लहू लाल होता है, सुर्ख़ लाल -


लहू लाल होता है, सुर्ख़ लाल... 
                                     
                   ● चयन और अनुवाद:- सतीश छिम्पा

     (अमर शहीद कॉमरेड अवतार सिंह पाश का खत अपने बहनोई हरशरण उर्फ धीदो गिल के नाम सन 1984, और डायरी और पाश की सर्वाधिक चर्चित इंकलाबी कविता और बेटी विंकल संधू का  अपने पिता शहीद कॉमरेड अवतार पाश के लिए उनके जन्मदिन पर पहला ही रचाव......)

जनवरी 1982

" वो मेरा वर्षों को झेलने का गौरव देखा तुमने
इस जर्जर शरीर में लिखी
लहू की शानदार इबारत पढ़ी तुमने
कविता हो ना हो

लेकिन इतिहास को यूँ साँस लेते हुए
मृत शरीर की ज़िंदा लोथ के साथ
मात्र शरीर के धागे से जुड़ा होना, देखा तुमने "

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27 दिसम्बर 1971
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11 अगस्त 1972  (डायरी, पाश)

" मैं सोचता हूँ, रूस में अगर कोई लेनिन ना होता तो वहां गोर्की का पैदा होना बिलकुल ही असम्भव था। घटनाओं को संतुलित रखकर समय को आगे बढ़ाना किसी बहुत महान सियासतदान का काम है। और अगर समय ऐसे ना बढ़ता तो गोर्की की मनुष्य मात्र की अच्छाई प्राकृतिक सी होकर रह जाती।
      भारत में नए लेखक गोर्की से मिलते जुलते नाम रखने की कोशिश कर रहे हैं, पर यहां लेनिन कहाँ हैं। लेखक आखिर समय का पैर भी नहीं उठा सकते हैं। मनुष्यों को मुहब्बत करना बहुत मुश्किल है और इससे सुंदर कुछ भी रचा नहीं जा सकता।"




मध्यममार्गी सेक्युलरों के लिए पाश की कविता

माशूकाओं को खत लिखने वालों
अगर तुम्हारी कलम की नोक बांझ है
तो कागजों का गर्भपात मत करो

बंदूक वालों
या तो बंदूक का मुंह दुश्मन की तरफ कर दो
या अपने आप की तरफ

तारों की तरफ देखकर क्रांति लाने की बात कहने वालों
क्रांति जब आई तो तुम्हे भी तारे दिखा देगी

बंदूक वालों
या तो बंदूक का मुंह दुश्मन की तरफ करलो या अपने आप की तरफ

क्रांति कोई खेल नहीं
नुमाइश नहीं
मैदान में बहता दरिया नहीं

क्रांति तो दो सभ्यताओं 
दो संस्कृतियों, दो रुचियों
दो वर्गों का दरिंदराना भिड़ना है
मारना है या मरना है
मौत का डर खत्म करना है

आज वारिश शाह की लाश  
कांटों वाली थोर बनकर
समाज के शरीर पर उग आई है

उनसे कह दो
ये युग वारिश शाह का नहीं वियतनाम का है
हर गली, हर खेड़े हर क्षेत्र में हकों के संग्राम का है

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मेरे पिता :- विंकल संधू
                               
                       ● हिंदी अनुवाद सतीश छिम्पा

     ( सभी सुधारो के बाद अब अपडेट किया गया है....सभी साथियों के सूचनार्थ- विंकल की इस लिखत को जिसको रात तमाम गलतियों के साथ लगते हुए सुबह दुबारा लगाने की बात कही थी जो अब अपडेट कर दी गई हैं.... अमर शहीद कॉमरेड पाश की यादों को इंकलाबी सलाम.....)

    अमर शहीद पाश की बेटी विंकल ने पहली बार लिखा है पाश पर .... अमर शहीद कॉमरेड पाश को इंकलाबी सलाम, सलाम लाल सलाम  
       
         "उसके छोटे हाथों से केक काटना मुश्किल हो रहा था। वह मोमबत्तियों को देखकर हैरान थी, पहले जलाया और फिर चमक गई। विंकल एक साल की ही तो थी। पैंतीस साल पहले, पाश ने अपनी बेटी के पहले जन्मदिन के लिए अपनी डायरी में एक प्रविष्टि की। कुछ महीने बाद, वह इस तरह से इनको कलात्मक रूप से ले रहा था, कि विंकल जो जो शब्द उच्चारित कर रही थी को अलग ढब से बोलना शुरू कर दिया। उसने इसे "मनुष्य भाषा" की ईमानदारी कहा। 9 सितंबर को पाश के 70 वें जन्मदिन से पहले विंकल संधू - जो उस समय   सात साल की थी जब पाश शहीद हुए ।
  ( पाश और बेटी विंकल )

