ग़ालिब छूटी शराब :- एक साल पूरा



वो जो एक बेवड़ा हुआ करता था....



ग़ालिब छूटी शराब :- एक साल

   ● सतीश सतीश
सावधान,  इनके साम्राज्य के लेखक अमर है

    ( इंकलाब की बात करने वाले अक्सर कलाओं के कोठे पर पूंजीवादी गिलास में फासिस्ट जीभ से जनता, लोक, मूल्यों और प्रतिबद्धता के लहू को पीते दिखते हैं।)
                                       ●  सतीश छिम्पा
००००९

आज पूरा एक साल हो गया, भयानक शराबी दौर से निकले हुए को, बहुत कुछ खोया है उन सात सालों में मैंने, मगर सच्चाई नही खोई- ज़मीर नही खोया- भीतर का मनुष्य मेरा जिंदा रहा,  आज तक भी वो जिंदा है। मैंने उन पवित्र शब्दों को शर्मिंदा नही किया, नही होने दिया किसी महान ध्वन्यार्थ को निरर्थक, अपमानित नही होने दिया.....  और आदमी ही रहा.... मैं साहित्यिक समाज मे काट कर फैंका गया हाशिए का रचनाकार जरूर साबित किया जा चुका हूँ। मैं उन कुछ अग्रज रचनाकारों के मिथ्या घमंड और सॉफ्ट फासिज़्म और बुर्जुआ- शोषक स्वभाव का जरूर शिकार बना हूँ-  मैं राजस्थान के  सामंती (राजस्थान के परम्परागत सांस्कृतिक) और थोथे फुकरापंती और कपट को ढोते हुए- तमाम अवमूल्यों के सामने प्रतिरोधक बैरिकेड बनने की सफल असफल कोशिश करता रहा हूँ। मगर, मानसिक व्याधियों और सामाजिक दायित्वों को , एक रचनाकार रूप में पूरा नही निभा पाया मगर इस अंधकार में मैं साबुत बचा लाया-  भीतर के मानव को, मैं संक्रमण से निकल आया सुरक्षित- बिना डरे- यह मेरी कमाई है।
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          मेरे अग्रजों ने पल पल मेरा साथ दिया, मुझे अकेला नही होने दिया, मुझे भावुक विचलन और कुंठाओं से निकाला, घुटनो पर बैठे मेरे आत्मसम्मान को ठोस आधार दिया..... मुझे निरंतर काम जारी रखने और तमाम समस्याओं के चलते हुए भी निरंतर दर्शन की तरफ, दार्शनिक- वैचारिक अध्ययन की ठोस जमीन तैयार करके दी..... वो दौर जो विचलन में धीमा पड़ा..... दिन की तमाम दुश्चिंताओं के बावजूद रात की स्टडी सिटिंग फिर शुरू हुई, बिना की थकान के, जैसे लौट आया हो सन 2016-17 का अद्भुत दौर। जब पढ़ने के नए जोश के समांतर मैं टिका रहा, अडोल रूप, सफल भी हो ही गया। मेरा फिर से दर्शन की तरफ मुड़ना, सतीश कुमार का एक नया या कहें पुनर्जन्म होना था। दिमागी जालों- जंजालों से निकलना बहुत मुश्किल था।  मुझे सूरतगढ़ हर हाल में छोड़ना ही छोड़ना था - (हमेशा के लिए नही, कुछ समय, साल- साल के लिए- जब तक कि इससे भी ज्यादा मजबूत ना कर लूं अपनी बुनियाद को.... हकीकतन समय और नियति और भाग्य के बीमारू शब्दों के भरोसे के जाल से निकल ना जाऊं.... वर्धा, तब तक मेरे लिए होम साइकैट्रिस्ट का जोरदार काम कर रहा है।) -

               
       
