किताबों की दुनिया और एक किताब चोर .....
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● सतीश छिम्पा
किताबें-
करती हैं बातें
आज की कल की... एक एक पल की
खुशियों की ग़मो की... फूलों की बमो की
प्यार की मार की..... जीत की हार की
क्या तुम नहीं सुनना चाहते किताबों की बातें
किताबें कुछ कहना चाहती है
तुम्हारे पास रहना चाहती है
● सफ़दर हाशमी
"बेहतर दुनिया का रस्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है"
(..... दुनिया की हर आदत से बेहतर और पवित्र है किताब पढ़ने की आदत, आप अगर रोज एक किताब पढ़कर सोते हैं या पढ़े बिना आपको नींद नहीं आती तो आप जीवन की सबसे ख़ूबसूरत शै के साथ हैं। किताबों से किया गया प्यार कभी आपको निराश नहीं करता, यह आपको बेहतर बनाता है। जेब मे भले धेला ना हो मगर आप जब किताब मेलों और किताबों की दुकानों की ओर खिंचने लगते हैं तब समझिए कि आप सुंदरता की ओर बढ़ रहे हैं।)
ये पूंजीवादी साजिशें
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हम लोग स्याणे बनते हैं। डेढ़ स्याणे, कागले से भी चंट जो गोबर में चोंच मारता है। कैसे ?? फेसबुकिया तिलिस्म में उलझकर झंडू बाम बने कुकवि- लिक्खाडों को इतना प्रचारित किया गया है कि आने वाली पीढ़ी साथ ही साथ प्रदूषित होती जा रही है। वर्चुएल दुनिया मे घूंटिया पंजाबी में जिसको गुड़ती कहा जाता है- जो लिया गया था- अधमरी आदमियत के साथ सड़ने लगा है।
एक दौर था जब लोग किताबें पढ़ने में पढ़ाने और चर्चाओं को पसंद करते थे। बहस मुबाहिसे और पाठक मंचों का स्वर्णिम दौर था। साहित्यिक पुस्तकें और पत्र- पत्रिकाएँ ढूंढ़कर पढ़ते थे। पंसारी की दुकान तक पर सरस्वती, चांद, लहर, अणिमा, हंस, साप्ताहिक हिंदुस्तान और सारिका, धर्मयुग, नई कहानी और कविता आदि जैसी पत्र पत्रिकाएँ उपलब्ध हो जाती थी। लोग बाग अध्ययन और चर्चा करते थे। बातों के केंद्र में विमर्शों के मुद्दे तय हुआ करते थे। विमर्श होते थे.... चर्चाएँ... हथाईयाँ होती थी। छोटे से छोटा या कहूँ नया लेखक भी पहचान लिया जाता था। क्लासिक्स का जमाना था। विश्व साहित्य के अनुवाद हुआ करते थे। समकालीन आत्ममुग्ध बीमार मानसिकताओं वाली युवा पीढ़ी की तरह तंग नजरिया और गंभीरता का नकली आवरण, नकाब तब नहीं हुआ करता था। वे हकीकतन बेहतर लोग थे।
अब सब अतीत हुआ। क्योंकि बाजार ये अच्छी तरह से जान गया है कि अपने मुनाफे में इजाफे के लिए कैसे इन सामाजिक प्राणियों की रुचियों को बदला जा सकता है। आप चाहे कितने ही चंट चालाक या डेढ़ स्याणे बनिए, वे फिर भी टोचरी में दे ही देंगे, कोई न कोई उत्पाद। बाजार में माल की कमी नहीं, इसीलिए श्रम के लिए मज़दूर भी कहाँ कम है। यह तो आप पर हैं कि आप कहाँ तक टिककर काम कर सकते हैं। मानसिक द्वंद्व, आर्थिक, सामाजिक और दैहिक द्वंद्वों के बीच, इसी तरह के पूंजी के पंक में पड़े बाजार में मुझको रोज़गार के लिए उतरना ही था। आज नहीं तो कल। किताबों ने उस समय जब अध्ययन बहुत कम ही था या कहूँ शुरुआती समय मे था। मुझे बनाया और उभारा था।
मैं जीवन चाहता हूँ किताबों से भरा
कर्ज हीन, सम्मान के साथ
मैं जी रहा हूँ किताबों के साथ
एक पूरी ज़िंदगी
मैं चाहता हूँ,
जब मरूं तो मेरी कब्र किताबों की हो।
वो समय, आत्महत्या या भाग जाना, पलायन का विचार उफ्फ, मुश्किल दिनों से क्यों न गुज़र रहे हो..... आत्मबल आपको हमेशा संघर्ष की प्रेरणा देती है। हौसला देती है। जब आप भूख और बेरोज़गारी से मोर्चा ले रहे होते हो तब "चार्ली चैप्लिन" की आत्मकथा आपको ऊर्जा देती है। कठोर से कठोर दिनों में ऑस्त्रोव्स्की आपको जज़्बे से भर देता है और अँधेरे दिनों में नाजिम हिकमत की कविताएँ आपके सपनो को पंख लगा देती है.... और फिर अवसाद के बाद और हरा हो जाता है जीवन। अवसाद के कठोर दिनों में जब आप सम्हल नहीं पाते हैं और अंधेरों की और मुड़ जाते हैं, तब लगता नहीं कि ये अँधेरा कभी छंटेगा, मगर एक दिन जब कोई नर्म, मुलायम उम्मीद आपके भीतर उतरकर पलने लगती है, तब उजाले आपको अपनी बाँहों में लेने के लिए बढ़ते हैं.... दिन मुश्किल होते हैं और आप अपघात के करीब होते हैं, लोग समझते हैं कि आपका काम तमाम हो गया, आप खत्म हो गए कि एक दिन आप किताबों की ओर मुड़ जाते हैं और उठ खड़े होते हैं, तब जीवन आपके लिए फिर से सहज रूप धर लेता है। प्यार आपको बाहों में लेने को मचलने लगता है। दुनिया के वे दो तरह के लोग जो आपको प्यार करते हैं तो निर्मम तरीके से आपको रौंदकर मार देना जो चाहते हैं, विवश देखने के अलावा कहीं कुछ भी नहीं कर सकते हैं।
मुझे यह कहने में या स्वीकारने में कोई हिचक नहीं हैं कि मैं आज भी किताबों के लिए, दुर्लभ मगर महत्वपूर्ण किताबो के लिए जोखिम उठा लेता हूँ। विश्व पुस्तक मेला (प्रगति मैदान, दिल्ली) का वह दौर आज तक मैं भूला नहीं हूँ जब एक धेला तक मेरी जेब मे नहीं था और में अवध असम गाड़ी में बिना टिकिट दिल्ली पहुंचा था। बिना किसी से संपर्क, घबराया, अजब सी विक्षिप्तों की तरह की शक्ल, अक्ल और बाल.... क्या करूँ और क्या ना करूँ में उलझा ही था कि एक कोई ऐसा दिख गया कि मेरा सब कुछ जो नामुमकिन था, हल हो गया (यह किस्सा अलग से कभी लिखूंगा) था। .... और जब मैं वापस सूरतगढ़ लौट रहा था तब मेरे पास बहुत सी किताबें थी, ऐसी किताबें जिनकी तासीर तक पहुंचना राजस्थानी युवाओं की रुचि का विषय ही नहीं रहा।
किताबें चोरी करना मेरी मजबूरन बनी आदत का एक बड़ा हिस्सा है। आज भी ना मिलती हो किताब तो चुरा लेता हूँ। किताबों के बारे में बीमार आदर्श भरी बातें बहुत चुभती है। किताबें पढ़ने की रुचि का मतलब कहानी उपन्यास ही नहीं भाई, इससे तो फिर टीवी ही देख लो, वो भी अच्छा है। बहुत से अन्य विषय, दर्शन का अध्ययन ज्यादा जरूरी है। जाने कितने ही मित्र परिचितों से उधार ले लेकर किताबे खरीद और पढ़ चुका हूँ। सूरतगढ़ में मार्क्सवादी स्टडी सर्किल भी मैंने ही शुरू किया था- एक ऐसी पहल जो अब तक राजस्थान में हुई ही नहीं। एक मुहिम जो जीवित युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास है।
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किताबें कोख है महान मनुष्य की.......
