अमृता जो महज एक नाम नहीं है.....

अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ
  
                                            ● सतीश छिम्पा
         अमृता, जी, अमृता ही- यह केवल एक नाम भर ही नही है बल्कि जीवन जीने की दीठ है- शब्द की गरिमा है कलाओं का माध्यम है तो प्यार का अथाह सागर है। जीवन जो इन्ही के बीच पसरा है


..... लेकिन कौनसी अमृता, कहाँ की अमृता- साड़ी वाली विद्रोही मगर मुक्ति की कामना वाली अमृता या सूट वाली आकंठ प्यार में डूबी साहिर की प्रेमिका, चन्दन नेगी की सहेली या..... या.....   अमृता शेरगिल.. जी, बिल्कुल, अमृता शेरगिल ना केवल भारतीय प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक थीं- बल्कि मिजाज़ से भी जादुई थी। उनका जन्म बुडापेस्ट (हंगरी) में हुआ था। कला, संगीत व अभिनय बचपन से ही उनके साथी बन गए। २०वीं सदी की इस प्रतिभावान सुंदर युवती को अनेक सम्मान मिले। इसके पिता उमराव सिंह शेरगिल और हंगरी मूल की यहूदी ओपेरा गायिका मां मेरी एंटोनी गोट्समन की यह संतान ८ वर्ष की आयु में पियानो-वायलिन बजाने के साथ-साथ कैनवस पर भी हाथ आजमाने लगी थी। आज से दशकों पहले इस बात को कहने वाली अमृता शेरगिल वह कलाकार थीं, जो अपने समय से बहुत आगे थीं। 

    महज तीस साल की छोटी-सी ज़िन्दगी में अमृता ने इतिहास को उन गहरे रंगों से भर दिया जिनकी छाप आज भी फीकी नहीं पड़ी है और शायद इसलिए उनकी ज़िन्दगी भले ही लम्बी नहीं थी पर बहुत बड़ी थी, लेकिन उसकी चेतना का स्तर... अद्वितीय थी। लगभग बीस साल की थी वह जब उसने कहा था कि, "मैं सिर्फ हिंदुस्तान में चित्र बना सकती हूँ। यूरोप तो पिकासो, मेटिक्स का है.... और हिंदुस्तान मेरे लिए है

      बहुत ही जल्दी, कम उम्र में दुनिया को अलविदा कह गई यह खूबसूरत चित्रकार- अपने अल्प जीवन में स्त्री और समानता के और विद्रोह के जो मानक तय करके गई थी- बाद में अमृता प्रीतम इस जगह से आगे का सफर तय करती है।

        अमृता प्रीतम जिस रूहानियत के तिलिस्म को रोमानी गाढ़े भावो के साथ अलौकिक दृश्य बिंब जो स्थापित करती है वो उसके सृजन का सर्वोच्च पक्ष है। जहां प्रेम या प्रेमिका या वस्तु, पात्र या भाव जो भी हो, सब उसी की छाया में चलते हुए छाया जैसा हुआ दिखता है। कबरां विच्चों बोल - इसी मर्म की जादुई कविता है।
    अमृता प्रीतम की यह एक प्रसिद्ध कविता है जिसमे बंटवारे के भारत विभाजन के समय हुए पंजाब के भयंकर हत्याकांडों का अत्यंत दुखद वर्णन है। यह कविता ऐतिहासिक मध्यकालीन पंजाबी कवि वारिस शाह को संबोधित करते हुए हैं जिन्होंने मशहूर पंजाबी प्रेमकथा हीर- राँझा का सब से विख्यात प्रारूप लिखा था। वारिस शाह से कविता आग्रह करती है के वे अपनी क़ब्र से उठे, पंजाब के गहरे दुःख-दर्द को कभी न भूलने वाले छंदों में अंकित कर दें और पृष्ठ बदल कर इतिहास का एक नया दौर शुरू करें क्योंकि वर्तमान का दर्द सहनशक्ति से बाहर है।
यह कविता भारतीय पंजाब और पाकिस्तानी पंजाब दोनों में ही सराही गयी। 


