कृष्ण आशु ही है हकीकतन सृजन का कुंज
( 'कृष्ण आशु 'होना नही है मुमकिन' से एक संक्षिप्त अंश।)
● सतीश छिम्पा
दरमियाना कद, ठीक ठाक बॉडी का यह शख्स जब भी मिलेगा आपको, मुस्कुराते हुए ही मिलेगा। जैसे कुदरत ने मुस्कान चिपका दी हो इनके होटों पर और लंबी चाभी भर कर छोड़ दी हो। गंगानगर में किसी भी लेखक का या गोष्ठी या कार्यक्रम या सम्मेलन जो भी हो, इस मुस्कुराते शख़्स को सायकिल के पैडल मारते ही देखा है मैंने, सहज स्वभाव और हंसमुख मगर गंभीर व्यक्ति..... किसी बड़े सम्मेलन में मेहमान लेखकों के सम्मान और उनकी सहूलियत के लिए रात को दो- दो बजे तक भी साइकिल के पैडल मारते हुए अचानक हाजिर हो जाएंगे। मौसम की मार से घबराना छोड़ो, सोचते भी नही है। जी यह सख़्श हकीकतन जिस धातु से बना है, उसको मिनखाचारी कहते हैं। बच्चा बच्चा इस नाम (आशु) को जानता है। हम लोग जो हल्की भारी व्याधियों को संघर्षों का नाम देकर जिस अतिशयता से वर्णन करते हैं- वो यहां नगण्य है, आशु भाई साहब के जमीनी जीवन तक पहुंचने का हम लोग सोच भी नही सकते और यहां तो वर्णन छोड़ो जिक्र भी नही करते हैं..... है तो बस निश्छल मुस्कुराहट...... आपको सलाम भाई जी..
कृष्ण आशु :- संपादक (१)
शोध, संस्कृति एवं साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका 'सृजन कुंज' संपादक के कलाओं के जनपक्षधर रूप से जुड़े मानवीय भावों का बहुत गहराई तक पता लगता है। इसमें उनके साहित्यिक, वैचारिकी और जीवन के प्रति प्रतिबद्धता और उसके प्रति संवेदनाओं के गुंफन को प्रकट करता है। वे आदमियत के पक्षधर हैं जो गलत धारणाओं को निडरता से खारिज करते हैं। गंगानगर एग्रीकल्चर अंचल है और यहां ये पत्रिका प्रकाश स्तंभ का काम करती है। आप देखिए कि व्यंग्य विशेषांक हो या स्त्री लेखन विशेषांक जो एक अलग ही तरह के जरूरी स्वतन्त्रता और स्वछंदता में फर्क का पहला ही प्रयोग स्वरूप बेहतरीन अंक भी छपा है। पठनीय अध्ययन सामग्री वाले ज्यादातर इसके अंक में शोध एवं संस्कृति के अलावा साहित्य की अलग अलग विधाओं की रचनाएं छपती हैं।
एक समय था जब हिंदी पट्टी ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय भाषाएं लघु पत्र पत्रिकाओं के ताण किसी आंदोलन की तरह से रचनाओ, विचारों और सहमति, असहमत स्थापित होकर मुख्य धारा के बीच विमर्श या आक्रोश को खड़ा कर देती थी। यहां तक कि कुछ बड़े रचनाकार भी संपादक के रूप में प्रसिद्ध हुए थे। धर्मवीर भारती को कोई लेखक के रूप में जाने या ना जाने लेकिन 'धर्मयुग' के संपादक के रूप में सभी जानते हैं। हरिशंकर परसाई के व्यंग्य इन्ही पत्रिकाओं के कारण फैले थे। जो आगे चलकर उनकी विख्यात छवि के निर्माता साबित हुआ। आजादी के बाद हिंदी की कहानी के बासी, बोझल और हल्के स्वरूप को नया संस्कार देने वाले कहानीकारों ने कहानी को आंदोलन का रूप देते हुए इसका नाम 'नई कहानी' कर दिया था। राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश, ये तीन नाम उसमें मुख्य थे। और इन तीनो के साथ अमरकांत आदि लखको का नाम भी इससे जुड़ गया। नई कहानी कि शुरुआत इसलिए माना जाता है क्योंकि 1956 ई. में भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में नयी कहानी नाम की पत्रिका का एक विशेषांक निकाला। इसी में नई कहानी को मंच मिला था।।