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● सतीश छिम्पा
किताबें राज खोलती है संस्कृतियों के सभ्यताओं के दरवाज़े खोलती है
किताबें सुनाती है मनुष्य विकास की कहानियां
युद्धों की ध्वंसात्मक कार्यवाहियों का पर्दाफाश करती है
तानाशाहों के अट्टहासों, उत्थान और मर जाने की गाथाएं सुनाती है किताबें.... वर्तमान में महान बने राजाओं, सामंतों के काले अतीत और करतूतों को सरेराह नंगा करती है किताबें।
कुदरत का सबसे खूबसूरत आविष्कार है मनुष्य और मनुष्य ने इज़ाद की एक और सुंदर शै, 'किताब'.....
किताबें समाये है अपने भीतर असंख्य प्रेम कहानियां
इज़ाबेलों और गॉमोर्डिलों की खूबसूरत रातों को
मिलन को बिरहा को और हैज़ल और नतालिया और उनकी कामुक सिसककारियों को
चुंबन
आलिंगन
प्यार और शत्रुता, घृणा और गद्दारी और ईमानदार रिश्तों की गरिमामय तासीर को
नींद और सर्द रात में महाकाव्यात्मक मिलन
किताबें बताती है नई दुनियां की खोज में निकले दैत्यों की अमानवीय हरकतों के बारे में
बार बार महंगे कपड़े बदलने वाले किसी गरीब देश के दुःस्वप्नजीवी प्रधान के बारे में
सभ्यताओं को बचाने की लड़ाइयां और जीवन को सहेजने सुंदर बनाने और अतिमानवीय साहसों का दस्तावेज़ है किताबें
किताबें ऐतिहासिक कब्रगाह है हिटलर,मुसोलिनी,हिरोहितो और बतिस्ताओं और पिनोशे की, छप्पन इंची सीने वाले फेंकू को आइना दिखाती हैं किताबें
किताबें कोख है महान मनुष्यों की मुक्ति की शब्द की और सामूहिकता की सुंदरता और न्याय की
किताबें धर्म की अंधी तासीर को खत्म करके जीवन को स्थापित करती है
स्थापित करती है मनुष्य को, गाय को अपदस्थ करके स्थापित करती लोकानुभव को
आओ स्थापित करें किताबों को
अपनाएं मनुष्यता के पहले ऐतिहासिक दस्तावेज़ को और रच दें एक और महाकाव्यात्मक गाथा जीवन, मुक्ति, न्याय और समानता और सुंदरता और सम्मान की
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पाठक बनाम समय
वर्तमान में किताबें आसानी से उपलब्ध है। अमेज़न, फ्लिपकार्ट आदि पर तो है ही मगर फेसबुक के कारण बढ़ रहे संपर्कों के माध्यम से नए बन रहे पाठकों के पास किताबें सहजता से पहुंच जाती है। ये बात मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि अभी एक छांछळे हुए युवा की पोस्ट पढ़ी, "मैं हूँ किताबों का बादशाह", पढ़कर हैरान नहीं हुआ और सहज कमेंट लिख दिया, "बावळीबूच अगर किताबें ही पढ़ता तो बादशाहत का नाम नहीं लेता", मेरे कमेंट के बाद उसने पोस्ट डिलीट कर दी और इनबॉक्स में कुछ ग्यासी बातें की, हालांकि ये व्यक्ति जरूरी या गैरजरूरी किताबों को खारिज करने की असफल कोशिशों के कारण हास्य का पात्र बनता रहता है। इस पोस्ट का मुख्य उद्देश्य ये बताना है कि आसानी से मिली चीज की भी कद्र की जानी चाहिए। हालांकि जब हम लोग किताबों से दोस्ती करने के प्रयास कर रहे थे तब किताबें किसी आकाशीय, अलौकिक वस्तु सी हमसे दूर, बहुत दूर होती जा रही थी। हम तरळे करते मगर असफल हो जाते। पैसे तो पास होते नहीं थे, वे तो आज भी नहीं है मगर तब का किताबों का अकाल आज एक हल्की मगर फ़ायदेमंद बाढ़ का रूप ले चुका है। मगर कभी इस तरह छांछळ कर हास्यास्पद नहीं बने। वैसे सबकी अपनी अपनी सोच है।
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वो किताब जो मैंने जीवन में पहली बार खरीदी --गोदान
● सतीश छिम्पा
वो किताब जो जीवन मे पहली बार खरीदी - गोदान
वो किताब जो जीवन की पहली मेरी पसंदीदा बनी- गोदान.....
यह सिर्फ मेरी ही कहानी नहीं है। हर उस लड़के की है जो अध्ययन और किताबों को किसी धर्म ग्रन्थ की तरह नही बल्कि जीवन जीने, सीखने और लड़ सकने को जीवन के हथियार के रूप में लें, जो कविताओं को आदर्श बीमारू जनवादी या लोकतांत्रिक ढब से या प्रीत के बासी सड़े आदर्श रूप में ना लें, मुक्ति कामी गीत की तरह या अन्न जल की तरह मानता हो :- जी हां, सही पहचान लिया आपने, मेरा नाम भी, बिल्कुल वही, आवारा, लंपट, लफ़ंगा, अय्याश, शराबी, ठरकी, गईवाळ जो कुछ भी भद्दा हो सकता था, वो मेरा नाम या कहूँ मेरे तआरुफ़ का सिंबल बन गया, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि कोमरेडाना स्पिरिट से मैं निकल आया मौत के उस कुए से और अब मेरा नाम सतीश छिम्पा है। मैं पंजाब पाकिस्तान बॉर्डर के जिला गंगानगर के सूरतगढ़ में रहता हूँ। एक साधारण सीमांत किसान परिवार में जन्मा थक मैं। जाने कैसे इस कमजोर और जर्जर घर को सम्हाले हुए थे दो विकलांग देह के धणी.... मैं जन्म से ही करड़ी किस्मत का हूँ, दादी माँ ने कहा था एक बार...... शायद सच
मैं किशोरावस्था तक ननिहाल मम्मड़ खेड़ा में ही जीवन वृक्ष के लिए खाद पानी ले रहा था।बचपन से ही हरयाणवी ढब ढाल में ढल चुका था। दुःसाहस विरासत में मिला है।
तोता मैना, पंचतंत्र की कहानियां। बात सन् 2002 की है। मैं 9वीं क्लास में पढ़ता था। पारिवारिक आर्थिक स्थितियां ज्यादातर इसी तरह की होती हैं , खासकर सीमांत किसान परिवारों के तो झाग आए ही रहते हैं। आदमी जब तक समझ पाता है... तब तक ये पूंजीवादी साजिशें उसकी उम्मीद के घेटू लगाकर काम पक्का कर जाती है। मुझे चाव था पढ़ने का, मगर सिलेबस नही, चाचा चौधरी, साबू, बांकेलाल, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, क्रुक बांड, भोकाल, इंस्पेक्टर स्टील, एंथनी, फाइटर टोड्स, कोबी भेड़िया, और राजन इकबाल आदि मेरे मित्र..... साथी थे गर्मियों की दोपहर के, लेकिन यह खजाना मेरा नही था, मेरे पास तो बहुत बाद में जुड़ा ये अद्भुत भंडार।
वो समय भी अजीब मगर अच्छा था... जब अक्सर हमारे मुहल्ले आदि के लड़के कॉमिक्स का जूआ खेला करते। माचिस की डब्बी से ताश या एक्टर्स आदि के कार्ड या काच गोळी, पट नक्का दुआ तीया.... इस खेल का माहिर बादशाह था गिंडी, जो इस समय गैंबलर बन चुका है। झज्जु भाई ने उसको हराया तो मेरे मौज बन गई। कॉमिक्स ही कॉमिक्स थी तब मेरे पास। एक और बात कि उस समय कुछ लोग कॉमिक्स तो कुछ गुलशन नंदा टाइप साहित्यिक पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं भी डाक आदी से मंगवाते और पढ़ते थे। शिव भाई की पंसारी की दुकान पर भी कॉमिक्स मिल जाया करती थी।