   यह खुद को आजाद करना नही था ना ही यह कोई क्रांतिकारी या इंकलाबी विद्रोह था यह अनेक भटकावों विचलनों के बाद का सामान्य विद्रोह था- जो उस समय बहुत बड़ी बात तो थी- साथ ही अराजक्ताओं के चलते खुद को प्रतिरोधकता के साथ चाहकर भी नही खड़ा कर पाई थी। यह आम भावुकता का मुद्दा नही है कि गुणगान में हम इतने अधमरे हो जाएं कि अपने प्रिय लेखकों के वे मानव या कहने जीवन के गद्दारी भरे काम या लिखतें जो भी हो का सटीक वर्णन हो ना करें तो क्या फ़ायदा अदब में बौद्धिक अश्लीलता को फैलाने में...जबकि यहां अमृता ने सबसे सुखाळा जो बेखुदी में ही थापित मानक था कि सिर से पांव तक वह साहिर के प्रेम में डूब जाने और लोक संवेदन की बेअदबी किए बिना ही इस प्रेम के  अराजक आनंद को लेने या भोगने के लिए गृहस्थी छोड़ निकल जाने को इस इंकलाबी रूप में दिखाया गया है, इंकलाब की गरिमा में बट्टा लगाने का काम करता है। जैसे कि कहा कि आसान नही था मगर फिर भी उस महान पलटाव के शब्द को अपवित्र नही किया जा सकता क्योंकि यह मात्र एक अराजक द्रोह था जिसके उत्प्रेरक तत्व अमृता प्रीतम तक आने से बहुत पहले अमृता शेरगिल और फ़रीदा के पास विकसित और मुखर हो जाने के बाद आगे बढ़े थे। 
 मृता प्रीतम को इंकलाबी कहना इंकलाब की हेठी करना है, उनकी अलग महानता है- उसे वहीं तक रहने दिया जाए। एक व्यक्ति ने लिखा है कि-" अमृता ने नारी मुक्ति का झंडा लेकर कभी आक्रामक रुख इख्तियार नहीं किया, बहुत कोमलता लेकिन दृढ़ता से वो एक व्यक्ति के तौर पर अपनी आजादी पर अडिग रहीं। वो आजादी की पक्षधर थीं और इस पर कभी समझौता नहीं किया। टूट कर प्रेम किया लेकिन ऐसा प्रेम जिसमें डूब कर इंसान खुद को पा लेता है, जो बांधता नहीं आजाद करता है, अनाम रिश्तों को बेहद अपनेपन से जीया, लीक से लगे-बंधे रिश्तों में जो विरोधाभास थे, उनकी कशमकश को अपनी रचनाओं में उभारा।''- अमृता ने खुद को जितना ऊपर स्थापित किया है उसके प्रशंसकों ने उसको उतना ही नुकसान पहुंचाया है। अकारण नही है कि अमृता युवावस्था के समय ज्यादातर की प्रिय लेखिका बनी है। 


