निकोलाई ऑस्त्रोवस्की, पाब्लो नेरुदा और अलेक्सांद्र

हमारे पुरोधा-1
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अलेक्सान्द्र अलेक्सांद्रोविच फ़देयेव (1901-1956)
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                                     ● सतीश छिम्पा

         वे न केवल महत्वपूर्ण उपन्यासकार थे बल्कि पेशेवर क्रांतिकारी भी थे।उन्होंने क्रान्ति के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था,उनका जन्म ही पेशेवर क्रांतिकारियों के परिवार में हुआ था।1918 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने।1918 से 1920 के बीच गृहयुद्ध के दौरान उन्होंने साइबेरिया में वाइट गार्ड्स की टुकड़ियों और हमलावर जापानियों के विरुद्ध लड़ाइयों में हिस्सा लिया।1921 में फदेयेव ने क्रोन्स्ताद सोवियत विरोधी विद्रोह को दबाने में हिस्सा लिया।1926 में फदेयेव मास्को लौट आए और लेखक संघ के लिए राजनितिक कार्य करने लगे।



     1918-1920 के दौरान हुए गृहयुद्ध से हासिल अनुभवों से उन्होंने 'पराजय' नामक प्रसिद्ध उपन्यास लिखा था।
            नात्सी विरोधी महासंग्राम (1941-45) के दौरान उन्होंने लाल यौद्धाओं के शौर्यपूर्ण अतिमानवीय संघर्षों पर कई महत्वपूर्ण निबन्ध और रचनाएँ लिखी थी।
        1945 में प्रकाशित फदेयेव का दो खण्डों वाला उपन्यास तब से लेकर आजतक मुक्तिकामियों के लिए महाकाव्यात्मक संघर्ष के लिए प्रेरणा स्रोत है जो उन्हें गोर्की के बाद के उनके महत्वपूर्ण उत्तराधिकारियों में शामिल करता है।उपन्यास के केंद्र में भूमिगत कोम्सोमोल (युवा कम्युनिस्ट लीग) के युवक युवतियां है जो जर्मन कब्ज़े के बाद गुप्त क्रन्तिकारी कार्यवाहियों का संचालन करते हैं।मगर एक कमज़ोर और गद्दार व्यक्ति के कारण सभी लोग दुश्मनो द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाते हैं और उन्हें बर्बर यातनाएं दी जाती है मगर वे टूटते नहीं है और अंतिम सांस तक संघर्ष करते हैं।अंत में उन्हें जिंदा दफन कर दिया जाता है।
          महान स्टालिन की मौत के बाद संशोधनवादी ख्रुश्चेव की घटिया नीतियों और नौकरशाही के चलते अदम्य बलिदानो के बाद हुई क्रांति से बने सोवियत संघ और मेहनतकशों को जो नुकसान हो रहा था।नेतृत्व पतन की और बढ़ रहा था.....उससे फदेयेव को बड़ी ठेस पहुंची थी।नतीजतन वे अवसाद का शिकार हो गए और 13 मई 1956 को उन्होंने आत्महत्या कर ली।
           संशोधनवादियों ने इसे स्टालिन कालीन अतिरेकों का परिणाम बताकर स्टालिन को बदनाम करने में कोई कसर नही छोड़ी।मगर सच्चाई फदेयेव की मौत के चौंतीस बरस बाद 1990 में तब सामने आई जब सोवियत अभिलेखागार खुला और फदेयेव का सुसाइड नोट दुनियां के सामने आया।
       फदेयेव ने लिखा है-
      "मेरे लिए अब और जीना असम्भव हो गया है,क्योंकि जिस कला को मैंने अपना जीवन दिया है वह पार्टी के आत्मविश्वासी,अज्ञानी नेतृत्व के द्वारा तबाह की जा रही है और इसे ठीक कर पाना अब सम्भव नहीं रह गया है।साहित्य के सर्वोत्तम कैडरों का इतनी बड़ी संख्या में शारीरिक तौर पर खात्मा किया जा रहा है,या सत्ता में बैठे लोगों की आपराधिक चश्मपोशी के चलते इतनी बड़ी संख्या में वे मर रहे हैं-जितना की जार के छत्रप तक ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते थे।
          साहित्य नई व्यवस्था का उच्चतम फल था,जिसे हीन बनाया जा रहा है,उत्पीड़ित किया जा रहा है और नष्ट किया जा रहा है।लेनिन की महान शिक्षाओं के प्रति नवधनाढ्यों की आत्मतुष्टि ने-इन शिक्षाओं के प्रति आस्था की उनके द्वारा कसमें खाने के बावजूद-मेरे भीतर उनके प्रति सम्पूर्ण अविश्वास भर दिया है।हम उनसे स्टालिन के मुकाबले बदतर की ही उम्मीद कर सकते हैं।वह कम से कम एक शिक्षित व्यक्ति थे।ये नए सत्ताधारी लोग अज्ञानी हैं।
      एक लेखक के रूप में मेरी ज़िन्दगी पूरी तरह बेमानी हो चुकी है।मैं अपार हर्ष के साथ ये जीवन त्याग रहा हूँ।इसे मैं एक घ्रणित जीवन स्थिति से मुक्ति के रूप में देखता हूँ,जहाँ आपके ऊपर लगातार कमीनगी,झूठ और कुत्सा प्रचार की बरसात होती रहती है।सरकार चलाने वाले लोगों को यह सब बताना मेरी आखिरी उम्मीद थी,लेकिन पिछले तीन वर्षों के दौरान,मेरे अनुरोध के बावजूद वे मुझसे मिलने के लिए समय तक नहीं निकाल पाए।
       मेरी इच्छा है मुझे मेरी माँ के बगल में दफना दिया जाए।"
        अंतिम सांस तक समाजवाद में उनकी आस्था बनी रही थी। वे एक ईमानदार क्रांतिकारी और लेखक थे जो जीवन की उज्ज्वलता और गरिमा को बनाए रखना चाह रहे थे मगर खरुश्चेवी संशोधनवाद और सत्ता की नौकरशाही के चलते वे निराश हो गए और आत्महत्या कर ली।