पिता जी पांचवीं जमात तक पढ़े हुए हैं। कहते हैं कि उस जमाने की पांच जमात, आजकल की दस जमात के बराबर है। पिताजी पंचतंत्र की कहानियां और तोता मैना अपनी सिलाई मशीन के डिब्बे में रखते थे, जिन्हें बाद में मैंने पढा। यह आकर्षण उसी उम्र में पैदा हुआ था। किताबें मुझे आकर्षित करती, उनका तिलिस्म मुझे बांधता, मैं किसी बौड़म की तरह किताबों की खुशबुओं में खोया हुआ खोया ही रहना चाहता था। मगर पचास साठ रुपये कीमत वाली किताब खरीदना भी खांडे की धार हो जाती थी। मांग कर किताबें पढ़ता था। लोगों का निजी पुस्तकालय देखकर मेरा जी बळता, तड़प उठती और बैठ जाती। मगर होना क्या था।
मस्तराम टाइप की किताबें बहुत प्रचलित थी- मगर मस्तराम से भी ज्यादा खतरनाक हुआ करती थी। हर एक किशोर के पास ये एक दो या ज्यादा मिल ही जाती थी। जिसको पढ़ पढ़कर किशोरावस्था के तुफानो और झंझावतों को शांत किया जाता था। एक दिन इसी तरह की एक किताब, मस्तराम की नही बल्कि अश्लील शेरो शायरी की, उसको पढ़ते हुए अचानक पीछे पेज के विज्ञापन को देखा और नम्बर और पता उतार लिया। मयूर नामक प्रकाशन से छपा प्रेमचंद का गोदान उपन्यास जिसका नाम सुना था। अब अचानक सामने आया तो प्यास बढ़ गई। साठ रुपये की थी। मगर साठ रुपये ही तो नही थे पास मेरे। माँ देती नही थी, क्योंकि उन्ही के टेलरिंग के काम से घर खर्च चलता था। माँ बचपन से ही पोलियो ग्रस्त है और एक पैर से विकलांग है। दिन भर में दो तो कभी तीन सूट बना पाती थी और कभी एक भी नहीं। सो वहां नहीं ही मिलने थे- चीज खाने के लिए रुपया- दो रुपया जो महीने बीस दिनों में मिलते, उनका क्या हो पाता, इसलिए चीज खाने के लिए जो मैं हमेशा एक निर्धारित किया खजाने से बूंद बूंद लेकर नहीं बल्कि खजाने में डाका ही मारा करता था -- वहां भी क्या मिला, कुछ नही उस दिन तो गली में बने पाखानों से ढुंगा धोने के पानी से भरी बोतलें भी केवल दो ही मिली और उनमे से एक खांडी भी थी। खांडी बोतल नही बिका करती थी... कहीँ कोई राह नही थी, लेकिन 'गोदान' को तो पढ़ना ही था।
पारिवारिक आर्थिक स्थितियां ज्यादातर लोगों की इसी तरह की होती हैं ,(आपने 'पहली कमाई ' का जो कॉलम देखा पढा है, यह उन्ही दिनों में से एक किस्सा है।) खासकर सीमांत किसान परिवारों के तो झाग आए ही रहते हैं। आदमी जब तक समझ पाता है... तब तक ये व्यवस्थागत साजिशें उसकी उम्मीद के घेटू लगाकर हिन्दू और मुस्लिम कर के आदमी का काम पक्के में कर जाती है। साथ-साथ काम भी करना था। इसलिए बहुत सी जगहों पर काम के लिए मारा मारा फिरता रहता। मेरा दुबला पतला सींकिया बदन मुझे हर मेहनत वाले काम की जगहों पर अयोग्य करार दिलवा देता। स्कूल के लिए बैग उठाकर घर से निकलता तो (पुरानी आबादी राजकीय माध्यमिक विद्यालय) स्कूल जो बहुत दूर था, रास्ते मे आने वाली फलों और गोलगप्पों की रेहड़ियों या कबाड़ियों से भी पूछा करता।
बहुत जगहों पर तलाशने के बाद मुझे सोनी कटला में एक चप्पलों की दूकान टाईप एजेंसी में काम मिल गया। मोहल्ले का लाला उर्फ काका वहां पर कुछ महीनों से लगा हुआ था- बात तय हुई, मुझे पहले काम सिखाया जाना था जो सुबह नो बजे से शाम को दस बजे तक भी हो जाता था। तनख्वाह ढाई सौ महीना, मेरा काम दुकान के आगे बुहारी देना, कभी चाय बोल आना, बड़े गट्टों और बोरियों में माल भरना, माल मतलब चप्पल, हवाई चप्पल, सेंडल चप्पल, बाटा चप्पल, घरेलू चप्पल, हर तरफ चप्पल ही चप्पल। फिर जब दो दिनों बाद मुझे असल ड्यूटी दी गई, काली, पीली, लाल या जो हो उन चप्पलों को बोरे में डालकर साइकिल से घसीटता हुआ दुकानों और रेहड़ियों पर सप्लाई करने जाता, चार पांच घण्टो में ही स्यान लेणी हो जाती थी।
कभी कभी पुरानी आबादी या गीता ज्योति आदि स्कूल के बच्चे राह में मुझे मिलते चाट पकोड़ियां खाते हुए, साइकिल चलाते या पतंग लूटते हुए.... वे देखते मुझे घिसट घिसट चलते हुए साइकिल से माल ढोते हुए। शर्मिंदगी होती। उस समय जब किसी परिचित लड़की का अचानक सामना हो जाता तो-- भले कोई कुछ ना सोचे मगर किशोर मन तो रोज रात संभोग रत्त ही रहता है, पायजामा खराब ना हो तब तक हिलता नही उस पोजिशन से। शर्मिंदगी भी ज्यादा नही रही। एक बार जब करनाणी धर्मशाला रोड़ पर की रेहड़ियों पर चप्पलें सप्लाई के लिए गया तो मक्खण ने अपनी माता को मेरे लिए मजाक करते हुए मजाक ही में कुछ कह- "देख छोटा सा तो है, काम कमाई करके पढ़ता है।" (पंजाबी में कहा था- 'निक्का जेहा मुंडा कीरत कर के पढ़दा ए.....) वो कॉम्प्लिमेंट मेरे जीवन का सबसे बड़ा कॉम्प्लिमेंट था, मगर मैं ही लायक नही था उस कोंप्लिमेंट के।
(... आज जब यह लिख रहा हूँ जाने क्यों भावुक सुनामी आ रही भीतर और विचार और स्मृति के तंतू बिखर कर बेमेल हुए जा रहे हैं, ये क्या है कि झूठ नही निकल रहा, यही कारण है, किताबो के कारण मैं आज भी किसी का भयानक से भयानक सच भी पचा सकता हूँ मगर सहन नही होता है और दिल करता है आग लगा दूं। नेस्तोनाबूत कर दूं, विध्वंस से मिटा दूं इस समाज को, इस वहशी लोगों के समाज को... उफ़्फ़ ये हकीकत। आप जितने ज्यादा सीधे सरल होते हैं उतनी ज्यादा आपकी जड़ें काटी जाती आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे- उतना ही आपका सम्मान होगा। कुकर्म तक भुला दिया जाता है। सरकारी अधिकारी या उच्चाधिकारी हैं तो आप आलोचकों की नज़र में नाजिम हिकमत या नेरुदा या निराला या दुष्यंत होंगे। यह एक रोग समान चिपक गया था मेरे।..)
मैं दुकान आगे बुहारी दे रहा था। सेठ जाने कहाँ से लड़ भिड़कर आया था, चाय का कप मेरी तरफ फेंका, लगा नही, बच गया, ''ये यहां क्या बुहारी तेरा बाप निकलेगा ??"