     उस  खतरनाक समय मे हर बात नकारात्मक मगर भयानक रूप से हावी हो रही थी। 23 मार्च, 1988 को, बुधवार को मेरे पिता की हत्या खालिस्तानियों के एक समूह ने कर दी (K C F, खालिस्तान कमांडो फोर्स, जिसका मुखिया सुक्खा सिपाही उर्फ लाभ सिंह था। हत्या की जिम्मेदारी कत्ल के चौथे दिन ली गई। इसके 2 महीने बाद ही लाभ सिंह मारा गया- अच्छा बुरा जो हो लकिन जाते जाते ईमानदारी दिखा गया, क्योंकि लाभ सिंह की जेब से मिली डायरी में जो 1995 में ऑस्ट्रेलिया में छपी थी में वो अफसोस और स्वीकारोक्ति के साथ लिखता है कि इंकलाबीयो के कत्लों ने लहर को उखाड़ दिया.... नॉट- उक्त बात अनुवादक सतीश छिम्पा की लिखी हुई है ताकि बात स्पष्ट हो जाए।) हालांकि, वे कभी भी  पाश के उस महान जीवन पक्ष को ना जान ही पाए और ना ही उनको छू पाए, लोक लहर का हिस्सा बने उनके किरदार की महानता और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को समझना असंभव था उनके लिए, तो जान नही पाने का सवाल ही नही उठता। उनका रचाव, अवदान विचारधारा और कविता। 

32 वर्षों से, मेरे पिता लोगों के दिलों में जीवित हैं और उनको जुल्म के विरुद्ध प्रेरित करने वाले उत्प्रेरक की तरह बस रहे हैं। 

    पाश के बारे में कुत्सा प्रचार जो किया जाता रहा है उसको अनदेखा करते हुए विश्विद्यालय में उन पर शोध  पीएचडी भी करवाने की शुरुआत हुई है, ना केवल शुरुआत बल्कि उनके लिखे के साथ ही साथ किरदार को जानने के लिए युवाओं का हुजूम उमड़ता है। आज भी, उनकी कविता युवा लोगों के जीवन को राह दिखाते हुए बदलती है और युवा पुरुषों और महिलाओं को उनके नक्शेकदम पर चलने के लिए प्रेरित करती है। कहने की जरूरत नहीं है, मुझे इस क्रांतिकारी, शक्तिशाली, प्रभावशाली, प्रगतिशील और साहसी कवि की बेटी होने पर गर्व है!
     (पाश की  बेटी विंकल )

मेरा जन्म जनवरी 1981 में तलवंडी सलेम (जालंधर) के एक छोटे से गाँव में हुआ था। यह एक ऐसा समय था जब लोग बेटी के जन्म पर आंसू बहाते थे। लेकिन यह मेरे पिता थे - इस दुनिया में मेरे आने का जश्न मनाने, हमारे गाँव में सभी को मिठाई बांटने और स्पीकर पर ज़ोर से संगीत बजाने का! कई लोग उसकी खुशी पर आश्चर्यचकित थे, लेकिन उनके लिए केवल यही बात नही थी, वे मानव जीवन के उजास की उच्चता से भली तरह परिचित थे और यह कि बेटी को जन्म देने की सुंदरता, आकर्षण और मूल्य को कोई कमतर दिमाग नही बल्कि महान किरदार ही होते हैं जो अक्सर उसके मूल्य को समझता है और वह अपने परिवार के लिए क्या लाती है।

मैं सात साल की थी जब यह हादसा (अमर शहीद इंकलाबी कवि अवतार सिंह पाश की हत्या 23 मार्च 1988ई. को हुई) हुआ था। यह सच है कि मुझे पहले इस बात का अहसास नही था, उनके किरदार की गरिमा की क्लासिक सच्चाई, छवि मुझे पहले नही पता थी मुझे एहसास नहीं हुआ कि पंजाब  के लिए ही नही उससे भी कही बहुत आगे तक पापा की यह शहादत कितना बड़ा रिक्त स्थान बना गई थी- कितना गहरा नुकसानदेह था। मुझे पता था कि मैं कभी भी अपने पिता की बाहों में नहीं चढ़ पाऊंगी या उनकी आवाज भी नही सुन सकूंगी। धीरे-धीरे, यादें भी फीकी पड़ गई होती, मगर दादा, मां, परिवार, मुझे उनके किरदार से जोड़ते रहे हैं। जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मेरे परिवार ने मुझे यह समझने में मदद की कि वह (पाश ) एक महान कवि, इंकलाबी व रचनाकार और जिंदा सोच के युवा थे। मेरी चाची पम्मी और राजिंदर, अजीत और सुच्चा, मेरी माँ, मेरी दादी और मेरे पिता के सबसे अच्छे दोस्त - सुरिंदर धनजल, चमन लाल, सुखविंदर कंबोज और अमरजीत चंदन, कुछ नाम बताने को और जानने के लिए उन्होंने मुझे उनके मतलब, ध्वन्यार्थ और उद्देश्य बताए कि वह क्या थे। और मुझे आज लगता है कि भले ही वह यहां नहीं है, लेकिन मैं उन्हें जानती हूं। मैं अपने दादा, मेजर सोहन सिंह संधू की हमेशा ऋणी हूं, जिन्होंने पिताजी की कमी का अहसास नही होने दिया, महान किरदार  थे। पिताजी की मृत्यु के बाद, वे मेरे जीवन के पालनहार बने थे।
      (जेल में बंद पाश, सन 1973 ई.)