  वो बेवड़ा हरामी सतीश अरे बहुत ऊंचे घराने की लड़की है शायद इसकी दोस्त- बकवास व्यक्ति है। ऐसी और भी अनेक बातें है जो अक्सर मेरे लिए, मेरे पीठ पीछे कही जाती थी। लेखकों की तो बात ही छोड़ो, उनकी बातचीत में लोक, बदलाव, प्रयोग, शैली, शिल्प, मार्क्सवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद जैसे जरूरी मुद्दे बातचीत का विषय होता ही नहीं है। विषय होता है, 'सतीश उस बॉय कट लड़की के साथ जयपुर जा रहा था, डबल स्लीपर में उसी के साथ लेटा था- वो हरामी एक बोतल दारू दोपहर तक पी जाता है-।  डोलते  हुए ये रात कहाँ जा रहा था। माउंट आबू गया तब वो जाटों की लड़की उसके साथ क्या कर रही थी। कब किसके साथ सेक्स किया या कब कितने कॉन्डम खरीदे या दिन में दो- तीन बार तो हो ही जाता होगा या बेवड़ा है साला। ये एक ऐसा दौर था जो मेरे जीवन का सबसे मुश्किल, घातक और क्रूर था। अक्सर सोचता, प्रण लेता और कुछ कर दिखाने का सोचता, मगर फिर से वही सब कुछ। भावात्मक रूप से इसने मुझे खोखला खाली कर दिया था।   


      -"सतीश :- ?????", 

       - "हाँ, सतीश, बावळी बूच है, स्याणो बणै पण पार कोनी पड़ै

       शायद, सतीश हो ऐसा, या ना भी हो... जरूरी नही है कुछ होना या कुछ नही होना। मैं बहुत परेशान था अभी कुछ दिन पहले ही । बेईमानी नही करना जानता, तेज तर्रार नही हूँ मैं, क्या इसके कारण या इसके की मैं लाग लपेट नही जानता,  जाने किन कारणों के चलते मैं उन बौद्धिक बेईमानो के हत्थे चढ़ गया कि वापस अर्ध विक्षिप्तता में फंसने लगा था। एक उम्मीद, एक उजास एक नाम, एक नाता जो मेरे साथ रहता है हर एक समय , उसने उन दुर्दांत पीड़ाओं  से भरे वे दिन जो असहनीय थे, हल्के कर दिए।
         मैं इन दिनों खुद से खुद ही लड़ने लगा हूँ, चीजें निकलती जा रही है हाथों से, मैं  दो बार या .तीन या चार और अनेक प्रयासों में असफल रहा हूँ। मैं आज तक के इस साहित्यिक यात्रा में ईमानदारी और सच्चाई के कारण जो जो नुकसान भोग चुका हूँ, वो नुकसान अविस्मरणीय है। मैं जकड़ा हूँ ग्रन्थियों से। अब मुझसे यह सहन नही हो पा रहा है, बहुत बहुत ही पीड़ा दायक है। मेरा दिमाग सुन्न होने लगा है।
       मैं अक्सर इसी सोच में रहता हूँ, कि अपराध क्या  है ? वैचारिक प्रतिबद्धता की बात करते हुए लेखकीय गुणों को महान बताने वाले क्यों अक्सर जीवन का अपमान करने वाले होते हैं। 
  
      ...  जबसे मेरा दिमागी अंधेरा मिटा है, सकारात्मक हुआ हूँ और ईमानदारी से काम करने लगा हूँ तो मुझे जिस अनदेखा पन का सामना करना पड़ रहा है, वो भयानक है, मैं जानता हूँ। आत्मघाती है। यह भी बनी बात है कि जब आप इन उलझनों में उलझते हैं, भावनात्मक संबल की आस में जब झाँकते हैं कहीं और सब के सब अपने अपने अंधेरो में अंधेरे की महिमा गाते आपको अनदेखा कर देते हैं। शायद यह नियति है सच, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ, फिर भले वो गुरुदत्त हो, मायकोव्स्की, स्वदेश दीपक, लवलीन या जो हो..... हमे समान करना पड़ता है सच्चाई के साथ उठकर उन झूठो से जो हकीकतन सच्चे माने जाते है। यह दौर खतरनाक है ।