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.... अग्निदीक्षा और जय जीवन

निकोलाई ऑस्त्रोवस्की :- अग्निदीक्षा और जय जीवन
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( महत्वपूर्ण कवयित्री कात्यायनी लिखती हैं कि
       "धरती पर समय समय पर उठ खड़े होने वाले क्रांतिकारी तूफानों के अग्निगर्भ से जो जीते जागते मिथकीय चरित्र उत्पन्न होते हैं, निकोलाई ओस्त्रोव्स्की उन्ही में से एक था। एक सच्चा क्रांति-सेनानी, एक सच्चा जननायक है।")

छात्र नोजवानो और उन युवतरों के लिए ये दो किताब किसी जीवन के सबसे जरूरी पाठ की तरह है जिन्हें हर एक को पढ़ना बहुत जरूरी है
       निकोलाई ऑस्त्रोव्स्की सोवियत क्रान्ति में अदम्य साहस और वर्ग शत्रुओं के विरुद्ध प्रचण्ड आक्रोश के साथ उभरने वाले महान बोल्शेविक क्रांतिकारी थे।
  निकोलाई ऑस्त्रोव्स्की का जन्म 1904 मे रोवनो प्रदेश के ऑस्त्रोव्स्की जिले के विलिया नामक गांव में हुआ था।  इस अदम्य क्रांतिकारी और लेखक का बचपन भयंकर गरीबी और शोषण में गुज़रा। उसी शोषण और गरीबी ने निकोलाई के मन में वर्ग शत्रुओं के प्रति निर्मम घृणा के बीज बो दिए थे। अन्याय और जीवन के अपमान और श्रम के शोषण के विरुद्ध विद्रोह करने और प्रतिरोध में खड़े होने की प्रेरणा इन्ही कठोर दिनों ने उन्हें दी थी।
     
