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विश्व अनुवाद दिवस.....
अनुवाद साहित्य में सबसे कठिन काम है। किसी भाषा के साहित्य, संस्कृति और शैली को किसी अन्य भाषा मे उसी तरह लेकर जाने की प्रक्रिया को अनुवाद कहा जाता है। आप विश्व साहित्य में सोवियत साहित्य या फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगीज, चेक, इंग्लिश, चीनी, पाकिस्तानी या ईरानी साहित्य के जो अनुवाद हिंदी या पंजाबी या राजस्थानी में पढ़ते हैं- उनकी प्रक्रिया सृजन से भी ज्यादा मुश्किल होती है, क्योंकि अनुवादक को केवल शब्दों या वाक्यों का ही अनुवाद नहीं करना होता है बल्कि भावों को बिना किसी हतक्षेप के जस के तस संप्रेषित भी करना होता है।
विश्व के महानतम लेखक, कवि या कहें कहानीकार, उपन्यासकार, चिंतक जो सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं, अनुभूतियों के चरम, पीड़ा की वेदना और मनुष्य के दुर्भाग्य का अत्यंत सहज अकृत्रिम चित्रण अनुवादकों ने किया है। चेखव से गोर्की, विजयदान देथा बिज्जी से प्रेमचंद, गुरदयाल सिंह से न्गूगी, गालेआनो से मार्खेज या पैट्रिशिया से पेट्रार्क और मार्क्स से रूसो तक के अनेक महान अवदानों का हिंदी, पंजाबी और अन्य भाषाओं में अनुवाद करके युगों को सहेजना आम बात नही हैं। आप देखें कि चेखव और उनकी कथा शैली या कहें कहानी कला और चिंतन के बौद्धिक स्तर ने भाषाओ को पार किया, अनुवादों के अवदान के बल पर। उन्हें वैश्विक स्तर पर उतना ही पढा जाता है जितना कि टॉलस्टाय और दास्तोवास्की, गोगोल और तुर्गनेव को....
दार्शनिक, रंगकर्मी, विज्ञान, अध्यात्म, भौतिकी, कलाओं के तमाम भाग- अगर आज हम तक पहुंच रहे हैं, अगर आज समय और भूखंडों से पार जाकर कोई कृति या विचार कालजई हो रहा है तो उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ या योगदान अनुवादकों का ही होता है- वे जो उसके दायरे को बढ़ा देते हैं। यही कारण है कि आज लेखक (तत्कालीन) और उनका निजी जीवन तक पाठकों को अलग टेस्ट का जो जायका चखाया है वो बहुत गहरा है। आज तक समीक्षकों ने चेखव लेखन पर इतना काम नही किया होगा-- जितना उसके जीवन पर किया है। जिज्ञासुओं को चेखव के व्यक्तित्व के कई अल्पज्ञात और अज्ञात पहलुओं की जानकारी मिलती है और वो समकाल में भी आ जाती है। यह है अनुवाद का स्वभाव।
अनुवाद या अनुवादक ना होते तो शायद मेरी विश्व साहित्य में दर्शन और राजनीतिक चिंतन और किताबों में इतनी रुचि कभी ना होती। अनुवाद को कुछ लोग बहुत हल्के में लेते हैं, जबकि अनुवादक को उस मानसिक संताप, प्यार, सुख या अधमता से गुजरना होता है जिससे स्वयं मूल लेखक गुजरा होता है। कविताओं का अनुवाद आसान है, मगर जब आप किसी के उपन्यास, जीवनी या आत्मकथा का अनुवाद कर रहे होते हैं तब आप अपने सहज, स्वाभाविक रूप में नहीं रह पाते हैं।
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(१.):-
अमृतराय :-
मुक्तिकामी उपन्यासकार हावर्ड फ़ास्ट
अमृतराय प्रेमचंद के बेटे हैं- तो क्या हो गया। अमृतराय ने हावर्ड फ़ास्ट को हिंदी के पाठकों तक पहुंचा दिया है- अद्भुत, अद्वितीय.... इसको कहते है महान अवदान... वाह भाई वाह
हावर्ड फ़ास्ट के ये कालजई , उपन्यास आदिविद्रोही, शपथ, मुक्ति मार्ग, शाहीदनामा, अमेरिकन आपका नजरिया संकुचित नही रहने देते हैं। अमृतराय मेरी नज़र में इसलिए महान नही है कि वे प्रेमचंद के बेटे हैं और न ही वरिष्ठ लेखक और संपादक होने के कारण, उनकी महानता है हावर्ड फ़ास्ट का समूचा साहित्य हिंदी में अनुवाद करना। अनुवाद को कुछ लोग बहुत हल्के में लेते हैं, जबकि अनुवादक को उस मानसिक संताप, प्यार, सुख या अधमता से गुजरना होता है जिससे स्वयं मूल लेखक गुजरा होता है। यहां तक कि जो लोग गलतफहमी पाले बैठे हैं कि कविताओं का अनुवाद आसान होता है''-- वे भी मानने लगे हैं कि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। मगर जब आप किसी के उपन्यास, जीवनी या आत्मकथा का अनुवाद कर रहे होते हैं तब आप अपने सहज, स्वाभाविक रूप में नहीं रह पाते हैं।
हॉवर्ड फ़ास्ट के उपन्यास शहीदनामा के उस पात्र द्वारा कही गयी ये बात मेरे मन मे बैठ चुकी है जिसको अगले दिन फांसी दी जानी थी कि "मैंने पाप किये हैं मगर मैं अपराधी नहीं हूँ"
हॉवर्ड फ़ास्ट.... विश्व साहित्य में मुझे गोर्की, टॉलस्टॉय, क्रूस अल्बर्टो, गालेआनो की ही तरह हावर्ड फ़ास्ट भी प्रिय है। फ़ास्ट हकीकतन एक क्रांतिकारी लेखक थे, जिनके सरोकार अपनी मातृभूमि ही नही बल्कि हर उस जमीन, देश, जनता और तमाम संघर्षशील तत्वों से है जिनके भीतर का द्वन्द्व बहुत उभर कर बाहरी गतिविधियों के साथ द्वंद्वात्मकता के साथ ही जूझ रहा हो। गुलामी, जोर, दाबा और अन्याय और जुल्म से जूझते हर एक प्रतिरोधी मनुष्य, भाषाई कौम और देश के साथ जुड़ता है। बहुत कम लोग सोचते हैं ऐसा, इसीलिए तो महान है हावर्ड फास्ट--- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का बहुत बारीकी से विश्लेषण करते हुए वे अपने एक और कालजयी उपन्यास 'मुक्ति मार्ग' की भूमिका में लिखते हैं कि ....
