आवारा की विदर्भ डायरी -
(१) पाप मुक्ति का पन्ना
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● सतीश छिम्पा
सड़क पर मिले एक पोस्ट कार्ड पर लिखी ये कुछ पंक्तियां, महज़ पंक्तियां नहीं है ।
.....और तुम्हारी मौत, इस पूरे शहर की मौत होगी
हॉवर्ड फ़ास्ट के उपन्यास शहीदनामा के उस पात्र द्वारा कही गयी ये बात इन दिनों मुझे बहुत याद आ रही है जिसको अगले दिन फांसी दी जानी थी कि "मैंने पाप किये हैं मगर मैं अपराधी नहीं हूँ", अपराध के लिए सजा कानून देता है मगर पाप के लिए व्यक्ति का भीतर, उसका जमीर, उसकी अंतरात्मा सजा देते हैं। पाप मुक्ति के लिए मुझे किसी पंडित, मौलवी या पादरी की जरूरत नहीं है और ना ही किसी भंते की जरूरत है क्योंकि जो पाप मैंने तुम्हारी भावनाओं के खिलते हुए फूलों से खिलवाड़ करके किया है उसके लिए मेरा भीतर कळप रहा है, तुम्हे ही आवाज़ दे रहा है कि आओ और आकर मेरी प्रीस्ट बनो, या शायद नहीं, आओ और आकर मुझे इस बेचैनी से मुक्त कर दो, इस पाप से मुक्त कर दो, और हंसते हुए कहो कि अब फिर से ऐसा मत करना, और देखना फिर कभी मैं वैसा नहीं करूंगा।
तुम्हारा शेखर
शेखर ने कभी सीखा कुछ भी नही और सलीका, वो क्या बला होती है। एक शाम जब वो घूमने निकला तो कॉलेज ग्राउंड में उसकी मुलाक़ात अन्ना कारेनिना से हो गयी थी, वो एक साधारण मुलाक़ात थी, जिसका इतिहास में कोई जिक्र नहीं होना था, या एक ऐसी मुलाकात जो रूटीन में किसी से भी हो सकती थी, मगर उस मुलाकात में एक ख़ास बात थी, बहुत ही ख़ास, और ये ख़ास तब हुई, जब अन्ना ने शेखर से कहा, "तुम्हारी काली आँखों में लाल सा कुछ है। ऐसा लाल जो जल्द ही तुम्हारे समूचे व्यक्तित्व को ढक लेगा।"
शेखर आजकल अन्ना को खोज रहा है।
ये गुलाबी से दिन थे जब शेखर पर लाल रंग का सुरूर चढ़ रहा था। उन्हीं दिनों एक बार बीकानेर रोड़ पर के एक चाय के ढाबे पर उसकी मुलाक़ात एक ऑवरकोट पहने दढ़ियल से मेले कुचैले शख्स से हुई थी, जिसकी ठहरी हुई सी गम्भीर आवाज़ में दुनियां भर का विद्रोह दबा हुआ था, समूची दुनिया की पीड़ाओं का घोल बनाकर पी गया हो जैसे, यह एक ऐतिहासिक मुलाक़ात थी, इतिहास के पन्नों में जिसका जिक्र ख़ुद भविष्य करेगा, क्योंकि उस शख्स ने कहा था, "शेखर, तुम्हारी तमाम ज़िन्दगी बेचैनी में गुजरेगी, सुकून कुछ एक पलों का होगा.. और तुम्हारी मौत, इस पूरे शहर की मौत होगी......."