      9 वर्ष की उम्र में वे गवाळिये का काम करते थे और 11 वर्ष की उम्र में यूक्रेन के शेपेतोवका नामक शहर में एक रेस्टोरेंट के बावर्चीखाने में काम करते थे।
    रेस्तरां की गन्दगी और गुलामी से निकल कर निकोलाई कई बार अपने भाई पास चले जाते थे जो पास ही रेलवे में मिस्त्री था। इसी जगह पर उन्होंने मानवाधिकारों के लिए मज़दूरों के संघर्ष की बात सीखी और बोल्शेविकों के मुंह से पहली बार लेनिन का नाम और विचारों के बारे में सुना।
     अगस्त 1919 में घर से भागकर वे लाल सेना में दाखिल हो गए।वहां एक अदम्य वीर यौद्धा बनकर वे उभरे..... क्रांतिविरोधियों पोलों, कज़्ज़ाकों और जर्मनों के विरुद्ध हिरावल में रहते हुए उन्होंने धनपशुओं के अमानवीय क्रूर दस्तों को धूल चटाने में मेहनतकशों की सेना में योगदान दिया था।
       1921 के वे कठोर दिन निकोलाई के लिए खतरनाक साबित हुए जब वे कीव में युवा कम्युनिस्टों के कोमसोमोल के प्रधान बना दिए गए। वे अपनी क्षमता से ज्यादा काम करके महान क्रान्ति में योगदान दे रहे थे मगर युद्धों में मिले ज़ख्म हरे हो गए और उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया मगर वे अतिमानवीय जज़्बे से मोर्चे के आगे डटे रहते थे।
      1924 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। तब तक उनका स्वास्थ्य इतना चोपट हो चुका था कि वे कुछ भी नहीं कर पाते थे। वे हिलडुल नहीं सकते थे और नज़र भी चली गयी थी। और यही वो दौर था जब निकोलाई ने क्रांति के नये महामानव के लिए काम करने की सोची और अपनी पत्नी और मित्रों की सहायता लेकर महान उपन्यास 'अग्निदीक्षा' लिखना शुरू किया। वे बोलते थे और उनके साथी लिखते थे। नवम्बर 1930 में उन्हीने यह उपन्यास लिखना शुरू किया और जून 1933 में ये किताब पूरी हुई।
       अग्निदीक्षा नए सोवियत महामानव के जन्म की कहानी है जिसने मानवता के हक में क्रूर राजशाही और समन्तवादियों से लोहा लिया और मेहनतकशों के लिए मेहनतकशों की व्यवस्था लेकर आए।

निकोलाई की कुछ महत्वपूर्ण बातें.......

"सिर्फ अपने परिवार के लिए जीना, घृणित निजवाद है। सिर्फ एक व्यक्ति के प्यार के लिए जीना, नीचता है और ख़ुद के लिए जीना निर्लज्जता है।"

            ० निकोलाई ऑस्त्रोव्स्की

मैं जानता हूँ कि मैं बहुत दिन तक नही जिऊंगा। मेरे अंदर एक आग है जो मुझे खाए जा रही है, और उसे नियंत्रण में रखने के लिए मुझे अपनी सम्पूर्ण संकल्प शक्ति को लगाने की जरूरत रहती है। इस समय तो मैं ज्यों त्यों ऐसा करने में समर्थ हूँ। मुझे इस अवसर से पूरा पूरा लाभ उठाना है जो प्रकृति ने मुझे सौंप रखा है। इससे चुक जाने से पहले जो कुछ मैं अपनी जनता के लिए लिख सकता हूँ, मुझे लिखना होगा। मेरे पास समय थोड़ा है, मुझे जल्दी करना होगा।

          •निकोलाई ऑस्त्रोवस्की ('जय जीवन'  किताब से जिसमे ऑस्त्रोवस्की के खत और कुछ अन्य सामग्री भी