 पिछले तीन दशकों में, सभी लोग मेरे पिता के प्रति अपने प्यार और प्रशंसा को व्यक्त करने के लिए हमारे पास आए हैं। यादें ताजा जो बार बार और हर बार होती गई। कई बार जब मैं तलवंडी सलेम में वापस जाती हूं, तो मेरे घर में रहने, खेत को देखने और उनको महसूस करने तक ही नही बल्कि गांव, और खेत और जीवन से प्यार करने  और उसके बारे में लिखना। एक सहज सरल पेंडू जीवन जीने के लिए लालायित कर देने वाली एक खुशी है। मैं अपने बच्चे के साथ इतने सारे पल साझा करने का इंतजार नहीं कर सकती।

 दुनिया भर में जितने भी कविता समारोह में मैंने कभी भाग लिया है, उनमें पाश हर समय हर जगह वैचारिक उपस्थिति रहती है। इसके लिए एक उनके पाठक भी समर्पित है,। पाश हमेशा ही जीवन के प्रेमी की तरह, शब्दों के किसी अनुयायी की तरह, स्वतंत्र और क्रांतिचेता या कहें नास्तिक तो थे ही अति भावुक व्यक्ति थे।, मुलायम भाव भी उनमे रहे है कि जो अपनी कविता से जुड़ना और उसके नक्शेकदम पर चलना चाहता है। अंतर्राष्ट्रीय पाश मेमोरियल ट्रस्ट और दुनिया भर के रेडियो और टीवी चैनलों जैसे संगठन पिताजी (पाश) की कविता को जीवित रखने में मदद करते हैं।
 जैसे-जैसे साल बीतते हैं, मैंने अपने दादा की जगह अपने बच्चों को पढ़ाया है, अरमान और इनायत ने अपने दादा के बारे में बताया और यह सुनिश्चित किया कि वह जानता है कि वह वास्तव में कौन था, उसका महत्व, और दुनिया को पढ़ने और अनुभव करने के लिए उन्होंने एक शक्तिशाली कविता को पीछे छोड़ दिया है।

पाश की पहचान उसकी कविता है। उसके लिए अनुयायी नही बल्कि साथी, दोस्त और हमदर्द है जो ऊर्जा उनकी कविताओं की उर्जा है, नास्तिक और भावुक व्यक्ति है जिनकी कविताओं और जीवन के कारण हर कोई उसके साथ जुड़ना चाहता है और उसके नक्शेकदम पर चलना चाहता है। यहां तक की पाश यादगारी ट्रस्ट जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थान और दुनिया भर के रेडियो और टीवी चैनल। उन्हें जीवित रखने में मदद करते रहे है।

 जैसे-जैसे साल बीतते गए और मैंने अपने पापा की जगह दादा को पाया , अरमान और अनात ने अपने नाना के बारे में जाना कि वे पाश नाम के महान आदमी थे।  
 अगर वे आज जीवित होते, तो मुझे लगता है कि मेरा परिवार इस जीवन से हटकर कुछ अलग जीवन जी रहा होता, लेकिन मैं उनके शब्दों और विचारधारा से परिचित होने की कड़ी में उसको जीवन मे ढालकर जीने की पूरी कोशिश करती हूं।

पापा की बहुत सी कविताओं ने मेरी जिंदगी के बहुत से मुश्किल हालात में, अगवाई करते हुए मुझे हौसला दिया है। मैं हमेशा उनकी शुक्रगुज़ार रहूंगी। उन्होंने मुझे उस औरत का रूप दिया है, जो मैं हूँ। उन्होंने मुझे और मेरी माँ को उन वचनों द्वारा जीने की हिम्मत दी हैं।
    उनका (पाश) का एक पोट्रेट मेरी बैठक वाले कमरे में लटकता रहा है - जिसके बिल्कुल पास ही 'सब से खतरनाक' कविता पोस्टर है। मुझे महसूस होता है कि वो हर रोज हमारी तरफ देखते हैं। शायद यह सुनिश्चित करते हुए कि हम  कहीं अपने सपनो का कत्ल तो नही करने दे रहे हैं किसी को। अभी जब हाल ही एक मुश्किलों भरी चुनौती का मुझे सामना करना पड़ा तो यह कविता मेरे पँखो तले हवा बनकर आई थी। पाश की कविता विनम्रता और ऊर्जा, रोजी-रोटी और उम्मीद देती है कि अगली पीढ़ी इसको अपने आप मे एक दीठ या मार्गदर्शन दे सके, इतनी ओजस्विता और विचारधाराक हौसले से भरी कविता को मान्यता रूप स्थापित रहना जरूरी हो जाता है।

 (पंजाबी कथाकार वरयाम संधू (कैनडा)
   अमरजीत चंदन (पंजाबी कवि, इंग्लैंड)
   दर्शन खटकड़, (पटियाला)
    अवतार पाश
   जसवंत खटकड़
  ( अमृतसर, सन 1973)
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