कुकर्म, दुष्कर्म ब्लात्कार और हैवान बनी दुनिया
(...मर गया आदमी, ईश्वर मर गया)
● सतीश छिम्पा
(. और इस सड़े गले मान्यताओं और परम्पराओं वाले सामाजिक ढांचे के बदलाव के लिए, महान बदलाव के लिए सोचते, काम करते हैं वे जो श्रम की परम्पराओं को आगे बढाते मेहनतकश है।)
हाथरस की दिल दहला देने वाली घटना और इस व्यवस्था की मानवद्रोही औकात....
इन खबरों की हैडलाइन देखिए.....
नाबालिक लड़की से सामूहिक दुष्कर्म ... में सरिया..... और तमाम वे जो जीवन को शर्मिंदा कर देती है, वे तमाम दरिंदगी भरी बातें.
(1.) पडोसी ने बच्चे से कुकर्म किया
(2). बच्ची से कुकर्म किया, मार दिया
(3). अधेड़ साधु ने गाय के बछड़े से किया कुकर्म और गांव वालों ने चप्पलों की माला डालकर और मुंह पर कालिख पोतकर पूरे गांव में घुमाया
(4).मन्दिर में साधु ने कुकर्म, बलात्कार किया
(5). मदरसे में मौलवी करता रहा बच्चों के साथ दुष्कर्म, रंगे हाथों पकड़ा
(6). बकरी के साथ कुकर्म, पकड़ा गया
(7). किन्नर के साथ सामूहिक दुष्कर्म
(8) नाबालिक छात्रा से आधीरात में मिलने गए अध्यापक को पकड़ा और कूट कूट कर सिलटां काढ दी
(9). अध्यापक दस साल के बच्चे से कुकर्म करता पकड़ा गया।
(10). कुतिया के साथ कुकर्म
(11) सत्तर साल के बूढ़े ने बच्चे का कुकर्म किया
.......... ये आदमी के भीतर के दरिंदे की दरिंदगी का सांस्कृतिक और सामाजिक प्रदूषण का दौर है। यह समाज खोखला और बदबूदार है। ये जो भाषण या मीटिंग्स में बड़ी बड़ी आदर्श टाइप बातें करते हैं और अपनी संस्कृति को महानता का दर्जा देते हैं, वे झूठे हैं। यह सड़ रहा समाज इनके पूंजीवाद फ़ासिस्ट तंत्र में और ज्यादा बदबु ही फैलाएगा, इसके अलावा कुछ भी सकारात्मक नहीं हैं यहां। फासिस्ट कल्चर में वैसे भी स्त्री को उपभोग की ही वस्तु माना जाता है, बच्चे बोनस। टेलिविज़न में बच्चे से किशोर हुआ लड़का उस समय तक लगभग बीस हजार बर्बर हिंसात्मक सीन देख चुका होता है जिसके कारण उसको वो जीवन का अंग मान लेता है। और फिर भविष्य......... आदमी में ईश्वर है, देवता का वास है, कहीं किसी फूहड़ नैतिकता वाली बेकार किताब में लिखा था, मर गया आदमी, मर गया ईश्वर, देवता ने अपघात कर लिया, बचा है तो बस भेड़िया।
एक बीमार घटिया परंपरावादी अमानुष आदमी , अब आदमी नहीं घटिया जानवर बना है। झुग्गियों से पीड़ितों के आंकड़े नहीं आते वरना यह संख्या भयावह होती। इस देश मे हर रोज करीब डेढ़ सौ बलात्कार और हर एक घण्टे पांच बच्चों के संग दुष्कर्म या दुष्कर्म की कोशिश की जाती है। आरोपी मुस्लिम हो और पीड़ित हिन्दू हो या आरोपी पुजारी हो या पीड़ित मुस्लिम या कोई जानवर हो, तब इन दैत्यों के काम आरोप प्रत्यारोप वाला आरंभ हो जाता है।
आजकाल अखबार की शुरुआती खबर ही इतनी वीभत्स और जलालत भरी होती है कि इन योन कुंठितो को जलाकर मार डाला जाए। अपराधों का दौर बहुत तेजी से कब बढ़ने लगा, उपभोक्तावादी समय मे टीवी और इंटरनेट पर आने वाले मानवद्रोही सीरियल, मूवीज़ और मशहूरी आदि, जिनमे इस तरह की हिंसाओं का खाना भरा होता है। मन्दिर के पुजारी ने बच्चे का किया दुष्कर्म, मदरसे के मौलवी ने किया योन शोषण..... अधेड़ अध्यापक बच्ची के साथ अश्लील हरकतें करता पकड़ा गया, हुई छित्तर परेड।
