जिंदा शहीद कॉमरेड दर्शन खटकड़....
तस्वीर सन 1970 की है
● सतीश छिम्पा
पंजाब में कम्युनिष्ट लहर के इंकलाबी पंजाबी कवि दर्शन खटकड़ जो पेशेवर क्रांतिकारी के रूप में काम करते थे।
जो एक अदम्य योद्धा कम्युनिष्ट क्रांतिकारी कवि जो मूल भूत अधिकारों के लिए क्रांतिकारी भावना के साथ पहले राजसत्ता फिर अलगाववादी धड़े से भिड़ा। जिसका आज तक जिंदा रहना अलगाववादियों को खल रहा है। वो जिंदा शहीद के तौर प्रसिद्ध है
भयानक गरीबी, आर्थिक सामाजिक असमानता, अन्याय, शोषण कुपोषण और राज सत्ता के बर्बर दमन और अनदेखी के विरुद्ध उठे प्रचण्ड आक्रोश की लहरों के साथ इंकलाबी लाल परचम उठाए युवा क्रांतिकारियों को उस समय ताजा उठे नक्सलबाड़ी किसान उभार से आस बंधी और वे सभी युवा जो जीवित थे, क्रांति की महिमा से वाकिफ़ थे, इस लहर में शामिल हुए। यह अलग मुद्दा है कि कुछ अतिउत्साही और नासमझ नेतृत्व के कारण एक महान उभार कुछ ही समय मे दमन का शिकार होकर खत्म हो गया।
यह लहर पश्चिम बंगाल के बाद उत्तर पश्चिम आंध्रप्रदेश और फिर पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी थी। इसमें पंजाब सहित देश के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। इस क्रांतिकारी लहर ने जब तक दुःसाहस की लाइन नहीं पकड़ी तब तक यह एक खालिस मानवीय मुक्ति का युद्ध थी जिसमे अनेक कवि, लेखक, कलाकार, रंगकर्मी आदि खुलकर शरीक हुए और नब्बै वर्षीय शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति भी इसमें शामिल थे। जो फिलोर किले के पास झूठे एनकाउंटर में शहीद हो गए थे। राजसत्ता के अन्याय और अत्याचार से व्यथित होकर वे भी शामिल हुए थे। अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी आदि बेहतरीन कवियो की कविता का जन्म भी इसी समर में हुआ। दर्शन खटकड़ और जयमल पढा जैसे और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।
पंजाब में लोकपक्षधर जनांदोलनों या जनसंगठनों का अद्भुत स्थापनाओं का इतिहास है मगर साथ ही गद्दारो का भी एक बड़ा टोला है यहां जो कुत्सा प्रचारक है। इन लोगों ने दर्शन खटकड़ जैसे महान क्रांतिकारी तक को नही बख्शा। भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि खटकड़ एक ईमानदार और प्रतिबद्ध और बेहतरीन क्रांतिकारी थे और उसी मूल्यों वाले प्रतिबद्ध कवि भी थे। लेकिन जलने कुढ़ने वाले लोगों ने यहां तक झूठ और उल्टी बातें फैला दी थी कि / "विदेशी फंड आदि से लेकर तमाम वो झूठे आरोप जो अक्सर खालिस्तान समर्थक धड़े खुद इंक्लाबियों पर लगाते आए हैं, ये प्रपंच तथाकथित इंकलाबी जो आतंकवादियों के स्लीपर सेल्स की तरह काम कर रहे हैं- ये आज भी भीतरघात से नही चूकते हैं। ' जब जब भी , दर्शन खटकड़, जयमल पढा , आमरसिंह अचरवाल, उदासी और लाल सिंह दिल या दर्शन दुसांझ आदि का जिक्र होता है या बहस उधर मुड़ती है- इस धड़े से बचकाना आरोपो की शुरुआत हो जाती है।
