साहित्य कलाओं की बौद्धिकता से नशामुक्ति केंद्र तक.
० सतीश छिम्पा
आवारा की डायरी..... माँ मैं नही करूँगा अब कभी भी कोई नशा, मगर वे मुझे डराने को बढ़ रहे हैं, मेरा सृजन, किताब, कलम और मैं, मैं भी कहाँ जा रहा हूँ... पकड़ो , वो लड़की गई, कहाँ हैं, है कहाँ सपने.. मर चुके... और.... और.... और .....
एक मासूम से किशोरावस्था से निकल कर युवा में बदलते उस लड़के ने क्यों चुना पतन की राह को, और हो गया कुख्यात नशेड़ी युवा लंपट के रूप में वो जो लिखता था प्यार ..... ''आवारा की डायरी'.. से दुखांतिका, यह कुल दस भागो में आएगी)
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जीवन जिस जगह धड़कता नही-- जीवन ढलकर जहां शब्दो मे बिलखता, हंसता और मुळकता और रोता नहीं- वे साल, कविता, संबंध जो भी हो कुछ भी मायने नही रखते - वे जिनमें जीवन ना हो या धड़कता ना हो वहां प्रेम सा कुछ या उत्साहित सा या सुंदरता लिए हुए। किशोरावस्था का अठारहवां वर्ष भावो का बसंत था। सेठ राम दयाल राठी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लिया था। उस समय मैं अठाइस किलो वजनी सॉलिड बॉडी का बहुत दुबला पतला लड़का था। जिज्ञासाएं इतनी थी कि मेरा मन एक मसले पर टिकता ही नहीं था। हर चीज के लिए इच्छुक बहुत रहता था। हर कालांश में अलग अलग अध्यापकों से अलग ही तरह के सवाल पूछता रहता था। नया माहौल था और मैं पुराना। खाकी पेंट और नीली शर्ट में हम छाने ही नहीं रहते थे। अळबाद में नम्बर वन था और हमारा सेक्शन भी 11वीं ई था जो पेटेंट था शरारती बच्चों के लिए। ग्यारहवीं 'ई' सेक्शन को शायद ये वरदान ही है कि उसमे शरीफ और साऊ लड़के बैठते ही नहीं थे।।
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वो एक दिन जो अलगरजी में बीता, मेरे अस्तित्व को बहुत आगे जाकर खत्म करने वाला था- बस एक इस दृश्य जो देखने की सजा भी देने वाला था. राखल दास की माँ उसके सगे चाचा संग आपत्तिजनक हालत-- छोड़ो इसे जाने देते हैं-- बीयर की एक बोतल जो छुआ था मेरे हाथों ने, फिर कभी (इसका जिक्र आठवें भाग मे है ) हाथ नही लगाया। मगर जो देखा- वो दिमाग भन्ना गया- और, वे सभी फिल्मी हीरोइन जो अपनी बारी या कहें नम्बरवाइज और दैहिक गठन के अनुसार या कामुक क्रियाओं के सीन के बीच फ़िल्म में थोड़ा ज्यादा प्रभाव डालती थी- की जगह मेरे हस्थमैथुन के दौरान अब वो स्थाई संभोग पात्र बन गई। और बस फिर तूफानी भावनाओ का दौर जो चला- वो, एक ऐसे राह ले गया था- जहां या तो व्यक्ति खुद बर्बाद या कहे लंपटाई का सितारा होते या बन जाते बेहतरीन (इसका जिक्र अगले कुछ खंडों में रहेगा- आप इसको लेकर डबल माइंड मत होइए, सबका तरीका एक जैसा उथला नहीं हो सकता है।) खैर जो बाद में होना है तो जिक्र भी बाद में ही करेंगे।
