बाल यौन उत्पीड़न, कुकर्म, दुराचार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं बच्चे
(बाल यौन शोषण एक कभी ना भूले जाने वाला दुखांत है)
● सतीश छिम्पा
बच्चों संग अश्लील हरकत करते बूढ़े को दो चार थप्पड़ लगाकर छोड़ देना, किशोर जो अशलील हरकत करते हुए बच्चों के साथ पकड़ लिया जाता है और क्षणिक गुस्से वाला व्यवहार और एक थप्पड़ और फिर उसके बाद सब कुछ सहज, यही सबसे बड़ी गलती है। हमे समाजिक रूप से परम्परागत कचरा और घटिया आदर्शवादी बीमार परम्पराओं को खत्म करने की जरूरत है। हमे जरूरत है सावचेती और जरा से खुलेपन की, आज के समय मे सबसे ज्यादा जिनका योन शोषण हो रहा है वे बच्चे हैं, उनमे भी ज्यादा संख्या लड़को की रहती हैं। और योन शोषण की सफल या असफल कोशिशें करने वाले ज्यादातर किशोर होते हैं और उनके बाद ज्यादातर बूढ़े बुजुर्ग। और इनमे से भी जो सबसे ज्यादा इस कुकर्म को अंजाम देते हैं वे घर के ही सदस्य होते हैं, खसकर संयुक्त परिवार के और उनके बाद आस पड़ोस या रिश्तेदार या स्कूल के अध्यापक।
दस साल पहले हुए अपने साथ कुकर्म का बदला लिया, आरोपी के बेटे का कुकर्म करके। एक 17 वर्षीय किशोर ने अपने साथ हुए कुकर्म का बदला लेने के लिए 3 वर्षीय बच्चे से कुकर्म कर उसकी हत्या कर दी क्योंकि कुछ वर्ष पूर्व उक्त बच्चे के पिता ने उससे कुकर्म किया था। इस संबंधी आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया तथा उसकी निशानदेही पर बच्चे का शव भी बरामद कर लिया। गांव पीराबाद निवासी एक व्यक्ति ने पुलिस को शिकायत दी कि गत दिवस उसका 3 वर्षीय बेटा घर से खेलने के लिए गया था परंतु वापिस नहीं आया। पुलिस ने इस संबंधी शक के आधार पर पड़ोसी के लड़के रहमत अली को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो उसने अपना जुर्म स्वीकार करते हुए कहा कि उसने अपने साथ हुए कुकर्म का बदला लिया है। लगभग 10 वर्ष पहले मृतक के पिता ने उसे अपने घर बुलाकर उससे कुकर्म किया था तथा मैंने उसके बेटे से कुकर्म करके हत्या कर अपने साथ हुए जुल्म का बदला लिया है। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया।
गांव और ढाणियों में इसका आंकड़ा सबसे ज्यादा भयावह है। इस तरह के मुद्दों पर बात करते समय अक्सर लोग मुझे बुरा भला कहते हुए गरियाने से नहीं चूकते हैं क्योंकि उनका प्यारा वर्गिय और जातीय समाज उनकी नज़र में आदर्श जो हैं। यह सच्चाई है, बहुत खारी, जहरीली सच्चाई कि उत्तर भारत के परम्परागत ग्रामीण समाज मे प्यार के लिए बिल्कुल भी नहीं मगर सेक्स, जबरन, रजामंदी और एक के ही नहीं बल्कि अनेक बनाने के लिए जोरदार खुलापन है। सेक्सयूएल बंदिश के ही कारण यह एक बड़ा और अजीब आंकड़ा पैदा हुआ है कि विश्व मे सबसे ज्यादा समलैंगिक भारत मे निवास करते हैं।
सबसे ज्यादा जो प्रभावित हैं वे हैं चार वर्ष के लेकर सोलह वर्ष तक के बच्चे जो कुकर्म की सफल या असफल कोशिशों के सहज शिकार होते हैं। कुछ खुद भी इसको दबाव और अंकुशों के कारण पसंद करने लगते हैं। ये वे हैं जो किशोरावस्था की तूफानी उम्र में पहुंच चुके होते हैं और घर मे हस्तमैथून से लेकर समलैंगिक संबन्ध तक बनाने शुरू कर देते हैं, इसका भी कारण बंदिशें हैं जिसके चलते योन रुचियाँ विकृत हो जाती हैं। प्यार और सहवास के लिए इस तरह के कड़े नियम खतरनाक और आत्मघाती होते हैं। स्कूल की बड़ी कक्षाओं की बालिकाओं के यौन शोषण में सबसे ज्यादा लिप्त होते हैं अधेड़ अध्यापक। कामी अय्यास लोग हर तरह के दुराचारी हो जाते हैं।
इस उम्र में (किशोरावस्था) बच्चो की ज्यादा सार सम्हाल की जरूरत है। यह कड़वी मगर ठोस हकीकत हैं कि बच्चे आज अपने घर मे भी सुरक्षित नहीं हैं। और सामाजिक नजरिया इस तरह का घटिया होता है कि समाज की नज़रों में बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और शोषण की बातें अगर घर या स्कूल की चारदीवारी में ही रहे तो अच्छा हैं। ऐसी सोच बहुत ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि इज्जत खराब ना हो जाए के भय से यह सब जारी रहता हैं। बाल यौन शोषण का सामना किया जाना सामाजिक कुकृत्यों में से सबसे ज्यादा उपेक्षित और हल्की ली जाने वाली आम बात टाइप बन चुकी है क्योंकि चिंता बस इज्जत की ही है। इसे नज़रंदाज़ करने के करण भारत में बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। इस प्रकार की घटनाओं के विभिन्न आयाम हैं जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है। बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है। शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसे मामलों को बहुत हलका माना जाता है।