निकोलाई ओस्त्रोव्स्की का पत्र पिता और बहिन को

        नोवोरोसीस्क,24 अक्टूबर 1926

पूज्य पिताजी,प्रिय कात्या,

                      मुझे अपने कागज़ात वक्त पर मिल गये। धन्यवाद! आपने मेरी जरूरत की सब चीज़ें भेज दीं। किसी तरह समय कट रहा है, बस।नहीं,नहीं,तकिया मत भेजिए और कोट भी नही। कोट बेच दो माँ,अगर उसका कुछ मिलता है तो,और उससे अपने जरूरत की कोई चीज़ ले लो। मुझे उसकी जरूरत नही। मैं बीमार हूँ। मेरी टांगों में इतना दर्द नही जितना रीढ़ की हड्डी में है। मुझे बिस्तर पर लेटे रहना पड़ता है। बस लेटे रहता हूँ,और पढ़ता रहता हूँ। मेरी सेहत बिलकुल चोपट हो गयी है। कुछ भी करूं इसमें कोई सुधार नज़र नही आता। अब यही चाहता हूँ गर्मी का मौसम आ जाए। तब मैं समुद्र के किनारे अनापा में रह सकता हूँ। मुझे आपको खत लिखे कुछ समय हो गया है,क्षमा मांगता हूँ। पर मेरे पास अपने दर्दों और पीड़ाओं के अलावा कुछ लिखने को नही है। और इनके बारे में मैं लिखना नही चाहता। मैं इनसे लाचार हो चूका हूँ। सुधरने का कहीं संकेत मात्र भी नही,हर रोज़ हर चीज़ वैसी की वैसी रहती है।
             पूज्य पिताजी,आपका स्वास्थ्य कैसा है?मुझे पत्र लीखिए। मेरा सबको सप्रेम अभिवादन तथा शुभकामनाएँ।

                                  आपका
                                   कोल्या

(धरती पर समय समय पर उठ खड़े होने वाले क्रांतिकारी तूफानों के अग्निगर्भ से जो जीते जागते मिथकीय चरित्र उत्पन्न होते हैं,निकोलाई ओस्त्रोव्स्की उन्ही में से एक था। एक सच्चा क्रांति-सेनानी,एक सच्चा जननायक.......-कात्यायनी)

"आदमी की सबसे बड़ी दौलत उसकी जिंदगी होती है, और जीने के लिए आदमी को बस एक ही जिंदगी मिलती है। उसे इस तरह अपनी जिंदगी जीनी चाहिए ताकि उसे मन ही मन इस दुःख की यंत्रणा को न सहना पड़े कि उसने अपनी जिंदगी के साल यों ही गुजार दिए हैं, ताकि उसे इस जिल्लत की आग में न जलना पड़े कि उसका बीता हुआ जमाना नीचे गिरा और ओछा था। उसे इस तरह से जीना चाहिए कि मरते वक्त यह कह सके कि मैंने अपनी सारी जिंदगी, अपनी सारी शक्ति संसार के पवित्रतम कार्य में लगाई है- मानवजाति की आज़ादी की लड़ाई में लगाई है। और आदमी को अपनी जिंदगी के एक एक क्षण का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि कौन जाने कब कोई अचानक बीमारी या करुण दुर्घटना बीच में ही उसकी जिंदगी के सूत को काट दे।"

( "अग्निदीक्षा" )

"अकिम क्या तुम सच में ये सोचते हो कि ज़िन्दगी एक कोने में दबा मेरा गला घोंट सकती है ? जब तक मेरे सीने में यहाँ ये धड़कन है----जब तक ये धड़कन बाकी है तब तक कोई भी मुझे पार्टी से काटकर अलग नहीं कर सकता सिर्फ मौत ही मुझे लड़ने वालों की कतार से अलग कर सकती है, ये बात याद रखना मेरे दोस्त"

(निकोलाई ऑस्त्रोवस्की के उपन्यास अग्निदीक्षा मे पावेल और अकिम का संवाद).....
  
"सिर्फ अपने परिवार के लिए जीना, घृणित निजवाद है। सिर्फ एक व्यक्ति के प्यार के लिए जीना, नीचता है और ख़ुद के लिए जीना निर्लज्जता है।"

 "उसको (निकोलाई को)  दिसम्बर को बीमारी का एक और दौरा आया जो अंतिम और घातक सिद्ध हुआ। जिस तरह वह दर्द से छटपटाया,वह किसी भी इन्सान के लिए असह्य होता। विवश होकर उसने मार्फिया का इंजेक्शन लेना स्वीकार किया।
     पर उसने 'कोम्सोमोल्स्काया प्राव्दा' के दफ्तर को टेलीफ़ोन किया।

"क्या मेड्रिड के मोर्चे पर साथी अब भी डटे हुए हैं?"

