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शेखर की प्रेम कहानी ........फिर कब आया दिसम्बर ?
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●सतीश छिम्पा (सूरतगढ़, राजस्थान)
मैदानों से उठकर हवाएं जब शहर के सूनेपन में रंग भरने की नाकाम कोशिश कर रही थी। बिलकुल तभी उम्र के दरख्त से एक ख़्वाब टूटकर रात की काली मांग में समा गया। मैंने देखा तुम निश्चिन्त, अबोल, खुद में ही खोयी सी मेरे साथ साथ चली जा रही थी। बीते मौसमों की धानी कहानियां तुम्हारे टॉप के रंग में घुलकर अपनी तन्हाईयों का उल्हाना देने लगीं थीं। कॉलेज में आज काफी भीड़ थी। अलग अलग रंगों में आज बी.ए के आखिरी दिन का जश्न मनाया जा रहा था। सफेदे से एक पत्ता टूटा और शून्यता में मिल गया।
"रात तुम आये क्यों नही ?? हम लोग खाने पर इंतज़ार करते ही रह गये" तुम बोल रहीं थी.....सुन मैं कुछ भी नहीं सका। हमेशा तो ऐसा नहीं होता। शब्द निकलने से पहले ही मैं तुम्हारे होटों से चुरा लेता था।......पर..आज.....आज.....ये क्या हुआ..... मुझे कुछ समझ मे नहीं आ रहा था। एकाएक जैसे दिल डांवाडोल हुआ जा रहा हो। चूमना चाहता हूँ, तुम्हारे होठों को, बहुत गहरे और सघन। भीड़ थी, चूम नहीं पाया और यह इच्छा कविता में ढाल ली।
जिसने छुआ होगा इस धरती पर
सबसे सुंदर, मुलायम और तिलिस्मी स्त्री अधरों को
अपने होठों से
पुरुष वह
दिनों तक रहा होगा
मद में मदमाता हुआ
नश्याई रंगों में रँगीजता पूर्ण पुरुष रूप में।
एक जैसे तासीर वाले दिन की तरह बीतता है, मेरा हर एक दिन। खाली दिन भी मेरे लिए उठा- पटक, भटकावों, व्याधियों, बेचैनियों और असंतुष्टि के साथ- साथ किरच भर सुख, और अकेलेपन से भरा रहता है। कितना मुश्किल है आत्मसाक्षात्कार। उफ्फ, जाने दो।
आज दिन हमेशा से ज्यादा गर्म है। नमी उमस, दम जैसे घुटा जा रहा हो। वो सामने जाने किसके साथ बात कर रही थी ;- जो अभी अभी आया है। तुम उमंगो से भरी मुस्कुराकर लौट रही थी, खिली खिली।
-"जय श्रीराम....'' मैं चौंक गया। मतलब ?? और मतलब जानकर सब कुछ बेमतलब हो गया। बहुत कुछ जो अभी घटा नहीं है, घटने वाला है, अंदेशा हो गया था। चल हट ढब्बू साला।
हिंदुत्व, फासीवाद के भेड़िए पर चढ़कर सत्ता, देश को बर्बाद करने में लगी है। साहित्यकार बुद्धूजीवी पंगु हो चुके हैं। देश को पहली बार गंदगी की गहरी खाई में जाते देखना, बहुत बुरा लग रहा है। जनता पर हो रहा अत्याचार देखकर ब्रिटिश भारत का हाल अपने आप ही समझ आने लग गया है। यह सच्चाई है कि इस देश को बनाने में अकेले किसी हिन्दू का हाथ नहीं है, मुस्लिम, सिख और तमाम धर्मो के लोगो का भी कोई हाथ नहीं है। जो है वो सब का सब बिल्कुल समान रूप में मजदूरों का बराबर खून और पसीना लगा हुआ है।