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     जब पढ़ने के नए जोश के समांतर मैं टिका रहा, अडोल रूप, सफल भी हो ही गया। मेरा फिर से दर्शन की तरफ मुड़ना, सतीश कुमार का एक नया या कहें पुनर्जन्म होना था। दिमागी जालों- जंजालों से निकलना बहुत मुश्किल था।  मुझे सूरतगढ़ हर हाल में छोड़ना ही छोड़ना था - (हमेशा के लिए नही, कुछ समय, साल- साल के लिए- जब तक कि इससे भी ज्यादा मजबूत ना कर लूं अपनी बुनियाद को.... हकीकतन समय और नियति और भाग्य के बीमारू शब्दों के भरोसे के जाल से निकल ना जाऊं.... वर्धा, तब तक मेरे लिए होम साइकैट्रिस्ट का जोरदार काम कर रहा है।) - अगर ना छोड़ता तो कभी उन दिमागी अंधेरों से निकल नही पाता जो निकल तो वहां रहते हुए ही गया था, मगर इस ताजगी को स्थाई भी रखना बहुत जरूरी था,  इसलिए तमाम मुश्किलों के बावजूद मैं बिना परेशानी के अच्छा जीवन जी रहा हूँ। सकारात्मकता के साथ लेखन और अध्ययन और अध्यापन और संपादन- कर रहा हूँ।

           ऐसा नही था कि इस दौर में विचलन के खतरनाक मोड़ नही आए, बहुत बड़े और बुरे आए..... समकालीनों और कुछ बहुत प्यारे अग्रज मुझसे नाराज़ है बहुत ज्यादा, कारण जो बताया जाता है, वो नही है। वो तो खत्म कर दिया गया था। अब इसका कारण वर्गीय अवस्थिति और बौद्धिक हीनता जनित कल्पित दंभ जो आपके एक तर्क से ढह ढेरी हो जाता है। उनके इस दंभ के चलते, उनकी चुगलियों और मिथ्या प्रचार का फल है कि आज तीन बहुत प्यारे अग्रज आगीवाण भले कवि हो प्रकाशक या पाठक मित्र या चित्रकार.... सब नाराज़, भयानक नाराज। खैर छोड़ो, क्योंकि अभी जो अपने हैं- वे कायम रहेंगे। किस भी अग्रज, अनुज और समकालीन के प्रति मैं कपट नही रखता। रख ही नही पाता, यह एक ही तो कमी है कि सच हो या झूठ- खुलकर, जोर से बोलता हूँ। अतिभावुक होना, अभिशाप बना बैठा है।   कम्युनिष्ट या कहें मार्क्सवादी नैतिकता इस समकालीन विश्व का एकमात्र मानवीय भावनाओ और संवेदन को स्थापित करने वाला तत्व है। मैं चीजो को दुनियावी दीठ से नही देख पाता इसलिए नुकसान उठता हूँ। आओ देखें कि जिन लोगों से समकालीन युवा लेखक संपर्क साधना, परिचय गाढ़ा करना बहुत बड़ी बात मानते हैं, वे जो आइकन बनकर उभर रहे हैं- एक सच, निर्मम सच और सब मित्रों के कपट का ताला खुल गया। आज मित्र नही रहे।  युगपक्ष जो बीकानेर का अच्छा साहित्यिक पन्ना छापता है, किस कारण मुझे नहीं छापता, उदयपुर अकादमी की पत्रिका मधुमती और उसका संपादक मुझे क्यों नही छापता- हास्यास्पद है। बीकानेर के कलावादी खेमे जो आर्थिकी सम्हालता है, जिसने कविताओं को अहिब बना दिया कि साथ लोकपक्षधर कविताओं और हरीश भादानी जी के साथ तुलनात्मक मूल्यांकन  का फल है। मतलब ईमान की बात मत कीजिए।

     .     इन्ही सब अंधेरों का सामना पहले भी किया था, और जब मेरे लिए खुला नरक का दरवाजा और मैं अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ जुटा हुआ था उस कुकृत्य में- काची उम्र, अधपके दिमाग, विचलन और फिर शराब दर शराब---- गालियां और गालियां और बेइज्जती- और एक बीमार सोच जिसकी बीमारी बाद में पता लगी कि दिमाग मे मेरे किसी तरह का गंभीर केमीकल  लोचा हैै-- जो ये कह रहा है कि दुनिया बड़ी जालिम है दिल तोड़ के हंसती है --या ये दुनिया और ये महफ़िल किसी काम की नहीं-- जनता ढोल, और बाकी सब अवसरवादी, कपटी जानवर हैं और आगे निकलने के कॉम्पिटिशन में इतने डूब चुके हैं कि इन्हें पता ही नहीं कि कब ये किसी दूसरे के कंधों पर पैर रखकर कामयाबी को छू लेते हैं और दूसरा, जिसके कंधों पर पैर रखा गया होता है, वो भी किसी दूसरे के कंधों को तलाश करता है। प्यार से नफरत करने वाले ये लोग बलात्कार को जरूरी दमन और सबक समझते हैं  और भैंस और बकरी तक को हवस का शिकार बना लिया जाता है।