शरारतों और पढ़ाई और काम में यूँ ही दिन बीत रहे थे कि एक दिन स्कूल में क्विज़ प्रतियोगिता हुई जिसमे मैंने, रजामुराद और विनोद और संजय ने हिस्सा लिया, संयोग से मुझे पहला स्थान मिल गया। यह प्रतियोगिता माध्यमिक शिक्षा विभाग की और से विभिन्न स्तरों पर आयोजित होनी थी और अब मुझे श्री गंगानगर जाना था। तैयारी का तो होश ही नहीं था बस सागण बखत स्कूल वालों के साथ पूग गया था। पहले चित्रकला और गायन और निबन्ध प्रतियोगिता हुई और उसके बाद क्विज प्रतियोगिता।
इस बार मेरा प्रथम स्थान पर आना संयोग नहीं था, क्योंकि ज्यादातर प्रश्न इतिहास से थे जिनमे मैं माहिर था। येे दिन मेरे लिए बहुत अच्छा था क्योंकि मैं जिले में प्रथम रहा था और दूसरी बात ये कि इसी दिन खालसा स्कूल की केन्टीन में मुझे सूरतगढ़ के उस स्कूल की लड़की ने समोसा खिलाकर मेरे बालों (जो अब विलुप्त हो रहे हैं) की तारीफ़ की थी जिसमे पढ़ना हमारे वर्ग के बच्चों के लिए सपना था। वो दोलड़े हाड़ों की, थोड़ी सी मोटी, इतनी कि वो गन्दी ना लगकर बहुत सुंदर और प्यारी दिखती हो। बॉय कट बालों में भरपूर तेल लगाकर उसने उन्हें बहुत करीने से बनाया था। वो जब बोलती तो गालों से थोड़ा ऊपर की तरफ दो प्यारे से गड्ढे पड़ते थे। , "आप किस स्कूल में पढ़ते हैं।", उसने जब पूछा तो मैं जाने किसी अलौकिक आनंद में झूल रहा हूं और किसी तिलस्मी जगह आ गया हूँ, क्योंकि बॉयज स्कूल में पढ़ने वाले लंडूरों से कभी भी कोई लड़की इस तरह से बात नहीं करती थी। अगर कभी किसी ने भूलवश कर भी ली (जैसे इस लड़की ने मुझसे की थी), तो उस लड़के के अगले दस - बारह दिनों के सपनो में वो लड़की जरूर ही आया करती और फिर अपने आप ही स्वप्न संभोग दौरान (स्वप्नदोष) पायजामा गंदा हो जाता, छुपके से जाकर नहाणघर मे पायजामा धोकर सुखा दिया जाता। और फिर रात भर वो मजनू बेकरारी में पसवाड़े फोरते फोरते थक जाता और इधर उस बेचारी लड़की को कुछ खबर ही नहीं थी कि आजकल हर रात उसके साथ क्या- क्या किया जाता है। मेरी गाड़ी भी इन्ही दिवास्वप्न में चल रही थी, बस दिक्कत यही थी कि उस किशोरावस्था में जब शारिरिक संवेग प्रचण्ड झांझावतों के साथ चढ़ते हैं, तो उस समय की सबसे बड़ी जरूरत स्त्री देह हमारे लिए आसमान ही हो जाती।