- "अरे ओ समान गाळ ना काढ, काम करता हूँ, फोकट नही बैठा तेरी तरह।'' बुहारी फेंक घर आ गया। सोचा कि गोदान अब जाने कब, कहां और कैसे पढ़ पाऊंगा- मेहनत खराब गई, पैसे डूब गए,...''
-"तेरा लड़का दबता नही है ..." पापा मां को वो बात बता रहे थे जो सेठ ने उन्हें दो सौ (पन्द्र दिन की सैलरी से ज्यादा दे दिए थे।) रुपए देते हुए कहा। अब तारीफ सुनने का मन नही था। बहुत मुश्किल से रात बीती और अगले दिन मनीऑर्डर किया साथ रुपये का और ििनतज़र करता रहा।
इंतज़ार.... इंतज़ार... इंतज़ार और बस, इंतज़ार और सात पता नही आठवे दिन वीपीपी आई घर मे, हैरान था साथ कि किताब डेढ़ सौ में कैसे, खैर उसका मलाल नही। गोदान मेरे हाथ मे थी.... गोदान मेरे उल्लास और निश्छल मन मे था। एक सिटिंग, रात भर में पढ़ गया। वो दिन याद है आज भी। घूघरिया लाग गया , पैर धरती पर नही टिके थे, प्रेमचंद को पढा है प्रेमचंद को.......... साहित्यिक किताब वह पहली थी जो खरीदी, पहली थी जो मेरी अपनी थी।
आज भी मैं साथ हूँ झुनिया के
गोबर के
होरी के.... मगर मैं अब खुद अपने साथ नही रहा।
(एक बार बहुत समय पहले इसको फेसबुक पर पोस्ट किया था, जो जाने कहाँ गायब हुए स्मृतियों के हिसाब से लिखा है हो सकता है कुछ छूट गया हो.....)
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एक किताब चोर ... (भाग १)
(.... 'कथा एक किताब चोर की' से आगे।)
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० सतीश छिपा
"मैं जीवन चाहता हूँ किताबों से भरा
कर्ज हीन, सम्मान के साथ
मैं जी रहा हूँ किताबों के साथ
एक पूरी ज़िंदगी
मैं चाहता हूँ,
जब मरूं तो मेरी कब्र किताबों की हो।
यह कहानी है एक आवारा यायावर की जिसका नाम इन कुछ विशेष सामाजिक अलंकारों के साथ लिया जाता है। जी हाँ, यह कहानी है एक सड़क छाप बदतमीज, बुरे, अय्याश औए लोफर और लंपट लड़के की जो आगे जाकर अपने नाम ही के अनुरूप राजस्थानी साहित्य सबसे ज्यादा बदनाम और उपेक्षित नाम बनेगा। जी हाँ, यह कहानी एक लाल आंखों वाले लड़के की जिसका इस धरती पर होना या ना होना, कोई मायने नहीं रखता है, बोझ के अलावा। जी हाँ साथियो, यह कहानी है असहमति को दर्ज करवाने वाले युवा कि, यह आपकी हो, मेरी हो या हो किसी की भी, कहानी अंततः कहानी ही होती है। मेरा नाम (...नैरेटर.) कुछ भी हो सकता है। मैं राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ कस्बे में रहता हूँ। एक साधारण परिवार में जन्मा मैं कुछ अजीब और जन्मजात खतरनाक आदतों के साथ बड़ा हुआ था। किशोरावस्था के शुरू में ही मुझे किताबों के अध्ययन का चस्का पड़ गया था।। किताबें मुझे आकर्षित करती, उनका तिलिस्म मुझे बांधता, मैं किसी बौड़म की तरह किताबों की खुशबुओं में खोया हुआ खोया ही रहना चाहता था। मगर पचास साठ रुपये कीमत वाली किताब खरीदना भी खांडे की धार हो जाती थी। मांग कर किताबें पढ़ता था। लोगों का निजी पुस्तकालय देखकर मेरा जी बळता, तड़प उठती और बैठ जाती। मगर होना क्या था।
-"सर ज्ञानरंजन जी की यह किताब इश्यू करवानी है।" मैंने स्कूल के लाइब्रेरियन जिसके पास सिर्फ प्रभार था से कहा।
-"किताब इश्यू नहीं कर सकते जब तक पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति न हो जाए।"
लेकिन मुझे वो किताब खींच रही थी अपनी ओर, वो देख रही थी मुझे हसरतों से और मैं उसकी तरफ़ ललचाई निगाहों से, मेरी अंगुलियां उसके पन्नो पर फिसलने के लिए मचल रही थी और अध्यापक जी के पीठ फोरते ही किताब मैंने अंट में दाब ली और बाहर चला आया। मेरे दिल की धड़कनें रेल के इंजन की तरह चल रही थी। धूजता हुआ मैं क्लास में पहूंचा और बैग में किताब रखकर निश्चिन्त होने का प्रयास करने लगा, मगर सफल न हो सका और आधी छुट्टी को बैग उठाकर घर भाग गया। यह मेरी पहली चोरी थी और ज्ञान जी की कहानियां बहिर्गमन, पिता, फेन्स के इधर और उधर, घण्टा आदि मेरी प्रिय कहानियां बन गयी। उसके बाद वहां से चेखव, गोगोल, कृष्ण कल्पित, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश की किताबें भी धीरे धीरे निकालता रहा और पढ़ता रहा। मेरे भूखे मन को जब्बर ख़ुराक मिलने लगी थी। फिर एक दिन पुस्तकालय पर ताला लटक गया।
कॉलेज में चोरी करने की लोड़ ही नहीं थी। वहां किताबें मिल जाया करती थी। मुझे याद है जब मैंने विष्णु प्रभाकर की शरत पर लिखी "आवारा मसीहा" इश्यू करवाई तो लाइब्रेरियन ने कहा था कि 1978 के बाद यह किताब तुम ही पहली बार इश्यू करवा रहे हो। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था और एक ही दिन में उसे पूरा पढ़ गया। एमिल जोला और तुर्गनेव को मैं अपने पास रखना चाहता था इसलिए अमृता प्रीतम की रसीदी टिकिट किताब हाथ में लेकर जोला और तुर्गनेव को अंट में दबा लिया और रसीदी टिकिट इश्यू करवा कर घर आ गया। यह वो दौर था जब मैं हर दिन एक किताब पढ़कर ही सोता था। आठ घण्टे की मेरी नींद तीन घण्टों में सिमट गयी थी। ये वो दिन थे जब जेब खाली और दिल भरा हुआ होता था। जेब तो आज भी खाली ही है मगर गर्दिश के उन दिनों में अरमान आसमानों को छूने के होते हुए भी पांव यथार्थ की जमीन पर टिके हुए थे। समोसा कचोरी की जगह किताब हथियाना अच्छा लगता था। यह आज तक बनी हुई है, इतना ज्यादा कि विश्व पुस्तक मेला दिल्ली हो या पटियाला या बठिंडा आदि में किताबें खरीदते हुए अनेक बार रेल या बस का किराया तक उसमे लगा दिया था। सन 2016 में जब देश निर्मोही जी से उन्ही के आधार प्रकाशन पर आदरजोग कुंवर रविन्द्र सर और बीकानेर के कवि नवनीत पांडेय और राजकुमार राकेश सर से भी मिला, उस समय पास में जो था सब लगा गया और मुझे कुंवर रविन्द्र सर से पांच सौ रुपये उधार पकड़कर वापस घर आया था और उसके बाद तो दीवानगी इतनी बढ़ गयी कि शर्म उड़ाकर फैंक दी और कत्ल के इस केस में मुझको घनघोर बेशर्म होने की सजा सुना दी गई थी।
इन दिनों फेसबुक पर मैं जो 'किताबनामा' नामक कॉलम लिख रहा हूँ, इसकी नींव भी उसी दौर में पड़ी थी। हुआ यह कि एक बार किसी मित्र के साथ मैं शाम की सैर करने के लिए जा ही रहा था कि कोई परिचित मित्र और मिल गया, उसी से बात चीत चलने लगी। कारण नहीं पता कि क्यो लेकिन हर बहस पर मैं जो तर्क दे रहा था रिफरेंस के साथ उससे वो चिढ़ गया था। इसी मूर्खता में वह जाने क्या बोलना चाह रहा था और क्या बोल गया, 'ले तेरी कोई इश्क की कहानियां किसी किस पढ़ी हुई है। नाम और सब कुछ बताओ, यह अब इसी बात का विस्तार है। और मैंने सब विस्तार से बता दिया। दरअसल उन दिनों खूबसूरत लड़कियों के हुस्न को नज़रों से सहलाते, पीते हुए जब पूरा दिन ही कोलेजे बीतने शुरू हुआ और मैं फिर मुड़ा किताबों की तरफ यह मेरे एकाग्र मन की ही ऊर्जा थी। और जब नज़र आई 'प्रेम कहानियां' नाम से विश्व साहित्य की कुछ बेहतरीन प्रेम कहानियों का संकलन । तब जाने किस घुट्टी में घोल कर पिया था उन कहनियों को और बिल्कुल डिट्टो उसको सब कुछ बता दिया,.....