-" पार्टनर ऐसे  ही  बनेगी तेरी विक्षिप्त पहचान "   

            बुरा था। बहुत डरा हुआ था मैं, यहां तक कि रातों में हर रोज डरावने सपने देखता और उठकर भागता था। शराब तो शराब, अफीम और बाद में अरसे तक पोस्त (भुक्की) गांजा भरी सिगरेट तो माल मत्ता वाली सिगरेट- अरसे तक नॉन स्टॉप, फिर रुका ताकि फिर से दौड़ लगाऊं---- उफ़्फ़ ''  मैंने ही उसको जोर देकर वापस चलने को कहा था जो उसने बहुत मुश्किल से माना था। वो बेवड़ा हरामी सतीश अरे बहुत ऊंचे घराने की लड़की है शायद इसकी दोस्त- बकवास व्यक्ति है। ऐसी और भी अनेक बातें है जो अक्सर मेरे लिए, मेरे पीठ पीछे कही जाती थी। लेखकों की तो बात ही छोड़ो, उनकी बातचीत में लोक, बदलाव, प्रयोग, शैली, शिल्प, मार्क्सवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद जैसे जरूरी मुद्दे बातचीत का विषय होता ही नहीं है। विषय होता है, 'सतीश उस बॉय कट लड़की के साथ जयपुर जा रहा था, डबल स्लीपर में उसी के साथ लेटा था- वो हरामी एक बोतल दारू दोपहर तक पी जाता है-।  डोलते  हुए ये रात कहाँ जा रहा था। माउंट आबू गया तब वो जाटों की लड़की उसके साथ क्या कर रही थी। कब किसके साथ सेक्स किया या कब कितने कॉन्डम खरीदे या दिन में दो- तीन बार तो हो ही जाता होगा या बेवड़ा है साला। ये एक ऐसा दौर था जो मेरे जीवन का सबसे मुश्किल, घातक और क्रूर था। अक्सर सोचता, प्रण लेता और कुछ कर दिखाने का सोचता, मगर फिर से वही सब कुछ। भावात्मक रूप से इसने मुझे खोखला खाली कर दिया था।   

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  •     मैं जब साहित्य में आया पहली बार, बहुत छोटा था। चवदह- पंद्रह साल का किशोर जो आठवी पास करके नोवीं जमात में आया ही था। तब तक किसी भी लेखक से नही मिला था- नाम नही पता था किसी का भी, प्रेमचंद या शरतचंद्र या अमृता प्रीतम के बारे में भी ज्यादा नही जानता था। पर कहीं पढा था उन्ही दिनों, जाने किसमे कि 'लेखक है लोक की आवाज़,' कविताओं की गरिमामयी उपस्थिति और बवंडर उठा देता है संपादक।   
              लेखक की कलम सच्चाई की स्याही से रचती है जीवन की रचना। अन्याय का मुंहतोड़ जवाब देती भीतर भावों की सुनामी और शोषण का मुरचा पकड़ कर बौद्धिक कपट की गंदगी को समूल खत्म कर देता है...   'शोषितों की कविताओं की गरिमामयी उपस्थिति और बवंडर उठा देता है संपादक। संपादक, कथाकार, आलोचक, कवि, क्रांतिकारी, युग पलटाव फलां फलां की कलम में बम फट गया, पटाखा बाज गया..... आंदोलन, लोक युद्ध, इंकलाब के नारे लगाते ये युवा, प्रौढ़, वरिष्ठ, कवि-कवयित्री, लेखीकाएं और लेखक... ''कुलबर्गी की शहादत 
         
        यह एकदम सच्ची बात है कि मैं अक्सर सोचता था "कलम की ताकत" , स्याही, कागज़ के दिल पर एक इंकलाब। टीवी में देखा, कहीं पर पढ़ा भी। कलम, सच्चाई, ईमानदारी, आक्रोश, युवा खून, अन्याय को पटक कर इतिहास की कचरा पेटी में या कलम की नोक से उठाकर कलाओं के कलावादी अमानुसों  को डाल दें हाशिए पर। जन जन की आवाज़, क्रांतिकारी लेखक, भगतसिंह की आवाज़ बना जयपुर का कसूता लेखक.... शब्दो मे जोश था। जब्बर, लोढा टाइप, लेखक को चुनोती देती लेखिकाएं -'उठा देंगे, पटक देंगे, फाड़ कर रख देंगे, हिला देंगे... नारी तू नही है अबला , अब उठा तलवार और घोंप दे.... फाड़ दे, घुसा दे, घुंक़ा दे, ज्वालामुखी है तूं आंधी तूफान और मैं पढ़ता लिखता गया।