कस्बे में उन दिनों तीन सिनेमाघर थे। छवि सिनेमा, कोहिनूर (अब महाराजा सिनेमा) और मोदी थिएटर। इसमें मोदी सिनेमा वाला ही असल मे पोर्न मूवीज़ दिखाया करता था। स्क्रीन पर चल रही स्त्री पुरुष अंतरंग प्रक्रिया हमारे किशोर मन को झकझोर कर रख देती थी। हम अक्सर ही दस रुपयों का जुगाड़ करके मोदी में पोर्न देखने जाते और फिर 'स्वतः संतुष्टि' पाकर घर पहुंच जाते। एक दिन मैं और मित्र सुदेश, भगवाना और राकेश फ़िल्म देखने गए। हम लोग थोड़ा देर से पूगे थे- इसलिए कुछ मिनिट्स की मूवी निकल गई थी। इस सिनेमा में जाने वाले ज्यादातर लोग मुंह पर रुमाल या साफा लिपट कर ही जाते थे ताकि कोई पहचान ना सके। अधेड़ और बुजुर्ग लोग ही ज्यादा होते थे। हमने भी रुमाल बांध रखा था। भगवाना राम ने पास में रुमाल बांधे बैठे अधेड़ आदमी से पूछा, "कितने मिनिट्स की फ़िल्म निकली है।''
- "ज्यादा नहीं निकली, असली सीन तो अभी शुरू होना बाकी है।" रुमाल वाले अधेड़ ने कहा। अब जैसे- जैसे फ़िल्म चलती वैसे- वैसे ही वो अधेड़ आदमी आसपास के लोगों को भूलकर जुट गया ''स्वतः संतुष्टि" की प्रक्रिया में और कुछ देर बाद ढीला होकर वहीं बैठा गया। हम सभी उस बेवकूफ पर गुस्सा निकालने ही वाले थे कि फ़िल्म खत्म हो गई और लाइट्स जला दी गई। हमने उसकी तरफ देखा तो हमारे पांव तले की जमीन खिसक गई, हम कुछ बोलते उससे पहले ही अधेड़ वहां से निकल गया। दरअसल वो भगवाना राम के पिताजी थे। अब भगवानाराम खेत मे होता तो उसके पिताजी घर मे, और भगवाना अगर घर मे होता तो पिताजी खेत मे जाकर सो जाते। यह तब तक चलता गया, जब तक कि छ: महीने बाद भगवानाराम की शादी ना हो गई।
क्विज प्रतियोगिता जीतकर मैं बहुत खुश था। मैंने माँ को बताया कि जिले में मेरा पहला स्थान आया है तो पड़ोस की एक आंटी जो माँ के पास बैठी थी ने मुंह मचकोड़ कर कहा, "क्यों खराब करै सरोज छोरै नै, पढ गे किस्यो पटवारी लागै ओ, धंधै सिर लगा दे" जबकि उसका लड़का बड़े अच्छे स्कूल में पढ़कर एक महंगे कॉलेज में पढ़ रहा था।उसी रात माँ ने रोटी जिमाते बखत मुझसे कहा,"बेटा लोग हांसै आपणै पर, जवाब देई आनै, मेरो काळजो कळपै तेरै खातर....."
- "म्हैं I.A.S. बण स्यूं माँ" माँ नहीं जानती थी कि आईएएस क्या होता है मगर फिर भी माँ को हौसला था।
आज भी याद है जब बी.एड. करने के बाद एम. ए. के दौरान मैंने चपरासी के पद के लिए आवेदन किया तो माँ को कही वो बात याद आ गयी और घर आकर घण्टों तक रोया था।.
ख़ैर, जिला स्तर पर जीतने के बाद हमे अजमेर जाना था। मेरे साथ पूरे जिले से लगभग बीस बच्चे थे और हमारी अगुवाई गंगानगर की एक अध्यापिका कर रही थी। इसी टूर पर मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार पहाड़ देखे और देखते ही जोर से बस की सीट से चिल्लाया, "अरे पहाड़ आ गया रेरेरेरे रेरेरे....." मेरे पीछे बैठी अनूपगढ़ की एक लड़की जोर से हंस दी मुझ पर। ख़ैर पहली बार एक बड़ा शहर देख रहा था। राज्य भर से सैंकड़ों बच्चे आए हुए थे। मैं बहुत उत्साहित था मगर ये वाली प्रतियोगिता राज्य स्तर पर आकर मैं हार गया था।.