अत्याधुनिक उपभोक्तावादी बर्बरता का जो सबसे गहरा और भयावह दौर जिसमे हम अभी जी रहे हैं। यह पलायन, विस्थापन, आक्रमण, लूट और घनघोर अंधकार से भरा दौर- जब अभिव्यक्ती घुटने लगी और, जिसमे प्रकाशक साल भर का अपना शैड्यूल्ड काम तक घटाकर जोखिम उठाना हानिकारक मानने लगे हैं। और इस कोरोना जनित अंधकार में तो पत्र— पत्रिकाओं की निरंतरता पर भी संकट है। बुर्जुआ संस्थानों तक के पत्र पत्रिकाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ चुके हैं। और बड़े संस्थानों के आधी सदी पुराने प्रकाशन तक बंद हो रहे है। ऐसे में श्रीगंगानगर जैसे खेतिहर अंचल से बड़े भाई साहब, अग्रज साथी कहानीकार संपादक डा.कृष्णकुमार आशु का दुःसाहस ही कहेंगे कि त्रैमासिक सृजन कुंज के सभी अंक प्रकाशित हो रहे हैं। आकर्षक और पठनीय अध्ययन सामग्री वाले ज्यादातर इसके अंक में शोध एवं संस्कृति के अलावा साहित्य की अलग अलग विधाओं की रचनाएं छपती हैं। इस साहस को सलाम।
कृष्ण आशु :- कथाकार (२)
('च्यानणै रा एनाण'-- कृष्ण आशु भाई जी का राजस्थानी में पहला ही सँग्रह है। बड़ी बात है कि इनके इस प्रवेश की कल्चरल वर्नेन्स बेहतरीन है।)
राजस्थानी कहानी में जो आज के रचनाकारों ने एक बदलाव के साथ, नये तेवर और जिजीविषा के साथ रचनाकर्म को स्थापित किया है तो उनमें से कृष्ण आशु प्रमुख है। कहानी समाजिक जड़ता तोड़ने वाली नवीन कथ्य के साथ प्रस्तुत की गई है। समकालीन रचनाकारों में कृष्ण आशु एक ऐसे स्फटिक का नाम है जो ना केवल युवा, प्रौढ़ या वरिष्ठ लेखकों के अवदान को पढ़ते हैं बल्कि उन सभी का बेहतर मूल्यांकन कर उस साहित्यिक चालाकी को एक तरफ करके सही और निष्पक्ष मूल्यांकन के द्वारा इन्हें सम्मानित करने के साथ साथ चर्चाएं करवाते हैं। पाठक मंच की जो स्वर्णिम परम्परा अब समाप्त हो चुकी है उसकी जरूरत को देखकर अलग तरह से और बेहतर तरीके के साथ उसको फिर 'लेखक से मिलिए' के द्वारा स्थापित कर दिया है। आज जहां लेखक अतिआत्ममुग्ध होकर सिर्फ अपनी और अपने लेखन का ही गीत गाता रहता है ऐसे में कृष्ण आशु युवा पीढ़ी के लिए एक आदर्श स्थापित करते हैं कि अब भी कुछ नहीं बिगड़ा, सम्हल जाओ। वे निरंतर नए पुराने रचनाकरों को मंच मुहैया करवा रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि प्रोत्साहित भी करते हैं।
राजस्थानी और हिन्दी साहित्य में कृष्ण आशु गुमनाम नाम या व्यक्ति नहीं है। चर्चित एवं लोकप्रिय कथाकार हैं। मानवीय संवेदना को अत्यन्त आत्मीयता एवं कलात्मक ढंग से चित्रित करने आशु के विभिन्न विधाओं में कई कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इन रचनाओं में कहानी, व्यंग्य और अन्य कथेतर भी शामिल है','
आशु की कहानियों में पर्याप्त विविधता है, क्योंकि इनके कहानी साहित्य का एक ऐसा सामाजिक ढांचा प्रस्तुत करता है जो मिश्रित है। जहां कल्चरल इफेक्ट पर भी बाह्य दबाव समूह की तरह काम करने वाले मूल्य भी स्थाई है।
सामाजिक जटिलताएं, जीवन और घटनाओं का सामंजस्य अस्थिर होना और मानव की असहायता, मानवीय मूल्य, अवमूल्यन, पतन, चारित्रिक जादुई उत्थान, नैतिक संकट, मूल्यहीनता तथा प्रत्येईध के विघटन को संपूर्ण मानवीय रूप में देखना, सुखद है।
राजस्थानी में एक अघोषित कहानी आंदोलन चल रहा है। जो सृजनात्मक होने के साथ विध्वंसात्मक भी है। पुराने को उखाड़कर एक जनपक्षधर धारा का निर्माण और स्थापना का। कहानी आंदोलन किसी एक के नहीं बल्कि हर एक युवा रचनाकार के भविष्य को निश्चित करने वाला है।