  पंजाबी ही नही बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाओं में अमृता प्रीतम एक बहुत बड़ा और महान नाम है। अमृता ने पंजाबी लेखन ही नही बल्कि भारतीय भाषाओं के तमाम साहित्य के लेखन को प्रभावित किया था। एक अलग शैली , एक अलग मगर बेहतरीन भाषा का रचाव था उनके पास।  और आज ही के दिन सन 1919 ई. में पाकिस्तान के गुजरांवालां में इस अद्भुत लेखिका का जन्म हुआ था।. अमृता प्रीतम ने भारत-पाकिस्तान का बंटवारा देखा था। भोगा था। दोनों देशों के लोगों की भावनाओं को समझा, पीड़ाओं को छुआ था और यही वजह थी कि उनके साहित्य में मुलायमियत के बावजूद बहुत रोमानियत भरी हुई उकताहट दिखती है और इसीलिए बटालवी की तरह ही उन्हें भी दोनों देशों का प्यार हासिल हुआ था। अमृता प्रीतम मूल रूप से कवयित्री थीं, लेकिन उनकी लिखी कहानियां, उपन्यास भी उतने ही प्रसिद्ध हुए हैं। अमृता की कालजयी जो रचनाएं थी वे इतनी मर्मस्पर्शी हैं कि इनका दायरा भारतीय भाषाओं को लांघकर विश्व की भाषाओं में अनुवाद लायक व्यवहार तय करती है। खासकर रसीदी टिकिट, पिंजर, अपने अपने चार बरस (संपादित), एक थी सारा (पाकिस्तानी शायर सारा शगुफ़्ता पर संपादित किताब.) के कारण ही उनकी स्थापना यहां कालजयी और महान रचनाकार के रूप में हुई है और उसमें भी खासियत यह कि वे एक शैली और एक भाव और एक ही दुख को लगातार पांच दशकों तक ढोती रही है। यहां उनका यह आत्मकथ्य आपके सामने लेकर आना जरूरी लगा , -- "मैं बहुत छोटी थी, जब मां नहीं रही- तो रात को जब मैं छत पर सोती, लगता- चांद पर मेरी मां का नाम लिखा हुआ है. चांद की छाती पर पड़े हुए जिन दो अक्षरों के साये दिखाई देते, वे दो अक्षर 'र' और 'ज' थे. मेरी मां का नाम राज था, और इन्हीं दो अक्षरों का साया मुझे चांद में दिखाई देता रहा. उठती हुई जवानी के साथ, उन्हीं दो अक्षरों में एक अक्षर और मिल गया 'न' और मुझे लगता, जिसके नाम के तीन अक्षरों का साया चांद पर दिखाई देता है, वह राजन जरूर कहीं इस दुनिया में होगा, जो कभी मुझे मिलेगा.

जिस तरह गीली मिट्टी पर से गुजरने वाले के पैरों के निशान वहां पड़े हुए दिखाई देते हैं, ठीक उसी तरह मुझे चांद में उसका नाम दिखाई देता और मैं सोचती- वह कभी एक मुहब्बत बन कर जाने किन राहों से गुजरता हुआ मेरी जिंदगी में आएगा. मैं जिंदगी भर अक्षरों को कागज पर उतारती रही, लेकिन अहसास वही बना रहा कि सारे अक्षर चांद पर से गिरते हैं. इसीलिए एक बार कहा...... जाने क्या, सुना कुछ नही.." वे अनसुने नही रहे।

      अमृता प्रीतम अगर पंजाबी का अतिक्रमण करके हिन्दी, उर्दू और भारतीय भाषाओं के अलावा कई अन्य भाषाओं में पढ़ी जाने वाली बड़ी लेखिका बनी है तो उसके पीछे इन्ही रचनाओं का आधार है। उनका  ऊपर लिखा जो आत्मकथ्य है उसका अगला भाग देखें '--, " जब मैं पैदा हुई, तो घर की दीवारों पर मौत के साये उतरे हुए थे... मैं मुश्किल से तीन बरस की थी, जब घुटनों के बल चलता हुआ मेरा छोटा भाई नहीं रहा. और जब मैं पूरे ग्यारह बरस की भी नहीं थी, तब मां नहीं रही. और फिर मेरे जिस पिता ने मेरे हाथ में कलम दी थी, वे भी नहीं रहे... और मैं इस अजनबी दुनिया में अकेली खड़ी थी- अपना कहने को कोई नहीं था। समझ में नहीं आता था कि जमीन की मिट्टी ने अगर देना नहीं था, तो फिर वह एक भाई क्यों दिया था? शायद गलती से कि उसे जल्दी से वापिस ले लिया और कहते हैं- मां ने कई मन्नतें मान कर मुझे पाया था, पर मेरी समझ में नहीं आता था कि उसने कैसी मन्नतें मानीं और कैसी मुराद पाई? उसे किस लिए पाना था अगर इतनी जल्दी उसे धरती पर अकेले छोड़ देना था।  


   जब छोटी सी थी, तब सांझ घिरने लगती तो मैं खिड़की के पास खड़ी कांपते होठों से कई बार कहती- अमृता! मेरे पास आओ।. शायद इसलिए कि खिड़की में से जो आसमान सामने दिखाई देता, देखती कि कितने ही पंछी उड़ते हुए कहीं जा रहे होते... जरूर घरों- अपने-अपने घोसलों को लौट रहे होते होंगे... और मेरे होंठों से बार-बार निकलता- अमृता मेरे पास आओ! लगता, मन का पंछी जो उड़ता-उड़ता जाने कहां खो गया है, अब सांझ पड़े उसे लौटना चाहिए... अपने घर-अपने घोसले में मेरे पास..."

