किस रूप में जानते हैं आप भगतसिंह को.....
● सतीश छिम्पा
● एक नौजवान जो अंतिम जेल यात्रा से पहले स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल हुए उत्साही भावुक नौजवान के रूप में प्रसिद्ध हुआ ??
● सांडर्स को मारना, असेम्बली बम कांड और लाल लाजपतराय के समर्थक रूप में ??
● "अभी एक क्रांतिकारी, दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।" -- वाक्य से ??
● मैं नास्तिक क्यों हूँ'' से ??
भगत सिंह। कॉमरेड भगत सिंह। यह एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जो शुरुआत से जिस क्रांतिकारी स्वर में फैलना था, जो उसका मूल स्वर था, जिस महान ध्वन्यार्थ का पर्याय जिसको बनना था, जो खुद में ही एक इंकलाब के तौर पर तैयार था- उस स्वर को दबा दिया गया और फिर राज व्यवस्था ने इस नाम को हर दौर और हर एक दल की सरकारों में अलग अलग तरह के स्वर रूप में मंडने की सफल और असफल कोशिशों में बहुत जगहों पर प्रदूषित करते हुए इस नाम की हकीकतन महान अप्रोच को, जहां इसकी अंतिम मंज़िल है, को भी भटका दिया। समकालीन राजनीतिक कम्युनिष्ट पार्टियों (चुनावी) ने इस नाम की भद्द तो पीटी ही साथ ही मूल स्वर की तासीर भी घायल करके आधी मार दी गई। भगतसिंह यूथ आइकन है मगर सबका अलग अलग और अलग ही कारण से भी है। कोई स्वतंत्रता सेनानी रूप में शहीद हो जाने वाले जुनूनी युवा रूप में महान मानते हैं। कोई मैं नास्तिक क्यों हूँ ? के कारण तो कोई इसलिए कि फांसी देने के समय वह महान लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था और 'अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है- वाक्य को तिलिस्म की तरह दोहराकर।
बहुत कम उम्र में स्वतंत्रता संघर्ष के मिशन में काम करते हुए अनेक बेहतरीन योगदान दिए - जो अन्य युवाओं ने भी उसी निष्कपट प्रतिबद्धता के साथ दिए.... हेमू कालाणी, बिस्मिल, रोशन और अशफाक ने भी दिया था और शहादत पाई थी तो भगतसिंह यूथ आइकन या कहें कि इतने प्रसिद्ध क्यों है ? क्यों उनकी महानता का स्वर इतना गहरा है ? उसका कारण ना केवल स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान का कारण है बल्कि जिस दिन वह जेल में पहला कदम रखता है और जिस दिन के जिस पल में शहादत होती है , उस पूरे समय को मार्क्सवाद के अध्ययन, मनन, चिंतन में लगाया और आधार सिद्धांतों से मार्क्सवादी क्लासिक्स को घोट कर पी जाता है और फिर उसकी राजनीतिक चेतना का विकास और पसराव जिस स्तर तक होता है वो राजनीतिक सौंदर्यबोध का महानतम स्तर था। वे अब एक महान मार्क्सवादी एक युवा मार्क्सवादी चिंतक और क्रांतिकारी थे- बाद में जिनके मन मे यह ख़्याल भी बराबर आता रहा कि, ' यह महान मार्क्सवादी विचारधारा, यह महान इंकलाबी राह यह सिद्धांत अपने साथ ही ले जाने के लिए नही है बल्कि जरूरत इनकी आम आदमी के दिलों तक पसारने की है। मार्क्सवाद जो हर एक मेहनतकश, शोषित और वंचितों का वर्गीय गान है। दर्शन जो एक नए और महान समाज और आदमी के निर्माण का है। महान क्रांति, जो महान लेनिन के नेतृत्व में अक्टूबर क्रांति के रूप में रूस (क्रांति के बाद इसका नाम सोवियत संघ हो गया था।) में हुई थी।