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-"गत कई वर्षों में हमने हिन्दुस्तान की जनता को शान्ति और भविष्य के दृढ़ समर्थकों के रूप में उठते हुए देखा है और हमने हिन्दुस्तानी जनता की आवाज सुनी है जो शान्ति और मानवता के लिए बुलंद और स्पष्ट आवाज है। क्यों न फिर यह पुस्तक हिन्दुस्तान की और हमारी जनता के बीच एक कड़ी बने और उन भावी सम्बन्धों का श्रीगणेश करे जो किसी दिन और निकट के व स्थायी बन जायेंगे...– और उस समय दुनिया की सारी जनता भाई चारे के साथ मिल–जुलकर रहेगी।''
मानव की महान मुक्ति कामना के साथ सृजनरत हावर्ड फ़ास्ट ने शिकागो मास मंडी के श्रमिक आंदोलन और शोषण सहित सभी आंदोलनों से होते हुए रोमन काल मे विश्व इतिहास के पहले महान मुक्ति संघर्ष के सूत्रधार स्पार्ट्स का भी अद्वित्य चित्रण करते हैं।
शपथ (उपन्यास)
हॉवर्ड फास्ट का उपन्यास शपथ उनके सरोकारों और राजनीतिक सामाजिक चेतना के उच्च स्तर और सौंदर्यबोध का प्रमाण है। भारत के बंगाल में चौथे दशक में आए खतरनाक त्रिकाल(तीन साल लगातार) अकाल से जुड़ी हर एक कारणों और साजिशों, मौत और पलायन और यह साबित किया कि अकाल कोई प्राकृतिक घटना नही बल्कि पैदा किया गया है। नाजी हिटलर के जुल्मों से लेकर बंगाल अकाल तक से सरोकार रखने वाले हावर्ड फास्ट सच्चे मायनो में कालजयी हैं।
शाहीदनामा ( उपन्यास)
अपने अस्तित्व को बचाने और बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष करते निग्रो, यहूदी और ऐसे विदेशी जो बेहतर की उम्मीद में अपने देश से भागकर अमेरिका पहुंचे थे, वे मज़दूर जो राष्ट्र का निर्माण कर रहे थे। अपने वर्तमान और श्रम का शोषण करवाकर पूंजीपति वर्ग का भविष्य बना रहे थे के संघर्षों की गाथा है 'शहीदनामा'। मज़दूर क्रांतिकारियों 'सैको और वैन्ज़ेटी' के बलिदान की कहानी। यह पूरी कहानी पूंजीपति वर्ग की कपटपूर्ण चालाकियों, उसके न्यायालय की धूर्त सुनवाइयों, कार्यवाहियों और मज़दूर संघर्ष पर आधारित है। यह एक ऐसा उपन्यास है जिसे हर तबके को पढ़ा जाना चाहिए। हावर्ड फ़ास्ट ने अमेरिका के मज़दूर विद्रोहों और संघर्षो को बड़ी नजदीकी से देखा, परखा था। यही कारण है कि उनकी हर रचना पूंजीपति राजसत्ताओं की आंख की किरकिरी थी।
हंस प्रकाशन से छपी इस किताब का अनुवाद बेहतरीन अनुवादक अमृतराय ने किया है।।
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युद्ध और प्रेम (कहानियां)
हॉवर्ड फ़ास्ट के उपन्यास पढ़े हैं मगर कहानियां पहली ही बार पढ़ी है। आदि विद्रोही और शहीदनामा मेरे प्रिय उपन्यासों में से हैं। ये पांच कहानियां किताब वाला, नये आदमी, जब वे नाच रहे थे, हमेशा के लिए और एक बच्चे का जन्म, ये सभी युद्ध और प्यार की कहानियां हैं। जैसा कि सबको पता ही है कि हॉवर्ड फ़ास्ट की प्रतिबद्धता अपने रचनात्मक रूप में आती है और पाठक को उद्वेलित करते हुए पूरा पूरा असर करती है, ये किताब भी कुछ वैसा ही असर छोड़ती है। और तो ज्यादा क्या कहा जा सकता है क्योंकि हॉवर्ड फ़ास्ट एक युग थे। हाँ, अनुवाद की जहाँ तक बात है वो अमृत राय के अनुवादों सा ही है। कुमार मुकेश का अनुवाद बेहतरीन है। उनका अनुदित उपन्यास 'शपथ' अभी पढ़ना है, देखते हैं उसमें अनुवाद कैसा है।। "हाँ, तुमने कहा था तुम मुझे प्यार करते हो। क्या तुम एक बेवकूफ़ गुड़िया से प्यार कर सकते हो ?"
(● जब वे नाच रहे थे, हॉवर्ड फ़ास्ट, युद्ध और प्रेम की कहानियां )
आदि विद्रोही' (उपन्यास)
(यह इंग्लिश में 'स्पार्टकस' नाम से है।)
"मैं लौटूंगा और
एक नहीं एक करोड़
बनकर आऊंगा"
० फेयरट्रेक्स
(आदि विद्रोही उपन्यास का एक पात्र जो गुलाम था और सलीब पर टंगे हुए अपनी मौत के ऐन पहले उसके मुंह से ये आखिरी शब्द निकले थे)
आदि विद्रोही और हावर्ड फ़ास्ट। प्रिय उपन्यासों में से एक है और मेरे प्रिय पसंदीदा रचनाकारों में एक हावर्ड फास्ट ने जिस तरीके से एक मुक्तिकामी पात्र की सृजना वर्तमान में करते हैं- उसका एक सिरा भी बहुत मुश्किल और ठोस चिंतन की डिमांड करता है। होना ही होता है नियति मर स्पार्टकस .......
स्पार्टाकस ने इतिहास में जो संघर्ष किया वो आज समकालीन मेहनतकशो का मेनिफेक्टो के रूप में जाना जाता है। और यही जाबाज आगे चलकर रोमन साम्राज्य के पतन का कारण बना। अतीत की कब्रगाहों पर आज भी लिखे जाते हैं नाम असंख्य योद्धाओं की वीर गाथाएं लिख हुईं है जहां।।
इतिहास में अनेक कथाएं छिपी हैं। आदिविद्रोही के 'स्पार्टाकस' के किस्से,. वो ही मुक्तियोद्धा जो लड़ा था अंधकार से।
हावर्ड फ़ास्ट जनता के, मेहनतकशो के रचनाकार थे। वे शिकागो की मांस मंडी हो या मेक्सिकन समस्या या विश्व राजनीति, हमेशा वे सर्वहारा मेहनतकशो के पक्ष में थे और लिखते भी थे। म
स्पार्टकस के नेतृत्व में चिमटा, फूंकणी, परात और अन्य घरेलू वस्तुओं को हथियार बनाकर असंख्य गुलाम आजादी के लिए निकले थे। गुलामों की सेना बहुत समय तक जूझती रही।. सत्ता की टुकड़ियों को हराकर के दक्षिण दिशा की और भी बढ़े। संघर्ष हुआ और सैन्यशक्ति ने यद्यपि स्पार्टकस की सेना पर अंततः विजयी हुई लेकिन उसने रोम साम्राज्य को जता दिया कि तुम कमजोर हो।.
एक सामंत जिसके टुकड़ीनुमा काफ़िले को स्पार्टकस की सेना ने हराया था हावर्ड फ्रास्ट के उपन्यास में वह, कुलीन एक विल्ला में युद्ध के अनुभवों को याद करते हुये बताता है कि किस तरह सेनेट के आदेश पर उसने क्रांतिकारी गुलामों द्वारा विसुइयस की ढलान पर ज्वालामुखी के चट्टान से बनी अनूठी कलाकृतियों को नष्ट किया. “पूरी तरह नष्ट करने के बाद हमने उन्हे मिट्टी में मिला दिया- अब उसका कोई अवशेष नहीं बचा है. तो क्या हमने स्पार्टकस तथा उसकी सेना को खत्म कर दिया. थोडा और समय लगेगा – और निश्चित ही हम सब चीजों को मिटा देंगे।''
गुलामों के स्वतन्त्र जीवन की कथाओं को अमर कालजई बना दिया गया है। कामयाबी मिल जाती तो बहुत सुहाना और दुर्लभ उपलब्धि के बहुत करीब, यदि पूरी कामयाबी मिलती तो शायद हर एक घटनाएं बदल कर अस्तव्यस्त हो जाती और फिर इससे आज थोड़ा अलग होती। स्पार्टकस विश्व इतिहास का पहला मुक्तिकामी योद्धा था। महान रचनाएं क्लासिक्स का दर्जा लेकर बहुत खास बन जाती है।
रोम के राजपरिवार में व्याप्त भ्रष्टाचार, यौन हिंसा, बर्बरता की पराकाष्ठा थी। महलों की विलासिता संपन्नता है और दूसरी तरफ है आदमी का गुलाम आदमी , अंधेरगर्दी, जुल्म, अन्याय जिनको खत्म करके वे मनुष्यता को स्थापित करने के सपनो के साथ लड़े थे।
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(२)
अफ्रीकन संघर्षों का अनुवादक :- आनंद स्वरूप वर्मा
(अफ्रीकन क्रांतिकारी साहित्य को हिंदी पाठको के लिए अनुदित करके बहुत बड़ा काम किया है, आनंद स्वरूप वर्मा :- एक पत्रकार, चिंतक, लेखक और अनुवादक, जिन्होंने अंध महाद्वीप के नाम से प्रसिद्ध अफ्रीका के साहित्य को हिंदी उल्था करके यहां के अनेक पाठकों के लिए सहज उपलब्ध बना दिया।)
