(● आ.ले. -- ७)
पाब्लो नेरुदा :- सच्चे मार्क्सवादी कवि
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(आज मेरे प्रिय कवि पाब्लो नेरुदा की पुण्यतिथि है।)
● सतीश छिम्पा
चिली में एक आदमी एक दरख़्त तले मरा पड़ा था और उसकी लाश के पास पाब्लो नेरुदा की कोई कविताओं की किताब थी जिसमे अवसाद से भरी कुछ कविताएँ थी। नेरुदा को जब इसका पता चला तो उन्होंने कभी अवसाद भरी कविताएँ ना लिखने का फैसला कर लिया था।
नेरुदा जब नोबल पुरस्कार लेने जा रहे थे तो हवाई अड्डे पर एक पत्रकार ने उनसे सवाल पूछा, "आपकी नजर में सबसे सुंदर शब्द कौनसा है ?"
-"हालांकि इस शब्द को अखबारों और रेडियो पर बहुत बार लिया गया है इसलिए यह आपको पुराना लग सकता है मगर मैं फिर भी कहूंगा 'प्यार' सबसे सुंदर शब्द है।"
वे सच्चे अर्थों मे कम्यूनिस्ट कवि थे। सारी धरती उनका देश थी। तानाशाह फ्रांको के विरुद्ध संघर्षरत स्पेनी क्रांतिकारी हो या सोवियत यौद्धा, मुक्ति मोर्चे पर लड़ने वाले हर मुक्तिकामी के लिए उनके मन मे सम्मान था। अमेरिकी पूंजीवादी दैत्य के पंजो में फंसे लातिन अमेरिका के हर देश ने उनके लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए थे क्योंकि वे दक्षिण अमेरिका को पूंजीवादी साम्राज्यवाद से मुक्त देखना चाहते थेे। क्यूबा की सामाजिक जनवादी क्रांति हो या चिली में अलेंदे की लोकतांत्रिक वामपंथी अलेंदे की सरकार, हर एक प्रयास को उनका समर्थन था। उन्हें चिली से भी निष्काषित कर दिया गया था।
निश्चय ही पाब्लो नेरुदा कालजयी और पुरोधा कवि है। इसमें कोई दो राय नही कि नेरुदा की कविता प्रेम को प्रकृति के साथ मिला चिले की भौगोलिक सीमाओं को लाँघ विश्व कविता पर छा गयी थी। मगर फिर भी नेरुदा के कवि के दो रूप हमारे सामने आते हैं। एक स्पानी गृहयुद्ध के दौरान का वैचारिक क्रांतिकारी कवि और दूसरा बाद के समय का भी अलग नेरुदा का कवि।
संशोधनवादी होने से पहले की नेरुदा की कविता अपनी सभी प्रकाष्ठाओं को लांघ विश्व प्रसिद्ध इसलिए होती है क्योंकि उस समय उनके मार्क्सवादी विचार कविता और चेतना से एकमेक होकर लोक को सृजित कर रहे थे,वे क्रांतिकारी थे संघर्ष शील थे..जीवन से भरे हुए नेरुदा तब जीवन को कविता में रच रहे थे...जब उन्हें स्पेन का राजदूत बनाया गया था तो उसी दौरान स्पेनी गृहयुद्ध छिड़ गया था और नेरुदा गणराज्य के पक्ष में उठ खड़े होने वालों में आग्गु थे,लोर्का की हत्या ने उन्हें विचलित किया था।लगभग थोड़े समय के ऊपर नीचे या कहें उसी दौर के आस पास उनकी "प्रेम की बीस कविताएँ और उदासी का एक गीत",दुनियां में बसेरा"(दो खण्डों में) "कैंटो जनरल" किताबें आई जो कि बेहतरीन थी।
एक समय बाद उनमे उदारवाद की गैर-क्रांतिकारी झलक के तौर पर विचलन साफ दिखाई दे रहा था। जब महान क्रांतिकारी चे ग्वेवारा की शहादत को एक महान क्रांतिकारी की जुदाई बताया लेकिन साथ ही ये भी साफ़ कर दिया कि वह चे की मृत्यु पर शोक से अधिक चिले कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापक लुई एमिलियो रिकाबरन की मृत्यु से दुखी है। उन्होंने चे की हिंसक क्रान्ति से अधिक संशोधनवादी संसदीय शांतिपूर्ण क्रान्ति(? यही शब्द थे) की वकालत की और एक जगह पर तो उन्होंने चे को आतंकवादी भी कह दिया था। नेरुदा का यह रेशनल और आलोचनात्मक रवैया अपने समय के अधिकाँश महान कम्युनिस्ट नेताओं के प्रति दिखाई पड़ता है। वे स्टालिन के प्रशंसक भी थे और आलोचक भी- आलोचना प्रशंसा के घाल मेल में वे अक्सर साम्राज्यवादी हलकों में गलत सन्देश पंहुचा देते थे। स्टालिन के नेतृत्व में बन रहे नए सोवियत संघ के वे प्रशंसक तो थे ही मगर स्टालिन का शुद्ध मार्क्सवादी-लेनिनवादी रूप उन्हें पच नहीं रहा था। यही विचार उनके माओ के प्रति थे। चीन में माओवाद को व्यक्ति पूजा का नाम देकर उन्होंने इसकी खूब आलोचना की थी। .....