-"वो लड़की जो दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा जानती थी, जो उछल कर एक छलांग में आसमान से मुट्ठी भर तारे तोड़ लाती थी। वो एक लड़की जो हाड़ मांस से नहीं बल्कि प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। वो जो असंख्य गौरैया के संगीत से इस समाज, वर्ग और देश को सजा देना चाहती थी। कहाँ है अब वो लड़की जो जिसकी आंखों में मचलते थे नये समाज और मनुष्य के सपने।""
दिल की, भीतर के कहीं गहरे भावनाओं के संसार की तड़फ, हर कोई नहीं जान पाता है । कहाँ जानता है ये जमाना कि उस एक लड़की के नाक के बिल्कुल ऊपर जो छोटा सा तिल है, उसमे बहुत गहरा और सघन तिलिस्म है। वो जब भी नीली जीन पर फिट-न-फिट डार्क मूंगिया या धारीदार चेक की बुशर्ट पहन कर आती तो मेरे भीतर भावुकता किसी सुनामी की तरह उठने लग जाती। वो औसत कद की दोलड़े हाडों वाली और गौरा- गुलाबी रंग वाली, तीखी नाक जो सिरे पर एक कट के कारण बेहद ख़ूबसूरत बन गया था। आंखे जैसे किसी शांत झील में उतरते चाँद की प्रतिमूर्ति हो। आवाज़, मन करता कि बस वो ही वो बोले, हम सुनते रहे लगातार और वो चुप ना हो, शब्द वहां अर्थों की सन्धि के मोहताज नहीं रहते हैं। वो लटूम जाते हैं उसके अस्तित्व और बिना बात की बात से। जब भी वह हंसती तो ऊपर का होंठ जो बहुत प्यारी शेप में था- ऊपर जाकर सिमटकर पतला सा हो जाता। वो इतना प्यारा था कि जो भी उसको देखता, अपना सब कुछ उसी पर वारने को तैयार हो जाता। ठेठ ग्रामीण किसान परिवार में जन्मी संस्कृति चौधरी (नाम बदला हुआ है) को हिंदी बहुत अच्छी नहीं आती थी। जब भी वो हिंदी बोलती तो मायड़ भाषा राजस्थानी से शब्दो को उधार ळे लेती और हिंदी राजस्थानी मिक्स भाषा बोलते हुए, भाषा का कचरा कर देती थी मगर बोलते समय इतनी खूबसूरत लगती कि उसकी इस कमी की तरफ कोई ध्यान ही नहीं देता था।
मैं राजस्थान लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी उसी बैच में जाकर करता था, जिसमे वो थी। जब वो पहले पहल क्लास में आई तब हम सभी दस मिनिट बाद होने वाले टेस्ट की तैयारी के जुटे थे। कमरे में बड़ते ही मेरी नज़र उस पर पड़ी और बस पड़ ही गई थी। जैसे जम गई हो उसके चेहरे पर मेरी नज़र। मैं एकटक, एक पलक उसको देखता रहा, टेस्ट देना भूल ही गया था। हालांकि मेरे पचास में से सैंतालीस नम्बर आए थे। उस दिन पहली ही बार क्लास में मेरा पहला नम्बर आया था और जब सर ने मुझे संबोधित करते हुए तारीफ पर तारीफ की, जिसे सुनकर फूल कर कुप्पा हो गया था।
अब मैं निश्चिंत था कि एक तो इस लड़की को मेरा नाम पता लग गया और दूसरी उसकी नज़रों में मैं एक साऊ, शरीफ़ और पढ़ाकू लड़का बन गया था।
अब हम अक्सर ही कोचिंग क्लास में एक दूसरे के सामने बैठेते थे। हमारी नज़रे एक दूसरी से हाथ मिलाती और इशारों में हाल चाल पूछती। संस्कृति चौधरी के पिता किसी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर थे। जाहिर है कि उनके जीन का असर संस्कृति की आदतों और पसंद नापसंद पर भी पड़ा ही था।
