वर्धा डायरी (१)
यह जो धरती है वर्धा की...........
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● सतीश छिम्पा
वह मार्च की कोई तारीख़ थी । दो साल पहले जब मैंने पहली बार वर्धा की धरती पर कदम रखा था। वो ही दिन था जब मैं हवाई जहाज में भी पहली ही बार बैठा था। विदर्भ के भूमिहीन किसान मजदूरों पर काम करना था। आत्महत्याओं पर। बिल्कुल अनजान शहर, जगह, और भयानक उमस भरी गर्मी से बेहाल होते हुए भी जाने क्या था इस शहर में कि मुझ जैसे जन्मजात बेचैन आदमी को सुकून मिलने लगा था। यहां अनेक बेहतरीन दोस्तों और साथियों से भी संपर्क हुआ और एक नए रिश्ते के साथ जीवन की भी शुरुआत हुई। अभी उपन्यास भी जल्द ही पूरा होने वाला है।
उसी समय मे कुछ कठोर भी हुआ था जीवन, दिमागी बोझ और ऐसे ही किसी मानसिक तहखाने में पड़ा हुआ मैं जाने, किसके साथ संवाद कायम कर रहा था, यूं ही सा एक बेतरतीब सा आत्म संवाद
::-- "कितनी बार इन सब बेतरतीब कागज़ो और डायरियों को तरतीब देकर लिखा, सहेजा, बचाव किया और फिर हर बार फ़ंटेसी, कहानी या जीवनी या जो भी हो, ढालने की कोशिश की, मगर नही, मैं मेरे 'मैं' के लिए जिस 'नाम' को रख रहा था वो अजब था- गाड़ी सेट नही बैठी..... उफ्फ, यह बेचैनी, अब खुद ही पढ़ें; नीचे एक अध-पागल जो जाने क्यों और कौन सा अफ़साना था जिसको अभी ही, बिल्कुल अभी सब सुन रहे थे। जैसे कील दिया गया हो उन्हें या किसी तिलिस्म में बांधा गया हो। एक किसी कवि जिसका किस्सा लोग हवाओं की सरसराहट में तलाशते हैं। कयास लगाते थे- वो एक बीमार कवि था। एक ऐसा शराबी कवि जिसने खुद से ही खुद को खत्म कर लिया था। मोहब्बत या बेरोजगारी या क्रांति या उपेक्षा, दलगत राजनीति करते लेखक, गांजा, पोस्त या शराब या जो भी हो, वही कारण था उसका, उसकी बर्बादी में हाथ था।
सात साल का अवसादों या कहें दिमागी कारावास भोग कर पिछले एक साल से बहुत खूबसूरत जीवन जो जी रहा हूँ वो तमाम मुश्किल और संघर्षो के बावजूद बहुत प्यारा है। सब जानते हैं सूरतगढ़ की मिट्टी ने बेवफाओं की तरह जब अर्धविक्षिप्त बनाकर छिटकाया तब वर्धा और साथियों ने हौसलों के बल बर मुझे टिकाया था और सकारात्मकता का दौर जो चला मेरा अवदान बन बनकर सामने आया। अंधेरा छंट गया।
अचानक उदासी घेर लेती है तो अगले पल निराशा.... हीनताबोध से जकड़ा हुआ मैं उल्लासों की नाव पर भी चढ़ा तो प्रेम के तिलिस्मी अलौकिक नशें में भी रहा... दुश्मनों की अथाह भीड़ देखी, आश्चर्य, इस भीड़ के ज्यादातर या कहें बहुमत तो मुझसे शक्ल तक से नही जानते, नाम भर सुना और खोल लिए दुश्मनी (आज तक नही समझ पाया) के मोर्चे। भटकावों का सर्वोच्च छूकर लौट चुका हूँ। पीड़ाएं...काफ़्का का धर्म भाई बनेगा क्या लड़के, जाने किसने कहा ::-- काफ़्का को पढ़ना, जैसे जीवित ट्रेजेडी से गुजरना। अवसाद और निराशा के समुद्र से गुजरना। काफ्का का एक एक शब्द, एक एक वाक्य अपने आप में दर्शन है, तभी तो ठहराव है ::-- कोई भी ख़ुद से पलायन नहीं कर सकता। यह नियति है। छूट इतनी भर मिली है कि देखो और भूल जाओ कि तुम्हारे साथ एक खेल खेला जा रहा है।"