अक्सर यह होता है कि मैं जिस भी पंजाबी लिखतों का हिंदी आनुवाद करके फेसबकु पर पोस्ट करता हूँ तो अगले ही दिन वही पोस्ट कुछ निक्के मोटे बदलाव के साथ अनुवादक रूप में उसी व्यक्ति के का नाम देखकर बुरा लगता है, इसलिए इन महान यौद्धाओं पर लिखे अपने लेख का बहुत छोटा अंश ही सामने लाता हूँ।
पाश की कविताओ से वाकिफ़ लोगों को आज यह रेखाचित्र पढ़ना अच्छा लगेगा, और पाश की डायरी भी अनुदित अंशो में सामने आएगी।
दर्शन खटकड़ :- कफ़स उदास है।
(रेखाचित्र - अवतार पाश, अनुवाद सतीश)
साठ के दशक के अंतिम बरसों में (सन 1967 ई.) में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी ताल्लुक के छोटे से गांव नक्सलबाड़ी में जो एक स्थानीय और छोटा सा किसान आक्रोश शुरू हुआ, वो किसान साथी बीयुल की हत्या के बाद और ज्यादा आक्रोश के साथ उठा। खेतिहर मज़दूरों ने जमीदार और कुलुक किसानों को अपनी ताकत इस कदर दिखा दी कि जमीदारों के कहने से पुलिस ने बर्बर दमन किया और बस फिर उठ खड़ा हुआ लावा सा प्रचंड खेतिहर और भमिहीन किसान महाउभार और आजादी के इस जाबांजो की आवाज़ कब विकराल रूप धर कर छात्र- मजदूर के इंकलाबी मुहीम में बदल गई.....जो बंगाल से सीधी आंध्रप्रदेश (इससे दो दशक पहले जहाँ महान तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में उठा था। तब यह दल गद्दार नही था) और वहां से पंजाब में पहुंची जहां असंख्य मुक्तिकामी युवा इसमे शामिल हुए और मिशन ले लेकर कार्यवाहियां की.... हालांकि यहां कनु सान्याल की जन विद्रोह की मास लाइन को काट कर अपनी जिद मनवाकर चारु मजूमदार ने इस महान क्रांतिकारी उभार को वाम दुःसाहस में बदल कर (आतंकवाद) बदनाम कर दिया। चारु की लालगंज थाना में हिरासत के दौरान मौत के बाद नागरेडी, सत्यनारायण सिंह सान्याल आदि के अलग अलग ग्रुप्स उभर कर आए.... लेकिन तब तक भटकाव हावी हो ही चुका था। लहर के भटकाव के शिकार होने के बाद अलग भी हुए। यह बहुत खतरनाक सफर था। इंकलाब के दीवानों के रक्त से पश्चिम बंगाल और फिर पंजाब की सड़कें लाल हो चुकी थी। इन्ही क्रांति के क्रांतिकारी बेटों में शामिल थे बाबा बूझा सिंह, दर्शन खटकड़, पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, अमरसिंह अचरवाल, जयमल पढा, दर्शन दुसाँझ आदि अनेक युवा कम्युनिष्ट क्रांतिकारी।
नाभा कॉलेज का चे ग्वेरा नाम से प्रसिद्ध थे खटकड़
"कैसा है वो दिखने मे?" किसी बहुत ही प्यारे से एक प्रोफेसर ने पूछा।
"सादा सा ही है, दरमियाने कद का, इकहरे जिस्म वाला, मासूम कोमल सा लड़का।" ये वाकफियत थी दर्शन खटकड़ के बारे में।