अजमेर मेरे लिए कुछ मायनो में बहुत बढ़िया रहा जिसे वो अनूपगढ़ वाली लड़की आज तक भी नहीं भूली होगी, और न मैं ही भूला हूँ। पहली बार मेरे किशोर शरीर ने किसी लड़की को बाहों में लिया था। पहली बार ही मैंने उसको पूरे आदम रूप में देखा और दिनों तक उसके असर में अटका रहा। पहली ही बार मेरे किशोर होंटो को किन्हीं प्यारे अनछुए गुलकंदी होंठो ने छुआ था और मैं अनाड़ियों की तरह उससे इस कदर लिपट गया कि होश दस मिनिट बाद ही आया। और चार साल बाद इसी लड़की से मिलने के लिए मैं बस से उसके गांव इस बहाने से गया कि मैं जयपुर पेपर देने जा रहा हूँ, और जब लौट रहा था तो वो मेरे साथ थी। घर से भाग जाना, प्रेमी जोड़ा फरार आदि बस हमने सुना भर ही था- अनुभव बहुत कम उम्र के कारण कच्चा ही रहा ।
जयपुर में हम दोनों तीन दिनों तक छुप छुपके रहे थे। बहुत बड़ा हौसला था हम दोनों का या शायद उसी का मगर जैसे- जैसे समय बीत रहा था। दिन ब दिन, पल पल और जाने कैसे कैसे हमारा जोश ठरने लग गया और हम दोनों ही बस में बैठकर अपने- अपने घरों की ओर चल दिए। उफ़्फ़, यह नारकीय, कायरता, दब्बूपन और घटियापन जाने क्यों हावी हुए जो बाद में बहुत कम दिखे मुझे।
.... और फिर खुला नरक का दरवाजा और मैं अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ जुटा हुआ था - काची उम्र, अधपके दिमाग, विचलन और फिर शराब दर शराब---- गालियां और गालियां और बेइज्जती- और एक बीमार सोच जिसकी बीमारी बाद में पता लगी कि दिमाग मे मेरे किसी तरह का गंभीर केमीकल लोचा हैै-- जो ये कह रहा है कि दुनिया बड़ी जालिम है दिल तोड़ के हंसती है --या ये दुनिया और ये महफ़िल किसी काम की नहीं-- जनता ढोल, और बाकी सब अवसरवादी, कपटी जानवर हैं और आगे निकलने के कॉम्पिटिशन में इतने डूब चुके हैं कि इन्हें पता ही नहीं कि कब ये किसी दूसरे के कंधों पर पैर रखकर कामयाबी को छू लेते हैं और दूसरा, जिसके कंधों पर पैर रखा गया होता है, वो भी किसी दूसरे के कंधों को तलाश करता है। प्यार से नफरत करने वाले ये लोग बलात्कार को जरूरी दमन और सबक समझते हैं और भैंस और बकरी से हवस मिटाते ये हरामी लोग।
ये चालें, बिसातें, छल, कपट, दिलों के मेल से भरी दुनिया मेरी नहीं है, ये दुनिया जो किसी भूखे को दुत्कार दे, किसी नाकारा को काम ना दे सके, ये दुनिया मेरी नहीं है। ये रोज रोज धर्म, जाति, भाषा के नाम पर कत्ल जो हो रहे हैं, एक सम्पन्न बाप द्वारा अपने नाकारा बेटे को स्थापित करने के लिए, एक चालबाज धूर्त बाप द्वारा अपने बंजर बेटे को कलाओं में स्थापित करने के लिए जमीर मार ले खुद का, वो मेरा नहीं है। माहौल गंधला, कूड़ा और कचरा भरी ऐसी जहां खुलकर प्यार करना। प्यार का इज़हार करने को छेड़ना समझा जाता है। जहाँ एक परिवार द्वारा अपनी बेटी को ब्लैकमेलिंग का हथियार बनाकर घरों को उजाड़ने के लिए जो साजिशें रची जाती है। एक कोई लड़की या लड़का बेरोज़गारी के कारण जिल्लत सहते हैं। किसी क्रांतिकारी लेखक को हाशिए पर पटक दिया जाता है। कोई जो नौकरी के लिए जिस्म का सौदा कर लेते हैं। .... वे इसी दुनिया का हिस्सा है।"