जीवन बहुत अनिश्चित होता है। मेरे जैसे अराजक के लिए तो अनिश्चित के साथ मजेदार और खतरों भरा भी। यह कब और कहाँ लेकर चला जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। अपनी लंबी यात्राओं के दौरान मैं प्लेटफॉर्म पर भी सोया हूँ तो एयरकंडीशनर कमरों में भी। फर्स्ट, थर्ड ए.सी. रेल में सफ़र किया है तो सामान्य डिब्बों में पखाने के पास और उसमें घुसकर भी विभिन्न जगहों पर गया हूँ। हवाई जहाज में भी चढ़ा हूँ तो बिना टिकिट डरते- डरते दिल्ली के दिल मे उतरा हूँ। वर्धा में मेरे लोकानुभव सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, इसीलिए मैं इस जगह को प्यार करता हूँ। हार, हताशा, कुंठा और हीनताबोध के परिणामस्वरूप उपजे अवसादों से घिरा मेरा मन आत्महत्या तक का सोच बैठा था। मैं जहां जरूरत होती है, कमजोर होता हूँ और फिजूल जगहों पर दिलेर और बहादुर। सूरतगढ़ वापस जाने का मतलब है फिर अवसादों में डूब जाना, यह बहुत खतरनाक है।
और इस खतरनाक शै का एक लंबा, बहुत लंबा समय मैंने भोगा है, बहुत सघन और गहरे उतरकर।
यात्राओं के दौरान बेहतरीन दोस्त मुझे मिले, जिनकी वजह से मेरी आगे की यात्राएं निश्चित हुई, अनिश्चितताओं से भरी होने के बावजूद। मेरा मन भी अनिश्चितता से भरा होता है। कुछ पता नहीं चलता कि कब कहाँ निकल जाने को तैयार हो जाए। टिकिट मैसूर की हो तो शायद पंचमढ़ी या बैंगलोर की तरफ़ निकल जाए या गोआ की सरहद पर या अरावली ही पुकार ले, कुछ पता नहीं चलता है।
पूरा डेढ़ साल हो गया इस नए जीवन को। आज सोचता हूँ तो गजब भाव जागते हैं। इस बार का दौरा अलग ही सा था। 11 नवम्बर को वर्धा उतरा वाया विश्वरंग 2019 ई. भोपाल तो तब से अब तक तेरह किलो वजन कम हो गया, बिल्कुल बीमार की तरह। डॉक्टर को दिखाया, कोई रोग या खराबी नहीं थी बस शराब छोड़ने के कारण फिटन फिट हो रहा हूँ।
इस बार मेरा भावनात्मक पक्ष बहुत उज्ज्वल गीतों की तरह महका जा रहा है। वर्धा में मेरी चुनिंदा पसंदीदा जगहों में से एक है दीपू का ढाबा, जहां मैं दोनों समय चाय पर चर्चा करने जाता हूँ। और दूसरी अंजली हाइट्स के पास किताबों की दुकान है जिसको अनीता ताई (मराठी में बड़ी बहन को ताई कहते हैं।) चलाती है। यहा मेरी रुचि की किताबों की भरमार है। एक और खासियत है इस जगह की, यह एक ओपन टीं हाउस / कॉफी हाउस भी है। यहां दिन भर बावळीबूच टाइप युवा बिना सिर पैर की रुड़ाते रहते हैं तो शोधार्थी जाने कितना ही क्विंटल भर उठाए देश की राजनीति पर मर्सिया पढ़ते हैं तो हम जैसे कविता, कहानी कला साहित्य और राजनीति और जीवन के मुरीद इन्ही के बीच में या एक तरफ बैठकर प्रेमचन्द से लेकर स्वयं प्रकाश तक और एमिल जोला से लेकर एडुआर्डो जॉमैन तक सबकी चर्चा आम बात है। इसी चर्चा के वक्त जब बंदा छठी या सातवीं चाय पी रहा होता है तब उसको अपना ख़्याल आता है और दौड़ जाता है। कोरोना काल मे जहां सभी अपने अपने दुखों को गा रहे हैं, ऐसे में मैं याद कर रहा हूँ इन्ही जगहों को, युवाओं के जमघट को, बातों को, प्यार, शरारत, टकराव, तकरार, बदलाव, मुक्ति, क्रांति, फासिज़्म, किन्ही सुंदर क्षणों में भर जाना सब कुछ का भीतर।