फ्रांको के फासिस्ट लश्कर स्पेन की राजधानी का घेरा डाले बैठे थे।
मेड्रिड का मोर्चा अभी तक कायम था और ओस्त्रोवस्की ने उल्लसित होकर कहा-

"ठीक है: तो मैं भी डटा रहूँगा"

(जय जीवन' किताब से....)

जीवन का सम्मान और संघर्षों को नई परिभाषा देने वाले क्रांति झंझा के महान यौद्धा निकोलाई ओस्त्रोवस्की के जीवन के अंतिम दिन की ये घटना उनकी क्रांति के प्रति दीवानगी और बोल्शेविज्म, मार्क्स और महान लेनिन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। ये दर्शाती है कि किस कदर उनमे वर्ग शत्रुओं और फासीवादियों के प्रति घृणा भरी थी। ओस्त्रोव्सकी को क्रांतिकारी सलाम।

       
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(● आ.ले. -- ७)

पाब्लो नेरुदा :- सच्चे मार्क्सवादी कवि की दो बात जन्मदिन विशेष
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(आज मेरे प्रिय कवि पाब्लो नेरुदा का जन्मदिन है.... इसी उपलक्ष्य पर पढ़ें जरूरी पोस्ट जो सन 2018 ई. में एक आर्टिकल लिखा था मैंने, सन्दर्भ सहित)

                                  
                                ० सतीश छिम्पा

      चिली में एक आदमी एक दरख़्त तले मरा पड़ा था और उसकी लाश के पास पाब्लो नेरुदा की कोई कविताओं की किताब थी जिसमे अवसाद से भरी कुछ कविताएँ थी। नेरुदा को जब इसका पता चला तो उन्होंने कभी अवसाद भरी कविताएँ ना लिखने का फैसला कर लिया था।

नेरुदा जब नोबल पुरस्कार लेने जा रहे थे तो हवाई अड्डे पर एक पत्रकार ने उनसे सवाल पूछा, "आपकी नजर में सबसे सुंदर शब्द कौनसा है ?"

-"हालांकि इस शब्द को अखबारों और रेडियो पर बहुत बार लिया गया है इसलिए यह आपको पुराना लग सकता है मगर मैं फिर भी कहूंगा 'प्यार' सबसे सुंदर शब्द है।"

       वे सच्चे अर्थों मे कम्यूनिस्ट कवि थे। सारी धरती उनका देश थी। तानाशाह फ्रांको के विरुद्ध संघर्षरत स्पेनी क्रांतिकारी हो या सोवियत यौद्धा, मुक्ति मोर्चे पर लड़ने वाले हर मुक्तिकामी के लिए उनके मन मे सम्मान था। अमेरिकी पूंजीवादी दैत्य के पंजो में फंसे लातिन अमेरिका के हर देश ने उनके लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए थे क्योंकि वे दक्षिण अमेरिका को पूंजीवादी साम्राज्यवाद से मुक्त देखना चाहते थेे। क्यूबा की सामाजिक जनवादी क्रांति हो या चिली में अलेंदे की लोकतांत्रिक वामपंथी अलेंदे की सरकार, हर एक प्रयास को उनका समर्थन था। उन्हें चिली से भी निष्काषित कर दिया गया था। 

              निश्चय ही पाब्लो नेरुदा कालजयी और पुरोधा कवि है। इसमें कोई दो राय नही कि नेरुदा की कविता प्रेम को प्रकृति के साथ मिला चिले की भौगोलिक सीमाओं को लाँघ विश्व कविता पर छा गयी थी। मगर फिर भी नेरुदा के कवि के दो रूप हमारे सामने आते हैं। एक स्पानी गृहयुद्ध के दौरान का वैचारिक क्रांतिकारी कवि और दूसरा बाद के समय का भी अलग नेरुदा का कवि।
        संशोधनवादी होने से पहले की नेरुदा की कविता अपनी सभी प्रकाष्ठाओं को लांघ विश्व प्रसिद्ध इसलिए होती है क्योंकि उस समय उनके मार्क्सवादी विचार कविता और चेतना से एकमेक होकर लोक को सृजित कर रहे थे,वे क्रांतिकारी थे संघर्ष शील थे..जीवन से भरे हुए नेरुदा तब जीवन को कविता में रच रहे थे...जब उन्हें स्पेन का राजदूत बनाया गया था तो उसी दौरान स्पेनी गृहयुद्ध छिड़ गया था और नेरुदा गणराज्य के पक्ष में उठ खड़े होने वालों में आग्गु थे,लोर्का की हत्या ने उन्हें विचलित किया था।लगभग थोड़े समय के ऊपर नीचे या कहें उसी दौर के आस पास उनकी "प्रेम की बीस कविताएँ और उदासी का एक गीत",दुनियां में बसेरा"(दो खण्डों में) "कैंटो जनरल" किताबें आई जो कि बेहतरीन थी। 