          
          आरंभ है प्रचण्ड और किसी युग के पक्ष में पढ़ा था कि प्रतिरोध की प्रचंड दहकती लहरों और आंधियों पर सवार होकर आए हैं क्रांतिचेता युवा, वरिष्ठ, प्रौढ़... बदला लेकर रहेंगे.. इंकलाब की आंधी में-- फलां फलां शर्मिंदा है... अब जिंदा है  अखलाक, धानाराम, रोहित वेमुला, कुलबर्गी, पानसारे, दाभोलकर, गौरी लंकेश, पाश, सफदर हाशमी...  भाषण देना है अभी रक्त रंजित करनी दुश्मनों की धरती आओ युवाओ आओ अग्रज वरिष्ठों.... वे खड़े हुए, पड़ गए, पेट ज्यादा बड़ा था- भारी, टसकते हुए वापस बैठ गए और कहा हम बहुत मंच लिए हूँ, क्रांति किए हूँ... अब आप फोड़ो बम... युवा उठा,  आक्रोश का ज्वालामुखी फूटपडा... साथियों.... जवान लिखारा दहाड़ा, युवा साथियों.....  आगे भूल गया, याद आया तो बोला...' इक्कीस नहीं, इक्यावन पूरे रख लो, बस इनाम लेते की न्यूज़ और फ़ोटो...." अनुवादक आलोचक की गादड़ सी आंख चमकी.... राजस्थानी अनुवाद, हिंदी अनुवाद दोनो हो जाएंगे, दिल्ली की किसी पत्रिका में फोटू... चर्चा भी.....

     
          हकीकतन कुछ शब्द हैरतअंगेज रहे- जैसे भगतसिंह, यथार्थवाद जमीर या ईमान या क्रांति, हम जंग ए आवामी से कोहराम मचा देंगे। प्रतिरोध, लौकिक सरोकार। जन जन की आवाज़, क्रांतिकारी लेखक, भगतसिंह की आवाज़ बना युवा लेखक.... मुझमे जोश था। जब्बर तूफान और मैं पढ़ता लिखता गया। बनावटी शब्द, एक डेढ़ दशक तक की लंबी यात्रा। 


        यह कभी सोचा नही था मैंने की कलावादियों की जुंडली से टक्कर लेने वाला कोई बचेगा ही नही, अकेले डर नही लगता मगर अफसोस होता है कि ये खुद को आदमी कहते हैं।  अमानवीय, प्रकाशक भगत सिंह के नारे लगाता हुआ जाने किस खिड़की से अज्ञेय से चेक साइन करवा लें आया, युवा लेखक फाड़कर रख देंगे अन्याय को, और मंच और कुछ रुपये, बिक गया.. एक ये ही मूल्य जो था मेरे पास, सच्चाई और मौलिकता।  बार बार विरोध करने के चलते अक्सर ही नही बल्कि हर एक वो अवसर मेरे लिए था, हड़पकर किस को भी पकड़ा देना मुख्य काम है इनका।
     
          धीरे- धीरे जानने, सीखने लगा और बीच मे रहा इनके तो जान पाया कि सब चंडे हुए हैं, मगर वो जो कुर्ता पायजामा पहने जाने कहाँ से आकर, ''लोकधर्मी" कवि बनकर स्थापित हुआ, मुझे आश्चर्य हुआ, मगर वो अब स्थापित था जाने किस लोक लेखक रूप में.... उसका पूरा ग्रुप लोकधर्मी निकला क्रांतिकारी जनकवि और विमर्शों आदि और बीकानेर जो अज्ञेय को भोमिया थरप चुका था- मुक्तिबोध की ठोकर लगी और वो फिर से सीआईए के कॉंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम पर बैठ गया। मेरे सात साल अवसाद के में कुछ हिस्सा इन सम्मानितों का भी रहा है। और फिर जब सीआईए स्थापित हुआ तब बीकानेर को अड्डा बना दिया गया, लेखक और कवि सब के सब ऐसे निकले की जाने कीड़ी नगरा हो। स्पेशल ब्रांच और मैं, जो मैं कौन, बनकर शिकार हो चुका था इनका।