करीब महीने भर तक हम दोनों एक दूसरे को आंखों ही आंखों में नज़रों से चूमते, सहलाते रहे। एक भावुक दृश्य जब भीतर पैठ जाता है तो अपने आस पास का उजाड़ भी हरियल चमन की तरह लगने लगता है।
उस दिन मैं किसी कारण से कोचिंग में जा नहीं सका। मुझे मालूम था कि वो एन सही शाम के पांच बजे पुराने हाउसिंग बोर्ड कॉलोनो के पानी की टँकी के पास खड़ी अपने बड़े भाई का इंतज़ार करेगी। बस फिर क्या था। मैं पहुंच गया उस मायावी हुस्न के महासागर के पास।"
मुझे नही पता था कि वो भी मुझे पसंद करती थी (बिल्कुल देसी लुक था मेरा, इसलिए शंका हुई) इसिलिए तो मेरे कहने केे साथ ही फ्रेंडशिप का प्रपोजल स्वीकार लिया और 'मैं भी यही कहना चाहती थी', कहने के बाद, " सिर्फ अच्छे दोस्त ही बने रहेंगे, इसके आगे का सोचना भी मत।'
हमने एक दूसरे के नम्बर लिए और हो गया हमारा संवाद स्थापित हो गया। हम अक्सर रात को एक या दो बजे तक मोबाइल से बात करते रहे। एक दूसरे के सानिध्य के इतने ज्यादा निर्भर हो गए कि जिस भी दिन शहर में नेट या मोबाइल सिम बंद होती थी तो उस दिन हमारी बातों का उतरता नशा तोड़ में बदल जाता औऱ हम किसी समेक एडिक्ट की तरह व्यवहार करने लगते। ये वे नशीले और खुशबूदार प्यारे दिन थे जब हम लोग हर रोज शाम को खेजड़ी मन्दिर के पास वाले धोरों पर जाते और घण्टों वहां बैठे रहते। बहुत बार ऐसा भी होता कि जब वो मुझे याद कर रही होती यो उसी वक्त मैं भी उसकी नश्याई आँखों की शराब पीने के जुटा होता था।
शहर में बदल रहे इस कस्बे की कोई ऐसी गली नही बचो थी कि जो हमे पहचानती ना हो। हर गली, हर दीवार पर हमारे रिश्ते की घोषणा छपी होती थी।
एक बार दिसम्बर की एक भयंकर सर्द रात को एक बजे उसका मैसेज आया, "हमारे घर की पिछली दीवार के पास आकर मैसेज करना, अर्जेंट, अभी आओ,
मैंने आव देखा ना ताव, जैकेट पहनकर निकल पड़ा। पांच या दस मिनिट बाद उसको सूचना दी तो वो दीवार पर आ गई और मैं कुछ कहता इससे पहले ही उसने एक डोलू मुझे पकड़ा दिया, 'इसमें खीर है,मैंने बनाई है।", और जल्दबाजी में वहां से जाने को मुड़ी ही थी कि मैंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच उसका चेहरा लेकर होठों का बहुत गहरा, सघन और संपूर्ण चुम्बन ले लिया और फटाफट घर की और चल दिया। रास्ते मे उसका मैसेज आया, "साले हरामजादे कुत्ते नीच, मैंने भाइयों से कहकर तेरी ऐसी तैसी ना करवा दी तो जाट की जाई ना कहना।", मैं भयभीत था। डरते डरते उसको 'सॉरी', रिप्लाई किया।
- "कोई सॉरी सूरी नहीं है भोसड़ी के हरामी ठरकी, चल दफा हो चूतिए।"