    एक समय बाद उनमे उदारवाद की गैर-क्रांतिकारी झलक के तौर पर विचलन साफ दिखाई दे रहा था।   जब महान क्रांतिकारी चे ग्वेवारा की शहादत को एक महान क्रांतिकारी की जुदाई बताया लेकिन साथ ही ये भी साफ़ कर दिया कि वह चे की मृत्यु पर शोक से अधिक चिले कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापक लुई एमिलियो रिकाबरन की मृत्यु से दुखी है। उन्होंने चे की हिंसक क्रान्ति से अधिक संशोधनवादी संसदीय शांतिपूर्ण क्रान्ति(? यही शब्द थे) की वकालत की और एक जगह पर तो उन्होंने चे को आतंकवादी भी कह दिया था। नेरुदा का यह रेशनल और आलोचनात्मक रवैया अपने समय के अधिकाँश महान कम्युनिस्ट नेताओं के प्रति दिखाई पड़ता है। वे स्टालिन के प्रशंसक भी थे और आलोचक भी- आलोचना प्रशंसा के घाल मेल में वे अक्सर साम्राज्यवादी हलकों में गलत सन्देश पंहुचा देते थे। स्टालिन के नेतृत्व में बन रहे नए सोवियत संघ के वे प्रशंसक तो थे ही मगर स्टालिन का शुद्ध मार्क्सवादी-लेनिनवादी रूप उन्हें पच नहीं रहा था। यही विचार उनके माओ के प्रति थे। चीन में माओवाद को व्यक्ति पूजा का नाम देकर उन्होंने इसकी खूब आलोचना की थी। .....

   नेरुदा की इस दौरान की कविताएँ कभी उतनी प्रसिद्ध नही हो सकी जितनी उनके क्रांतिकारी कवि के समय की हुई थी। इस समय में वे औरत को खेत और ख़ुद को हल कहकर विचलन का गम्भीर सन्देश देने लगे थे।  उनकी क्रांतिकारिता से ज्यादा जीवन के सौंदर्यबोध और प्रतिबद्धता को ही प्रकाश में लाया जाना चाहिए था।  हालांकि उनका संशोधवादी रूप को या कहें हल्के विचलन को ज्यादा दिन नही मील और चिली तख़्ता पलट के बाद वे फिर से अध्ययन और मनन करते हुए-- चीजों को समझने लगे थे।
 उनको समय कम मिला और उन्होंने "कॉमरेड,यह बागीचे का समय है" जैसी कविता रच डाली थी।आलेन्दे की मौत और पिनेशो द्वारा तख्ता पलट ने उन्हें झकझोर दिया था। आलेन्दे की मौत के 12 दिन बाद नेरुदा चल बसे थे।

       साधारण शब्दों में कहूँ तो नेरुदा विश्व कवि के रूप में एकमात्र कवि है।  कविता बस एक ही बार नाराज होकर नेरुदा से दूर धुई थी, तब जब वे म्यांमार में चिली के राजदूत थे लेकिन वे प्रतिबद्ध  मार्क्सवादी विचारों से भरे थे  तो कविता भी दूर नही गई को।

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जवाहर लाल नेहरू और पाब्लो नेरुदा...
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  (सन 2018 ई. में एक आर्टिकल में दर्ज किया था मैंने पाब्लो के बारे में।)