        (जाना तभी बचा और प्रतिरोध में खड़ा हुआ गया।)

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    कलावाद 'कला कला के लिए'  बीमारू धारणा पर आधारित अलौकिक विचार को किसी तिलिस्म, रोमामियत सा बीमारू बौद्धिक, सॉफ्ट फासिज़्म के साथ आत्मा, भावनुभाव से विचार के प्रति एक दृष्टिकोण जिसको नकार दिया गया था। कलावाद को साहित्य एवं कला के क्षेत्र में उपयोगितावाद के विलोम के रूप में जाना जाता है। कला का उद्देश्य किसी नैतिक या धार्मिक उद्देश्य की प्राप्ति नहीं बल्कि स्वंय अपने पूर्णता की तलाश है। कला सौन्दर्यानुभूति का वाहक है इसलिये इसे उपयोगिता की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिये। 


    समाज, नीति, धर्म, दर्शन आदि के नियमों का पालन कला की स्वच्छंद तथा स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति में बाधक होते हैं।  अब यह जो ओम निश्छल जी ने नंदकिशोर आचार्य कविता की बात करते हुए समकालीनता से अलग भाषा का अध्‍यात्‍म रचने वाले कवियों में सेे एक कहा हैं। आचार्य के संग्रह 'छीलते हुए अपने को'देखते हुए कहा जा सकता है कि हालांकि भाषा के अध्‍यात्‍म पर कब्‍जा सदैव अशोक वाजपेयी का रहा है पर अजाने ढंग से आचार्य ने पिछले कई वर्षों से अपनी आत्‍मानुभूतियों को छोटी छोटी कविताओं में इस तरह सिरजा है कि उनके शब्‍दचित्र महुए के फूल की तरह झरते प्रतीत होते हैं।"..
        एक बीमार दर्शन को जीवन दर्शन कहने वालों से बचना जरूरी है।

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            विज्ञान, तर्क, दीठ, द्वंद्वात्मक, संघर्ष, पदार्थवादी चेतना, पदार्थ - सचेतनता या चेतन, अवचेतनावस्था.... ये शब्द थोथे नहीं है- ना हल्के हैं, जबकि इन्हें बना दिए जाने की भरपूर कोशिश (हास्यास्पद है ना) कि गई है, की भी जा रही है। हम विज्ञान को नही बल्कि एक लेखक, एक व्यक्ति को तुच्छ स्वार्थों के चलते कलावादी पूंजीवादी अपसंस्कृतिक अवमूल्यों के प्रदूषण में लौट लगाते  हुए देखते हैं- हम देखते हैं कि आलोचक, न्यूटल है, मतलब उसकी आलोचना या स्थापित किए जाने की कोशिशों में नंदकिशोर आचार्य, कैलाश वाजपई से लेकर रमेशचंद्र शाह तक और फिर ज्योत्स्ना मिलन से उमट या संजीव मिश्र तक सभी होंगे, बीच मे मोहता या किसी सॉफ्ट फासिस्ट का आना बड़ी बात नही है। बड़ी बात और खराब बात तो ये हैं कि इस तरह के लोग हरीश भादानी, विजेंद्र, जुगमंदिर तायल और अन्य जीवित विचारो  के समृद्ध जन या लोकधर्मी  कवियों और कविताओं पर भी लिख रहे हैं। यह कैसा वैचारिक भटकाव या बौद्धिक कपट है कि इनके विरुद्ध कोई आवाज़ भी नही उठा रहा- और यहां जो एक था आवाज़ उठाने की कोशिश करने वाले वे ज्यूरी में बैठ कर इनाम बांट रहे हैं। क्या सच मे हम दार्शनिक धरातल या, दार्शनिक चेतना या सैद्धांतिकी महज नाम है। प्रतिरोध, प्रतिबद्धता कहाँ है ये महान शब्द .... यह कपट आम नही है कि बौद्धिक अय्याशों ने जनवाद को कलावादी कुकर्म में शामिल किए जाने का जश्न तक मनाया है, एक पुरस्कार की आड़ के। 