अनुवाद को कुछ लोग बहुत हल्के में लेते हैं, जबकि अनुवादक को उस मानसिक संताप, प्यार, सुख या अधमता से गुजरना होता है जिससे स्वयं मूल लेखक गुजरा होता है। यहां तक कि जो लोग गलतफहमी पाले बैठे हैं कि कविताओं का अनुवाद आसान होता है''-- वे भी मानने लगे हैं कि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। मगर जब आप किसी के उपन्यास, जीवनी या आत्मकथा का अनुवाद कर रहे होते हैं तब आप अपने सहज, स्वाभाविक रूप में नहीं रह पाते हैं। बहुत कम अनुवादक ऐसे हैं जिनके विश्व साहित्य के अनुवाद बेहतरीन होते हैं। इनमे मूल भाषा जैसी ही रवानी होती है। राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, अमृत राय, आनन्द स्वरूप वर्मा, शमशेर बहादुर सिंह, अनुराधा श्रीवास्तव, सत्यम वर्मा, गोपीकृष्ण गोपेश, डॉ मदनलाल मधु, रामकृष्ण पांडेय, द्रोणवीर कोहली, वल्लभ सिद्धार्थ, ओमा शर्मा, सुशांत सुप्रिया, जंगबहादुर गोयल, परमिंदर सोढ़ी आदि इन्हें पढ़कर लगता ही नहीं कि आप अनुवाद पढ़ रहे हैं। चेखव और एमिल जोला के जितने भी अनुवाद हिंदी में हुए हैं वे स्तर और गुणवत्ता में राजेंद्र यादव के सबसे अच्छे है। यहां अनुवादक खुद उपस्थित होकर ही उनका जस का तस उल्था कर पाता है।
साहित्य में अनुवाद का काम सबसे मुश्किल है। किसी भाषा के साहित्य, संस्कृति, भाव और तासीर और शैली को किसी अन्य भाषा मे उसी तरह लेकर जाने की प्रक्रिया को अनुवाद कहा जाता है। आप विश्व साहित्य में सोवियत साहित्य या फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगीज, चेक, इंग्लिश, चीनी, पाकिस्तानी या ईरानी साहित्य के जो अनुवाद हिंदी या पंजाबी या राजस्थानी में पढ़ते हैं- उनकी प्रक्रिया सृजन से भी ज्यादा मुश्किल होती है, क्योंकि अनुवादक को केवल शब्दों या वाक्यों का ही अनुवाद नहीं करना होता है बल्कि भावों को बिना किसी हतक्षेप के जस के तस संप्रेषित भी करना होता है। अनुवाद या अनुवादक ना होते तो शायद मेरी किताबों में इतनी रुचि कभी ना होती जो किताबें चुराने तक पहुंच गई थी।
अफ्रीकन साहित्य का हिंदी पाठकों के लिए आनंद स्वरूप वर्मा द्वारा किया गया अनुवाद एक ऐसा स्तरीय, मजबूत और ठोस पुल के समान है जिसके बिना समय काल, भाषा और भूखण्ड को पार करके इतने बड़े फलक पर आ जाना मुमकिन ही नही था। मैन आज तक अफ्रीकन साहित्य के जो यदा कदा फुटकर अनुवाद जो ज्यादा जरूरी भी नही थे हाथ लगते तो पढ़कर छोड़ देता था। यूँ ही एक दिन किसी परिचित के पास न्गूगी वा थ्योंगा का उपन्यास 'खून की पंखुड़ियां' देखा, जिज्ञासावश कुछ पन्ने पलटे और बस यहीं से लगी यह धुन कि पढ़ना ही है। जेब मे पैसे तो थे नहीं, पढ़ता कहाँ से और तड़फ थी कि बढ़ती जा रही थी तो तंग आकर एक दिन साथी दिगंबर की वॉल पर कमेंट कर दिया "मुझे अफ्रीकन साहित्य श्रंखला की सभी किताबें पढ़नी है मगर मेरे पास पैसे नहीं है।".. उन्होंने ने मुझे हल्के में ना लेकर गंभीरता से लिया और युवा साथी अतुल के नंबर दिए ताकि मैं उनसे संपर्क करूँ। अतुल से बात की और फिर उस दिन से पूरे चार दिन छोडकर पांचवे दिन अफ्रीकन साहित्य सीरीज की सभी किताबें मेरे हाथ मे थी। हालांकि वो पांच सौ रुपये मैंने आज तक नही लौटाए हैं- पर कभी लौटाऊंगा जरूर। हफ्ते भर में सभी किताबें पढ़ गया था। और जो मीठा सा नशा इस साहित्य सीरीज का चढा तो एडिक्ट हो गया- आनंद स्वरूप वर्मा के किए अनुवाद मूल भाषा का ही असर करता है। एक बेहतरीन और महान संघर्षशील रचनाकार का अनुवाद उन्ही की तरह के क्रांतिकारी सोच के जिंदा अनुवादक आनंद स्वरूप वर्मा ने किया था - यह अपने आप मे एक महान संयोग है। आनंद स्वरूप वर्मा को जानना युवा पीढ़ी के लिए बहुत जरूरी है।
आनन्द स्वरूप वर्मा का जन्म सन 1943 ई. में हुआ था। इनकी पत्रकारिता की शुरुआत सन 1966 से हुई जिसके चलते आनंद स्वरूप वर्मा अनेक पत्र पत्रिकाओं से जुड़े भी रहे हैं। 1970 से 1974 ई. तक आकाशवाणी दिल्ली के हिन्दी समाचार विभाग में भी काम किया। वैकल्पिक मीडिया विकसित करने के एक महत्वपूर्ण मिशन की शुरुआत करते हुए पत्रकारिता में किसी आंदोलन की सी प्रतिबद्धता के साथ इस मिशन की अवधारणा को 1980 ई. में ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के सम्पादन-प्रकाशन से शुरू किया जो आज तक जारी है। अभी हाल ही में ‘पत्रकारिता का अंधा युग’ शीर्षक से इनकी पुस्तक दिल्ली के सेतु प्रकाशन ने प्रकाशित की है।
पत्रकारिता के दौरान अनेक अविस्मरणीय अनुभव हासिल करते हुए वे पाठकों के लिए जिस महत्वपूर्ण अवदान को गढ़ रहे थे उसका परिणाम बाद के वर्षों में सामने आया था। सन 1994 में दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक चुनाव की रिपोर्टिंग के सिलसिले में वे अफ्रीका में ही थे और इस असाधारण और अविश्वसनीय अनुभव को हासिल किया था। लगभग 350 वर्षों की नस्लभेदी पूंजीवादी साम्राज्यवादी गौरी सत्ता के बाद जिस तरह पहली बार वोट डालने के लिए बूढे़ और जवान रात के दो बजे से ही पंक्तिबद्ध थे और जिस रोमांच का अनुभव कर रहे थे उसे देखना उनके लिए एक अविस्मरणीय अनुभव था। एक ऐसे नागरिक के रूप में जिसके पास मतदान का अधिकार न हो, नेल्सन मंडेला ने अपना अंतिम प्रेस कान्फ्रेंस किया था। जिसके लिए आनंद स्वरूप वर्मा बताते हैं कि "उसमें मैं मौजूद था और उनसे बातचीत की। चुनाव की रिपोर्टिंग मैंने ‘जनसत्ता’ के लिए की। इस सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जाने वाला हिन्दी का मैं अकेला पत्रकार था।''
और इन्होंने एक पत्रकार और साहित्य सेवी होने का फर्ज बखूबी निभाया भी। इसके अलावा भी इन्होंने अनेक ऐसे काम किए जिनके बारे में सोचा भी नही जा सकता, मतलब प्रतिबद्धता के उच्च गुण मूल्यों को स्थापित किया था। वे बताते हैं कि :-- "भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों में चल रहे जनतांत्रिक संघर्षों पर देश के अखबारों और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन करता रहा हूं। नेपाल के राजतंत्र विरोधी संघर्ष पर मैंने काफी काम किया और अनेक पुस्तकें लिखीं।"
हिन्दी पाठकों को अफ्रीकी जनता के मुक्ति आंदोलनों की जानकारी देने का मैंने विशेष रूप से प्रयास किया क्योंकि हमारी सोच सदा से यूरोसेंट्रिक थी और हम तीसरी दुनिया (एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका) के देशों पर कम, यूरोप के देशों और अमेरिका पर ज्यादा ध्यान देते थे जबकि तीसरी दुनिया के देशों का समाज हमारे यहाँ के समाज से काफी मिलता जुलता है।"