समझ नहीं आता कि यह हो क्या रहा है। औरत तो औरत यह गिरा हुआ आदमी बच्चों, बच्ची, किन्नर, ट्रांसजेंडर, बूढ़ों, भेड़ बकरियों, जानवर तक को हवस का शिकार बनाता जा रहा हैं। माने या ना माने मगर इस विकृति के कारणों की जन्मदात्री प्रतिबंध जनित कुंठाएं ही होती हैं। पूंजीवादी फासिस्ट व्यवस्था का यह मानसिक रोग उसकी मुख्य आदत है, और अध्यापक वर्ग में बहुत से अध्यापक ऐसे हैं जिन्होंने जाने कितने बच्चें और बच्चियों की जिंदगी नरक बनाई है। मैं ऐसे अनेक अध्यापकों को जानता हूँ जिन्होंने बहुत सी बच्चियों और बच्चों को खराब किया है। पिट भी जाते हैं, मगर बेइज्जती ठरकियों की ठरक के आगे कुछ नही है। इसी वजह से समाज और बच्चे के लिए बाल यौन शोषण कोई नयी समस्या नहीं है। ये देश के हर परम्परागत समाज की समस्या है। ये समस्या इंटरनेट के इस दौर में तो एक सार्वजनिक मुद्दा या बहस तलब जरुरी मुद्दा बन गयी है।
अजीब नहीं खतरनाक समय है... सच्चाई, कुछ नोट्स
बहुत अजीब सी खबरें आ रही हैं इन दिनों, बहुत भयानक,जैसे मनुष्य विकृत हो कर भेड़िया बन गया हो या सहनशीलता कहीं ढकणी में नाक डुबोकर मर गयी हो:-अभी अख़बार पढ़ रहा था:-
"लड़का लड़की घर से फरार, माँ को इंदिरा गांधी नहर में फेंका..."
"छ बच्चों की माँ ने कुंवारे प्रेमी संग आत्महत्या की"
"ताश के भाभी देवर खेल में भाई से हारने पर किशोर ने की आत्महत्या"
"किशोरी ने ज़हर पीकर की आत्महत्या"
"अंधे भाई ने नशे के लिए किया भाई का कत्ल"
"नवविवाहिता घर से फरार"
यह दौर ही ऐसा है जहां सहनशीलता के बजाए पलायन या जीवन को समाप्त कर लेना ज्यादा सुगम माना जाता है। थोड़ी सी तकलीफ या पीड़ाएं इन्हें तोड़ डालती है, यह कौनसा प्यार होता है जिसके चलते छ मासूम बच्चों की भी परवाह नहीं की जाती...... दुनिया, तेरा क्या बनेगा?
(1)
"छ बच्चों की माँ ने कुंवारे प्रेमी संग आत्महत्या की"
प्रेमी प्रेमिका पहले तो किसी दूसरे शहर में बहन भाई बनकर किराए का मकान लेते हैं। साथ रहते हैं। प्यार करते हैं, फिर पकड़े जाने के डर से लड़की द्वारा अपने अन्य प्रेमी से लड़के को बहुत निर्मम तरीके से पिटवा दिया जाता है। सर पर शराब की बोतलें मारी जाती है। पीटा जाता है इतना कि व्यक्ति मर जाता है।
(गंगानगर नर्स वाला कांड।)
(2)
भरतपुर, युवा पुजारी मन्दिर के पीछे गाय के साथ दुष्कर्म करता पकड़ा जाता है। 92 वर्षीय बूढ़ा पुजारी लड़की से जबरदस्ती करता वीडियो में रिकॉर्ड होता है। मदरसा का युवा मौलवी बच्चों के साथ दुष्कर्म करता पकड़ा जाता है। सत्तर साल का बूढ़ा 5 साल की बच्ची का कुकर्म करके मार देता है।
( किशोवय स्कूली लड़कियों के संवेगों का फायदा उठाते हुए स्कूल की ही सात लड़कियों को हवस का शिकार बनाया। पकड़ा गया, जूतम परेड हुई, मुंह बांदर के ढुंगों सा कर दिया गया, मास्टर अब सूरतगढ़ में रहता है।)
(3)
फतेहाबाद (हरयाणा) में तीस वर्षीय बहु ससुराल में ही देर रात को नारनोल के पुलिस कर्मी के साथ नग्न पकड़ी जाती है।
जवाई और सासु फरार, शादी करके लौटे।
(4)
लड़का अपनी प्रेमिका के साथ भागकर शादी करता है। कुछ महीने साथ रहता है फिर जब वो गर्भवती होती है तो उसे अकेली छोड़कर भाग जाता है।