        क्या यह बौद्धिक दिवालियापन नही है कि जब वैचारिक हठधर्मिता के बीच सैद्धांतिक मुद्दों को हम आपसी समझाइस या सौदेबाजी से निपटा रहे हैं। चेतना या कहूँ उस द्वंद्वात्मक दीठ या अन्य जो भी हो, इन सबके कारणों की विवेचना करता है द्वनद्वात्मक दर्शन जो  यथार्थ की परख के लिये एक सही और सघन, ठोस दृष्टिकोण है। दार्शनिक चिन्तन मूलतः जीवन की ही नही बल्कि विज्ञान और उसके केन्द्रीकारी मूल तत्वों को जड़ता से निकाल संचालित करते हुए अनेक पहलुओं के एक साथ निस्तारण की जमीन तैयार करता है। अब खत्म सब। आगे बढ़ना ठीक।

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       मेरा मकसद किसी भी तरह की किसी की शिकायत करना नही है- बस मेरी आंतरिक अकुलाहट है, तड़प और पीड़ है कि इस लोकपक्षधरता शब्द के पीछे छिपी लेखकों, संपादकों, लेखक संगठनों और तमाम बौद्धिक कपट का पर्दाफाश किया जाना चाहिए। सबके सामने सरेआम किया जाना चाहिए कि बौद्धिक कपट समकालीन समय का सबसे खतरनाक और अमानवीय लंपट तरीके का कला जगत का सबसे भद्दा रूप है। भले वह मठाधीश हो या उनसे भी चार चांदे चढ़ी हुई कथेसर और इसकी पेटी बुर्जुआजी और घनघोर पक्षपाती जीवनद्रोही असामाजिक अनैतिक अपसंस्कृतिक अवमूल्यों का आधार हो जो उसके लिए सबसे बड़ा मंच है। गोर्की हो या जनकवि, जनवादी और जनपक्षधरता..... सबसे ज्यादा प्रदुषित हुए हैं। किसी का नाम लेना ठीक नही क्योंकि इन व्यापारियों के सामाजिक संबंध दायरे तक नही जाना इसलिए.... धान कथाएं तब कहां मर जाती है जब हकीकतन जीवन संघर्षो में जूझते युवा प्रतिबद्धता को मंच की जरूरत हो ? 
           इनाम, इकराम, किताबें, मंच, पडपंच...... मैंने विरोध किया और एक मोटे पेट वाले कॉमरेड से कहा, "साथी ये मानवभक्षी जमात भेड़िया बनने लगी है- आओ मारें इंकलाबी सोच स्थापित करें, आने वाली पीढ़िया ये ना कहे कि ''जब वहां कविता का बलात्कार करके, भाव, वाक्य, और समूची भाषा का अपमान हो रहा था तब तुम कहाँ मुंह काला करवा रहे थे। और  फिर मोटे कॉमरेड के पेट मे जमी मक्कारी बोली, चुप चाप बैठा रहा इसने ग्यारह सो की रसीद कटाई है।'


           बहुत  समय तक यही मक्कारी चलती रही और जाने कब मैं इंकलाब, स्याही और कलम और किताबों के साथ एक ही मुश्त अवसाद के सात साल काट आया, जी, स्वदेश दीपक तो नही मगर मेरे ही तरह के मौलीक अनुभव दे गए। जो लड़का कभी किसी को गाली तक नही दे पाता था, वो लेखिकाओं, दोस्तों और परिचित लड़कियों और महिलाओं के साथ कॉल से या सोशल मीडिया के जरिए जो बदतमीजी, लंपटता, और घटिया बातचीत करके तंग जो करता था, उसका कोई पाप विमोचन पत्र नही, बल्कि खुद से ही खुद को निकाल कर लाना था । हर एक लड़की को बिना डरे  प्रपोज़ करना लंपटकिय बात, गाली आदि और भय, दुःस्वप्न, हार और हताशा और अकेलेपन का शिकार हुए पता नहीं लगता। मुझे अवारा, शराबी, सड़कछाप, बदमाश और लंपट आदि जो अलंकार मिले, इससे और इसके वर्ग की कामुक जमात से मिला जब मैंने इनका खिलौना बनना अस्वीकार कर दिया- मुझे ठीक होकर निकलना था।  कुछ प्यारे सज्जन भी है जो मेरा यकीन करके हर एक बुरे वक्त में साथ निभाया और सहयोग किया। आज जब मैं हर तरहः से स्वस्थ और सजग ताजगी से भरा हूँ तो इसका कारण  वे स्त्रियां ही हैं जिनके कारण मैं आज दर्शन और कलाओं के क्षेत्र में थोड़ा गौर करके उनसे कदम ताल मिला रहा हूँ। 