"1970 से साप्ताहिक ‘दिनमान’ के लगभग हर अंक में मेरी रपटें प्रकाशित होती रहीं और यह सिलसिला एक दशक तक चला। नेल्सन मंडेला पर मेरा पहला लेख 1970 में प्रकाशित हुआ था जब अभी मंडेला ने जेल में महज 7 वर्ष ही बिताये थे।"
"1989 में केन्या और जिंबाब्वे की यात्रा की। 1994 में दक्षिण अफ्रीका और 2004 में नाइजीरिया और घाना की यात्रा की तथा वहां के साहित्य का अध्ययन किया।" (जिसका सकारात्मक परिणाम का लाभ आज हम पाठक ले रहे हैं।)
- "दक्षिण अफ्रीका की राजनीतिक स्थिति पर 1990 में मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक थाः ‘दक्षिण अफ्रीका-गोरे आतंक के खिलाफ काली चेतना’।"
इतना सब महत्वपूर्ण और बहुत ठोस काम के बाबत बताते हुए सहजता से यह कहना कि " 1994 में केन्या के विख्यात उपन्यासकार और विचारक न्गुगी वा थ्योंगो के लेखों का अनुवाद और संपादन किया जो ‘भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता’ शीर्षक से एक पुस्तक रूप मे प्रकाशित हुई।"-- शायद अनुवादक आनंद स्वरूप वर्मा और प्रकाशक और न्गूगी वा थ्यांगो को भी इस बात का इल्म नही था कि उनके अनुदित साहित्य से वे भारत मे इस कदर स्थापित हो जाएंगे कि 'खून की पंखुड़ियों' सहित उनका तमाम साहित्य लोग तलाश तलाश कर पढ़ेंगे। वे आगे बताते हैं कि - "सन 1996 में ‘आज की अफ्रीकी कहानियां’ (हालांकि यह दो भाग में है, पहला अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा का है, दूसरे का एक महिला जिनका नाम भूल गया हूँ, का है। पहला भाग अद्भुत है।) शीर्षक से अफ्रीकी कहानियों के एक संकलन का अनुवाद और संपादन किया। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि हर देश की कहानी से पहले उस देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य पर मेरी टिप्पणी है जो कहानियों की संप्रेषणीयता को बढ़ा देती है।
इसके अलावा उनका एक और महत्वपूर्ण जो काम था वो था सन 1999 ई. में ‘औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति’ पुस्तक का अनुवाद और संपादन। इसमें शिक्षा और संस्कृति से संबंधित न्गुगी वा थ्योंगो के लेख संकलित हैं जो अफ्रीका के मुक्तिकामी युवाओ के लिए किसी जरूरी पाठ की तरह तो है ही तीसरी दुनिया के लिए भी है।
इन सब महत्वपूर्ण अनुवादों के साथ ही इनके कुछ अन्य जरूरी अनुवाद भी है जिनमे प्रमुख है- 'आज का भारत' (रजनी पाम दत्त), 'भारतीय जेलों में पांच साल' (मेरी टाइलर), 'माओ त्से तुंग का राजनैतिक दर्शन' (मनोरंजन मोहंती), 'तीसरी फसल' (पी. साइनाथ), 'भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास' (ई एम एस नंबूदिरीपाद), 'नेपाली समरगाथा' (ली ओनेस्टो) 'भारत में विदेशी निवेश' (मैथ्यू कुरियन), 'सुल्तान महमूद गजनवी' (मोहम्मद हबीब), 'सलाम बस्तर' (राहुल पंडिता), 'भारत में बंधुआ मजदूर' (महाश्वेता देवी), 'बिहार में नक्सलवाद' (कल्याण मुखर्जी), 'वेनेजुएला की क्रांति' (मार्ता हार्नेकर), 'भारत में बच्चे और राज्यनीति' (मायरन वीनर) 'अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का इतिहास' (ए.एन.सी.), 'तानाशाह की कैद में- केन सारो वीवा की जेल डायरी'(केन सारो-वीवा) (यह एक संघर्षशील क्रांतिवीर की महान डायरी है।) , चीनी उपन्यास लाल पोस्ते के फूल (आ लाए), चीनी उपन्यास खोखला पहाड़ (आ लाए), दक्षिण अफ्रीकी उपन्यास पत्थरों का देश (अलेक्स ला गुमा) और खून की पंखुड़ियां'... और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति - शिक्षा और संस्कृति की राजनीति' (न्गूगी वा थ्यांगो)
(तस्वीर में न्गूगी वा थ्यांगो और आनंद स्वरूप वर्मा मंगलेश डबराल और पीछे अभिषेक श्रीवास्तव।)
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(३)
वल्लभ सिद्धार्थ :- वैश्विक साहित्य का भाषाई पुल
( एक ऐसा महान अनुवादक जो अल्पज्ञात है।)
वल्लभ सिद्धार्थ, यह एक ऐसा नाम है जो अपने साथ अनुवाद का वैश्विक काम और नाम टांगे हुए हैं- एक ऐसा नाम जो तड़क भड़क और आत्मप्रचार से दूर, हकीकतन किसी लोककथा के हीरो की तरह गुमनाम नही मगर अल्पज्ञात, जिसने क्लासिक्स की कदर की और कदर जानी और उसकी कदर (महता) स्थापित की..... वल्लभ सिद्धार्थ विश्व के उन कुछ महान अनुवादकों में से एक है, जिन्होंने वैश्विक महान और कालजई रचनाओं को आम पतगक तक पहुंचाया मगर खुद हाशिए पर रहे- हिंदी जमात के मानसिक रोग के शिकार हुए अब तक के महान नामो में से एक नामनाम है - वल्लभ सिद्धार्थ।
उनका जन्म अप्रेल सन 1937 में झाँसी के एक कस्बे मऊरानीपुर में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम ए किया था। उस समय जब उनके लिए प्रशासनिक सेवाओं जैसे बड़े बड़े स्वर्णिम अवसर थे मगर फिर भी उन्होंने एक मसिजीवी लेखक बनना स्वीकार किया। हालांकि उनकी पुश्तैनी संपन्नता ने उनके सामने मुश्किलें नही आने दी। लेकिन यह निर्णय आसान भी नहीं होता। वल्लभ सिद्धार्थ ने जीवन का बहुत क्रूरतम समय भी इसी के चलते देखा था।
उनकी पहली कहानी 'उपेक्षिता' धर्मयुग के 1967 ई के अंक में छपी। और लगातार सहज प्रयासों के साथ लेखन में सुधार लाते हुए बहुत अच्छी कहानियां लिखी जो उन्ही दिनों सारिका में भी छपी थी।
उनकी कहानी लेखन की यह यात्रा जो कम समय की थी जो 1995 तक अनवरत जारी रही। उन्होंने लगभग डेढ़ सौ कहानियाँ लिखी जो अपने अपने समयो में हिन्दी की सभी स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई।
वल्लभ सिद्धार्थ की कहानियां भारतीय भाषाओं के साथ ही साथ अंग्रेजी व जापानी भाषाओं में अनूदित हुई थी। ब्लैक आउट व दूसरे किनारे पर वल्लभ जी के प्रमुख कहानी संग्रह जो मैंने पढ़े हैं, बाकी तो और भी हैं ही - 'कठघरे' उनका हिंदी उपन्यास है ।
जाने किस प्रेरणा से प्रेरित होकर वल्लभ सिद्धार्थ ने विश्व क्लासिकस को देखा, छुआ, जाना और उन सबके सब महान रचनाओँ का हिन्दी अनुवाद कर दिया। उन्होंने उनको विस्तार दिया, जब वे क्लासिक्स की ओर उन्मुख हुए, वो समय - महान सृजन से पुष्ट हो रहा था।
काफ़्का से संवाद
दंडदीप में (काफ़्का की तीन लंबी कहानियाँ)
जलपरी (पुश्किन का नाटक),
महान त्रासदियां (नाटक)
पुश्किन की जीवनी(हेनरी त्रोएत),
हमशक्ल , एक हिमपात की कहानी (दोस्तोएवस्की के उपन्यास)
युद्ध और शांति, कज़ाक, पुनरुत्थान, अन्ना केरीनिना(लेव तोलस्तोय)
मृतात्माऐं (गोगोल)
गोदो का इंतजार (सैम्युअल बैकैट का नाटक)
मक्खियां (ज्यां पाल सार्त्र)
आत्मा और कंटीले तारों का घेरा (अलेक्जेंडर सोल्झेनीत्सिन)
इलियड(होमर), यूटोपियन, डिवाइन कामेडी
नवजीवन, (दांते) दाँते की जीवनी
एडल्ट, भूमिगत की डायरी, अपराध और दंड (दाॅस्तोएवस्की)
इब्सन का प्रेत
और चेखव की महान कहानियाँ