भावनात्मक रूप से दिन बड़े भारी बीत रहे है। बहुत बार हम लोग भावुक शान्त से मन के साथ किसी पूंजीपति धनपशु को मनुष्य मानकर उससे प्यार करने लगते है जबकि वो इस लायक नहीं होती कि उसको प्यार किया जाए या उसके साथ मानवीय व्यवहार किया जाए। उस एक मानसिक बीमार, संक्रमित दंभी व्यक्ति से संबन्ध जोड़ने से बस एक ही फायदा होता है, वह ये कि उस जिनावर के कारण मनुष्य और मनुष्य की खाल में छिपे भेड़िया की पहचान करना व्यक्ति सीख जाता है। इस उजाड़ मगर सुनसान भी जहां मैंने असंख्य ऐसे अनुभव लिए जो मेरे लिए बिल्कुल नए और रोमांचकारी थे। अनेक यात्राएं और अध्ययन के लिए बेहतरीन किताबें।
नस्तास्या ने कहा था "अंदेशा इंसान को खत्म कर देता है।" लेकिम मुझे कैसा अंदेशा था। तुम्हारे चले जाने का ? समय की कमजोरी का कालिख बन जाना, क्या अंदेशा था ? कमजोर पलो में टूटा हुआ मैं, एकदम बिखरा हुआ मैं, क्या यह पतन था। मैं रात भर जागता हूँ।
वो 25 दिसम्बर की दोपहर थी।.... कॉमन रूम
का दरवाज़ा बंद था। पंखे की आवाज़ भारी होती साँसों को दबा रही थी। तुम्हारे चेहरे के गुलाबी रंग पर
आब्शायी मौसम खिले थे। चश्मे के पीछे से.झांकती आँखे न जाने क्या कहना चाहती थी। ..... वो आज तक अनकहा ही तो है। देखे हुए ख्वाब कब पूरे होते हैं।
.........."हम फिर से मिलेंगे। फिर से बजेंगी शामों की शहनाइयाँ।" तुमने कहा था।
जब मेरी हथेलियां तुम्हारे चेहरे को टिकाकर , सहलाते हुए, आगे हुआ और ... गहरा, तिलिस्म मेरे जीभ में नोक पर जीवन रस सा घोल दिया था, कोमल से तुम्हारे हाथों ने, वे मेरे होटों पर अपनी नरमी खो रहे
थे।
एक आंसू तुम्हारी गाल पर लुढ़क आया........
मैं तुमसे कहना चाहता था कि -"मैं कोई भला या शराफत का पुतला नहीं हूँ मगर बहुत बार ये खुद आकर मुझे दबोच लेते हैं। मैं मौलिकता में ज्यादा यकीन रखता हूँ। आज तक मौलिक रहा और यही मौलिकता मेरे व्यक्तित्व की कमाई है। लेकिन टीस जो होती हैं, बहुत सालती हैं, बहुत दुख देती हैं। अभावों के प्रचंड तूफान में डांवाडोल हो रहे घर को सम्हालते दो विकलांग, हीण लोग, माँ- पिता की जर्जर देह और लगातार टूटती- जुड़ती, हारती और कायम रहती उम्मीदों के बीच, पीड़ाओं के झंझावतों को दरकिनार करते हुए वे सुखो की कारी की तलाश में जाने कितने दिन उस अंधकार में रहे थे, जहां दो टेम की रोटी का जुगाड़ महाभारत था।
चिल्लाने की हद पर चिल्लाया ''विध्वंस, निर्मम विध्वंश..." किसी को नहीं सुना।
"क्या बात है?" मैंने पूछा था।
"हम मिलेंगे फिर से। फिर से बजेगी शामों की शहनाइयाँ। अगले दिसम्बर दिन और रंग में होंगे।" तुमने कहा था।
तुमने एक दिन कहा था कि दुःख के हाथ लम्बे नही होते, अवसाद लँगड़ा होता है और मोहब्बत होती है
आकाश से भी अधिक विस्तृत और उसी दिन मुझे मोहब्बत की हथेली में आकाश मुस्कुराता दिखाई दिया था। तुम अब आ जाओ।
