- सतीश छिम्पा असंदिग्ध रूप से लोकधर्मी कवि हैं। उनकी कविताओं में महज विनिर्मिति की औपचारिकता नहीं है, बल्कि लोक में रहकर सब कुछ आत्मसात करने की और उसे रचनात्मक परिणिति तक ले जाने की बेहद श्रमसाध्य प्रक्रिया भी है।आज के चमकते युवा कवजुड़ सितारों की कविता में जिस तरह की असहनीय अपठनीयता व दोहरावों भरी रूपाकृति की भीषण एकरसता प्राप्त होती है, उसे देखते हुए सतीश छिम्पा की कविताएं काफी सुकून देती हैं। सतीश की भाषा का सबसे सकारात्मक पक्ष है लोकधर्मिता और बिम्बधर्मिता। यहां बिम्ब अदृश्य, ग़ैैर-आनुभाविक व अमूर्त उपादानों के सहारे निर्मित नहीं है, बल्कि कवि की अपनी ज़मीन, परिवेश और जनपद, भौगोलिक तथा सांस्कृतिक उपादानों द्वारा निर्मित है। बिम्बधर्मिता का यही उपलक्षण सतीश को भीड़ में एक विशिष्ट कवि बनाता है।सतीश के पास भाषा का मैकेनिज्म तो है ही, साथ में विषय का मैकेनिज्म भी वह भली प्रकार समझते हैं। उनकी प्रेम कविताएं भावहीन दयालु अरण्य रोदन की परम्परा से पृथक होकर एक नये विजन के साथ संवाद करती हैं। प्रेम कविताओं को प्रतिरोध अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है। लेकिन यह काम दुष्कर और जोखिम भरा है। यहां वैचारिक निष्कर्षों में चूक हो सकती है तथा भाषा में दोहराव का संकट कविता के लिहाज से खतरा बन सकता है, मगर सतीश की प्रेम कविताएं दोहराने और चूक जाने की आशंकाओं के विपरीत नये और जटिल जीवन सत्यों को उघाड़कर रखने का रचनात्मक संघर्ष बरकरार रखती हैं। यहां प्रेम में समर्पण के साथ बौद्धिक सजगता भी है।आत्मीयता की निजी अभिव्यक्ति में भी सृष्टि का पुनर्पाठ है। वैयक्तिकता की भीतरी तहों में सामाजिक दायित्व का निर्वहन भी है। इस सन्दर्भ में उनकी 'इन दिनों', 'तुम्हारे लिए', 'खिलता दिन, बारिश और चश्मे वाली लड़की' पढ़ी जा सकती हैं। कवि यहां जटिल होते जा रहे जीवन में प्रेम की अभिव्यंजना हेतु अनुकूलतम भाषा औजारों का निरन्तर अन्वेषण करता दिखायी दे रहा है। वैचारिकता, बौद्धिकता उसे इस विषय में बेवजह भावातिरेक की तरफ नही ढकेलती, अपितु कवि के भीतर सक्रिय सरोकारों और उसकी चिन्ताओं को प्रस्तावित करने का साधन बनती है। उनकी दूसरी कोटि की कविताओं में जिसके तहत 'थार पेड़ और पहाड़', 'जीवन के पक्ष', 'आओ शोक मानायें, हरजस गायें' आदि कविताएं आती हैं। इन कविताओं में भाषिक कसाव, सहजता, सघन संवेदन, ऊष्मा, लोकधर्मी कवि दृष्टि देखते बनती है। भाषा लोकराग व लोक ध्वन्यात्मकता से अनुगूंजित होकर प्रकृति व मनुष्य के बीच हमसफर का काम कर रही है।इन कविताओं में एक तरफ कवि की पक्षधरता व प्रतिबद्धता का दिग्दर्शन है, तो दूसरी तरफ हम नये लोकजीवन के उपागमों व वस्तु विन्यासों में नवीन सौन्दर्यबोध परिष्कृत संवेदना सधे हुए शिल्प से रूबरू होते हैं। यहां कवि थार, पहाड़ों और पेड़ों से बात करते हुए भी मनुष्यता के व्यापक सन्दर्भों का उल्लेख करता है। वह प्रकृति पीड़ा में जगत की पीड़ा व्यंजित कर रहा है। यही कारण है कि इन कविताओं को किसी मेकअप की दरकार नहीं है। काव्यभाषा का इन्द्रिय बोधात्मक विन्यास, अन्तर्लय युक्त संवेदनशीलता पाठक को बांध कर रखने में सक्षम है।लोकधर्मी कविता की बड़ी पहचान चरित्र हैं। मात्र प्रकृति और वस्तु-विन्यास को लोकधर्मिता कहना लोक का सरलीकरण है। लोक का सबसे ज़रूरी संघटक मनुष्य है। और मनुष्य में भी कर्मशील मनुष्य, वह आदमी जो समाजिक संरचना में अपनी वर्गीय और जातीय अवस्थिति के कारण अन्तिम पायदान पर है। यदि ऐसा मनुष्य कविता में नहीं है, तो लोकधर्मिता संदिग्ध होती है। क्योंकी पीड़ाबोध तो मनुष्य ही व्यक्त करता है।सतीश छिम्पा असंदिग्ध रूप से लोकधर्मी कवि हैं। उनकी कविता 'आओ शोक मनायें हरजस गायें' में भैंस का ठाण निहारती मां, और दो पैग पीकर ललकारता रंघावा इनका अचानक चले आना महज विनिर्मिति की औपचारिकता नहीं है, बल्कि लोक में रहकर सब कुछ आत्मसात करने की और उसे रचनात्मक परिणिति तक ले जाने की बेहद श्रमसाध्य प्रक्रिया भी है। सतीश छिम्पा को पढ़कर कहा जा सकता है कि हिन्दी कविता में लोकधर्मी कविता का भविष्य उज्जवल है। आज का युवा अपनी ज़मीन और परम्परा को पहचानता है, इसलिए वह आभिजात्य रचना उपागमों के आतंक से बगैर प्रभावित हुए अपनी अस्मिता और पहचान से जुड़ी रचनाएं लिख रहा है तथा अपनी परम्परा से जुड़कर आगे ले जाने का काम कर रहा है।
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