    अमृता लेखकों की तीन पीढ़ियों की चहेती रही  है- अक्सर उसके पास, उसके घर मे लेखक आते जाते रहा करते थे। इतना ही नही, कई बार उसे झगड़े तक सुलझाने पड़ जाते थे, जैसे-- पाश और बटालवी का

        कहीं खुद पाश ने ही लिखा था कि-"  जब वो स्टेज से नीचे उतरा तो हमने उसे एक तरफ बुला लिया। और भी बहुत सारे लोग उसके आसे पासे जुड़े थे.....


    लोग अपने महबूब शायर को घेरे खड़े थे जो बोल भी रहे थे, - "आपकी कुछ नई नज़्में बहुत ही अच्छी हैं, और हम सभी आपको आपकी कविता के इस नए मोड़ के लिए मुबारकबाद देते हैं।


- "कौनसी नई नज़्में" शिव ने पूछा


- बुड्ढी अख, फ़र्क अते.....


- तो पहले क्या मैं बकवास ही लिखता रहा ??


- नहीं पहले भी बढ़िया लिखते थे पर अब और भी अच्छा लिखने लगे हो।

          वो कुछ गुस्से में आ गया लगता था। उसके हाथ में कोई किताब थी। उसने पटक कर जमीन पर मारी। मेरे साथ वाले काफी खीज गए थे। मैंने  किताब उठा ली और कहा- " इतना ख़ूबसूरत लिखने वाले को शराब में बेसूरत होकर कविता पढ़ने की आदत छोड़ देनी चाहिए।"


- "ये बुर्ज़ुआ आदत है" किसी दूसरे ही के मुंह से निकला,उसका गुस्सा शिखर पर आ गया। उसने मुझे बाजुओं पर से पकड़ लिया।


- "मैं बुर्ज़ुआ हूँ? ये घड़ी तूने पहनी है। ये टैरालिन की कमीज़ तूने पहनी हुई है। मेरे पास कुछ भी नहीं। और तुम मुझे बुर्ज़ुआ कहते हो?" शिव ने अपना कोट उतारकर फैंकने की कोशिश की।

- "ले ये कोट ही है जो तेरे से ज्यादा पहन रखा है, अगर मैं ये कोट ही उतार दूँ तो क्या मुझे इंकलाबी मान लोगे ?"


- "इंकलाबी होना या हट जाना कोई कोट उतारने या पहनने जैसा अमल नहीं है।" ....मैंने  उसके कोट के बटन बंद करते हुए कहा।


- "तुम बड़े..... तुम मुझे मार्क्सवाद की एक भी लाइन कोट करके बता दो।"


- "ये किस ख़ुशी में ?"


- "तुमने मार्क्सवाद की एक भी किताब पढ़ी है ? तूं किसी एक की लाइन सुना" शिव ने कहा


- "पढ़ाओ भई इसे माओ का ग्रन्थ।" पीछे से कोई बोला तो सारी भीड़ में ठहाके फूट पड़े। समागम के प्रबन्धक घबरा के दौड़े और घबराए शिव को खींच के ले गए। 


           अमृता के पास अक्सर पाश का आना जाना लगा रहता था। ऐसे ही किसी दिन वहां जब सब बैठे थे तो अचानक एक शब्द सुन के बटालवी चौंका जैसे कि अचानक उसे पता लगा हो कि मैं वहां बैठा हूँ,- "पाश मैं बहुत रोया जब मुझे पता चला कि मेरे साथ झगड़ा करने वाला तूं ही है। मुझे यकीन नहीं हुआ की तूं ऐसा कैसे कर सकता है ? मैं तेरा ख़त पढ़कर अनेक बार रोया, जो आदमी इतना सुंदर ख़त लिख सकता है वो मेरी इस तरह बेअदबी कैसे कर सकता है ? पाश तूं भूषण से पूछ लेना कि मैं कितना रोया तेरा खत पढ़ पढ़कर, मुझे कई रात नींद नहीं आई, देख तेरे ख़त बारे कविता लिखकर मैंने उसे अमर कर दिया।"