भगतसिंह केवल साम्राज्यवादी अंग्रेजों से ही भारत को आज़ाद करवाना नहीं चाहते थे, उनके कार्यक्रम और रणनीति में ये भी शामिल था कि विदेशी गुलामी के बाद भारत की राजनीति, समाज कैसा हो, उत्पादन प्रणाली और वितरण कैसा होगा, उत्पादन सम्बंध कैसे होंगे, वे प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट थे और आने वाले भारत की तस्वीर भी उसी वैज्ञानिक दृष्टि से देखते थे। आज जब राज सत्ताएं शहीदे आज़म भगतसिंह के विचारों को दबाने में असफल हो चुकी है तो वे अपने दूषित बौद्धिक तबके की मदद से इन्हें धुमिल करने और हाईजैक करने के प्रयास में हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है भगतसिंह की विचारधारा, उन्होंने मार्क्सवाद को जीवन पद्धति बना लिया था। भगतसिंह का सपना आज भी इंकलाब का ही है। भगतसिंह और उनके साथियों की लड़ाई एक सुंदर जीवन, व्यवस्था और सर्वहारा के अधिनायकत्व को स्थापित करते हुए समतामूलक, शोषण विहीन सुंदर समाज बनाने की थी।
भगतसिंह एक ऐसा महान मार्क्सवादी युवा जिसको प्रदूषित करने के अनेक प्रयास किए जा चुके हैं और इस समय जब राज सत्ताएं उसके विचारों को दबाने में असफल हो चुकी है तो वे अपने सड़ियल बौद्धिक तबके की मदद से इन्हें धुमिल करने और हाईजैक करने के प्रयास में हैं। पूंजीवादी सत्ताओं की शह पर भारत का मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग इन्हें कभी भगवां बनाने की कोशिश करता है तो कभी गांधी या अम्बेडकर के साथ जोड़ने के लिए कसमसाता है- मगर वे असफल होते आए हैं, इसका सबसे बड़ा कारण है भगतसिंह की विचारधारा। भगत सिंह, एक महान शहीद जिसको फासिस्ट दल, मध्यममार्गी पूंजीवादी लिबरल और तमाम संसदीय दल और विचारधाराएं अपना- अपना घोषित करने के प्रयासों से लेकर उसको आर्य- समाजी आदि समांतर धार्मिक धड़ों तक ने हाइजेक या कहें किडनैप करने के अथक असफल प्रयास कर लिए हैं- मगर वो नाम जो उज्ज्वल है, वो जो मार्क्सवादी है..... वो जो प्रतिबद्ध कम्युनिष्ट है- कैसे हो जाता हाइजेक, कैसे धूमिल हो जाता वो नाम जो लेनिन को आदर्श मानता था।
उन्होंने मार्क्सवाद को जीवन पद्धति बना लिया था।
● आज एक जगह मित्र साथी की पोस्ट पर किया गया मेरा कमेंट भी यहां दे रहा हूँ। वाह, भाई जी, लेकिन जिन चीजों से प्रभावित हो यह संक्षिप्त टीप लिखी गई है- क्या उसमें सिर्फ नास्तिकता के आम चलताऊ, या युवा अतिभावुकता जनित कमजोरी के चलते प्रदर्शनकारी तौर पर अपना लिए गए इस तरह के उथले ब्यौरे भर थे या तमाम अलौकिक अवमूल्यों का विखण्डन है जो गले मे ताबीजों के साथ ही मध्यम मार्गीय समाज सुधारक टाइप राजनीतिक अवसरवाद का भी निर्मम खात्मा है......... क्योंकि मैं पिछले काफी समय से इस बाबत सोच रहा हूँ कि हम अक्सर क्यो ऐसी स्थापनाएं करते हैं कि - "भगतसिंह जैसा विचारक या क्रांतिकारी तो एक ही हुआ है। लोग चाहते हैं कि। भगतसिंह पैदा हो मगर किसी दूसरे के घर मे.... या ऐसा महान क्रांतिकारी पैदा होना संभव नहीं, आदि आदि.... ये स्थापनाएं बहुत बीमार है। अपमान है इस देश के महान कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों का जो अव्वल तो जॉन ड्यूईन के इस पूंजीवादी यथास्थिति वादी लोकतंत्र ( लोहिया का यूटोपियाई लोकतंत्र भी यही जनवादी