्रतिबद्धता उन्हें बदनाम करने की सब कोशिशों को धत्ता बताती हैं। समकालीन कवियो की तरह पातर राजनीतिक मुखरता से हस्तक्षेप नही करता मसलन स्वर भिन्न था।   

  अपने एक साक्षात्कार में वे कहते भी हैं कि...

"मार्क्सवाद और इंकलाबी कम्युनिष्ट क्रांतिकारी उभार के राजनीतिक पक्ष के बारे में मेरी कविताओं में सीधे कोई नारा शायद न मिले, पर यह भी सच है कि इस विचार के मानवीय पक्ष, नवयुवकों की त्याग भावना और विचार के आधार पर मर-मिटने के जज्बे ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया है।“


ये वही दौर था जब पटियाला यूनिवर्सिटी में वे पढ़ रहे थे और हर तरफ - नक्सल गतिविधियों का घेराव था और  पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन से भी वे भवुकता के स्तर पर जुड़े हुए थे। तो इस विचारधारा का कहीं न कहीं उन पर प्रभाव साफ साफ झलकता भी है। उनकी कविताओं में मुखर दुस्साहसी राजनीतिक स्वर खुला नहीं है। मार्क्सवाद के राजनीतिक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दर्शन का प्रभाव उनके चेतना स्तर के तर्कणा को वैज्ञानिक द्वन्द्व भिन्न भिन्न  स्तर के भावों को स्थापित करती है। जीवन उनके सौन्दर्यबोध में घुल-मिल गया है, जो उनकी कविता को एक गहरी सघनित ठोस मानवीय दृष्टि से ओतप्रोत करता है। जैसे संवेदन समुद्र में गोता लगाया हो...

    यह कविता.....

     

मेरी माँ मेरी कविता को समझ न पाई

बेशक़ मेरी माँ-बोली (मातृ-भाषा) में लिखी हुई थी


वह तो केवल इतना समझी


पुत्र की रूह को दुःख है कोई


पर इसका दुःख


मेरे होते कहाँ से आया


बड़े ग़ौर से देखी


मेरी अनपढ़ माँ ने मेरी कविता :


देखो लोगो


कोख से जन्मे


माँ को छोड़


दुःख काग़ज़ों से कहते हैं


मेरी माँ ने काग़ज़ उठा सीने से लगाया


सुरजीत पातर की कविताओं की भावभूमि बहुधा जिन रोमानियत भरे सूफ़ीज़म से साथ उतरती है, वे प्रदूषित भावों के होते हुए भी लौकिक सरोकारों और संवादों के जरिए सामाजिक चेतना के उभार के बाद सहज ढल जाते हैं। कविता में व्यथा तो है, पर उससे उबरने की ताकत भी वहां मिलती है। सुरजीत पातर की कविताओं, गीतों और ग़ज़लों में ज़िन्दगी का बहुत ही करीब से स्पर्श मिलता है, जो पाठक को एक ऐसे संसार में लेकर जाता है, जहां पीड़ाओं का परागा भुनती कोई भट्टी वाली नही है बल्कि सामूहिक पीड़ाओं का रुदन ढोती लोकचेतना है जिसने दुखों से उबरने के लिए पीड़ाओं को शब्द दिए  और अर्थ जो निरर्थक नही है। महज एक आक्रोश की अभिव्यक्ति से अलग पातर की कविता छात्र नोजवानो की दुनिया में हीनताबोध से ग्रस्त मानवीय जन समूहों की तरफ इशारा करते हुए एक दिलासा देती है, वह कविता के स्पर्श को महसूस कर सकता है। कविता उलझे-उदास मन को इस तरह थाम लेती है, जैसे मिट्टी पौधे की जड़ को। बिना किसी शोर के पातर की कविता व्यथित मानव समूह और  मन को सहारा देती है। इस विशिष्टता के बारे में पातर स्वयं कहते हैं कि वे जिस माहौल में पले-बढ़े, उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी थी। मानव जीवन की प्रेमिल और भौतिक सुख, उल्लसित संवेदन उजास पातर की कविताओं में है।

पंजाबी कविता की सबसे बड़ी परेशानी प्रसंशकों और आलोचकों की है :- जो कविता को कविता रहने नही देते बल्कि उन्हें किसी बीमारू आदर्श के ढांचे पर लाद कर रख देते हैं। यह ज्यादातर कवियो की कविताओं का साझा दुख रहा है। सुरजीत पातर की कविताओं से वे अतिभावुक जन परहेज थोड़ा करेंगे- बल्कि इन्हें तो भावों का गला घोंटकर मारने तक का हास्यास्पद सा भाव भी उभर कर सामने आता है। जैसे यह कहना कि " पातर के लिए रचना कर्म एक उच्च धार्मिक दीठ या इबादत भांत की है''- हकीकतन ऐसे पाठकों से बचाव जरूरी है। 

