एदुआर्दो गालेआनो :- जीवटता का प्रतीक
● सतीश छिम्पा
गालेआनो को छापना दुश्मन को छापना है.......
(एदुआर्दो गालिअानो की लिखी 'ओपन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका' का हिंदी अनुवाद "लातिन अमरीका के रिसते जख्म)
एदुआर्दो गालेआनो ने लातिन अमेरिका में जंगो, तख़्ता पलटों और सैनिक तानाशाही के बीच अपना लेखन, पत्रकारिता और मेहनतकश आवाम की मुक्ति के लिए अपने स्तर पर काम किया था। उन्होंने उस काले वक्त को भोगा था जब लातिन अमेरिकी राष्ट्रों में पिनोशे जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के पिट्ठू मनुष्यता और मनुष्यता के पैरोकारों का कत्ल कर रहे थे। वे ज़िंदा लोगों को मार और निष्काषित कर रहे थे। वे खदानों, खेतों, जंगलों और मेहनतकशों को लूट रहे थे। लातिन अमेरिका लुट रहा था और अमेरिकी कुत्तेशाही के सामने सशक्त प्रतिरोध बना था वहां का साहित्य... जिनमे गालेआनो प्रमुख थे। "आग की यादें" ऐसी ही एक किताब है- मगर बात ये भी है कि इस किताब को पढ़ने से पहले "लातिन अमेरिका के रिसते ज़ख्म" को पढ़ना बेहद जरूरी है, जिसमे लातिन अमेरिका की आर्थिक,राजनितिक और सामाजिक ग़ुलामी और उससे मुक्ति के प्रयासों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।
इस किताब को पढ़ने के बाद जॉन बर्जर की बात सही लगने लगती है कि, "एदुआर्दो गालेआनो को छापना दुश्मन को छापना है:-- झूठ, उदासीनता और सबसे बढ़कर फ़रामोशी का दुश्मन। उनका शुक्रिया कि हमारे अपराध याद रखे जाएंगे। उनकी नज़ाकत तबाह कर देने वाली है, उनकी सच्चाई गुस्से से भरी हुई है।"
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वर्तमान व्यवस्था को जारी रखना अपराध को जारी रखना है। हमेशा ही हड़प लिए गए संसाधनों की वसूली अपनी नियति की पुनःप्राप्ति है। (इसी किताब से..........)
ग़ुलाम अपनी शक्ति और अपने दिन सोना साफ़ करने के सयंत्रों में बिताते। "वहां वे काम करते हैं", लुईस गोमेस फेर्रेइरा लिखता है, एक डॉक्टर जो अठारहवीं सदी के पहले भाग में मिनास गेरिस में रहता था, "वहां वे खाते हैं और अक्सर वहीं सो जाते हैं। और जब वे काम करते हैं तो पसीने से नहा जाते हैं, उनके पैर हमेशा ठण्डी ज़मीन पर, पत्थरों पर या पानी में रहते। जब वे आराम करते या खाना खाते तो उनके रोम छिद्र बन्द हो जाते हैं और वे इतने ठंडे हो जाते हैं कि कई खतरनाक बीमारियों के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं, जैसे कि उरोग्रह (पलुओरिस), रक्तघात और पक्षघात के दौरे, ऐंठन नमोनिया और दूसरी घातक बीमारियां"
मिनास गेरिस के जंगलों के कप्तानों ने उन ग़ुलामो के सर के बदले सोने में अपना इनाम हासिल किया जिन्होंने भागने का प्रयास किया था। बीमारी एक ईश्वरीय वरदान थी क्योंकि इसका मतलब मृत्यु का आगमन होता था।
इसी किताब से...