(5)
प्रेमी को कॉल करके प्रेमिका रात को अपने घर मे तब बुलाती है जब घर के सारे लोग सो जाते हैं। एकांत में, तूड़ी वाले कोठे में सेक्स करते हुए पकड़े जाते हैं। प्रेमी भाग जाता है और लड़की ईंट मारकर अपनी माँ का सर फोड़ देती है।
(6)
लड़का रात को लड़की से मिलने जाता है। घरवालों को पता चल जाता है, लड़की कहती है उसका बलात्कार करने आया है और लड़के की धुलाई होती है। तोड़ दिया जाता है जगह जगह से और पूरे सही डेढ़ महीने बाद वो साठ वर्षीय बूढ़े के साथ पकड़ी जाती है।
(7)
आकंठ प्रेम के डूबी लड़की को उसका प्रेमी किसी सुनसान जगह पर बुलाता है। बॉडी प्ले से होते हुए मिलन तक पहुंचने का सब कुछ वीडियो में वो लड़का रिकॉर्ड करता है। किन्हीं अंतरंग क्षणों की वीडियो बना लेना इधर बहुत आसान हो गया और लड़की को ब्लैकमेल करना और फायदा उठाना आम हो गया है। और यही कुछ लड़कियां झूठे रैप केस, दहेज केस के बल पर चालीस पचास लाख ऐंठने के प्रयासों में कई बार असफल होकर, बेइज्जत हुई है। दहेज केस सौ में से इक्का दुक्का ही सही होते हैं। जाने कैसे किसकी सिखलाई पर यह चरसा चल पड़ा है।
(8)
साठ साल का ससुर पुत्रवधु का बलात्कार करता है।
बूढ़ा बेटी की सहेली का ब्लात्कार करता है।
(9)
बहुत समय तक अंतरंग बातचीत करने के बाद अपने msg डिलीट करके लड़के के मैसेज का स्क्रीन शॉट। लड़का ठरकी घोषित।
ये हकीकत है हमारे आस पास की, प्रदूषित सोच का यह कड़वा सच है।
यह दौर अविश्वसनीय और भयानक है जहां सम्बंधों और सम्वेदनाओं की कोई जगह नहीं है। पूंजीवादी, फासिस्ट क्रूर साम्प्रदायिक व्यवस्था का परिणाम।
अजीब नहीं खतरनाक समय है... सच्चाई,
ये हकीकत है हमारे आस पास की, प्रदूषित सोच का यह कड़वा सच है।
यह दौर अविश्वसनीय और भयानक है जहां सम्बंधों और सम्वेदनाओं की कोई जगह नहीं है। पूंजीवादी, फासिस्ट क्रूर साम्प्रदायिक व्यवस्था का परिणाम।
(१.) प्रेमी प्रेमिका दूर दराज के किसी दूसरे शहर में रहते हैं। भाई और बहन बनकर किराया का कमरा लेते हैं। साथ रहते हैं। पूरा एन्जॉय करते हैं। कर ही रहे होते हैं कि लड़की का एक अन्य प्रेमी अचानक जाने कैसे पहुंचता है वहां और दे दनादन दे, दे दनादन दे..... रेल बना देता है। मकान मालिक केस करवा कर कमरा खाली करवाते ही भगा देता है।
(.२) बहुत खतरनाक समय मे बर्बर ख़ौफ़नाक और बहुत अजीब सी खबरें आ रही हैं। वीडियो रिकॉर्डिंग्स कितना घटिया खेल हो गया है। किसी का भी विश्वास जीतकर उसको आसानी से बर्बाद किया जा सकता है। इन दिनों यही तो हो रहा है। यह सब बहुत भयानक,जैसे मनुष्य विकृत हो कर भेड़िया बन गया हो या सहनशीलता कहीं ढकणी में नाक डुबोकर मर गयी हो। रात देर गए वीडियो आया। खोलकर देखा, "यह वही लड़की थी जिसने मुझे अपनी किताबों की चॉइस के कारण बहुत प्रभावित किया था। संभोग तो नही कहा जा सकता क्योंकि एक बड़ी उम्र लड़का उसका उससे जबरदस्ती सेक्स संबंध बनाते समय उसको बहुत बर्बरता से पीट रहा था। थप्पड़, मुक्के मारना और बालों को खींचना..... अप्रकृतिक मैथुन करते समय उसकी पीड़ा भरी लेलड़ी को सुनते हुए हंस हंस कर मजाक उड़ाना और फिर मुक्कों पर मुक्के, थप्पड़ दर थप्पड़.......