अनुवाद साहित्य में उनका यह अब तक का योगदान है। मैं जब भी वल्लभ सिद्धार्थ के बारे में साथियों से या स्टडी सर्किल के छात्र नोजवानो से बात करता हूँ तो हमेशा ही ग्लानि महसूस करता हूँ। आत्मग्लानि। निहायत बेशर्मी की हद पार कर चुके बौड़म की तरह। अफसोस होता है। कारण ? - कारण यह है कि इक्का- दुक्का अनुवादों को छोड़ दिया जाए तो वल्लभ सिद्धार्थ का तमाम अनुदित साहित्य मैं पढ़ चुका हूँ। किताबों की चोरियां जब किया करता था- तब से ही पढ़ता आ रहा हूँ। यह मूर्खताओं भरी सच्चाई है कि मैंने हमेशा रचनाकारों को महान माना, भले गोर्की हो या सिम्बोपाइस्त या गालेआनो या निरजंन.. अनुवादकों पर कभी गौर ही नही किया जब कि इस सबके कर्ता धर्ता है ही अनुवादक। एक ऐसा भाषाई पुल जो मौलिक जितना ही महान है। जब ध्यान किया भी तो बहुत से नाम भी विस्मृत हो चुके थे।
(४)
(ओमा शर्मा - अनुवाद की दुनिया का जादुई नाम)
ओमा भाई साहब से पहला परिचय उनकी कहानियों से ही हुआ था। याद नही, शायद हंस में छपा करती थी। मगर यह नही पता था कि यह व्यक्ति मध्य पूर्व यूरोप का तिलिस्मी सा लगता जनजीवन स्वाइग के साथ लेकर आने वाले हैं। ओमा शर्मा
1. गुज़रा जमाना (आत्मकथा स्टीफ़न स्वाइग, अनुवाद ओमा शर्मा)
2. कालजई कहानियां (स्टीफ़न स्वाइग, अनुवाद ओमा शर्मा)
3. कायर (स्वाइग का उपन्यास, अनु. अनुराधा महेंद्र)
4. अंतर्यात्रा वाया वियना (यात्रा डायरी, ओमा शर्मा)
(यह मेरे लिए बहुत अच्छा ही नहीं बल्कि अद्वितीय अनुभव है कि जिस देशकाल, समाज, वातावरण और संस्कृतियो को जानने समझने के असफल प्रयास मैं करता रहता था। संबंधित पाठ्य सामग्री कहीं कुछ मिलता नहीं था और यहां सब कुछ मिल गया। वे लोग जो मूल लेखक को चांद चढ़ाकर अनुवादक का जरा सा ही, वो भी भूले भटके जिक्र करते हैं, और हल्की, सतही बुरी तरह की आलोचनाएं करते हैं, वे कभी नहीं समझ सकते कि अनुवादक ही है वो पुल जिस पर से पाठक वियतनाम या घाना या यूक्रेन या इंग्लैंड,... सभी समय और सरहदों को पार करके उस अज्ञात से लेखक से मुलाकात करते हैं।
ओमा शर्मा भाई गजब का काम किया है यह आपने और देश निर्मोही जी आप भले कितने ही निर्मोही हो भले लेकिन मोह हमारे को पुगा ही देते हैं। ओमा शर्मा ही वे शख्स है जो स्वाइग को हिंदी में लेकर आए उनके अवदान के साथ, महज एक 'कायर' उपन्यास का अनुवाद अनुराधा महेंद्र का है बाकी ओमा शर्मा का। इससे भी परले दर्जे की स्वाइग को और ज्यादा गहरा जानना है तो इसको जरूर पढ़ें, ओमा शर्मा की यात्रा डायरी ''अन्तर्यात्रा वाया वियना'', इस लेखक अनुवाद ओमा जी ने क्या गजब का काम किया है, सैल्यूट हैं जी आपको)
किसी भी लेखक को पढ़ने का क्रम उसकी रचनाओं से शुरू होता है, मगर स्टीफ़न स्वाइग के बारे में मेरे साथ कुछ अलग घटा, मैंने पहले उनकी आत्मकथा 'वो गुज़रा जमाना' (अनुवाद:- ओमा शर्मा) पढ़ी थी। और अब 'स्टीफ़न स्वाइग की कालजयी कहानियां' पढ़ी हैं। सात लंबी कहानियों का यह संग्रह अपने आप मे अद्भुत है। स्वाइग की कहानियों में सिर्फ़ भावों और घटनाओं का ही मेल नहीं होता है बल्कि यहां मनुष्य की मूल प्रवृतियों, कृत्यों और मनोविज्ञान का द्वंदात्मक वर्णन होता है। मनुष्य के मानसिक धरातल का इतना गहन और विराट अध्ययन और चित्रण कि पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाता है। इस संग्रह की सभी कहानियां मुझे प्रिय है मगर 'अनजान औरत का ख़त' कहानी विशेष प्रिय है। एक औरत अपने बच्चे की मृत्यु पर अपने प्रेमी को ख़त लिखती है और अपना प्यार जताती है- जानते हुए भी कि वो उससे प्रेम नहीं करता है। इकतरफ़ा प्रेम और संबंधों की गरिमा को व्याख्यायित करती यह कहानी किसी भी संवेदनशील मन को झकझोर सकती है- पाठक उसके साथ- साथ चलने को मजबूर हो जाता है। किताब की भूमिका में भी लिखा हुआ है कि ".....और अंत तक पहुंचकर उसे अहसास होता है कि प्रेम की यह एकतरफ़ा, असामान्य स्थिति, किसी फ़ितूर के कारण नहीं, प्रेम के उदात्त अहसास के कारण बनी है।"
इस संग्रह की बर्निंग सीक्रेट, अनजान औरत का ख़त, अदृश्य संग्रह, भगौड़ा, किताब शाह, बदहवास और खेल शतरंज का आदि सभी कहानियां बेमिसाल है।
स्वाइग अपनी कहानियों में संबंधों, स्त्रियों, संवेदनाओं, घटनाओं और मनोविज्ञान का ऐसा मार्मिक और जीवंत चित्रण करते हैं कि पाठक एक फ़्लो में बहता रहता है। चीज़ों की रवानगी उसको बहाए जाती है और वो मगन होकर साथ- साथ बहता रहता है। यह एक ऐसा कहानी संग्रह है जो अपनी बेमिसाल कहानियों और बेहतरीन अनुवाद के कारण विशिष्ट हो जाता है। हर सुधि पाठक को यह किताब पढ़नी चाहिए। आधार प्रकाशन और ओमा शर्मा जी का हार्दिक आभार जिनके कारण ये बेहतरीन कहानियां हिंदी में आ सकी।
विश्व साहित्य के हर रचनाकार की रचनाओं का प्लेटफॉर्म एक दूसरे से बिल्कुल अलग होता है। अगर कुछ रचनाकार एक ही समय मे एक ही घटना पर लिखते हैं तब भी उनकी मनःस्थिति भिन्न बनी रहती है। यह अच्छी और बुरी दोनो तरह की बात है कि स्वाइग को जीने के लिए बर्बर फासीवादी दौर मिला जब ऑस्ट्रिया के यहूदी तानाशाह हिटलर की नीतियों से प्रताड़ित थे। इसकी वजह से उनकी मानसिक स्थिति वैसी बनी जैसी हम उनकी कहानियों और एकमात्र उपन्यास 'कायर' में पढ़ते हैं।
स्वाइग का यह उपन्यास उनकी व्याकुल मनस्थिति और अडिग विचारों का बेहतरीन दस्तावेज़ है। उपन्यास के केंद्र में मुख्य पात्र एंटन हॉफमिलर का जीवन और उसकी मानसिकता से उपजी कुछ घटनाएं हैं जो अंत तक कथा की आत्मा बनी रहती है। उपन्यास में स्वाइग ने कथा के मुख्य पात्र के अपराधबोध को बहुत ऊंचा और विराट भावनात्मक स्तर दिया है। आत्मग्लानि को इस तरह किसी ने इमोशनल ब्लैकमेल में नहीं बदला है। उपन्यास के मुख्यपात्र में करुणा के भाव का बहुत मार्मिक चित्रण तो किया ही है लेकिन साथ ही साथ एडिथ की मौत और उन परिस्थितियों की भी बहुत संवेदनशील पेशकारी की है जिनमे वो आत्महत्या करती है। उपन्यास में आए पत्रों में छिपी अति भावुकता पाठकों को झकझोर देती है। इसी उपन्यास के अंत मे मुख्य पात्र एंटन जब युद्ध मे जाता है तो उसकी मनस्थिति का बहुत शानदार और यथार्थ चित्रण करने में स्वाइग जो सफलता हासिल करते हैं वो अद्भुत है। बानगी देखिए, - "अगस्त के महिने में उन दिनों लाखों की संख्या में सैनिकों को युद्ध के लिए बुलाया गया। मुझे यकीन है कि उनमें से कई अधीर होकर नहीं, बल्कि उदासीन होकर गए थे जैसे मैं ख़ुद। मैं युद्ध मे इसलिए नहीं गया कि मेरे भीतर देश के लिए मर मिटने का जज़्बा था बल्कि मेरे लिए जीवन से पलायन का बस यही एक रास्ता था। जिस तरह चोर पकड़े जाने के डर से अंधकार की शरण लेता है, ठीक उसी तरह मैंने जंग के मैदान में शरण ली"
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि स्वाइग विश्व साहित्य की धरोहर है और उनकी रचनाएं अनमोल खजाना। अनुराधा महेंद्र का अनुवाद बेहतरीन है और जबरदस्त पेशकारी आधार प्रकाशन की है। यह उपन्यास हर पाठक की टेबल पर होना जरूरी है। हार्दिक बधाई
किताबनामा.....