          कल से जवाहरलाल नेहरू पर बहुत सी पोस्ट्स देख पढ़ चुका हूँ तो सोचा क्यों न विश्व कवि पाब्लो नेरुदा की भारत यात्रा और नेहरू से मुलाकात का अनुभव भी यहां लिखा जाए....
              "सन 1950 में मुझे फिर एक बार भारत जाना पड़ा। पैरिस में जोलियो क्यूरी ने मुझे एक ख़ास मिशन पर भेजने के लिए कहा। मुझे नई दिल्ली जाना था और अलग-अलग तरह के राजनीतिक विचारों वाले लोगों से सम्पर्क करना था और भारत में शान्ति के आंदोलन को मजबूत करने की संभावनाएं तलाशनी थी।
        नेहरू ने अगली सुबह अपने दफ्तर में मिलने का समय दिया। वे उठे और चेहरे पर बिना किसी स्वागत मुस्कान के भाव के मुझसे हाथ मिलाया। उनका चेहरा इतनी बार छप चुका है कि उसे बताने की जरूरत नहीं। काली, ठंडी आँखे भाव शून्य रूप से मुझे देख रही थी। तीस साल पहले स्वाधीनता के एक बड़े प्रदर्शन में उनसे और उनके पिता से मेरा परिचय करवाया गया था। मैंने इसका जिक्र किया लेकिन उनके चेहरे पर कोई फर्क नहीं आया। एक आध शब्द में सब बातों का जवाब देते रहे और ठंडी आँखों से मुझे घूरते रहे।
     मैंने उनके मित्र जोलिओ क्यूरी का पत्र उन्हें दिया। उन्होंने कहा कि उनके मन में फ्रेंच वैज्ञानिक क्यूरी के लिए बहुत सम्मान है और फिर वे पत्र पढ़ने लगे। उसमे क्यूरी ने मेरा परिचय भी दिया था और मेरे काम में नेहरू को मदद करने को भी कहा था। उन्होंने उसे पढ़ा और पढ़कर वापस लिफाफे में रख दिया और बिना कुछ कहे फिर मुझे देखने लगे। मुझे अचानक लगा मेरी उपस्थिति उनमे एक तरह की वितृष्णा जगा रही है। मुझे यह भी लगा कि पीतवर्ण का ये आदमी जरूर किसी बुरे शारीरिक, राजनीतिक या मानसिक अनुभव से गुजर रहा है।। उन्हें देखकर लगता था कि उनमें ऊँचा होने, शक्तिशाली होने का गुमान है। ऐसा सख़्त आदमी जो केवल आदेश देने का आदि है लेकिन नेता होने के गुणो से वंचित है। 
    "वापस जाकर मैं प्रोफेसर क्यूरी को क्या बताऊँ??"
    "मैं उनके पत्र का उत्तर दे दूंगा" उन्होंने रूखेपन से कहा। 
   मैं कुछ मिनिट तक चुप रहा। वे कुछ क्षण बहुत ही लम्बे लगे। मुझे लगा अपने मिशन के बारे में कुछ कहना चाहिए,"शीत युद्ध कभी भी युद्ध में बदल सकता है।" मैंने भयानक आण्विक हथियारों का भी जिक्र किया। ऐसे में जो युद्ध नहीं चाहते उन सबको एक साथ आना चाहिए।
  वे खोए रहे जैसे मेरी बात सुनी ही न हो और,"दोनों ही पक्ष एक दूसरे पे शांति के लिए तर्क फेंक रहे हैं।" मैं समझ गया कि बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी।

    
       पांच साल बाद मुझे मास्को में लेनिन वार्षिक शांति पुरस्कार समिति में बैठने का मौका मिला। एक अंतर्राष्ट्रीय समिति जिसका मैं हिस्सा था। जब उस साल के पुरस्कार के लिए लोगों के नाम पर वोट करने का अवसर आया तो भारतीय प्रतिनिधि मंडल ने नेहरू का नाम सुझाया। मेरे चेहरे पर हंसी की एक छाया घूम गयी, जिसे वहां उपस्थित लोगों में से कोई नहीं समझ पाया। मैंने उसके पक्ष में मत दिया। अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार में नेहरू को विश्व शांति का प्रबल समर्थक कहा गया।"

("मेरा जीवन, मेरा समय" पाब्लो नेरुदा की आत्मकथा से, अनुवादक कर्ण सिंह चौहान)

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