क्या सच मे इससे कोई फर्क पड़ता है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि तुम जा रही हो। पापी हूँ मगर चुप रहकर या झूठ बोलकर घटिया महीन बन सकता। तुम जाओ तो फर्क नहीं बल्कि अकेलापन डराता है। रह नही पाता मैं। बहुत दुख देता है शाम का अंधेरा, गुनगुना। मुझे बचाओ, बचा लो, अरे बचा लो मुझको....... कोई पत्ता तक नही हिला। नहीं, बहुत फर्क पड़ता है तुम्हारे जाने से, मत जाओ मेरी दोस्त, रुक जाओ।
शाम को स्टेशन वीरान था। दरख्त उदास खड़े थे। वक्त के आकाश से मोहब्बत के बादल उड़ गये थे।
दूर जाती हुई गौरय्या पीछे मुड़ कर टहनी पर उदास बैठे साथी को देखती हैं। मैं हाथ हिलाता हूँ। दिशाएं खामोश थीं। कमजोर से पल अब उदास थे। वो एक लड़की फिरोज़ी सूट पहने किसी भूखे को रोटी दे रही है। रोटी। भूख। पेट। आदमी।
"अबके दिसम्बर दिन और रंग में होंगे।"
सच्च कहा था तुमने। जाने कितने दिसम्बर बीत गये। जिंदगी ने जाने कितने रंग बदले...। कॉलेज
की सड़क पर आज भी उदास हैं। इमारतों में अटके तुम्हारे ठहाके अब अदीठ हैं। दीखता है तो बस दिसम्बर को हाथ हिलाकर विदा करता एक साया।
तुमने कहा था किसी दिसंबर.... और मैं ..............
मुसीबत, मुश्किल दिन, झूठ नहीं बोलूंगा, मैं भयानक तरीके से डर जाता हूँ। सुन्न, कांपने लगता हूँ। इसीलिए अक्सर पलायनवादी हो जाता हूँ। पीड़ाएं बहुत बार सहन नहीं कर पाता और मैं किसी भावनात्मक ओट की तलाश में भटकता हुआ फिर से बचपन मे लौटकर बच्चा हो जाने की कल्पना करता रहता हूँ। एक सच्चा वैचारिक, मानवीय गुणों से भरा, समझदार और उन्नत दृष्टिकोण वाले साथी की हमेशा मुझे जरूरत रही है। और हमेशा मैं ऐसे सच्चे हमराह साथी की तलाश में होते हुए उससे विहीन रहा हूँ।
तमने तो कहा था कि'अबके दिसम्बर..... दिन और रंग में होंगे।"
तुम याद आ रही हो इन दिनों मुझको....
तुम्हारा चले जाना कुछ यूं था कि जैसे भूरे काले बालों वाली उस लड़की की तरह जो मेरे कैनवास पर बनी हुई थी। जिसको देखकर मैं तुम्हारे अस्तित्व को महसूस करता था। जीवन साथी के बिना कभी भी बहुत खूबसूरत नहीं होता है। लेकिन मैं इसको
अपने विचारों के साथ और ज्यादा और से और भी ज्यादा खूबसूरत बनाकर जीना चाहता हूं मगर कैसे, किसके साथ, अकेलपन डरता है। गरिमामय जीवन की उज्ज्वल शर्तों पर, मौलिक तरीकों के साथ। कोई नकाब नहीं, कोई लबादा नहीं। जैसा हूँ, वैसे ही जीना, रहना, पेश आना मेरी आदत है।
.....तुमने तो कहा था कि अबकी बार...... दिसंबर में.....
( सच तो यह है कि ऐसा मैं कहानियों कविताओं में लिखता हूँ.... हकीकतन मुझ कायर को जो मिले, सब स्वीकार होता है। Not :- शेखर का वक्तव्य)
● सतीश छिम्पा (सूरतगढ़, राजस्थान)
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