पातर जिस मानववादी दृष्टिकोण के आधार पर काव्यगत भावभूमि को लोक में हल्के भावों के साथ ठोस सरोकारो को स्थापित करते हैं वे उनके सौन्दर्यबोध के दर्शनिक स्तर पक्का मापक बन उभरता है।  उनका लेखन, कविता, ग़ज़ल इसी कारण मनुष्यता की गहरी मानवीय संबंधो को स्थापित करते हुए..... भावभूमि बन जाती है। पातर की कविताओं में आदर्श भाव पधर और नेरोदिक सूफी धारा का हल्का प्रभाव मिलता है। सुरजीत पातर को पंजाबी में एक समृद्ध काव्य परम्परा मिली है सहज संभव है कि उनपर कई प्रभावों की छाप मिलेगी ही। वे ग़ालिब और इक़बाल की शायरी से भी खुद को प्रेरित बताते हैं। पंजाबी के अनेक महान कवियो की परम्परा में से वे कुछेक का प्रभाव स्वीकारते हैं जैसे शिव  बटालवी,  वीर सिंह और मोहन सिंह का प्रभाव भी स्वीकार करते हैं। दरअसल छात्र उभार, किसान कम्युनिष्ट उभार और खालिस्तान अलगाववाद का भयावह दौर था तो क्रांतिकारी प्रतिरोध का भी महाकाव्यात्मक दौर था जिसमे तटस्थ रहना जुल्म में शामिल होना मान लिया जाना भी बुरा नही था फिर भी दूसरे कवियों की तरह पातर खुद को किसी भी राजनीतिक मत से प्रतिबद्धता के साथ नहीं पाते हैं मगर तटस्थ भी नही रहे- यह एक सजग कवि का दीठ बेहतरीन दीठ पधर है।

 मेरी माँ और मेरी कविता

मेरी माँ मेरी कविता को समझ न पाई

बेशक़ मेरी माँ-बोली (मातृ-भाषा) में लिखी हुई थी

वह तो केवल इतना समझी

पुत्र की रूह को दुःख है कोई

पर इसका दुःख

मेरे होते कहाँ से आया

बड़े ग़ौर से देखी

मेरी अनपढ़ माँ ने मेरी कविता :

देखो लोगो

कोख से जन्मे

माँ को छोड़

दुःख काग़ज़ों से कहते हैं

मेरी माँ ने काग़ज़ उठा सीने से लगाया

शायद ऐसे ही कुछ मेरे क़रीब आ जाए

मेरा जाया।


वह दिन

वह दिन यदि अब कभी मिले

मैं उसकी श्वेत हंस जैसी काया पर

मरहम लगा दूँ

पर दिन कोई घर से रूठ कर गया जना तो नहीं

जिसके बारे में कभी पता चले यहाँ है, कभी पता चले वहाँ

और फिर किसी शाम

वह फ़टे हाल घर आ जाए

या किसी स्टेशन पर

गाड़ी का इंतज़ार करता मिल जाए

दिन कोई घर से रूठ कर गया जना तो नहीं

दिन तो हमारे हाथों से मरे हुओं के

कराहते प्रेत हैं

जिनके घावों तक अब हमारे हाथ नहीं पहुँचते

अभी गुज़री कल तक

सदियों तक नहीं पहुँचती

आज की चीख


बांसुरी वृत्तांत

कोई बाँसों का जंगल जल रहा था

हरे नयनों से का

जल झर रहा था

इक आई बांसुरी

सहने लगी जब

अग्नि का ताप

यूँ कहने लगी तब :

मेरे बांसों के जंगल शांत हो जा

मेरी ओर देख

मैं तेरी ही जाई हूँ

तू जलता है तो मैं समझाने आई हूँ

जलते जंगल ने देखा बांसुरी की ओर

उसकी सुर्ख आँखों में अंगारे दहकते थे :

हमें तुम मत सुनाओ अपने यह उपदेश आकर

हवा से कहो जाकर

जो एक ओर तुम्हारे जैसे को

ज़मीं से टूटे हुओं को

ऐसे नग़मे सिखाती है

दूसरी ओर झंझा बनकर आती है

हमारी आग में ही

वह हमारे वंश को


लट लट जलाती है।


हवा के पास आई बाँसुरी :


बात सुन री ऐ हवा


बुरा लगता है


जब कुछ बुरा


तेरे बारे में


मेरे होंठों पे आये


पर आज तुम बहुत ही बेरहम लगती हो


जलाती हो जो तुम बांसों के जंगल


इतना तेज़ बहती हो


हवा फुँफकार उट्ठी :


अरे, तुम सात आँखों वाली होते हुए भी अंधी हो


अंधी बांसुरी रोए हवा को।


नहीं तुम जानती


मेरा नहीं है वश कोई इस पर


यह धरती है


कहीं से ठंडी और कहीं से गर्म


ठंडी से गर्म की ओर जाना ही है मेरा धर्म


जाओ पूछो धरती से जाकर।


धरती ने कहा :


मेरे बांसों की बेटी


ओ मेरी वंशी


मैं तुम्हारा दुःख समझती हूँ


पर मैं सूरज के आकर्षण में बँधी हूँ


घूमती हूँ


इसी कारण


कहीं है छाँव कहीं धूप


कहीं ठंडा कहीं गर्म मेरा रूप


तो मैं सूरज के पास जाऊँ?


बांसुरी ने पूछा


तो हँसी धरती :


उस संतपित से तुम क्या प्रश्न पूछोगी


झुलस जाओगी


यदि उस के पास जाओगी।


तो रब के पास जाऊं?


रब? वह तो खुद है एक सवाल


पता नहीं आदमी उसका या वह है आदमी का ख़्याल


वे कहते हैं रब तो सब कुछ है


दहकता वन भी, बजती बांसुरी भी


झुलसती धरती भी वर्षा बरसती भी


रब अपनी रब्बता की भाषा में ही बोलता है


सिर्फ़ बंदा ही उसके भेद कुछ कुछ खोलता है


आई बांसरी बन्दे के होंठों से जुड़ गई


हवा में मल्हार की धुन गूंज उठी


कलेजा बांसुरी का चाहे बिंधा हुआ था


दहकते जंगलों का तेज़ तीखा ताप भी था


कुछ रिमझिम के थे इमकान भी


और किसी इलाही राज़ के खुलने का आह्वान भी...

             ● सतीश छिम्पा

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