कृष्ण आशु जी का कहानी संग्रह कई मायनो में सही ही नही है बल्कि वे बेहतरीन कर रहे हैं। तो भी एक रंग है प्रेम रो, चर्चित और बेहतर ढाळ रखती हैं। इस संग्रह की एक भी कहानी ऐसी नहीं जो कथ्यगत कमजोर हो। शिल्प सदाबहार है। 'मकान नंबर 136 रामदास नगर की हुकांर', 'म्है लुच्चो आदमी हूँ कांई', 'बस इतरी सी बात' ' फँर भी', 'फंदो'----- आदि बेहतरीन कहानियां है। कुल मिलाकर आशु जी को ओळमा दिया जा सकता है कि जब इतना समान और वो भी समृद्ध तो क्या कारण है कि इतने समय बाद सँग्रह ला रहे हैं।
कृष्ण आशु :- एक व्यक्ति, एक सामाजिक प्राणी (३)
यहां भाई साहब के कथाकार रूप का ही वर्णन करना पर्याप्त नही है। हमे उनके रचाव के तमाम हिस्सों को जानना देखना और समझना है।
साल शायद 2005 रहा होगा, जब राजस्थान पत्रिका में आशु भाई साहब एक कॉलम लिखा करते थे, श्रीगंगानगर हनुमानगढ़ के साहित्यकारों के बारे में, हर कॉलम में अलग अलग लेखकों का परिचय हुआ करता था। उसी दौरान मैंने पहली बार नाम सुना था कृष्ण भाई जी का, मिलना तो बहुत बाद में गंगानगर के ही एक कार्यक्रम में हुआ था।
हनुमान दल मंदिर के पास एक कॉटेज में हम सभी रुके हुए थे, ओम पुरोहित कागद जी, विनोद नोखवाल, राजेश चड्ढ़ा जी, रामस्वरूप किसान जी, सत्यनारायण सोनी जी, और कुछ और नए पुराने लेखक, कार्यक्रम का पहला सत्र था जब डॉ. सत्यनारायण सोनी जी ने मुझसे पूछा था,"क्या तुम कृष्ण कुमार आशु को जानते हो? कभी मिले हो?" मैं कभी उनसे मिला नहीं था तो कह दिया कि,"नहीं,मैं उनसे कभी नहीं मिला" और उसी समय आदरणीय राजेश चड्ढ़ा गुरूजी ने अपने सदाबहार, जिंदादिल अंदाज़ में आवाज़ लगाई ,"आशु भाई" और औसत कद के वे हंसमुख व्यक्ति प्रकट हो गए, सदा लिबाज़, और तड़क भड़क से दूर एक सच्चे लेखक, हमने हाथ मिलाए, राजी ख़ुशी और सुख सम्पत के समाचार पूछे, और तो कुछ था ही नहीं बात करने के लिए बस इतना ही कि " भाई जी आपका कॉलम पढ़ता हूँ".....
उसके बाद लगभग हर कार्यक्रम में भाई साहब से मुलाकात और बातचीत होती रहती थी। जैसे जैसे उन्हें जानता गया, मैं हैरान होता गया कि क्या कोई आदमी इतना मेहनती और समर्पित भी हो सकता है। साईकिल पे झोला टांग कर गंगानगर जैसे शहर में पत्रकारिता करना, देर रात घर लौटना और लिखना....ये सब आश्चर्य पैदा करता है, ऊपर से आप हैरान रह जाएंगे कि ये भाई साहब गजब के आयोजक भी है। बड़े से बड़ा कार्यक्रम आयोजित करते हैं... वो भी सफल, और सारा श्रेय अपने यार दोस्तों को देते हैं। पंकज बिष्ट का गंगानगर आना हो या ममता कालिया का या प्रेम जनमेज्य का या किसी भी अन्य बड़े लेखक का, सब कुछ आशु भाई साहब और इनकी टीम का कमाल होता है। "लोगों से लड़ा मतकर यार...." एक बार उन्होंने कहा था।
हाल ही में गंगानगर में आशु जी और उनकी टीम "व्यंग्य महोत्सव" का सफल आयोजन करके हटी है, जब वे मंच संचालन कर रहे थे तब बार बार कह रहे थे, "ये आप सबका महो है, दोस्तों का महो है, उनका महो है, फलाणे का महो है, ढिंकाणे का महो है" और मैंने नाम टिका दिया, कृष्ण आशु उर्फ़ महो (मोह)
श्रीगंगानगर जिले के युवाओं को मंच देने और आगे लाने में भाई साहब का बड़ा योगदान है। इसके अलावा देश भर के लेखकों को कार्यक्रमो के माध्यम से आमंत्रित भी करते हैं। हमारा सौभाग्य है कि हम उनके समय में हुए.....
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