'अंतरयात्राएं वाया वियना' ओमा शर्मा जी की यात्रा डायरी है। यह कहना नाकाफ़ी है कि ये अच्छी किताब है बल्कि 'अद्भुत/लाजवाब' शब्द ही इसके लिए सटीक है। हालांकि मैंने स्टीफ़न स्वाइग की आत्मकथा 'गुजरा जमाना' पढ़ी है मगर इतनी दीवानगी मुझमे पैदा नहीं हुई। ओमा शर्मा ने अपने प्रिय रचनाकार की स्मृतियों का पीछा किया, उन्हें भीतर परोटा, वे यादों के भग्नावशेषों को पुनः सजीव करने के सफल प्रयास में वियना और साल्जबर्ग की यात्राएं करते हैं। उनके चिंतन का स्तर इतना विराट और व्यापक है कि लगता है जैसे पाठक स्वयं स्वाइग से साक्षात्कार कर रहा हो। यह महज एक यात्रा विवरण नहीं है बल्कि एक महान रचनाकार से एक युवा रचनाकर की सघन मुलाकात है। ओमा शर्मा जी हिंदी जगत और हम पाठक आपके सदैव ऋणी रहेंगे। अब मेरे हाथ स्वतः ही स्वाइग की कहानियों की तरफ बढ़ रहे हैं, इनका अनुवाद भी ओमा जी ने ही किया है। और आधार के बारे में, लाजवाब, अद्भुत काम है आपका, हम दिल से शुक्रगुज़ार हैं।
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(३)
(ओमा शर्मा - अनुवाद की दुनिया का जादुई नाम)
ओमा भाई साहब से पहला परिचय उनकी कहानियों से ही हुआ था। याद नही, शायद हंस में छपा करती थी। मगर यह नही पता था कि यह व्यक्ति मध्य पूर्व यूरोप का तिलिस्मी सा लगता जनजीवन स्वाइग के साथ लेकर आने वाले हैं। ओमा शर्मा
1. गुज़रा जमाना (आत्मकथा स्टीफ़न स्वाइग, अनुवाद ओमा शर्मा)
2. कालजई कहानियां (स्टीफ़न स्वाइग, अनुवाद ओमा शर्मा)
3. कायर (स्वाइग का उपन्यास, अनु. अनुराधा महेंद्र)
4. अंतर्यात्रा वाया वियना (यात्रा डायरी, ओमा शर्मा)
(यह मेरे लिए बहुत अच्छा ही नहीं बल्कि अद्वितीय अनुभव है कि जिस देशकाल, समाज, वातावरण और संस्कृतियो को जानने समझने के असफल प्रयास मैं करता रहता था। संबंधित पाठ्य सामग्री कहीं कुछ मिलता नहीं था और यहां सब कुछ मिल गया। वे लोग जो मूल लेखक को चांद चढ़ाकर अनुवादक का जरा सा ही, वो भी भूले भटके जिक्र करते हैं, और हल्की, सतही बुरी तरह की आलोचनाएं करते हैं, वे कभी नहीं समझ सकते कि अनुवादक ही है वो पुल जिस पर से पाठक वियतनाम या घाना या यूक्रेन या इंग्लैंड,... सभी समय और सरहदों को पार करके उस अज्ञात से लेखक से मुलाकात करते हैं।
ओमा शर्मा भाई गजब का काम किया है यह आपने और देश निर्मोही जी आप भले कितने ही निर्मोही हो भले लेकिन मोह हमारे को पुगा ही देते हैं। ओमा शर्मा ही वे शख्स है जो स्वाइग को हिंदी में लेकर आए उनके अवदान के साथ, महज एक 'कायर' उपन्यास का अनुवाद अनुराधा महेंद्र का है बाकी ओमा शर्मा का। इससे भी परले दर्जे की स्वाइग को और ज्यादा गहरा जानना है तो इसको जरूर पढ़ें, ओमा शर्मा की यात्रा डायरी ''अन्तर्यात्रा वाया वियना'', इस लेखक अनुवाद ओमा जी ने क्या गजब का काम किया है, सैल्यूट हैं जी आपको)
किसी भी लेखक को पढ़ने का क्रम उसकी रचनाओं से शुरू होता है, मगर स्टीफ़न स्वाइग के बारे में मेरे साथ कुछ अलग घटा, मैंने पहले उनकी आत्मकथा 'वो गुज़रा जमाना' (अनुवाद:- ओमा शर्मा) पढ़ी थी। और अब 'स्टीफ़न स्वाइग की कालजयी कहानियां' पढ़ी हैं। सात लंबी कहानियों का यह संग्रह अपने आप मे अद्भुत है। स्वाइग की कहानियों में सिर्फ़ भावों और घटनाओं का ही मेल नहीं होता है बल्कि यहां मनुष्य की मूल प्रवृतियों, कृत्यों और मनोविज्ञान का द्वंदात्मक वर्णन होता है। मनुष्य के मानसिक धरातल का इतना गहन और विराट अध्ययन और चित्रण कि पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाता है। इस संग्रह की सभी कहानियां मुझे प्रिय है मगर 'अनजान औरत का ख़त' कहानी विशेष प्रिय है। एक औरत अपने बच्चे की मृत्यु पर अपने प्रेमी को ख़त लिखती है और अपना प्यार जताती है- जानते हुए भी कि वो उससे प्रेम नहीं करता है। इकतरफ़ा प्रेम और संबंधों की गरिमा को व्याख्यायित करती यह कहानी किसी भी संवेदनशील मन को झकझोर सकती है- पाठक उसके साथ- साथ चलने को मजबूर हो जाता है। किताब की भूमिका में भी लिखा हुआ है कि ".....और अंत तक पहुंचकर उसे अहसास होता है कि प्रेम की यह एकतरफ़ा, असामान्य स्थिति, किसी फ़ितूर के कारण नहीं, प्रेम के उदात्त अहसास के कारण बनी है।"
इस संग्रह की बर्निंग सीक्रेट, अनजान औरत का ख़त, अदृश्य संग्रह, भगौड़ा, किताब शाह, बदहवास और खेल शतरंज का आदि सभी कहानियां बेमिसाल है।
स्वाइग अपनी कहानियों में संबंधों, स्त्रियों, संवेदनाओं, घटनाओं और मनोविज्ञान का ऐसा मार्मिक और जीवंत चित्रण करते हैं कि पाठक एक फ़्लो में बहता रहता है। चीज़ों की रवानगी उसको बहाए जाती है और वो मगन होकर साथ- साथ बहता रहता है। यह एक ऐसा कहानी संग्रह है जो अपनी बेमिसाल कहानियों और बेहतरीन अनुवाद के कारण विशिष्ट हो जाता है। हर सुधि पाठक को यह किताब पढ़नी चाहिए। आधार प्रकाशन और ओमा शर्मा जी का हार्दिक आभार जिनके कारण ये बेहतरीन कहानियां हिंदी में आ सकी।
विश्व साहित्य के हर रचनाकार की रचनाओं का प्लेटफॉर्म एक दूसरे से बिल्कुल अलग होता है। अगर कुछ रचनाकार एक ही समय मे एक ही घटना पर लिखते हैं तब भी उनकी मनःस्थिति भिन्न बनी रहती है। यह अच्छी और बुरी दोनो तरह की बात है कि स्वाइग को जीने के लिए बर्बर फासीवादी दौर मिला जब ऑस्ट्रिया के यहूदी तानाशाह हिटलर की नीतियों से प्रताड़ित थे। इसकी वजह से उनकी मानसिक स्थिति वैसी बनी जैसी हम उनकी कहानियों और एकमात्र उपन्यास 'कायर' में पढ़ते हैं।
स्वाइग का यह उपन्यास उनकी व्याकुल मनस्थिति और अडिग विचारों का बेहतरीन दस्तावेज़ है। उपन्यास के केंद्र में मुख्य पात्र एंटन हॉफमिलर का जीवन और उसकी मानसिकता से उपजी कुछ घटनाएं हैं जो अंत तक कथा की आत्मा बनी रहती है। उपन्यास में स्वाइग ने कथा के मुख्य पात्र के अपराधबोध को बहुत ऊंचा और विराट भावनात्मक स्तर दिया है। आत्मग्लानि को इस तरह किसी ने इमोशनल ब्लैकमेल में नहीं बदला है। उपन्यास के मुख्यपात्र में करुणा के भाव का बहुत मार्मिक चित्रण तो किया ही है लेकिन साथ ही साथ एडिथ की मौत और उन परिस्थितियों की भी बहुत संवेदनशील पेशकारी की है जिनमे वो आत्महत्या करती है। उपन्यास में आए पत्रों में छिपी अति भावुकता पाठकों को झकझोर देती है। इसी उपन्यास के अंत मे मुख्य पात्र एंटन जब युद्ध मे जाता है तो उसकी मनस्थिति का बहुत शानदार और यथार्थ चित्रण करने में स्वाइग जो सफलता हासिल करते हैं वो अद्भुत है। बानगी देखिए, - "अगस्त के महिने में उन दिनों लाखों की संख्या में सैनिकों को युद्ध के लिए बुलाया गया। मुझे यकीन है कि उनमें से कई अधीर होकर नहीं, बल्कि उदासीन होकर गए थे जैसे मैं ख़ुद। मैं युद्ध मे इसलिए नहीं गया कि मेरे भीतर देश के लिए मर मिटने का जज़्बा था बल्कि मेरे लिए जीवन से पलायन का बस यही एक रास्ता था। जिस तरह चोर पकड़े जाने के डर से अंधकार की शरण लेता है, ठीक उसी तरह मैंने जंग के मैदान में शरण ली"
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि स्वाइग विश्व साहित्य की धरोहर है और उनकी रचनाएं अनमोल खजाना। अनुराधा महेंद्र का अनुवाद बेहतरीन है और जबरदस्त पेशकारी आधार प्रकाशन की है। यह उपन्यास हर पाठक की टेबल पर होना जरूरी है। हार्दिक बधाई
किताबनामा.....