1916 के वसंत में जब लेनिन ने अपनी किताब साम्राज्यवाद की रचना की उस समय लातिन अमरीका में विदेश से होने वाले सारे प्रत्यक्ष निजी निवेश का पांचवे हिस्से से भी कम संयुक्त राज्य अमरीका से आता था। आज लगभग तीन चौथाई प्रत्यक्ष निजी निवेश अमरीका से आता है। वह कौनसा साम्राज्यवाद था जिसे लेनिन जानते थे? अपने उत्पादों के लिए विश्व बाज़ार खोजते औद्योगिक केंद्रों का अत्यधिक लालच। कच्चे माल के सभी सम्भव स्रोतों पर कब्ज़ा करने की अतिव्याकुलता। लोहे, कोयले और पेट्रोलियम की लूट। प्रभुत्वशाली इलाकों में नियंत्रण को आपस में जोड़ते रेलमार्ग। वित्तीय एकाधिकारियों के सब कुछ ले लेने वाले ऋण। सैन्य अभियान और विजय के लिए युद्ध। ये एक ऐसा साम्राज्यवाद था जो ऐसी किसी भी जगह को अपने ज़हर का निशाना बनाता जहां एक उपनिवेश या अर्ध उपनिवेश अपनी खुद की एक फैक्ट्री बनाने का साहस दिखाता।
इसी किताब से.....
क्या हमारे लिए हाथ बांधकर रखने के अलावा सबकुछ वर्जित है? गरीबी किस्मत में नही लिखी गयी है। और अल्पविकास ईश्वर की रहशयमयी परिकल्पना का हिस्सा नही है। क्रान्ति के मुक्तप्रद साल बीतते जाते हैं। शासक वर्ग इंतज़ार करते हैं और इसी बीच प्रत्येक व्यक्ति को नर्क की आग में जलाने की व्यवस्था करते जाते हैं।
इसी किताब से......
लातिन अमरीका के राष्ट्रों और वहां के मेहनतकशों की नियति बहुत कुछ भारत से मिलती है। अतीत में पुर्तगाल की मूर्खता की चासनी में डूबी धूर्त सत्ता के माध्यम से पहले स्पेन, इंग्लैंड, डच और फ़्रांस ने वहां सोने और चादी और बाद में चीनी, कॉफ़ी और टीन के लिए लूट मचाई और लातिन अमरीका के मूलनिवासियों का या तो सीधे ही कत्लेआम किया या फिर उन्हें ग़ुलाम बनाकर उनके श्रम को इस कदर चूस लिया कि मौत ही उनकी मुक्ति बन गयी थी। बाद में अमरीकी आर्थिक साम्राज्यवाद के ज़हरीले नाग ने जब लातिन अमरीका को ऐसा डसा जिससे वहां के लोग आज तक नही उबर पाए हैं। और जहां कहीं भी चुनाव और संसदीय तरीके से मेहनतकशों ने साम्राज्यवादियों को देश बाहर करने के लिए क्रांतिकारी ताकतों का सहारा लिया तो वहां सीआईए के कुत्तों द्वारा सैनिक तानाशाहों द्वारा तख़्ता पलट करवाकर जीवन को खत्म करने और लूट को जारी रखने के उद्देश्य से मेहनतकश आम लोगों का जीना हराम करवा दिया और मौत के दस्ते बना बनाकर कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को ढूंढ़ ढूंढ़ कर उनकी हत्याएं करवा दी गयी। और अनेक देश बाहर कर दिए गए। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों शातिर पूंजीपतियों साम्राज्यवादियों और सीआईए के इशारों पर लातिन अमरीका में वैसा ही मौत का तांडव करवाया गया जैसा नई दुनिया की खोज और उसके तीन दशकों बाद तक यूरोपियन ताकतों ने लातिन अमरीका में किया।