शीर्षक कहानी मक्सिम गोर्की की थी। अलग- अलग राष्ट्रों के बारह कहानीकारों की तेरह कहानियों का यह संग्रह अपने आप मे अद्भुत है। कारेल चापेक की कहानी 'द्वीप' प्रेम की बेमिसाल कहानी है जिसमे प्यार का एकपक्षीय भाव परिलक्षित होता है। नायिका का मौन समर्पण कहानी को विशिष्ट बनाता है। इसी कहानी का एक कथन बहुत मार्मिक है, " डरो नहीं, याद करने की कोशिश करो कि तुम इंसान हो। इसके लिए मांस और शराब लाओ, यह बहुत कमजोर नज़र आ रहा है। तुम यहाँ बैठो और अपने बारे में बताओ, भाषा जैसा अहम तोहफ़ा तुम्हे वापस मिला है। ज़ुबान की ताकत से सुंदर और कुछ नहीं, इसकी मदद से मनुष्य बीते लम्हों और भावनाओं को व्यक्त कर सकता है।"
ऑस्कर वाइल्ड की कहानी 'बुलबुल और गुलाब' फैंटेसी होते हुए भी मुझे विशेष प्रिय है। प्रेम और किसी प्रेमी के लिए बुलबुल का बलिदान इसे और ज्यादा मार्मिक बना देता है।मोपासां की कहानी 'दीवानापन' कम उम्र में बड़ा प्रेमी सिद्ध होने की जिद की कहानी है। यहां उम्र के बंधन टूट जाते हैं। अतिसंवेदनशीलता और भावुकता के अतिरेक में 'सेंतीज़' सीमाओं को तोड़ डालता है। यह बहुत मुलायम सी कहानी है। कैरोली किसफलूदी की कहानी 'प्रेम और कर्तव्य' में प्रेम और कर्तव्य के मध्य द्वंद्व को दर्शाया गया है। कर्तव्य और प्रेम को पूरक मानकर, पहले कर्तव्य पालन की बात कही गयी है। जब कर्तव्य पूरा हो जाए तभी प्रेम आपको आलिंगन में लेता है। बिना इसके प्रेम सिर्फ हवस बनकर रह जाता है। गोर्की की कहानी 'उसका प्रेमी' एक ऐसी महिला की कहानी है जो प्रेम पाने के लिए कुछ भी कर सकती है। जाने कौन कौन से करतब वह करती है। अंत तक वह किसी मायाविनी की तरह व्यवहार करती है और आध्यात्म को प्राप्त हो जाती है। यह लाजवाब कहानीं थी। थॉमस हार्डी की 'औरत और ख़्याल' स्त्री के विद्रोह और दिवास्वप्न की कहानी है जिसमे अनजान प्रेमी से मिलन के लिए नायिका ख़्यालों में विचरती है। कह सकते हैं कि इस संग्रह ने स्फटिक का काम किया था और इसी में ओ हेनरी, अरमांदो जेगरी, अर्नेस्ट हैमिंग्वे, चेखव, आर्थर शिनितज्र और तोल्स्तोय की कहानियां भी थी। प्यार, प्रेम और इश्क के ये जादुई शब्द तिलिस्म पैदा करते हूं प्रेम की कहानियों की लाजवाब किताब थी। वो भाई पाटेड़ी आंखों से मुझे यूँ देख रहा था जैसे मैंने कोई जादू किया हो।
बस यही से इश्क इश्क की हदें तोड़ गया और किताबे बस मैं और मुझमे किताबें.... किसी भाषा के साहित्य, संस्कृति और शैली को किसी अन्य भाषा मे उसी तरह लेकर जाने की प्रक्रिया के चलते हमने पाया सहेज है विश्व समुद्र का अथाह जल। विश्व साहित्य में सोवियत साहित्य या फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगीज, चेक, इंग्लिश, चीनी, पाकिस्तानी या ईरानी साहित्य सरल और प्रवाहमान, इन सभी भाषाओं की अनेक किताबें मेंरे सामने थी और मैं चोर, ले गया शब्दों या वाक्यों का ही नहीं बल्कि भावों के भावुक हस्तक्षेप को हतक्षेप।
मेरा हमेशा से तो नहीं कहूंगा लेकिन अध्ययन और समझ विकसित हुई तो मेरा यह मानना या दृष्टिकोण रहा है कि किताबों मनबहलाव के लिए ही नहीं पढ़ी जा सकती। किताबें माध्यम है उस गौरवशाली अतीत को जानने का जो नये महामानव के निर्माण की गाथाओं और अतिमानवीय साहस से भरा है। क्रांतियों के सफल- असफल अतीत को जानने का, भूलों को समझने का और गुणों को आत्मसात करने का भी मार्ग किताबों से ही होकर जाता है। कुचक्रों, अन्याय, शोषण और दगाबाजियों से भरे वर्तमान की चालों को समझने और सुधारने का माध्यम किताबें ही हैं। किताबें भविष्य की अँधेरी सड़कों को मुक्ति के उजास से भरकर इस दुनिया को जीने लायक बनाने की मुहीम है। मत कहो कि तुम सिर्फ मनोरंजन और बुद्धिजीवी दिखने, बनने के लिए किताबें पढ़ते हो। किताबें राजपथ की खोखली नीतियों का पर्दाफ़ाश करने वाली प्रचंड रूप से धधकती ज्वाला है।
मेरे एक परिचित के पास जबर्दस्त पुस्तकालय था। गोर्की, हेमिंग्वे, मोपांसा, चेखव, प्रेमचन्द, धूमिल आदि बहुत से कालजयी लेखक उसके पास थे मगर वो किताब देता नहीं था।
-"किताब दे दे यार प्लीज"
-"खरीद कर पढ़ने की आदत डाल, मैं नहीं देता।"
-"तेरे पिता तो सरकारी नौकरी में है, मैं कहाँ से खरीदूं, दे दे भाई।"
-"नहीं।"
-"देख दे दे, नींस तो चुरा लूंगा।" मैने कहा तो वो हंसने लगा और बात आई गयी हो गयी। और एक दिन जब वो घर नहीं था,आंटी जी से अनुमति लेकर मैं उसके कमरे में घुस गया और मोपांसा, गोर्की, चेखव मेरी अंट में थे और धूमिल, प्रेमचन्द और पास्तरनाक मेरे हाथ में थे। आज भी वो मुझसे किताब मांगता है। आज हालांकि हर एक व्यक्ति के लिए किताबें इतनी आसानी से मिलने लगी है कि अक्सर हम बात करते हुए कहते हैं कि, "यह फ़ेसबुकिया' दौर और इसकी प्रवृत्तियों, किताबों की गरिमा को चूस गई है। जाने कितने लिंक दिए गए हैं कि हर तरफ ई मेगज़ीन या ई बुक जैसा प्रदूषण फैला हुआ है।
यह एक ऐसा सुनहरा दौर था जब मैं किताबों के लिए बिना टिकिट दूर दराज तक जा आया हूँ। तुर्गनेव, गोर्की, चेखव, शोलोखोव आदि बहुत से रचनाकार मेरे प्रिय हो गये थे।
धीरे धीरे समझ विकसित हुई और अध्ययन और संपर्क का दायरा बढ़ा और मैं भी कुछ फुटकर काम करता रहता..... फिर मैं किताबें खरीदने लग गया और खरीद कर पढ़ने लग गया। अब जब भी उसे किताब की जरूरत होती है मैं दे देता हूँ मगर अब वो किताबें नहीं पढ़ता। इससे एक चीज मुझमे पैदा हो गयी कि जब भी कोई युवा या युवतर लड़का लड़की मुझसे किताब मांगते हैं। मैं मना नहीं कर पाता।
० सतीश छिम्पा
क्रमशः..... (अगली क़िस्त आगे किसी दिन।)
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कथा एक किताब चोर की.....(२)
(किताबें मेरी बुझती सांस की आस है.....)