जब भी कोई किशोर वय बच्चा बाथरूम में जरूरत से ज्यादा समय लगाने लग जाए या गुमसुम रहने लगे या वो छोटे बच्चों के पास रहने की ड्यूटी के लिए ज्यादा लालायित हो तो उस पर नज़र रखी जानी चाहिए और जब इस तरह के बदलाव आपके बच्चे में आ रहे हो तो घर के बूढ़े और अन्य दैत्यों को उनके साथ अकेला कभी मत छोड़िए। किशोर वय लड़की अगर स्कूल के किसी बूढ़े या जवान या अधेड़ अध्यापक के यहां ट्यूशन या एक्स्ट्रा क्लास की बात करे तो सावधान हो जाना चाहिए। सिर्फ लड़कियों का ही नहीं यह उन लड़कों के मामलों में भी होता है जो अपने परिवार और माता-पिता के साथ इस खतरनाक मगर जरूरी विषय को बेकार मान लिए गए कृत्य पर बात करने के लिए सक्षम नहीं हैं। ये पूरे समाज की मानसिकता है जो बुरे लोगों को प्रोत्साहित करने का काम करती है।
कुछ लोग मासूम बच्चे के दिमाग में बैठे डर का लाभ उठाते हैं, वो बेचारा मासूम बच्चा/बच्ची जिसे यौन उत्पीड़न के बारे में कोई जानकारी नहीं होती वो दिन प्रतिदिन इस का शिकार होता है। खासकर किशोर हो रहे बच्चे, वीर्य निर्माण की प्रक्रिया शुरू होते ही वे पहले स्वप्नदोष के साथ ही हस्तमैथून को व्यवहार में लाते हुए अकेले समय बिताना ज्यादा पसंद करने लगते हैं। टीवी या कहीं भी कामुक दृश्य देखते ही बाथरूम में भागते हैं ताकि उसी सीन को सामने रखकर हस्तमैथून कर सके, इस बदलाव पर सबसे ज्यादा पैनी नजर बूढ़े ठरकी कामी दैत्य रखते हैं, वे अपनी हवस का शिकार इसी तरह के बच्चों को बनाते हैं। उसके बाद परिवार को इस तरह के बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, सेक्स और मानव शरीर की जरूरतों को समझते हुए इन प्राकृतिक बदलावों पर खुलकर बात करते हुए समाधान तलाशना चाहिए।
मैं ऐसे अनेक अध्यापकों को जानता हूँ जिन्होंने बहुत सी बच्चियों और बच्चों को खराब किया है। पिट भी जाते हैं मगर बेइज्जती ठरकियों की ठरक के आगे कुछ नही है। इसी वजह से समाज और बच्चे के लिए बाल यौन शोषण कोई नयी समस्या नहीं है। ये देश के हर परम्परागत समाज की समस्या है। ये समस्या इंटरनेट के इस दौर में तो एक सार्वजनिक मुद्दा या बहस तलब हो चुकी हैं। यह एक जरुरी मुद्दा बन गयी है।
घर की महिलाएं इस स्थिति के बारे में सबसे ज्यादा जानती हैं मगर वे परबस होकर कुछ बोल नहीं पाती हैं। जहाँ तक इस सड़े गले समाज का संबंध है, ये विषय अभी भी चर्चा के लिए वर्जित है। गाँवो में तो यह एक नशा बनकर उभरा है क्योंकि इस मुद्दे को घर की चारदिवारी के ही अन्दर रखने के लिये कहा जाता है सभी इससे वाकिफ भी होते हैं। गांव के झोलाछाप डॉक्टर और अध्यापक और स्वस्थ तंदुरुस्त बूढों के पास किसी भी बच्चे या बच्ची को सीधे ही निश्चिंत होकर नहीं देना चाहिए, नज़र रखी जानी जरूरी हैं।
ऐसा नहीं है कि हम लोग जो लिख रहे हैं, महान हैं, इस तरह की महानताएं किशोरावस्था में खूब भटकती रही हैं। धार्मिक और नेमी धर्मी परिवारों को इस बीमार आदर्शवाद के बीमार और इस तरह का पाखंड छोड़कर इस पर ध्य्यन देना चाहिए नहीं तो जाने कब उनकी औलादें अप्राकृतिक हैबच्युअल हो जाएंगी, पता नहीं चलेगा।
इन मामलों में हमेशा ज्यादातर अपराधी, पीड़ित का कोई जानकार और पीड़ित के परिवार का जानकार या पीड़ित का कोई करीबी ही होता है। इस निकटता के कारण ही अपराधी अनुचित लाभ उठाता है, क्योंकि वो जानता है कि वो किसी भी तरह के कुकर्म से माफ़ी मांगकर निकल जाएगा। बच्चों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और रेप की घटनाएं कोई नई नहीं है. दुखद बात ये है कि इस तरह की घटनाओं के शिकार बच्चों के आरोपियों में अधिकतर लोग जान पहचान के होते हैं। घरों में रहने वाले होते हैं। अपने पारिवारिक संपर्क, दोस्त या पाडोसी नाते रिश्तेदार में से होते हैं। इनकी पहचान बस यही है कि ये उन बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा अकेले रहना पसंद करते हैं।
जागो लोगों जागो, जागो वरना बच्चों को तरस जाओगे.....
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