अक्सर दूसरों की थाली के लाडू बड़े लगते हैं। जाहिर सी बात है कि हम भारतीय लोगों ने गुलामी के समय जो जुल्म सहे बर्बराना और घातक थे लेकिन लैटिन अमेरिकन शोषण इससे भी ज्यादा भयानक था। यूरोपीय लोग जब अमेरिकी महाद्वीप पहुंचे, उस समय वहां पर आबादी थी जो बसी हुई थीं। उजास को कहा कर पसर चुके उस अंधेरे समय मे वहां अनेक निवासी रहते थे। लेकिन, यूरोपीयों के अत्याचार के बाद लगभग दो सौ सालों में उनकी जनसंख्या बहुत कम रह गई। यूरोपीय वहां पर हीरे, सोने और चांदी की तलाश में गए थे। सोने-चांदी के लालच में उन्होंने कबीले के कबीले दफन कर दिए। सभ्यताओं को जमीन में गाड़ दिया। पहले तो उन्होंने सोना-चांदी छीना। फिर वे जमीनों को खोदने लगे। उन्हें हजारों-लाखों मजदूर चाहिए थे। मूल निवासियों को उन्होंने जानवरों से भी ज्यादा बुरी तरह से काम कराना शुरू किया।
गिरमिटियों की तरह काम करते हुए यहां के मूल निवासी औसतन सात साल तक जीवित रह पाता था। यूरोपीय लोगों द्वारा लाई गई बीमारियों से मूलनिवासी मक्खियों की तरह मरने लगे। विद्रोहियों के पूरे कबीलों को चेचक का टीका लगा दिया जाता था। उनके खेत उजाड़ दिए जाते थे। ताकि वे सोने-चांदी की खदानों में काम करें। यूरोपीय लोगों की सेनाएं घोड़ों पर सवार होकर पशुओं की तरह मूल निवासियों के शिकार पर निकलती थीं। मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। यूरोपीय सेना के वीर सिपाही मूल निवासियों को मारकर उनके अंडकोष काटकर अपने मुखिया के सामने पेश करते थे। हर अंडकोष पर उन्हें इनाम मिलता था। लातिन अमेरिका के खून की एक-एक बूंद चूस-चूस कर यूरोप को चढ़ाई गई। तब जाकर यूरोप के चेहरे पर ये चमक-दमक दिखाई पड़ती है।
यहां तक कि वे मूल निवासी अपने बच्चों को मार देते थे। वे खुद को मार देते थे। जब सोना-चांदी व अन्य धातुएं खतम हो गई तो यूरोपीय लोगों ने यहां पर गन्ने, रबर, कोको व कॉफी की खेती शुरू कर दी। खदानों व बड़े-बड़े बागानों में काम करने के लिए बड़े पैमाने पर मजदूरों की जरूरत थी। अफ्रीका से गुलाम पकड़ कर लाने का एक नया व्यापार शुरू हुआ। अफ्रीका से लातिन अमेरिका लाने के दौरान ही आधे से ज्यादा गुलाम जहाज की अमानवीय जिंदगी में मर जाते थे। जो बच जाते थे उन्हें गुलामों की मंडियों में बेच दिया जाता था।
पूरे विश्व के मेहनतकशों का दुःख दर्द और शोषण से उपजी पीड़ाएं एक सी होती है और पूंजीपतियों की हरामी चालें और लूट के लिए जीवन को खत्म कर देने के इरादे एक जैसे होते हैं। जहां कहीं भी प्रतिरोध होता है या तो सीआईए और या फिर उसके टुकड़ों पर पलने वाले कुत्ते उसे खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जा पहुचते है। सत्तर के दशक में छपी यह किताब लातिन अमरीका सहित तमाम विश्व और भारत में आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी की तब दी, हत्यारों ने रूप बदला है शोषण की नियत और ज़ुल्म का ढंग नही.बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और विनाश की शर्त पर विकास भारत के मेहनतकशों का लहू चूस रहा है।.... गार्गी प्रकाशन से इसका हिंदी अनुवाद छपा है। भारत के तमाम युवाओं को यह किताब पढ़नी चाहिए और परिस्थितियों पर विचार करके मुक्ति का मार्ग गढ़ना चाहिए।
● सतीश छिम्पा
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