रूप था जिसको अलग से देखते हुए बाबा साहेब अपने आदर्श अध्यापक जॉन ड्यूईन के इस यथास्थितिवादी जनवाद के पक्षधर थे। समकालीन स्थितियों में लगभग सभी मध्यमार्गी धड़े इसको बेहतर मानते है बस कुछ सुधारो के साथ- जो असंभव है।) और इसके शोषण तंत्र से जूझते हुए शहीद हो गए और अनेक यहां की शिक्षा और सामाजिक ढांचे ने जन्म से पहले ही बधिया कर दिए। इसमे अमूल बदलाव की जरूरत है जो अक्सर लगता है। अब तो कम से कम इन मध्यमार्गी अति आदर्शो के राजनीतिक बीमार चेतना की राह से जीवित विचारों को आजाद करवाया ही जाना चाहिए- उन तमाम गलत धारणाओ से भी छुटकारा लिया जाना चाहिर जो लोकतंत्र के सॉफ्ट फासिज़्म मध्यमवर्गीय अनसरों ने घड़ रखी है। युवाओं को चाहिए कि भावुक होने के बजाए भगतसिंह के विचारों को पढ़े, ताकि जान सके कि उनकी राजनीतिक लाइन क्या थी। और यह भी जानना जरूरी है कि भगतसिंह के बाद यहां अमर शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे अनेक महान यौद्धा शहीद हुए हैं। दर्शन दुसांझ जैसे जिंदा शहीद भी इसी धरती की उपज है।
उन्होंने मार्क्सवाद को जीवन पद्धति बना लिया था।
मार्क्सवाद जो हर एक मेहनतकश, शोषित और वंचितों का वर्गीय गान है। दर्शन जो एक नए और महान समाज और आदमी के निर्माण का है। महान क्रांति, जो महान लेनिन के नेतृत्व में अक्टूबर क्रांति के रूप में रूस (क्रांति के बाद इसका नाम सोवियत संघ हो गया था।) में हुई थी। इसका सबसे बड़ा कारण है भगतसिंह की विचारधारा। उनका मार्क्सवादी होना ही आज राजनीतिक रूप में उनके अस्तित्व का आधार है..... सात दशकों से चले आ रहे इस लोकतांत्रिक यात्रा के ये अनेक साल बता रहे है कि ये व्यवस्था पूंजीपतियों-धनपशुओं की लूट के हिस्से में रहे है। ऐसे में भगतसिंह की अधूरी लड़ाई को पूरा करने के लिए देश के नौजवानों-छात्रों को मेहनतकश आबादी के बीच में जाना होगा और क्रांति की अलख जगानी होगी। युवाओं को चाहिए कि भावुक होने के बजाए भगतसिंह के विचारों को पढ़े, ताकि जान सके कि उनकी राजनीतिक लाइन क्या थी। युवाओं को चाहिए कि भावुक होने के बजाए भगतसिंह के विचारों को पढ़े, ताकि जान सके कि उनकी राजनीतिक लाइन क्या थी।
मार्क्सवाद और मार्क्सवाद भारत के संबंध में बहुत गहराई से पढ़ने की जरूरत है ताकि भगतसिंह और उसकी परम्परा के शहीदों की जानकारी आपको मिले और जिसको सहेजकर आप आगे बढ़ा सकें। इन सबके अलावा भगतसिंह के बाद यहां अमर शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे अनेक महान यौद्धा शहीद हुए हैं। दर्शन दुसांझ जैसे जिंदा शहीद भी इसी धरती की उपज है। यह गहन अध्ययन बहुत जरूरी हो जाता है।
विश्व इतिहास का सबसे सुनहरा या कहें महाकाव्यात्मक उथल पुथल का समय था, साठ के दशक से सत्तर और अस्सी के दशक तक का दौर। भारत सहित विश्व के अनेक देश युवा प्रतिरोध से उफन रहे थे। कांगो गणतंत्र, कांगो जायरे, घाना, तस्मानिया, मोरक्को, इथियोपिया, तंजानिया, नामीबिया, चाड, वियतनाम, ईरान और इराक इथयोपिया, यूगोस्लाविया (वर्तमान में इसका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।), चेक और स्लोवाकिया, स्पेन, चिली, क्यूबा समेत लातिनी देश महान मुक्ति के सपनो के साथ तोपों और