             शिव बहुत भावुक हो गया था। अमृता ने बीच में पड़कर बात का रुख बदला।


      सन 1967 ई में पश्चिम बंगाल से शुरू होने वाली नक्सल लहर जो एक महान कम्युनिष्ट लहर में बदल गई थी की देन है पंजाबी साहित्य में आमूल चूल बदलाव और जीवन और उसकी गरिमा को स्थापित करने वाली इंकलाबी कविता का उत्स जो किसी उजास की तरह से हुआ था। जबकि इससे पहले जो प्रेम और व्यक्तिगत संघर्षों के महिमा मंडन, प्यार के बीमार पक्ष मतलब निराशा, जुदाई आदि का हावी होना बहुत अश्लील था। यह अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटालवी का दौर था।  शिव कुमार बटालवी के गीतों में प्यार के संक्रामक पक्ष, उसकी "बिरह की पीड़ा’ इस कदर सघन थी कि उस दौर में पंजाबी ही नही बल्कि भारतीय भाषाओं में कई बड़ी कवयित्री  अमृता प्रीतम ने उन्हें ‘बिरह का सुल्तान’ नाम दे दिया था। शिव कुमार बटालवी पंजाबी का वह शायर जिसके गीत भाषाओ के बंधनों को तोड़कर आजाद हो चुके थे। पंजाब ही नही बल्कि उसकी ख्याति हर कहीं फैली थी। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए किसी छुपे प्रेमी की तरह की इबारत की तरह लिखा था वो जब स्टेज पर होते तो अनेक फरमाइशें आती थी इस एक गीत की। 
इक कुड़ी जिहदा नाम मुहब्बत ग़ुम है’

ओ साद मुरादी, सोहनी फब्बत
गुम है, गुम है, गुम है
ओ सूरत ओस दी, परियां वर्गी
सीरत दी ओ मरियम लगदी
हस्ती है तां फूल झडदे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी

शिव की लूणा से लेकर बाकी काव्य संग्रह तक लोकप्रिय तौर पर उनका कोई भी काम हिंदी भाषा में नहीं आया है। उधर अमृता प्रीतम लगातार नित नई स्थापनाएं  किए जा रही थी। साठ के दशक के इस दौर  प्रसिद्धि की बुलंदियों पर थी अमृता। इस दहकते लाल अंधड़ की शुरुआत हुई तो अमृता के साथ ही गति से स्थापित हुआ शिव हिंदी भाषी लोगों के बीच लोकप्रिय हुए को भी हाशिए पर बैठाया गया थे। उनके लिखे गीत जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की जोड़ी ने जब हाय तो वे हमेशा हमेशा के लिए लोकप्रियता के आसमान में दर्ज हो गए।। ये इस तरह के मानसिक रोग पैदा करते बीमार से गीत क्यो छा गए थे पंजाब में, क्यों अमृता के अवसादों भरे साहित्य का इतना भरा पूरा दायरा हुआ। क्या कारण था, कारण, आर्थिक ऊंचाइयां, जहां पेट की भूख शांत हो चुकी थी।


           पेट की भूख  शांत हुई तो जिस्म की तलब हुई और बीमार कविताओ का दौर शुरू हुआ। मगर जैसे ही पश्चिम बंगाल से इंकलाबी, कम्युनिष्ट लहर का प्रचण्ड उभार हुआ, वैसे ही उठते गए जवान मरजीवड़े क्रांतिकारी और फिर उठे भूख, अन्याय, असमानता और संघर्ष का दौर- पेट की और जीवन के अस्तित्व के लिए जूझ रहे वर्ग के लिए जुझारू कविता का दौर आया, जो आज तक कायम है। इसी का असर था कि शिव बटालवी ने अमर शहीद बाबा बूझा सिंह की शहादत पर एक कविता लिखी थी जो चर्चित रही। अमृता जो तब तक बहुत ऊंचे कद को छू गई थी- महानता की राह पर थी मगर इंकलाबी शहादतों पर जिसकी कलम मोन रही, उसने वारिश को गाना ठीक समझा तो उनके नकार में उतरे इंकलाबी शायरों ने जवाब इस तरह दिया जो आगे बताया जाएगा।