हाँ, वो मासूम और कोमल सा ही है अपनों के लिए, हमारे लिए... और विरोधियों के लिए, दुश्मन जमात के लिए, वर्गिय शत्रुओं के लिए कैसा है..... इस बात को हमारे देश का राज प्रबन्ध बहुत अच्छी तरह समझता है, जिसने पहले उसको इश्तिहारी मुजरिम करार देकर "पांच हज़ार" रूपये इनाम (साहित्य अकादमी का नही। उस समय बहुत कीमत थी पांच हजार रुपयों की) उसकी गिरफ्तारी के लिए रखा और अब तीन साल से पैरों में बेड़ियां डाल के जेल में डाल रखा है। एक ऐसी कोठड़ीनुमा गुफा जैसी बैरक में कैद है जहां सूरज की रोशनी तक नहीं पहुंचती है। डिस्टेशन सेंटर की यातनाओं, जुल्मों सितम, डंडों, पट्टों और करंट को सहता हुआ यह क्रांतिकारी मार्क्सवादी युवा, आदर्श है पीढ़ियों तक के लिए.....। ऐसा है वो जाबांज, जिसका नाम दर्शन खटकड़ है और जो विश्वविद्यालय का आज का 'चे- गवेरा' के नाम से प्रसिद्ध है। वो भगतसिंह की तरह ही जुल्म, अन्याय, गैरबराबरी, सम्मान और मूल्यों और क्रांति और वर्गिय एकजुटता के लिए प्रतिबद्ध है।
भगतसिंह की राह पर चलने वाला या लाल यौद्धा जिसको जिंदा शहीद कहा जाता है-- भगतसिंह के ही गांव 'खटकड़ कलां' का जाया जलमा है।
पुलिस और राजसत्ता और बुर्जुआ वर्ग के दमन, अन्याय और अत्याचार को सहते हुए जिला जेल (जलंधर) की हवालात से, दर्शन खटकड़ के ख़त और डायरी से...21 जून 1971.... क्रांतिकारी दर्शन खटकड़ जेल में अवतार 'पाश' के साथ बंद थे।)
" पहले भी यहीं था रहता/ इसी जगह
इस कोठे में
जिसे अपना घर था कहता
हर रिश्ते के साँस घोटता था
हर रिश्ते में बहुत स्वार्थ......"
" 'तूं' और 'मैं' बळदों की जोड़ी हैं
'तूं' जुड़ी है बाहरवार
'मैं' जुड़ी अंदरवार....."
वो इंकलाबी है... मनुष्य, कवि, अदबी सख्शियत और उस पर भी एक बहुत भला और बेहतरीन साथी। कभी कभार उसका बूढ़ा बाप उससे मुलाकात के लिए जाता है। तब मोटे शीशों वाली नज़र की ऐनक से खटकड़ अपने बाप का चेहरा निहारता रहता है और उसे तस्सली होती है कि वाकई धन्यवाद करने का समय अब आ गया है।
गहरी रात जब दूसरे कैदी अपने गांव की, परिवार की या औरतों और प्रेमिकाओं की बातें करके सौ जाते हैं तो उसकी सुरीली आवाज़ सभी बैरकों में लौरी की तरह पसर रही होती है...
"हम पे जो गुज़री, सो गुज़री, मगर शबे हिजरां
हमारे अश्क तेरी, अकबत संवार चले"
एक और महत्वपूर्ण बात है कि आदमी लाल यौद्धा कॉमरेड दर्शन खटकड़ ने ना केवल राजसत्ता और लोकल बुर्जुआ धनपशुओं का सामना किया बल्कि पंजाब की खाड़कु लहर भी इनको निशाना बनाने की कोशिश करती रही थी, बाकी वे लोग आज भी किसी ना किसी तरह का दुष्प्रचार करते ही रहते हैं।
कॉमरेड खटकड़ अब एक जनसंगठन सीपीआई एमएल (न्यू डेमोक्रेसी) में हैं।
(ये शब्द चित्र 70 के दशक का है जब क्रांतिकारी लहर परवान पर थी और पाश और खटकड़ जेल में कैद थे..जिला जेल जलंधर हवालात से, 21 जून 1971.... दर्शन खटकड़, वलैत नूं 93 चिट्ठियां अते यादां नामक पंजाबी की किताब (दर्शन खटकड़ के जीवन, रचनाओं, संघर्षों और पत्रों का संकलन.... से :- संपादक :- हरभगवान भीखी, किताब :- दर्शन खटकड़ नवरोज़ प्रकाशन (बंगा)
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