- "तुम शिकायत करो इसकी यह दरिंदगी है।" सवाल का जवाब जब उसने यह कहकर दिया, "अरे यार मैं प्यार करती हूँ उससे, वो भी करता है मुझसे।" वीडियो उसी समय डिलीट कर थी थी
-"लक्ख लाहण्ता तेरे पर....." मैंने कहा मगर मैं उसकी आँखों मे छुपी लाचारी साफ देख पा रहा था। वो दबी हुई थी किसी भार, अनचाहे बोझ तले.....। निकल जाएगी इस नरक से, जाने कैसे मुझे यह यकीन हुआ।
(३.) आकंठ प्रेम के डूबी लड़की को उसका प्रेमी किसी सुनसान जगह पर बुलाता है। बॉडी प्ले से होते हुए मिलन तक पहुंचने का सब कुछ वीडियो में वो लड़का रिकॉर्ड करता है। किन्हीं अंतरंग क्षणों की वीडियो बना लेना इधर बहुत आसान हो गया और लड़की को ब्लैकमेल करना और फायदा उठाना आम हो गया है। बहुत सी जिंदगियां बर्बाद हुई है इस कपटी खेल के कारण।
इसमे लड़के ही नही बहुत जगहों पर लडकियां बहुत क्रूर होती है। वे भी ऐसे कांड की जिम्मेदार होती हैं।
और यही कुछ लड़कियां झूठे रैप केस, दहेज केस के बल पर चालीस पचास लाख ऐंठने के प्रयासों में कई बार असफल होकर, बेइज्जत हुई है। दहेज केस सौ में से इक्का दुक्का ही सही होते हैं। जाने कैसे किसकी सिखलाई पर यह चरसा चल पड़ा है।
(४.) भयानक, वीभत्स था रात यू ट्यूब पर चल रहा वीडियो, बहुत छोटी लगभग तीन या चार साल की लड़की को नग्न करके उसके ऊपर लेटकर कुकर्म का प्रयास करता एक विकलांग बूढ़ा- प्रयास कर ही रहा था कि एक व्यक्ति किसी देव पुरुष की तरह वीडियो बनाते हुए ही आया, ""क्या भाई, क्या चल रहा है यह। बोल चल क्या चल रहा है।".... बूढ़ा विकलांग घबराकर उठता है- बच्ची को कच्छी पहनाकर खुद कपड़े पहनते हुए गिर जाता है..... वीडियो खत्म यहां, अब आगे क्या है अंदाजा लगाया जा सकता है।
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बाल यौन उत्पीड़न
● सतीश छिम्पा
जागो लोगों जागो, जागो वरना बच्चों को तरस जाओगे..... बाल यौन उत्पीड़न, कुकर्म, दुराचार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं बच्चे बाल यौन शोषण एक कभी ना भूले जाने वाला दुखांत है। ग्रामीण (खासकर मरुथल की ढाणी) में कोई ना कोई किशोर किसी न किसी बच्चे से या तो दुष्कर्म करता मिल जाएगा या इसी तरह की अन्य यौन क्रियाओं में लिप्त मिलेंगे। पकड़े जाने पर गुस्से तीन चार थप्पड़ और क्षणिक गुस्से वाला व्यवहार और फिर उसके बाद सब कुछ सहज, यही सबसे बड़ी गलती है। हमे समाजिक रूप से परम्परागत कचरा और घटिया आदर्शवादी बीमार परम्पराओं को खत्म करने की जरूरत है। हमे जरूरत है सावचेती और जरा से खुलेपन की, आज के समय मे सबसे ज्यादा जिनका योन शोषण हो रहा है वे बच्चे हैं, उनमे भी ज्यादा संख्या लड़को की रहती हैं। और योन शोषण की सफल या असफल कोशिशें करने वाले ज्यादातर किशोर होते हैं और उनके बाद ज्यादातर बूढ़े बुजुर्ग। और इनमे से भी जो सबसे ज्यादा इस कुकर्म को अंजाम देते हैं वे घर के ही सदस्य होते हैं, खसकर संयुक्त परिवार के और उनके बाद आस पड़ोस या रिश्तेदार या स्कूल के अध्यापक। गांव और ढाणियों में इसका आंकड़ा सबसे ज्यादा भयावह है। इस तरह के मुद्दों पर बात करते समय अक्सर लोग मुझे बुरा भला कहते हुए गरियाने से नहीं चूकते हैं क्योंकि उनका प्यारा वर्गिय और जातीय समाज उनकी नज़र में आदर्श जो हैं। यह सच्चाई है, बहुत खारी, जहरीली सच्चाई कि उत्तर भारत के परम्परागत ग्रामीण समाज मे प्यार के लिए बिल्कुल भी नहीं मगर सेक्स, जबरन, रजामंदी और एक के ही नहीं बल्कि अनेक बनाने के लिए जोरदार खुलापन है। सेक्सयूएल बंदिश के ही कारण यह एक बड़ा और अजीब आंकड़ा पैदा हुआ है कि विश्व मे सबसे ज्यादा समलैंगिक भारत मे निवास करते हैं।