पंजाब में जब नक्सलबाड़ी लहर का कम्युनिष्ट उभार बहुत प्रचण्डता के साथ उठा तब नोजवान क्रांतिकारियों ने पंजाबी की प्रगतिवाद के नाम पर लिखी जा रही बीमार कविताओं को हाशिए पर पटक दिया। राजसत्ता के बर्बर जुल्म सहते युवा ने जब कलम उठाई तो परम्परागत भाषा नहीं, शब्द नहीं, अर्थ नही, बल्कि उन्होंने इंकलाबी शब्दों में मुक्ति का बारूद भरकर लिखी अनेक विस्फोटक कविताएं.......... यह वही दौर था जब अमृता प्रीतम चर्चाओं का सिरे पर थीं और उनकी यह कविता जो अमरता की राह बढ़ ही रही थी- राह में इंकलाबी कविताओं का लाल सैलाब आ गया- कविता निम्न है.......
आज्ज आखां वारिस शाह नूं
कित्थे कबरां विचों बोल ते आज्ज किताबे ईश्क दा
कोई अगला वर्का फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी तूं लिख लिख मारे वैण
आज्ज लखां धिया रोंदियां तैनूं वारिस शाह नूं कैण
उठ दर्दमंदा देया दर्दिया उठ तक्क अपना पंजाब
आज्ज वेले लाशा विछियां ते लहू दी भरी चिनाव
किसे ने पंजा पाणियां विच दित्ती जहर रला
ते उणा पाणियां धरत नूं दित्ता पानी ला
इस जरखेज जमीन दे लू लू फुटिया जहर
गिट्ठ गिट्ठ चड़ियां लालियां ते फुट फुट चड़िया कहर
उहो वलिसी वा फिर वण वण वगी जा

    ...... और कविता के इस ढीलेढाले याचना रूप के विरुद्ध पाश की एक कविता आती है उसी दौर में जिसमें वे अमृता का ना केवल नकार बल्कि बहुत ठोस और स्पष्ट नकार करते हैं... देखें अवतार पाश की उक्त कविता में- 'क्रांति जब आएगी तो तुम्हे भी तारे दिखा देगी'.........
                                      
माशूकाओं को ख़त लिखने वालों
अगर तुम्हारे कलम की नोक बाँझ है
तो कागज़ो का गर्भपात मत करो
बंदूक वालों या तो बंदूक का मुँह दुश्मन की तरफ मोड़ दो
या अपने आप की ओर
तारों की तरफ देखकर क्राँति लाने की नसीहतें देने वालों
क्राँति जब आएगी तो तुम्हे भी तारे दिखा देगी
क्राँति कोई खेल नहीं... नुमाइश नही... मैदान में बहता दरिया नहीं
क्राँति तो दो सभ्यताओं, दो संस्कृतियो का दरिंदराना भिड़ना है
मारना है या मरना है
मौत का डर खत्म करना है
आज वारिश शाह की लाश कांटों वाली थोर बन के समाज के शरीर पर ऊग आयी है
उनसे कह दो
ये युग वारिश का नहीं
वियतनाम का है
हर खेड़े, हर गली में अपने हकों के संग्राम का युग है

  युवा और युवतर कवियो को न केवल फिक्शन के पाठक बनकर रहना है बल्कि उन्हें जीवन को सहेजते हुए इंकलाबी राह की तरफ़ ज्यादा ध्यान देना चाहिए। पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे। उनमें से एक लाल सिंह दिल भी थे--  हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि लालसिंह दिल बेहतरीन क्रांतिकारी कवि थे मगर फासिस्ट सामंती लेखन की दुनिया हमेशा कुत्साप्रचार ही करता है। यह तो सीने मे दहकती आग का ही काम है कि वो जलती चली जा रही है।

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