● सतीश छिम्पा
सन 2007 या 08 के आसपास की ही बात है। राजकीय महाविद्यालय, सूरतगढ़ में स्नातक में पढ़ रहा था। जैसा कि आपने इससे पहले की तीन पोस्ट पढ़ ली है-- जिससे साबित होता है कि पैसों के अभाव के चलते प्रचंड तरीके से उठती अध्ययन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए मैं दुस्साहसी बन गया था। चोर बन गया था। किताबों का चोर। एक आवारा, सड़कछाप यायावर बनने से पहले बन गया था मैं एक चोर। और ऐसी ऐसी जगहों से किताबे उड़ाई जहा भीतर जाने तक कि अनुमति नहीं होती थी।
किताबों में एक गजब तरह का तिलिस्म होता है। आपकी बिलकुल इच्छा ना हो भले, या आप किसी और काम या, किसी के साथ गये भर ही हो या आपकी जेबें फटी हुई हो या जो भी कारण हो.... वो कारण खत्म हो जाता है और किताबें इस जादुई तरीके से आपकी तरफ़ देखती है कि आपका जान बूझकर पत्थर किया गया दिल पिघल जाता है। आप ललचाई निगाहों से कभी "आदि विद्रोही" तो कभी "रंगां दी गागर" या कभी "लहू दी लो" की ओर देखते हैं। आपकी नज़रें वहां ठहर जाती है। वे ठहरी रहती है कि अचानक आपके कदम उस ओर बढ़ जाते हैं और आपकी अंगुलियां किताब के खुशबूदार रहस्यमयी पन्नो पर फिसलने लगती हैं। आपका मन उसको पढ़ने के लिए ललचा उठता है और कुछ देर में जादू में बंधकर आप उसको ख़रीदने के लिए बढ़ते हैं कि फिर एक और किताब, फिर और...और...और... और इस तरह आपके पास अनेक किताबें हो जाती हैं, जिन्हें ब्लैक टी पीते हुए आप अकेली रातों में पढ़ते हुए फिर से नई किताबों की संगत की तैयारी करते हैं.. लेकिन मैं तब खरीद नहीं पाता था।
किताबों के इस नशे में मुझको किताबों की दुनिया का सबसे बड़ा चोर और ठग बना दिया था। लेकिन बात यह भी एक है कि व्यक्तिगत द्वेष रखने वाले अक्सर इसी को तर्क मानकर जवाब देते हैं, आत्ममुग्ध ना समझा जाऊं तो कहूंगा कि किताबो की क्वालिटी मुझे बेहतरीन मिली है। आज तक कोई भी घटिया किताब नहीं चुराई मैंने।। क्योंकि यह भी तो सवाल खड़ा रहता है पाठक के सामने कि, "हम कौनसी या किस तरह की किताबें पढ़ें ?" केवल सहित्य पढ़ना मेरी रुचि नहीं है। दर्शन नही पढोगे तो साहित्य अध्ययन का अचार थोड़े डालना है। उसके बिना यह निराधार है। सूरज पाल सर की बात से सहमत होते हुए यही कहूंगा कि, "सबसे ज्यादा वे किताबें पढ़ी जाती हैं जो पाठक कहीं से चुरा कर लाता है। किताब चुराने का जोखिम तभी उठाया जायेगा जब किताब नजर तो आ रही हो लेकिन हमारे पास न हो।", इसमें रुचि, स्तर और कल्चरल पॉलिटिकल इफ़ेक्ट को भी ध्यान में रखता हूँ।
उन्ही दिनों दिमाग मे खतरनाक खुराफातों ने जन्म लिया। जिसकी वजह से कई बार गाली, झिड़की और बेइज्जती भी सही। हुआ यूं कि मैंने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की, "नागार्जुन सहित्य सम्मान" के नाम से और हंस, कथादेश, आदि अनेक पत्र पत्रिकाओं में भेज दिया... जानता था कि किताबें आएगी जरूर, पुरस्कार का लालच किसे नहीं हैं।...... और फिर होने लगी डाक द्वारा किताबों की बरसात। अनेकानेक किताबें आई, लगभग सात या आठ सौ के आस पास। मेरी अध्ययन गति बहुत ज्यादा तेज थी जो अब सिर्फ तेज है। आज के लाजवाब रचनाकारों जैसे एच. आर. हरनोट, उर्मिला शिरीष, रत्न कुमार सांभरिया, राज बुद्धिराजा, धीरेंद्र अस्थाना आदि बहुत से नाम थे। किताबे तो चलो एकत्र हो गई लेकिन बहुत से लेखक टेलिफोन पड़ोस से सहारण परिवार का नम्बर दिया होता था। कॉल कर कर के उन्होंने स्यान ले ली।
वैसे डर भी बहुत था कि कहीं पकड़ा गया तो पुलिस केस ना हो जाए, लेकिन चलता रहा। फिर एक दिन एक और विज्ञप्ति जारी हुई, "इस वर्ष का नागार्जुन साहित्य सम्मान भेराराम (जाने क्या नाम दिया था फर्जी में ही) को फलां फलां कृति पर घोषित किया गया है। .. और उन्ही पत्रिकाओं में भेज दिया, और बस, सब काम जम गया था। अब कोई कॉल नहीं आती थी। बाद में हालांकि मुझे इस कृत्य पर पछतावा भी बहुत हुआ कि मैं एक रचनाकार के साथ धोखा और गद्दारी कैसे कर सकता हूँ। यह गलत था। अपना कन्फेशन किया एक अध्यापक (तब वो अध्यापक नहीं था, बाद में लगा था)मित्र से तो उसने मुझे दिलासा देते हुए मेरी साफ़गोई पर मर- मिटे जा रहा था। मैं हैरान की भाई तारीफ है या मजाक, समझ नहीं आ रहा था। उसी लहर में बहते हुए उसने मुझे चाय का कहा तो निकल लिया उसी के साथ उसके घर।
चाय पीते हुए वो अपनी बहन और पिता के सामने मेरी तारीफ में लिट लिट जा रहा था। तभी बाहर शायद कोई शोर हुआ, यूँ ही बच्चे कर रहे थे लेकिन अंदेशा लड़ाई का था, सब के सब दौड़ लिए गेट की तरफ.... मैंने देखा अलमारी पर 'राग दरबारी' रखा है... उठाया और अंट में दबाकर निकल लिया, दोस्त से किसी काम का बहाना करके।
- "साले कुत्ते तू नहीं सुधरेगा।" उसने मसखरी करते हुए कहा था।
इस किताब जुगाड़ू मुहीम में कई बेहतरीन किताबें हाथ आई थी। हरनोट की दारोश तथा अन्य कहानियां भी थी।
एक दिन किसी काम से मुख्य पोस्ट ऑफिस गया। जहां पोस्टमेन डाक छांटता है, वहाँ सीधे चला जाता हूँ मैं। डाक देख ही रहा था कि एक डाक पर नज़र गयी, फटा हुआ लिफाफा साफ बता रहा था कि इसमें 'नया ज्ञानोदय' का प्रेम महा विशेषांक है। डाक राजेन्द्र छिम्पा की थी जो डाकिया से अनुमति लेकर मैं उनके घर पहुचाने का बहाना कारक ले आया था। विश्व साहित्य की जोरदार सामग्री थी। यह आज भी है मेरे पास।
क्रमशः :----- (किस्सा कथा किताब चोर)
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किस्सा एक किताब चोर का..(भाग-३)
० सतीश छिम्पा