उस रात बाकी की तमाम रात मेरी जाग कर इस फिक्र में कटी कि सुबह उसके भाई कहीं घर आकर ही ना लड़ाई कर ले, हालांकि लड़ाई लुडुई की बात पर मैं विचलित नहीं था, ये तो हम अक्सर ही कॉलेज या ग्राउंड में करते झेलते ही थे। दिक्कत उससे ब्रेकप और बात को घर में किसी को बताने के बाद जो मेरी बेइज्जती होनी थी और इज्जत का जो बलात्कार होना था, उसका ख्याल प्रचण्ड रूप से मुझे झकझोर रहा था।
भय और अकेलेपन से जूझता मैं दो दिनों तक हर रोज रात को बहुत देरी से घर में घुसता था। जाने कब क्या कांड करवा दे, गुस्सेल और स्वाभिमानी लड़की जो ठहरी।
एक ऐसी ही सुनसान रात में जब मैं दो बजे घर मे घुसने ही वाला था कि मोबाइल मैसेज आ गया।, '"अभी, इसी वक्त पिछली दीवार पर आ, जल्दी।''
मैं कुछ बोलता मगर बोल नहीं पाया, और भाजकर दीवार के पास अंधेरे की ओट में खड़ा हो गया, जहां दूसरी तरफ से एक बहुत फैले हुए दरखत की छाया उस अंधेरे को और ज्यादा गहरा और गहन बना रही थी। वो आ गई। अब हम दोनों दीवार पर आमने सामने खड़े थे। चुप चाप, निःशब्द, किसी मरघट की सी उदास इस कंटीली चुप्पी मेरा काळजा धड़...धड़ाधड़... धड़ की तरह ही भय का भूकम्प उठा रहा था। मैं बोलना चाह रहा था मगर मेरी जीभ सूखकर जैसे ताळवे से जा चिपकी हो। शब्द भीतर ही भीतर भ्यां कर रहे थे कि अचानक उसने मेरा चेहरा पकड़ा और उसी तरह का बहुत गहरा मादक चुंबन मेरे सिगरेट से काले हुए होठों को बहुत बारीकी और कोमलता से चूम लिया। जा
- "सॉरी शेखर, तुमने किस ही तो किया था और मैं मूर्ख तुम पर गुस्सा गई थी।" उसने कहा तो मेरे भीतर का भय प्यार और स्नेह की चाशनी में डूबकर मधुमय बन गया था। उस जादुई अहसास को मैं अपने दिल के भीतर भावों की तिजोरी में सजाकर रख लिया था।
अब हम लोग हर रोज उसी दीवार पर लटक के एक दूसरे को घण्टों चूमते रहते, तब तक जब तक कि हमारे होंठ रूखे और सूखे होकर जलने ना लग जाए।
एक दिन जब मोहल्ले में जागरण था और उसके घर के सभी लोग उसमे शामिल होने चले गए, तो उसने मुझे उसी तरीके से बुलाया और फिर अपनी तरफ नीचे उतरने को कहा। मैं डरते हुए उतर गया, मगर फिर सहज हो गया देखकर की वहां पिछवाड़े पशुओं के लिए बने गेराज टाइप कोठे में हम मिलन सुख ले सकते हैं। हम सुबह 5 बजे तक उसी गैराज में एक दूसरे के भीतर के तिलिस्म को पढ़ और छूते रहे।
अब हम रोज दीवार पर मिलने की बजाए उस कोठे में मिलते जहां एक बुरी तरह टूटी चारपाई हमारे लिए सुख सेज बनकर आराम देती थी।
करीब साल भर चली इस प्रेम की प्रेमिल कहानी का अंत भी इसकी शुरुआत की तरह दोगाचिंति में ही हुआ।
हम दोनों को ही नहीं पता था कि हो क्या रहा है। हमे इससे कुछ मतलब ही नहीं था मगर मतलब होना चाहिए जरूर था। अराजकता और जल्दबाजी में मैं कुछ विशेष नहीं सोच पाया था। वैसे भी होनी को कौन टाल सकता है। यह दिसम्बर के अंतिम सप्ताह का कोई बहुत ही सर्द दिन था जब मैं अपनी शैलिनी वूडली या कभी कभी नताली पोर्टमैन भी कहता था, मिलने, एक सम्पूर्ण मुलाकात की उम्मीद में गया। हम दोनों अभी एक दुसरे की बाहों के गर्म लावे