बन्दूको के आगे सीना ताने खड़े थे। शहादतों का दौर था। वियतनाम संघर्ष महान हो ची मिन्ह के नेतृत्व में महान विजय के करीब पहुंच चुका था। इंकलाबी महा जन उभार प्रचण्ड आक्रोश के साथ तब की मौजूदा महाशक्ति अमरीका के घुटने टिकवा चुका था। युवाओ का जोश देखते ही बनता था। और जबर जुल्म इतना कि सड़क पर खड़ा कोई बीस से तीस पैंतीस वर्ष का युवा भले निर्दोष हो, क्रांतिकारी होने के भय से कत्ल कर दिया जाता था। बंगाल और आंध्रा की धरती लाल हो चुकी थी तो कैसे पंजाब नही प्रभावित होता।
भारत मे तात्कालिक क्रांतिकारी किसान उभार का कारण 1967 में उठे स्थानीय, छोटे स्तर पर प्रतिरोधक आक्रोश स्वर का उस समय किसान बिगुल की हत्या था , जिससे खेतिहर मजदूर, भूमिहीन, सीमांत या कहें सभी सर्वहारा और अर्ध सर्वहारा उसमे शामिल हुए। ये वो ही चिंगारी थी जो तेलंगाना सशस्त्र किसान महाउभार (भूमिहीन खेत मजदूर) से उठी थी- जो दशक भर के बाद से ही बारूदी ढेर या कहें दबा छुपा महा दावानल के धधकने का तात्कालिक कारण ही बना था , -- इंकलाबी महान कम्युनिष्ट उभार किसी अद्वितीय अविश्वसनीय तरीके से हुआ जो महान मुक्ति का समर था, बदकिस्मती कि यह ढाई महीने ही चल पाया था और रौंदकर दबा दिया गया था, जिसने तमाम अमानवीय धारणाओं और बर्बरताओं को हिलाकर रख दिया था। किसान आंदोलन के दबते ही पार्टी लाइन बना रहे केंद्रीय सदस्यों के सामने फिर खुल गया इस महान संघर्ष का राह, छात्र उभार से, जो एक दावानल की तरह उठा और यही वह समय था जब बौद्धिक जमात की भी आंखे खुली। इंसाफ पसंद युवाओं के लहू की नदियां बहा दी गई थी पश्चिम बंगाल की सड़कों पर।
यह उसी महान जन उभार का ही अगला पायदान माना जा सकता है जो इससे पहले तत्कालीन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (भा.क. पा.) जो उस समय मार्क्सवाद लेनिनवाद के बुनियादी दर्शन और लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत में आस्था रखने वाली एक सही पॉलिटिकल लाइन वाली पार्टी थी, जो उस समय तक ख्रुश्चेव जैसे मानवद्रोही के संशोधनवाद के प्रभाव से बची हुई थी- के नेतृत्व में भारतीय इतिहास का पहला महान लोकयुद्ध तेलंगाना सशस्त्र किसान उभार उफान पर आया था जो विचलन से क्षद्म लक्ष्य रखकर पार्टी लाइन बनाने की उस समय कोशिश हुई हो ऐसा भी नहीं था- सन 1953 ई में यहां जो उथल पुथल या बदलाव का ढांचा तैयार हुआ वो सर्वहारा के महान शिक्षक स्टालिन की मौत के बाद सत्ता में आए संशोधनवादी निकिता ख्रुश्चेव क्रान्ति विरोधी या कहें साम्रज्यवाद पूंजीवादी ताकतों का भेदिया था जिसने क्रांति को खत्म कर दिया और पूंजीवादी ताकतों के राह का सबसे मजबूत और स्थाई और महान प्रतिरोध को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के प्रतिस्पर्धी (पूंजीवाद की पुनर्स्थापना कर दी) नीति के माध्यम से महान अक्टूबर क्रांति का अंत कर दिया गया था।