सबसे ज्यादा जो प्रभावित हैं वे हैं चार वर्ष के लेकर सोलह वर्ष तक के बच्चे जो कुकर्म की सफल या असफल कोशिशों के सहज शिकार होते हैं। कुछ खुद भी इसको दबाव और अंकुशों के कारण पसंद करने लगते हैं। ये वे हैं जो किशोरावस्था की तूफानी उम्र में पहुंच चुके होते हैं और घर मे हस्तमैथून से लेकर समलैंगिक संबन्ध तक बनाने शुरू कर देते हैं, इसका भी कारण बंदिशें हैं जिसके चलते योन रुचियाँ विकृत हो जाती हैं। प्यार और सहवास के लिए इस तरह के कड़े नियम खतरनाक और आत्मघाती होते हैं। स्कूल की बड़ी कक्षाओं की बालिकाओं के यौन शोषण में सबसे ज्यादा लिप्त होते हैं अधेड़ अध्यापक। कामी अय्यास लोग हर तरह के दुराचारी हो जाते हैं। इस उम्र में (किशोरावस्था) बच्चो की ज्यादा सार सम्हाल की जरूरत है। यह कड़वी मगर ठोस हकीकत हैं कि बच्चे आज अपने घर मे भी सुरक्षित नहीं हैं। और सामाजिक नजरिया इस तरह का घटिया होता है कि समाज की नज़रों में बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और शोषण की बातें अगर घर या स्कूल की चारदीवारी में ही रहे तो अच्छा हैं। ऐसी सोच बहुत ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि इज्जत खराब ना हो जाए के भय से यह सब जारी रहता हैं। बाल यौन शोषण का सामना किया जाना सामाजिक कुकृत्यों में से सबसे ज्यादा उपेक्षित और हल्की ली जाने वाली आम बात टाइप बन चुकी है क्योंकि चिंता बस इज्जत की ही है। इसे नज़रंदाज़ करने के करण भारत में बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। इस प्रकार की घटनाओं के विभिन्न आयाम हैं जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है। बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है। शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसे मामलों को बहुत हलका माना जाता है।
जब भी कोई किशोर वय बच्चा बाथरूम में जरूरत से ज्यादा समय लगाने लग जाए या गुमसुम रहने लगे या वो छोटे बच्चों के पास रहने की ड्यूटी के लिए ज्यादा लालायित हो तो उस पर नज़र रखी जानी चाहिए और जब इस तरह के बदलाव आपके बच्चे में आ रहे हो तो घर के बूढ़े और अन्य जो भी हो उनके साथ अकेला कभी मत छोड़िए। किशोर वय लड़की अगर स्कूल के किसी बूढ़े या जवान या अधेड़ अध्यापक के यहां ट्यूशन या एक्स्ट्रा क्लास की बात करे तो सावधान हो जाना चाहिए। सिर्फ लड़कियों का ही नहीं यह उन लड़कों के मामलों में भी होता है जो अपने परिवार और माता-पिता के साथ इस खतरनाक मगर जरूरी विषय को बेकार मान लिए गए कृत्य पर बात करने के लिए सक्षम नहीं हैं।