पहले बताया था कि पैसे ना होने और पढ़ने की ललक के चलते किताबें मुझे कुछ ज्यादा ही पुकारने लग गई थी। सोलह वर्षीय लौंडे को कौन सौ- पचास रुपये देता। दस रुपये भी महाभारत हो जाते थे। यही कारण था कि किताबें चोरी करना मेरी आदत बन गई। जहां पढ़ने के लिए किताबें मिल भी रही होती तो भी कुछ किताबों को संग्रहित करने की चाह मुझसे चोरी करवा ही लेती थी। कालांतर में चोरी की आदत ने 'पैसे उधार' लेने की शक्ल अख़्तियार कर ली थी/है।
मृणाल पांडे का कहानी संग्रह मैंने अंट में दबा लिया और वापस मुड़ने को ही था कि कॉलेज के पुस्तकालयाध्यक्ष जगदीश जी ने मुझको आवाज़ लगाई, "सतीश, इधर आओ", ये स्नातक प्रथम वर्ष की बात है। किताबें चोरी करते हुए मुझे लगभग दो महीने हो गए थे। मोपासां, एमिल जोला, चेखव, अमृता प्रीतम, राजेन्द्र यादव आदि को चुरा चुका था। उनकी आवाज़ ने मुझे हिलाकर रख दिया। मैं उनकी तरफ बढ़ रहा था मगर लग रहा था जैसे मेरे पैरों में सत्त ही नहीं हो, पांव धूज रहे थे। गला सूख गया, थूक निगलना मुश्किल हो गया था। मैं सोच रहा था कि राजस्थान पत्रिका में कहानी छपने और कॉलेज के मंचो पर चढ़- चढ़कर जो इज्जत कमाई है वो अब धूड़ धप्प होने वाली है। बोलना चाह रहा था मगर शब्द कहीं अलोप हो गए थे। हिम्मत करके पूछ लिया, ''जी सर"
- "बिन्नै जावै तो मोहन जी नै भेज देई।" उन्होंने कहा तो जैसे अधमरा कोई कबूतर जी उठा हो मगर अभी धूजणी गई नहीं थी। कंपकपाते हुए ''जी, सर'' कहा और दौड़ता हुआ सा निकल गया। यह पहली ही बार था कि मुझे इतनी घबराहट हुई। इसके बाद मैंने किताबें निकालना बंद कर दिया था। मगर कब तक ? बस यूं ही एक दिन अंजली (नाम बदला हुआ) के आकर्षण में बंधा मेरा किशोर मन, उसकी सुंदरता को आंखों ही आंखों पीने के लिए लाइब्रेरी में उसके पीछे हो लिया। वो इतिहास की किताबों की अलमारी की तरफ खड़ी थी। उसके बिल्कुल सामने तब भारतीय साहित्य समेत विदेशी अनुवादों की किताबें रखी हुआ करती थी। मन मे चोर था इसलिए उनकी तरफ मुड़ गया, मुड़ ही तो गया था। ना चाहते हुए भी हाथ एमिल जोला के उपन्यास 'त्रियाचरित्र' (जिसमे यूरोपियन राज परिवारों के रक्त संबन्ध के भीतर ही अय्याशियों का वर्णन है) की तरफ बढ़ गया। कोई देखता उससे पहले ही किताब अंट में थी। अब अंजली की सुंदरता का आकर्षण हवा हो गया था। मैं तेज कदमो से लाइब्रेरी से बाहर निकला और घर की और हो लिया।
पम्मा सिंह (नाम बदला हुआ) हमारे प्रिय अध्यापक हुआ करते थे, आज भी हैं। वे इलाके में अच्छे विद्वान माने जाते हैं। जब भी कोई विद्यार्थी उनके घर जाता, वे उसे बाहर के कमरे से ही लौटा देते थे। भीतर नहीं जाने देते। एक बार यूँ ही संयोग बन गया कि मुझे भीतर पानी लाने जाना पड़ा। रसोई के बगल के कमरे को देखकर दंग रह गया। वे अकेले रहते थे इसलिए कमरे में चला गया। हैरान था, पूरी दो अलमारी किताबों से भरी हुई थी। पानी लेकर लौटा तो सर से किताब की फ़रमाइश कर दी। "किताब खरीदकर पढ़ने की आदत डालो।", सर ने कहा, परम आदरणीय होते हुए भी मन ही मन उनको गाली निकाली, "बावळी बूच तुझे तो सरकार पचास हजार देती है। मैं कहाँ से खरीद लूं।", बात आई गई हो गई। कुछ दिनों बाद कॉलेज में सर ने कहा,"सतीश बाइक चलानी आती है ?"
-"नहीं सर, हीरो पुक आती है।" तब नया नया सीखा ही था। उन्होंने किसी लड़की की स्कूटरी दिलाकर कहा, "बस अड्डे से मोहित को लेकर घर छोड़ दे", मैं चला गया। सर को आज तक इलाचन्द्र जोशी, शरतचन्द्र, जैनेन्द्र और टॉलस्टॉय की तलाश है। पता नहीं कहाँ खो गए। आपको मिले तो हमारे करोड़पति सर को जरूर बता देना।
(मक्सिम गोर्की के उपन्यास 'माँ' के बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा)
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वरिष्ठ रचनाकारों मैंने छला है तुम्हे ... सजा दो मुझे
अग्रज लेखकों मैंने ठगा है तुम्हे.... मुझे दो सजा
(किस्सा एक किताब चोर का - ४)
० सतीश छिम्पा
कम नही होता है पन्द्रह (अठारह वर्ष, किताब छपने से तीन साल पहले लिखने लगा था।) सालों का सफ़र। बहुत से कड़वे- मीठे अनुभवों के साथ ही जहरीले, जहर बुझे अनुभव भी मिले हैं मुझको इस साहित्यिक यात्रा में। रचनाओ का पत्र पत्रिकाओं में छपना या किताब का छपना इतना महत्वपूर्ण नहीं था मेरे लिए जितना महत्वपूर्ण आदरणीय प्रमोद कुमार शर्मा और राजेश चड्ढा जी और मनोज कुमार स्वामी जी के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन के कारण अध्ययन की ओर मुड़ना। ये तीन गुरुजन मेरे जीवन के अभिन्न हिस्से हैं। पढ़ने की बहुत तेज गति और किताब चयन का दृष्टिकोण मुझे इन्ही से मिला। इसलिए यह मैं गर्व से कह सकता हूँ कि अपनी इस इकतीस बत्तीस साल की उम्र तक मैने बुरी या औसत किताबें बहुत कम, मजबूरी में ही पढ़ी होगी, अन्यथा विश्व साहित्य और भारतीय भाषाओं के साहित्य की अनमोल कालजयी रचनाओं का मुझ तक आना मुश्किल जरूर था लेकिन नामुमकिन नहीं था। प्रह्लाद जी पारीक का इस श्रंखला में आना मेरे लिए और ज्यादा गजब अनुभव रहा। आज फेसबुक के प्रदूषित दौर में जब बहुत आसानी से और सस्ते में या निशुल्क भी किताबें उपलब्ध हैं, तब भी ये उस स्तर की नहीं हैं जिस स्तर की हमने उस समय मे हासिल की, पढ़ी और मुहिम का हिस्सा हुए, मतलब साहित्य पढ़कर बस कागद काले नहीं करने बल्कि जनांदोलनों में शरीक होते होते, भटकते उलझते हुए एक सही पॉलिटिकल लाइन को चुनना और उस पर काम करना भी महत्वपूर्ण था। खालिस बुद्धिजीवी दिमागी व्यभिचार के अलावा कुछ भी नहीं है। इसी प्यास के प्रचण्ड उफान के वश अनगिनत चोरियां की, जाने कितनी ही किताबें चोर चोर कर पढ़ी है मैंने ।