से गर्मा ही रहे थे कि आहट सुनकर उसने उसी वक्त मुझे धक्का देकर फटाफट भागने के लिए कहा, मैं दिवार पर एक ही छलांग में चढ़ गया और एक भयंकर सरसराहट के साथ बहुत ही तेज गति से मारा गया लट्ठ, निशाना चूक कर दीवार पर लगा, इतना तेज की पक्के रद्दे की ईंट भी हिल गई। कूद कर घर की विपरीत दिशा में दौड़ता हुआ मैं पसीने पसीन हो गया था, मगर कदमो में जैसे बिजली आ गई हो और मैं दस मिनिट बाद एक टूटे खण्डकर के अंधेरे में जा दुबका था। बड़ी मुश्किल से सुबह हुई और घर जाकर लेट गया, भय था कि उन लोगो ने मुझे पहचान ना लिया हो, वे घर तक ना आ जाए। इसी सोच के साथ मुझे नींद आ गई और जब जगा तो संस्कृति का ही मेसेज था।
- "फिक्र मत करना, तुम्हे उन्हेंने नहीं पहचाना और हॉकी स्टिक से मार खाकर भी मैंने तेरा नाम नही बताया।
मैं दुख, ग्लानि, पीड़ा और अकेलेपन का एक साथ ही शिकार हो गया, बेहद शर्मिंदगी भी। तीन दिन बाद सीधे उसके घर की गली में पहुंच गया।
मैं उस दुख, तकलीफ और पीड़ा से एकदम हिल सा उठा था जब उसी गली के एक मित्र जोगिंदर रंधावा ने बताया कि उसकी तो कल शादी कर दी, तुम तो जानते हो कि किसान वर्ग में लड़कियां मिलती ही नहीं है, इसलिए लपक लिया रिश्ता प्रोफेसर साहब ने। ज्यादा खर्चा नहीं किया बस चुन्नी चढा कर व्हीर कर दी गई है। हाथों हाथ ही रिश्ता पकड़ लिया और भेज दी गई।
मैं जैसे किसी बहुत ऊंची पहाड़ी से नीचे खाई में धकेल दिया गया हूँ। गश खाकर गिरने ही वाला था कि खंबे को पकड़कर कुछ देर रिलैक्स हुआ और टूटे दिल के साथ घर की तरफ चल दिया।
एक बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण रिश्ते का यूँ बिखर जाना मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था।
अभी मैं उसको भूल कर उबरने ही वाला था कि उसका मैसेज आ गया, हाउसिंग बोर्ड कालोनी की तरफ आओ अभी के अभी। मैं चला गया, मगर वहां अफसोस के अलावा कुछ था ही नहीं । सब ठीक है के अंदाज में मैं जाने ही वाला था कि उसने कहा, "शादी हो गई तो क्या हुआ, हम अब भी पहले की तरह आसानी से रातें बिता सकते हैं।।"
हालांकि मैं इतना भी ईमानदार नहीं हूँ जितना तब हो गया था। मैंने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिया, "नहीं यार, किसी को धोखे में रखकर मुझसे प्यार का निभाव नहीं हो सकेगा।", और फिर घर की तरफ निकल गया। हम दोनों के बीच लम्बा मोन पसरा और फैलता ही रह गया। वो जैसे परिदृश्य से गायब ही हो गई हो।
पर फिर एक दिन अगस्त की बीस तारीख को वो मेरे घर आई और एक नाजुक मायावी तासीर के तिलिस्मी चुंबन से मुझे उस अंधेरे से बाहर निकाल लाई। वो लड़की नहीं, जादुई हूर थी कोई।
संस्कृति आज भी उसी तरह दिखती है, मगर मेरी नज़र वैसी नहीं रही, इनमे बुराइयों का टीर आ गया है।
अब वो कहाँ है, मुझे नहीं पता।
● सतीश छिम्पा
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