'अंतरयात्राएं वाया वियना' ओमा शर्मा जी की यात्रा डायरी है। यह कहना नाकाफ़ी है कि ये अच्छी किताब है बल्कि 'अद्भुत/लाजवाब' शब्द ही इसके लिए सटीक है। हालांकि मैंने स्टीफ़न स्वाइग की आत्मकथा 'गुजरा जमाना' पढ़ी है मगर इतनी दीवानगी मुझमे पैदा नहीं हुई। ओमा शर्मा ने अपने प्रिय रचनाकार की स्मृतियों का पीछा किया, उन्हें भीतर परोटा, वे यादों के भग्नावशेषों को पुनः सजीव करने के सफल प्रयास में वियना और साल्जबर्ग की यात्राएं करते हैं। उनके चिंतन का स्तर इतना विराट और व्यापक है कि लगता है जैसे पाठक स्वयं स्वाइग से साक्षात्कार कर रहा हो। यह महज एक यात्रा विवरण नहीं है बल्कि एक महान रचनाकार से एक युवा रचनाकर की सघन मुलाकात है। ओमा शर्मा जी हिंदी जगत और हम पाठक आपके सदैव ऋणी रहेंगे। अब मेरे हाथ स्वतः ही स्वाइग की कहानियों की तरफ बढ़ रहे हैं, इनका अनुवाद भी ओमा जी ने ही किया है। और आधार के बारे में, लाजवाब, अद्भुत काम है आपका, हम दिल से शुक्रगुज़ार हैं।
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(४)
जंग बहादुर गोयल:- वैश्विक जिसको होना.....
हाशिए पर उसे छोड़ दिया.... एक बहुत जरूरी अनुवादक- जिसको अगली पीढ़ी तो मूल्यांकन कर के इस पूरोधा को नोटिस में लेगी ही और सहेजेगी भी, मगर बात समकाल की है, घासलेटी अनुवादकों को तारों सजी तारीफें मिल भी रही है तो भी भविष्य तो जंगबहादुर गोयल जैसे प्रतिबद्ध अनुवादकों के हिस्से ही आएगा।
(एक ऐसा अनुवादक जो प्रकाशकों के लिए नही बल्कि मन मुताबिक अनुवाद करता है। इनकी अनुदित रचनाओं का समय, स्थान, देश और सांस्कृतिक अतिक्रमण बहुत सुंदर तरीके से होता है।)
_______________________________
जंग बहादुर गोयल बहुत सहज और सजग पाठक, लेखक और अनुवादक है। सबसे बड़ी बात कि प्रकाशक के कहने पर या किसी परियोजना के अधीन ठेका लेकर अनुवाद नहीं करते बल्कि स्वविवेक से ही काम करते हैं। डॉ. नीलम गोयल जीवन साथी होने के साथ ही साथ साथी, सहयोगी और अनुवादक भी हैं। इन्होंने हर एक काम के लिए भरपूर सहयोग दिया। अक्सर मुझे जो चीज खटकती है वो यही है कि राजस्थान के स्वयंभू अनुवादक अनुवाद की सित्या पट देते हैं। साहित्य अकादमी से परियोजना के तहत अनुवाद लेकर किसी भी हल्की फुल्की किताब का अनुवाद करने वाले इन लोगों को हकीकत में बहुत ज्यादा अध्ययन, मनन और चिंतन के बात अन्य लोगों से सीखने की ललक पैदा करनी ही होगी।
वैसे अनुवादक का कद मेरी नज़र में लेखक से भी ऊंचा है। अनुवादक ही दो समयकाल के बीच वह पुल है जिससे एक समय की ही नहीं बल्कि भौगोलिक, सांस्कृतिक भिन्नताओं के बीच लिखी, स्थापित और चर्चित बेहतरीन रचनाएं दूसरे काल, भौगोलिक क्षेत्र और संस्कृर्ति तक का सफर करती हैं।
जंग बहादुर गोयल जी से पहला परिचय ही उनके किसी अनुवाद के कारण हुआ था जो मैंने पढ़ने के बाद किसी ग्रुप में टीप रूप में लगाई थी। एक बात और है कि जंग बहादुर गोयल अनुवाद के लिए जो भी रचनाएं चुनते हैं वे बेहतरीन होती है। कलेक्शन और चयन की किसी भी अनुवादक या पाठक के उच्च दृष्टिकोण को साबित करता हूं। ऐसी महान और कालजयी रचनाएं जिनका अनुवाद डिमांड पर किया जाता हैं। इनका केवल हिंदी और अंग्रेजी ही नहीं बल्कि पंजाबी में भी अनुवाद का बहुत और स्तरीय काम है। खलील जिब्रान की जीवनी (अनु. जंग बहादुर गोयल), जोरबा द ग्रीक, विश्व के कालजयी उपन्यास (चार भागों में मौलिक रचना है।) मोहब्बतनामा (हिंदी पंजाबी दोनो में अनुवाद है।) पंजाबी का सिंह ब्रदर्स ने छापा है और हिंदी आधार प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। संवाद प्रकाशन ने भी वैश्विक साहित्य के इनके किए अनुवादों को छापा है। हाल ही में आधार प्रकाशन से इनका एक और महत्वपूर्ण अनुवाद 'गैड फ्लाई' भी छपा है, जो हिंदी और पंजाबी में उपलब्ध ही नहीं था। यह सदी के सबसे चर्चित और महान उपन्यासों में शामिल है।
डॉ. नीलम गोयल जो कि जंग बहादुर गोयल की जीवन साथी, सहयोगी और अनुवादक भी हैं का इन सब महत्वपूर्ण कार्यों में भरपूर सहयोग रहा है।
आप सब पाठकों के लिए उनके काम पर की गई मेरी संक्षिप्त टीप भी यहाँ प्रस्तुत कर रह हूँ।
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(जोरबा द ग्रीक)
'ज़ोरबा द ग्रीक' विश्व में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले उपन्यासों में से एक है। यह एक यात्रा है जो स्थूल से सूक्ष्म, बाहर से भीतर और समष्टि से व्यष्टि तक की है। अगर आप एक संजीदा पाठक है तो निश्चित ही इस उपन्यास को पढ़कर वैसे नहीं रहेंगे, जैसे कि आप इसे पढ़ने से पहले थे। यह आपकी अंतरात्मा को झकझोर देगा। आपके भीतर का अमूल चूल परिवर्तित कर देगा। 'ज़ोरबा' दो ध्रुवों की यात्रा है जो दुनियावी चीजों, मान्यताओं को ठेंगा दिखाता है। यह जीवन को बेहतर तरीके से जीना सिखाता है और बुद्ध हो जाने का मार्ग सुझाता है। यह महज एक उपन्यास नहीं बल्कि जीवन का दर्शन है। जीवन उत्सव है। वास्तव में यह जीवन को जीवन की तरह जीना और देखना सिखाता है। ज़ोरबा केवल एक पात्र नहीं है बल्कि भीतर की तड़प, उल्लास, उत्सव और बेफ़िक्री है। तभी तो वह अपने बॉस को कहता है कि, "बॉस, तुम्हारे पास सब कुछ है- मगर कमी है तो थोड़ी सी दिवानगी की।" 'ज़ोरबा' परम्पराओं को ताक पर रखकर पीड़ाओं, कुंठाओं और व्याधियों के सामने अडिग खड़े रहने की उज्ज्वल गाथा है।
आधार प्रकाशन (पंचकूला) से प्रकाशित यह उपन्यास इस सदी के सबसे महत्वपूर्ण उपन्यासों में से एक है। रही बात अनुवाद की तो दौर के महत्वपूर्ण अनुवादक आदरणीय जंग बहादुर जी गोयल और नीलम जी गोयल द्वारा किया गया यह अनुवाद अद्भुत है। पाठक निश्चय ही इसे पढ़ते हुए मूल भाषा का स्वाद अनुभव करेगा। मुझे यही लगा जैसे यह हिंदी में ही रचा गया है। युवा पाठकों को यह उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए।
(विश्व के कालजयी उपन्यास)