खुद से ही खुद बड़बड़ाता, शुरुआत थी यह शायद-" मेरे दोस्त ये दुनिया बहुत कठोर है, उबड़ खाबड़ है, भावों और सपनों की कातिल वाला जाहिल समाज क्या जाने कि प्यार का इज़हार करते शब्द, दुनिया के सबसे सुंदर शब्द हैं। फिर भी मैं पढ़ता हूँ, सपने देखता हूँ, जब मेरे बस में कुछ नहीं रहता तो मैं घूमने जाता हूँ। और अकेले बड़बड़ाने के रोग का भी जाने कब पता चला ।
-" पार्टनर ऐसे ही बनेगी तेरी विक्षिप्त पहचान "
वो लड़की.... बाद में सुना था कि उसने मेरा नाम घरवालों को नहीं बताया। बहुत बर्बर तरीक़े से उसको इतना पीटा गया कि वो बेहोश हो गई। अब जब पहले की तरह अपरिपक्व नहीं हूँ, चीजों बातों को समझता हूँ तो लगता है कि बहुत बुरा हुआ ये सब। उसने मुझ पर भरोसा किया था। भरोसे को कायम रखना था और कोई सम्मानजनक नौकरी हासिल करके उनके घर वालों से रिश्ते की बात भी की जा सकती थी, मगर कहाँ कर पाया था मैं कुछ भी।
व आ
जयपुर में रहते हुए उसी ने हिम्मत जुटाई थी कि हम लोग कहीं दूर भाग जाएं, और शादी करके वहीं सैटल हो जाएं जबकि मेरा हाल भयंकर रूप से बुरा था। बहुत डरा हुआ था मैं, यहां तक कि रातों में हर रोज डरावने सपने देखता और उठकर भागता था। शराब तो शराब, अफीम और बाद में अरसे तक पोस्त (भुक्की) गांजा भरी सिगरेट तो माल मत्ता वाली सिगरेट- अरसे तक नॉन स्टॉप, फिर रुका ताकि फिर से दौड़ लगाऊं---- उफ़्फ़ '' मैंने ही उसको जोर देकर वापस चलने को कहा था जो उसने बहुत मुश्किल से माना था।
वो बेवड़ा हरामी सतीश अरे बहुत ऊंचे घराने की लड़की है शायद इसकी दोस्त- बकवास व्यक्ति है। ऐसी और भी अनेक बातें है जो अक्सर मेरे लिए, मेरे पीठ पीछे कही जाती थी। लेखकों की तो बात ही छोड़ो, उनकी बातचीत में लोक, बदलाव, प्रयोग, शैली, शिल्प, मार्क्सवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद जैसे जरूरी मुद्दे बातचीत का विषय होता ही नहीं है। विषय होता है, 'सतीश उस बॉय कट लड़की के साथ जयपुर जा रहा था, डबल स्लीपर में उसी के साथ लेटा था- वो हरामी एक बोतल दारू दोपहर तक पी जाता है-। डोलते हुए ये रात कहाँ जा रहा था। माउंट आबू गया तब वो जाटों की लड़की उसके साथ क्या कर रही थी। कब किसके साथ सेक्स किया या कब कितने कॉन्डम खरीदे या दिन में दो- तीन बार तो हो ही जाता होगा या बेवड़ा है साला। ये एक ऐसा दौर था जो मेरे जीवन का सबसे मुश्किल, घातक और क्रूर था। अक्सर सोचता, प्रण लेता और कुछ कर दिखाने का सोचता, मगर फिर से वही सब कुछ। भावात्मक रूप से इसने मुझे खोखला खाली कर दिया था।
बहुत प्यारी, प्यार से भी प्यारी वो लड़की आज भी स्मृतियों में जिंदा है। उसका नाम अब भी डायरी में दर्ज है। सुना है वो बहुत समय तक पागलपन का शिकार रही थी। जाने वो अब कैसी, किस हालात में होगी - अब जबकि मैं सात साल अर्धविक्षिप्तता में बर्बाद कर आया।..
सुबह चार बजे रिंकू के हाथे से दो पव्वे लेने है... और बाकी..
क्रमशः --
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