मनोज पांडे, आशीष मिश्रा, वीरेंद्र प्रताप सिंह, अशोक मिश्रा, शरद जायसवाल, हुस्न तबस्सुम, कुमार कुलदीप, सिद्धार्थ, सत्यम सिंह, आशीष के. राजपूत, डिसेंट साहू, नरेश गौतम, रवि चंद्रा राउत, राकेश मिश्रा, अशोक मिश्र, मजदूर झा, राकेश उर्फ चिल्ली, चंदन सरोज, अजय गौतम, शुभम, तुषार सूर्यवंशी, विजय, धर्मराज, विनीता, और राजबाला जी से गहरा मित्रता का रिश्ता जुड़ा तो वैचारिक स्तर पर भी कई साथी जुड़े थे।
वर्धा की एक और खासियत है साथी मित्र कॉमरेड आमिर अली अजानी भाई साहब। वर्धा (महाराष्ट्र) में प्रतिरोध की सबसे सशक्त आवाज़। केंद्र सरकार के हर काले कानून के विरुद्ध प्रतिरोध को नेतृत्व देने वाले साथी अजानी जी यहां वर्धा से मासिक पत्रिका 'नवनिर्मिति' का संपादन- प्रकाशन भी करते हैं। ठोस वैचारिक दार्शनिक मुद्दों के अलावा ज्वलंत मसलों पर बहस की बेहतरीन पत्रिका है।
कुल मिलाकर वर्धा मेरे जैसे अवसादों की लंबी कैद से निकले के लिए जन्नत है। संबन्धों की शरणस्थली हैं। जीवन के भिन्न भिन्न हिस्सो के लिए, वैचारिक धरातल के लिए, और जनता के बीच, जनता के साथ, जनता के लिए काम करने का भी।
यहां भी एक काला दौर समूचा भोगा किसी सामाजिक कलंक द्वारा मेरे बारे में यहां भद्दी से भद्दी बात फैला दी गयी थी- जिसमे एक दो दोस्तों का शामिल होना- पीड़ादायक था। उस व्यक्ति को जाने मुझसे क्या भय था । नया नया आया था- फितरतन सबसे हंस बोल कर बाते करता था कि अचानक सब कटने लगे..... इसलिए कि नया है तो उसकी बात लोग सच मानेंगे, माना भी गया....... हालांकि अब उस बात और किसी भी सामाजिक प्रदूषण से मेरा कोई वास्ता नही है लेकिन फिर भी... मनुष्यता के मर जाने का दुख है।
हमारा एक प्यारा साथी है नरेश गौतम- आप उससे बात कीजिए, राय या सलाह या जिस भी तरीके से बात करें- आपको उसको एक आम छात्र या युवा की दृष्टि से ही देखेंगे- औसत, जैसे हम है। लेकिन जब आप एक दो मुलाकातों के बाद परिचय थोड़ा गहरा हो जाए और उसके हाथ मे कैमरा हो- हैरान रह जाएंगे आप बोलने को शब्द नही मिलेंगे- गौर से देखते रहें- इसके चेहरे पर कुछ नही होगा- भाव शून्य मगर जब आप देखेंगे तस्वीरें, कैमरा उठाए इस साधारण से युवा को तो दंग रह जाएंगे- इसका कैमरा क्लिक नही करता- इस धरती की उज्ज्वल कोख और कुदरत की सुंदर बुनघट को किसी कालजयी महाकाव्य के काव्यगत रूपों को उतारता है। मैं फोटोग्राफी बाबत ज्यादा नही जानता मगर चित्रों की नब्ज पहचानता हूँ। यह बेहतरीन कलाकार मेरा दोस्त है, इस बात पर मैं मान कर सकता हूँ। एक और जो हमारे साथी हैं, डिसेंट। डिसेंट भाई हकीकतन अपने नाम की तरह यूनिक है। पढ़ने वाला युवा जिसके सरोकारों का स्तर मानवीय जीवन की गरिमा को और गरिमामय बनाते हैं। थर्ड जेंडर पर शोध करने वाले इस साथी का व्यवहार, बहुत अच्छा है। आशीष राजपूत भाई का बौद्धिक रूप से समृद्ध है तो उनसे बात करते समय अक्सर लगता है जैसे बड़े भाई या अभिभावक से चर्चा कर रहा हूँ। बहुत प्यारा आदमी है।
(शेष आगामी किश्त में)
क्रमशः.....
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