नेरुदा की इस दौरान की कविताएँ कभी उतनी प्रसिद्ध नही हो सकी जितनी उनके क्रांतिकारी कवि के समय की हुई थी। इस समय में वे औरत को खेत और ख़ुद को हल कहकर विचलन का गम्भीर सन्देश देने लगे थे। उनकी क्रांतिकारिता से ज्यादा जीवन के सौंदर्यबोध और प्रतिबद्धता को ही प्रकाश में लाया जाना चाहिए था। हालांकि उनका संशोधवादी रूप को या कहें हल्के विचलन को ज्यादा दिन नही मील और चिली तख़्ता पलट के बाद वे फिर से अध्ययन और मनन करते हुए-- चीजों को समझने लगे थे।
उनको समय कम मिला और उन्होंने "कॉमरेड,यह बागीचे का समय है" जैसी कविता रच डाली थी।आलेन्दे की मौत और पिनेशो द्वारा तख्ता पलट ने उन्हें झकझोर दिया था। आलेन्दे की मौत के 12 दिन बाद नेरुदा चल बसे थे।
साधारण शब्दों में कहूँ तो नेरुदा विश्व कवि के रूप में एकमात्र कवि है। कविता बस एक ही बार नाराज होकर नेरुदा से दूर धुई थी, तब जब वे म्यांमार में चिली के राजदूत थे लेकिन वे प्रतिबद्ध मार्क्सवादी विचारों से भरे थे तो कविता भी दूर नही गई को।
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जवाहर लाल नेहरू और पाब्लो नेरुदा...
(सन 2018 ई. में एक आर्टिकल में दर्ज किया था मैंने पाब्लो के बारे में। -- "मेरा जीवन, मेरा समय" पाब्लो नेरुदा की आत्मकथा से, अनुवादक कर्ण सिंह चौहान)
कल से जवाहरलाल नेहरू पर बहुत सी पोस्ट्स देख पढ़ चुका हूँ तो सोचा क्यों न विश्व कवि पाब्लो नेरुदा की भारत यात्रा और नेहरू से मुलाकात का अनुभव भी यहां लिखा जाए....
"सन 1950 में मुझे फिर एक बार भारत जाना पड़ा। पैरिस में जोलियो क्यूरी ने मुझे एक ख़ास मिशन पर भेजने के लिए कहा। मुझे नई दिल्ली जाना था और अलग-अलग तरह के राजनीतिक विचारों वाले लोगों से सम्पर्क करना था और भारत में शान्ति के आंदोलन को मजबूत करने की संभावनाएं तलाशनी थी।
नेहरू ने अगली सुबह अपने दफ्तर में मिलने का समय दिया। वे उठे और चेहरे पर बिना किसी स्वागत मुस्कान के भाव के मुझसे हाथ मिलाया। उनका चेहरा इतनी बार छप चुका है कि उसे बताने की जरूरत नहीं। काली, ठंडी आँखे भाव शून्य रूप से मुझे देख रही थी। तीस साल पहले स्वाधीनता के एक बड़े प्रदर्शन में उनसे और उनके पिता से मेरा परिचय करवाया गया था। मैंने इसका जिक्र किया लेकिन उनके चेहरे पर कोई फर्क नहीं आया। एक आध शब्द में सब बातों का जवाब देते रहे और ठंडी आँखों से मुझे घूरते रहे।
मैंने उनके मित्र जोलिओ क्यूरी का पत्र उन्हें दिया। उन्होंने कहा कि उनके मन में फ्रेंच वैज्ञानिक क्यूरी के लिए बहुत सम्मान है और फिर वे पत्र पढ़ने लगे। उसमे क्यूरी ने मेरा परिचय भी दिया था और मेरे काम में नेहरू को मदद करने को भी कहा था। उन्होंने उसे पढ़ा और पढ़कर वापस लिफाफे में रख दिया और बिना कुछ कहे फिर मुझे देखने लगे। मुझे अचानक लगा मेरी उपस्थिति उनमे एक तरह की वितृष्णा जगा रही है। मुझे यह भी लगा कि पीतवर्ण का ये आदमी जरूर किसी बुरे शारीरिक, राजनीतिक या मानसिक अनुभव से गुजर रहा है।। उन्हें देखकर लगता था कि उनमें ऊँचा होने, शक्तिशाली होने का गुमान है। ऐसा सख़्त आदमी जो केवल आदेश देने का आदि है लेकिन नेता होने के गुणो से वंचित है।
"वापस जाकर मैं प्रोफेसर क्यूरी को क्या बताऊँ??"
"मैं उनके पत्र का उत्तर दे दूंगा" उन्होंने रूखेपन से कहा।
मैं कुछ मिनिट तक चुप रहा। वे कुछ क्षण बहुत ही लम्बे लगे। मुझे लगा अपने मिशन के बारे में कुछ कहना चाहिए,"शीत युद्ध कभी भी युद्ध में बदल सकता है।" मैंने भयानक आण्विक हथियारों का भी जिक्र किया। ऐसे में जो युद्ध नहीं चाहते उन सबको एक साथ आना चाहिए।
वे खोए रहे जैसे मेरी बात सुनी ही न हो और,"दोनों ही पक्ष एक दूसरे पे शांति के लिए तर्क फेंक रहे हैं।" मैं समझ गया कि बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी।
पांच साल बाद मुझे मास्को में लेनिन वार्षिक शांति पुरस्कार समिति में बैठने का मौका मिला। एक अंतर्राष्ट्रीय समिति जिसका मैं हिस्सा था। जब उस साल के पुरस्कार के लिए लोगों के नाम पर वोट करने का अवसर आया तो भारतीय प्रतिनिधि मंडल ने नेहरू का नाम सुझाया। मेरे चेहरे पर हंसी की एक छाया घूम गयी, जिसे वहां उपस्थित लोगों में से कोई नहीं समझ पाया। मैंने उसके पक्ष में मत दिया। अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार में नेहरू को विश्व शांति का प्रबल समर्थक कहा गया था।
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