दरअसल मैं यहां आप सबको इस महत्वपूर्ण मौलिक काम के बरे में बताना चाहता हूँ। चार भागों में विभाजित यह किताब "विश्व के कालजयी उपन्यास" विख्यात अनुवादक जंग बहादुर गोयल जी का मौलिक लेखन है। यह ना तो अनुवाद है, ना ही इन प्रसिद्ध उपन्यासों का सारांश है और ना ही किसी तरह का पकाऊ या बोझल उपदेशात्मक महाग्रन्थ है बल्कि रचनाकार की इन सत्तावन महान रचनाकारों से एकात्म हो जाने की पवित्र और विराट प्रक्रिया है। यह एक साधना है, तपस्या है जो आसपास से टूट कर इन उपन्यासों के पात्रों, घटनाओं और विचार तंतुओं के साथ दसियों बरसों तक जंग बहादुर गोयल करते रहे हैं। विडम्बना ही है कि एक बेहतरीन अनुवादक होने के कारण पंजाबी साहित्य और हिंदी के कुछ लोग उनके इस मौलिक और अद्भुत काम को भी 'अनुवाद' का ही नाम देने लगे हैं।
"विश्व के कालजयी उपन्यास" भाग-3 की भूमिका में पंजाबी सहित भारतीय भाषाओं के अद्भुत रचनाकार गुरदयाल सिंह ने जो लिखा है, उससे मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ, "जंग बहादुर गोयल की यह तीसरी पुस्तक पढ़ते हुए मैंने यह महसूस किया है कि उसने अपनी इस नई विधा के लिए एक विशिष्ट भाषा और शैली का भी सृजन किया है।", जो बात मैं भाग-1 (जो कि पहले ही पढ़ लिया था) को पढ़ते हुए सोच रहा था, वो ही बात गुरदयाल सिंह जी ने अपने अद्भुत लहज़े में लिख दी। जी हाँ, भारतीय साहित्य की यह एक नई और लाजवाब शैली है। संभवत विश्व साहित्य में भी इस विधा में इतना बड़ा काम पहले कभी नहीं हुआ है। जहाँ तक मेरे निजी विचार है, यह काम अतिमानवीय साहस और श्रम और निष्ठा से ही संभव है, ठीक वैसे जैसे किसी महाकाव्यात्मक ग्रँथ को लिखना। मेरे लिए यह ग्रन्थमाला इसलिए भी महत्वपूर्ण और रोचक रही क्योंकि इसमें विश्व साहित्य के जिन लेखकों को शामिल किया गया है, उनमें से अधिकांश को मैं पढ़ चुका हूँ और बहुतों के बारे में पढ़ चुका हूँ।
हैरान हूं जानकर कि अध्ययन के अपने इस लंबे समयकाल में कोई पाठक किस तरह रचनाओं के पात्रों के साथ घुल जाता है, अभिन्न मित्र बन जाता है कि वो उनके बीच रहता, गुजरता और ग़ुरबत करता हुआ उन्हीं का हो जाता है और फिर बाहरी समाज से संपर्क जोड़कर एक नई विधा में उन्हें फिर से जीवन दे देता है। बहुत मेहनत और तपस्या का काम है। इस अद्भुत और महत्वपूर्ण काम के लिए मैं मेरे आदरणीय और प्रिय रचनाकार जंग बहादुर गोयल सर को हार्दिक बधाई देता हूँ।
० मोहब्बत नामा
(विश्व के महान रचनाकारों के प्रेम प्रसंग पंजाबी में 'मोहब्बत नामा' शीर्षक से)
-" इस काम में कितना समय लगेगा ?" डॉक्टर नैकुआर्ट ने पूछा।
-" छः महीने"
डॉक्टर चुप रहा।
-" छः महीने नहीं, तुम मुझे छः हफ्ते दे सकते हो ?"
डॉक्टर फिर भी कुछ नहीं बोला।
-"कुछ तो बोलो डॉक्टर। क्या तुम मुझे छः दिन दे सकते हो ? इन छः दिनों में मैं बाकि रहे उपन्यासों के कथानकों की रूप रेखा लिख लूंगा और मेरी मौत के बाद मेरा दोस्त गौटिआर उन्हें पूरा कर देगा। वो मुझे और मेरी भाषा शैली को अच्छी तरह जानता है।"
-"ओनेरो, तुम मेरे हाथों में जन्मे हो, मैं बेबस हूँ। मैं झूठ नहीं बोल सकता, बस..... आज की रात निकल जाए, गनीमत है। "
" पता नहीं बाल्ज़ाक को इस बात का इल्म था या नहीं, यह भी नहीं पता कि उसने ऐसा चाहा था या नहीं, पर इन महान रचनाओं का लेखक दुनिया के उन तमाम क्रांतिकारी लेखकों की श्रेणी से सम्बन्ध रखता है जिन्होंने लोगों की सोच में बुनियादी बदलाव पैदा किया है। वो सचमुच एक जीनियस था। " बाल्ज़ाक को दफ़नाते समय विक्टर ह्यूगो के शब्द।
फ़्रांस सहित विश्व साहित्य का एक ऐसा महान लेखक जिससे टॉलस्टॉय और गोर्की तक ने प्रेरणा ली, जिसका बचपन काँटों की सेज था और जवानी अंधेरी गुफा और रंगीनियों का मिश्रण रही। जो तमाम उम्र घर के लिए तरसता रहा। लेखन के लिए अंतिम समय तक सोचते रहने वाले इस महान रचनाकार का अंत इतना भयानक और पीड़ादायक रहा कि पढ़कर आगे बढ़ने की बजाए ठहरना पड़ता है।
जंगबहादुर गोयल जी और सिंह ब्रदर्स का यह काम सराहनीय है। 'मुहब्बतनामा' का हिंदी अनुवाद भी है जो कि आधार प्रकाशन ने छापा है। यह इतनी प्यारी और मलूक सी किताब है कि मन करता है अनुवाद करके राजस्थानी सहित अनेक भाषाओं तक पहुंचाया जाए। राजस्थानी में भी जरूर आनी चाहिए।
( खलील जिब्रान की जीवनी)
- "तेरा अपनी हमजोली से मिलन कब हो रहा है ?" जब मिशलीन ने जिब्रान से पूछा तो उसने कहा
- "ईश्वर के सामने मेरी उससे शादी हो चुकी है। हम दोनों के शरीर पहले ही आपस में जुड़ के एक ऐसे पवित्र संबन्ध का रूप ले चुके हैं, जो शुद्ध प्यार को समर्पित है। मेरी और उसकी आत्मा के तख़्त पर अनश्वर परमात्मा विराजमान है। "
खलील जिब्रान की जीवनी पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी सूफ़ी के जीवन के बारे में पढ़ रहे हैं। उनका चिंतन, दर्शन और प्यार और जीवन के प्रति नजरिया उन्हें किसी महान दरवेश की तरह स्थापित करते हैं। जीवनी पढ़ते हुए लगता है जैसे जिब्रान के जीवन के स्वर्ग, और चिंतन के जंगलों में घूमते हुए उसकी थाह ले रहे हैं। मीशा खुद मिखाइल नईमी है। यह पहेली अब सुलझी है।
यह अद्भुत किताब है। जंग बहादुर गोयल का अनुवाद बेमिशाल है। जंग बहादुर गोयल की अनुवाद के क्षेत्र में यात्रा ना केवल लंबी बल्कि बेहतरीन और उच्च स्तरीय है। इन्होंने अनुवाद की शुरुआत ही चेखव के विश्व विख्यात नाटक 'चेरी की बगिया' का पंजाबी उल्था करके की थी।
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हिंदी में किए गए अनुवाद....
जीवन मदिरा (बाल्जाक के जीवन पर आधारित उपन्यास)
गोर्की के खत
फोमा गार्डयेव,
मक्सिम गोर्की
एलिस मुनरो की कहानियां
खलील जिब्रान (जीवनी अनुवाद हिदी और पंजाबी)
जोरबा द ग्रीक
इश्क नहीं आसां(विश्वप्रसिद्ध लेखकों के प्रेम प्रसंग पर मौलिक किताब)
विश्व के कालजयी उपन्यास ( मौलिक काम जो चार भागों में हैं।)
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पंजाबी में किए गए अनुवाद.....
संसार दे शाहकार नॉवल (4 भाग)
खलील जिब्रान की जीवनी का हिंदी के साथ ही पंजाबी में भी अनुवाद
वाया बठिंडा (उपन्यास)
मोहब्बतनामा प्रेमाख्यान(मौलिक काम)
गैड फ्लाई (हिंदी और पंजाबी, दोनो में)
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