किसी महान ऐतिहासिक घटना की किताब में जीवन के समांतर जादुई जीवन चलता और दौड़ता रहता है। किताब के भीतर गजब तरह का सम्मोहन, जादू, सम्मोहन या कहूँ तिलिस्म होता है। आपकी बिलकुल इच्छा ना हो भले, या आप किसी और काम या यूं ही बेमतलब या, किसी के साथ गये भर ही हो या आपकी जेबें फटी हुई हो या जो भी कारण हो.... वो कारण खत्म हो जाता है और किताबें इस जादुई तरीके से आपकी तरफ़ देखती है कि जैसे कोई नवयौवना चेत के महीने में तड़फ से ताक रही हो प्यार के लिए और फिर आपका जान बूझकर पत्थर किया गया दिल पिघल जाता है। आप ललचाई निगाहों से कभी "आदि विद्रोही" तो कभी "रंगां दी गागर" या कभी "लहू दी लो" की ओर देखते हैं। आपकी नज़रें वहां ठहर जाती है। वे ठहरी रहती है कि अचानक आपके कदम उस ओर बढ़ जाते हैं और आपकी अंगुलियां किताब के खुशबूदार रहस्यमयी पन्नो पर फिसलने लगती हैं। आपका मन उसको पढ़ने के लिए ललचा उठता है और कुछ देर में जादू में बंधकर आप उसको ख़रीदने के लिए बढ़ते हैं कि फिर एक और किताब, फिर और...और...और... और इस तरह आपके पास अनेक किताबें हो जाती हैं, जिन्हें ब्लैक टी पीते हुए आप अकेली रातों में पढ़ते हुए फिर से नई किताबों की संगत की तैयारी करते हैं.. लेकिन मैं तब खरीद नहीं पाता था।
किताबों के इस नशे में मुझको किताबों की दुनिया का सबसे बड़ा चोर, लुटेरा, चार सौ बीस और ठग बना दिया था। यहां तक कि राजस्थानी के युवा और चर्चित कवि विनोद स्वामी ने पंचायती धर्मशाला, श्री गंगानगर में किसी बड़े सम्मेलन में किताबो की प्रदेशनी लगाई थी। लास्ट दिन सुबह पता लगा कि चार किताबें कम है इधर उधर में वे बात कर ही रहे थे कि किसी के जाने क्या याद आया और कोई एक नाम लेकर उसने कहा, वो ले गया था, मगर किताबें मेरे पास थी, और अब भी है शायद भविष्य में वे ना रहे।
लेकिन बात यह भी एक है कि व्यक्तिगत द्वेष रखने वाले अक्सर इसी को तर्क मानकर जवाब देते हैं, आत्ममुग्ध ना समझा जाऊं तो कहूंगा कि किताबो की क्वालिटी मुझे बेहतरीन मिली है। आज तक कोई भी घटिया किताब नहीं चुराई मैंने, बस एक बार, सिर्फ एक बार और वो एक बार जिसने एक ही बार मे मुझे वो सबक सिखा दिया कि मैं इस तरह की मूर्खता कभी ना करूं। हुआ यूं कि अभी कुछ महीनों पहले मैं जुजुर साहब नांदेड़ एक्सप्रेस से वर्धा जा रहा था। इटारसी उतर कर मैं दूसरी गाड़ी पकड़ता हूँ क्योंकि आकोला वाला राह काणा है। गाड़ी आने में कुछ समय था तो मैं बुक स्टाल पर रखी और चर्चित लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ की चर्चित किताब 'मल्लिका ' खरीद लाया.... और वर्धा पहुंचता उससे पहले ही दिमाग खराब हो गया, फेंक देता मगर फिर सोचा कि इसमें एक महान रचनाकार की कहानी है, जिसको समकालीन चर्चित लेखिका पिरो या साध नहीं पाई। बहुत ज्यादा दुख हुआ उस किताब को खरीदकर, जाने क्यों लोग चर्चित हो जाते हैं।
किताबें सिर्फ साहित्य नहीं बल्कि दर्शन पर ज्यादा जोर हो तो ही ठीक है.... क्योंकि यह भी तो सवाल खड़ा रहता है पाठक के सामने कि, "हम कौनसी या किस तरह की किताबें पढ़ें ?" केवल सहित्य पढ़ना मेरी रुचि नहीं है। दर्शन नही पढोगे तो साहित्य अध्ययन का अचार थोड़े डालना है। उसके बिना यह निराधार है। सूरज पाल सर की बात से सहमत होते हुए यही कहूंगा कि, "सबसे ज्यादा वे किताबें पढ़ी जाती हैं जो पाठक कहीं से चुरा कर लाता है। किताब चुराने का जोखिम तभी उठाया जायेगा जब किताब नजर तो आ रही हो लेकिन हमारे पास न हो।", इसमें रुचि, स्तर और कल्चरल पॉलिटिकल इफ़ेक्ट को भी ध्यान में रखता हूँ।
उन्ही दिनों दिमाग मे खतरनाक खुराफातों ने जन्म लिया। जिसकी वजह से कई बार गाली, झिड़की और बेइज्जती भी सही। हुआ यूं कि मैंने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की, "नागार्जुन सहित्य सम्मान" के नाम से और हंस, कथादेश, आदि अनेक पत्र पत्रिकाओं में भेज दिया... जानता था कि किताबें आएगी जरूर, पुरस्कार का लालच किसे नहीं हैं।...... और फिर होने लगी डाक द्वारा किताबों की बरसात। अनेकानेक किताबें आई, लगभग सात या आठ सौ के आस पास। मेरी अध्ययन गति बहुत ज्यादा तेज थी जो अब सिर्फ तेज है। आज के लाजवाब रचनाकारों जैसे प्रमोद कुमार शर्मा, दुर्गेश, एच. आर. हरनोट, हबीब कैफ़ी, उर्मिला शिरीष, रत्न कुमार सांभरिया, राज बुद्धिराजा, धीरेंद्र अस्थाना आदि बहुत से नाम थे। किताबे आती गई, आती गई और हो गई बहुत ज्यादा, किताबें तो चलो एकत्र हो गई लेकिन बहुत से लेखक टेलिफोन (पड़ोस sसे सहारण परिवार का नम्बर दिया होता था।) कॉल कर कर के उन्होंने स्यान ले ली।
मेरे भीतर एक नहीं कई मिजाज़ के सतीश रहते हैं। मुलायम और दया भाव वाला सतीश, किसी भी बात जो दिल पर लगी हो, रो देता है। किसी दुख पर दुखी तो मजे की बात पर मजा, खूब हंसता है, अचानक खुले बालों वाली वो खूबसूरत लड़की जिसको कई कई दिनों से सपनो में प्रपोज़ करता है, दिखी तो आंख पोंछ कर आगे निकल लेगा। यही हुआ जाग गया ईमानदार और लेखको की भावनाओ से लिए खिलवाड़ से शर्मिंदा हुआ जा रहा था। जाने कैसे बीस बाइस मिनिट तक रोया ही रोया। फिर मुस्कुराते हुए उठा और लग गया काम मे।
उस समय वैसे डर भी बहुत था कि कहीं पकड़ा गया तो पुलिस केस ना हो जाए, लेकिन चलता रहा। फिर एक दिन एक और विज्ञप्ति जारी हुई, "इस वर्ष का नागार्जुन साहित्य सम्मान भेराराम (जाने क्या नाम दिया था फर्जी में ही) को फलां फलां कृति पर घोषित किया गया है। .. और उन्ही पत्रिकाओं में भेज दिया, और बस, सब काम जम गया था। अब कोई कॉल नहीं आती थी। और मैं मजे से पढ़ने लिखने लग गया। .... बाद में जैसा ऊपर बताया कि मुझे इस कृत्य पर पछतावा भी बहुत हुआ कि मैं एक रचनाकार के साथ धोखा और गद्दारी कैसे कर सकता हूँ। यह गलत था बहुत गलत, गिरी हुई हरकत... जिसका कन्फेशन भी किया मगर यह अपराध बोध ज्यादा नहीं रहा, हवा हो गया था। और मैं फिर से लय में आ गया।
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बहुत शानदार!
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