ये पूरे समाज की मानसिकता है जो बुरे लोगों को प्रोत्साहित करने का काम करती है। कुछ लोग मासूम बच्चे के दिमाग में बैठे डर का लाभ उठाते हैं, वो बेचारा मासूम बच्चा/बच्ची जिसे यौन उत्पीड़न के बारे में कोई जानकारी नहीं होती वो दिन प्रतिदिन इस का शिकार होता है। खासकर किशोर हो रहे बच्चे, वीर्य निर्माण की प्रक्रिया शुरू होते ही वे पहले स्वप्नदोष के साथ ही हस्तमैथून को व्यहार में लाते हुए अकेले समय बिताना ज्यादा पसंद करने लगते हैं। टीवी या कहीं भी कामुक दृश्य देखते ही बाथरूम में भागते हैं ताकि उसी सीन को सामने रखकर हस्तमैथून कर सके, इस बदलाव पर सबसे ज्यादा पैनी नजर बूढ़े ठरकी कामी दैत्य रखते हैं, वे अपनी हवस का शिकार इसी तरह के बच्चों को बनाते हैं। उसके बाद परिवार को इस तरह के बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, सेक्स और मानव शरीर की जरूरतों को समझते हुए इन प्राकृतिक बदलावों पर खुलकर बात करते हुए समाधान तलाशना चाहिए।
मैं ऐसे अनेक अध्यापकों को जानता हूँ जिन्होंने बहुत सी बच्चियों और बच्चों को खराब किया है। पिट भी जाते हैं मगर बेइज्जती ठरकियों की ठरक के आगे कुछ नही है। इसी वजह से समाज और बच्चे के लिए बाल यौन शोषण कोई नयी समस्या नहीं है। ये देश के हर परम्परागत समाज की समस्या है। ये समस्या इंटरनेट के इस दौर में तो एक सार्वजनिक मुद्दा या बहस तलब हो चुकी हैं। यह एक जरुरी मुद्दा बन गयी है।
घर की महिलाएं इस स्थिति के बारे में सबसे ज्यादा जानती हैं मगर वे परबस होकर कुछ बोल नहीं पाती हैं। जहाँ तक इस सड़े गले समाज का संबंध है, ये विषय अभी भी चर्चा के लिए वर्जित है। गाँवो में तो यह एक नशा बनकर उभरा है क्योंकि इस मुद्दे को घर की चारदिवारी के ही अन्दर रखने के लिये कहा जाता है सभी इससे वाकिफ भी होते हैं। गांव के झोलाछाप डॉक्टर और अध्यापक और स्वस्थ तंदुरुस्त बूढों के पास किसी भी बच्चे या बच्ची को सीधे ही निश्चिंत होकर नहीं देना चाहिए, नज़र रखी जानी जरूरी हैं।
ऐसा नहीं है कि हम लोग जो लिख रहे हैं, महान हैं, इस तरह की महानताएं किशोरावस्था में खूब भटकती रही हैं। धार्मिक और नेमी धर्मी परिवारों को इस बीमार आदर्शवाद के बीमार और इस तरह का पाखंड छोड़कर इस पर ध्य्यन देना चाहिए नहीं तो जाने कब उनकी औलादें अप्राकृतिक हैबच्युअल हो जाएंगी, पता नहीं चलेगा।
इन मामलों में हमेशा ज्यादातर अपराधी, पीड़ित का कोई जानकार और पीड़ित के परिवार का जानकार या पीड़ित का कोई करीबी ही होता है। इस निकटता के कारण ही अपराधी अनुचित लाभ उठाता है, क्योंकि वो जानता है कि वो किसी भी तरह के कुकर्म से माफ़ी मांगकर निकल जाएगा। बच्चों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और रेप की घटनाएं कोई नई नहीं है. दुखद बात ये है कि इस तरह की घटनाओं के शिकार बच्चों के आरोपियों में अधिकतर लोग जान पहचान के होते हैं। घरों में रहने वाले होते हैं। अपने पारिवारिक संपर्क, दोस्त या पाडोसी नाते रिश्तेदार में से होते हैं। इनकी पहचान बस यही है कि ये उन बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा अकेले रहना पसंद करते हैं।
जागो लोगों जागो, जागो वरना बच्चों को तरस जाओगे.....
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