जो मार्क्सवादी भारतिय बुद्धिजीवी या संसदीय वाम के प्रवक्ता यह मानते हैं कि महान क्रांति का अंत नब्बै के दशक में हुए विखण्डन से हुआ, उन्हें एक बार फिर विश्व इतिहास का बहुत बारीकी और गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए- और इसको भी जानना चाहिए कि इस सत्ता के हिमायत में दौलन के शिकार दस्ते ने अनेक बार दुस्साहस भरी भीतरी चाल चली है-- यही सन 1953 ख्रुश्चेव के भारतीय उत्तराधिकारी बी.टी.रणदिवे और उनके साथी जो आगामी समय में संशोधनवादी मध्यम मार्गी धड़े के आदर्श नेता भी बनकर उभरे ने संसद की राह लेते हुए तेलंगाना में अनेक युवा क्रांतिकारियों का रक्त बहाए जाने को अनदेखा कर दिया या, इस अविश्वसनीय जनद्रोही धड़े के इस हत्यारे रुख का सामने आ जाना भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की सबसे बड़ी गद्दारी साबित हुई जिसका अगला अमानवीय पड़ाव पश्चिम बंगाल में कोंग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार ने जुल्म की इंतिहा कर दी और संसदमार्गी वाम के बीच से आए इतिहास के सबसे बड़े और काले दुखांत और विचलन और कतारों के बीच विद्रोही स्वर की मुखरता और निरंतरता के जिम्मेदार लोग जो थे ने खून का वीभत्स खेल खेला था।
पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। मास्टर हरपाल से लेकर जसवंत कंवल और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। बलदेव सिंह मान, दृश्न दुसांझ, अमर सिंह अचरवाल, सतनाम, अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे। उनमें से कई तो कालजई कविताओं के रचयिता भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे सब जो उस समय या उसके बाद खालिस्तानी अतिवाद के शिकार हुए वे अद्भुत सर्जक निकले। वहां अनेक बेहतरीन क्रांतिकारी कवि भी थे।
कम्युनिष्ट लहर खत्म हो जाने के बाद पंजाब में फिर एक महान मुक्तिकामी लहर उठी, प्रीथीपाल सिंह रंधावा जैसे छात्र नेताओं के नेतृत्व में छात्र प्रतिरोध का उफान। यहां बर्बरता ने नंगा नाच नाचा। सत्ता और धार्मिक अतिवादी, लोकल बुर्जुआ किसी भी छात्र, प्रतिरोधी को बख्शना नही चाहते थे।
ये दहकते दिन लाल लहू से नहाकर तांडव कर रहे थे..... मजदूर और गरीब और जवान उठ खड़े हुए और इन्ही में से एक थे अमर शहीद बाबा बूझा सिंह।
भयानक गरीबी, आर्थिक असमानता, अन्याय और भूखमरी की कगार पर पहुंचने ही वाले परिवार को सुख शांति से रोटी उपलब्ध करवा सकने की इच्छाओं को लेकर बाबा बूझा सिंह विदेश चले गए जाने किस तरह वे अर्जेंटाइना में पहुंचे। घर की तंगहाली को दूर करने के सपने देखता बाबा बूझा सिंह विदेश कमाई करने गए थे जो वहां जाकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण गदर आंदोलन के गदर संगठन में शामिल होकर घर की बजाए देश की तंगहाली दूर करने में जुट गए। ये ही वो समय था जब उनके सामने अध्ययन और अध्ययन की उच्च स्तरीय जरूरी सामग्री आने लगी। मार्क्स से लेनिन तक के नाम ना केवल सुने बल्कि उन्हें पढा और आत्मसात भी किया। बाबा गदरी जवानों के साथ चंद लोगो मे एक थे जो सोवियत संग गए, पढ़ने और विचार को जानने के लिए। अस्सी साल की उम्र में साइकिल घसीटते हुए जो दूर दूर तक युवाओ के गुप्त स्टडी सर्किल चलते, इंकलाब की राह बनाते.... अस्सी- बयासी की बुजुर्ग उम्र में जिन्हें पुलिस ने झूठा मुकाबला बनाकर शहीद कर दिया था। वे भगतसिंह की परंपरा में भगतसिंह से ज्यादा गहरे उतरे, और उसकी लाइन को पुख़्ता कर गए।
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