                 लेखक, कवि या कहें  बुद्धिजीवियों कोई उनकी रचनाएं पढ़कर अगर क्रांतिकारी माने तो उसको अपनी हर एक बात और  चीजो के बारे में फिर से सोचना चाहिए- क्योंकि यहां सपनो का ही नही, भावनाओ का भी कत्ल होता है। कह सकते हैं कि अपराध या पाप की धारक है यह जमात । हर समय एक अज्ञात कपट,, हीन भावनाओ और साथ ही कुठाओं को महसूस करते हुए मैं - क्या पता मैं भी मर जाता और बस कवि बनकर ही बचत। .....याद नही करना चाहता वो,  भयानक रूप से दारू पी कर लड़ना, झगड़ना और अवसाद और भारीपन- हताशा , अवसाद की अति और अराजकता, दिमागी पंगुपन का कारण या बे कारण सब के सब फिजूल थे।  क्योंकि यह तो दो ही साल छलाँ जबकि नरक पूरे सात साल का भोग है मैंने जिसका  दोष उस  धनपति लेखिका, जिसका मैं सहज शिकार हो गया था का भी नही था तो उनका भी नही था जिनको सामाजिक डांगर कहा जाना ठीक रहता है ।  इसी जमात की देन थी यह।

            भाई प्रेम सुनो पहली बात तो यह है कि अभी जो वीभत्स  खूंखार दौर जिसमे हम जी रहे हैं इससे बचाव सिर्फ मार्क्सवादी  प्रतिबद्धत प्रतिरोध से ही संभव है और सबका तो नही कहता मगर ज्यादातर प्रतिरोधी आवाज़ जीवित आदम की ही होती है।  और हर एक जीवित का यही एक पक्ष मजबूत होता है। मैं उन्ही शब्दो की पुनरावृत्ति करके अपनी बात कहू तो शायद ज्यादा ठोस तरीके से कह पाना संभव ही नही। जो लातिन अमरीकी लेखक जूलियो रैमन रिबेरो ने कहे थे....  हालांकि प्रभावित इस वक्तव्य से भी हूँ लेकिन अपनी मौलिकता के साथ कि  " मैं क्यों लिखता हूँ। हर एक मानवद्रोही व्यवस्था, आदत और स्थितियों से युद्ध लड़ने के लिए और खुद को असहाय, बोहेमियन और कमजोर और बीमार सा समझने और मानने जैसे गलत भावों से अलग रखने के लिए। खुद को सांस्कृतिक प्रदूषण से बचाने के लिए। जो बेचैनी, उहापोह, दोगाचिंति, द्वंद्व  और अराजकता, आक्रोश, अपराधबोध और हीन भावना  मुझे घेरे रहते हैं। व्यथित करते हैं और सुकून से दूर रखते हैं उनको बनाए रखने और स्थाई याददिहानी के रूप में सहेजने के लिए और खुद को जिंदा रखने के लिए लिख लेता हूँ। बेहतर से भी बेहतरीन भावों को रोपकर सुरक्षित रखना, जिंदा होना है। कोई ऐसी बात या विचार जो कहने के लिए हो मगर कह पाना संभव नही हो..... मैं लिख देता हूँ। मैं अपराधबोध को आत्मालोचना से काटकर , जीवन और जीवन की गरिमा को स्थाई रखने और जीवित शब्दों को विचारों तक कि यात्रा करने और ठोस रूप में स्थापित करते हुए स्थाई करने के लिए कटिबद्ध हूँ।"


             यकीन नही करते हैं लोग की साहित्यिक समाज मे आज इस दिन तक जाने क्या क्या आरोप लगे हैं मुझ पर, मेरे जीवन का कैसा विभत्स पोस्टमार्टम किया गया है। मेरे बारे में कितना ज्यादा गिरा हुआ  बोला गया है -- मेरी आत्मा को छलनी करने,  साहित्यिक समझ  या अतीत में मेरे शराबी व्यवहार, और मेरे अध्ययन को लेकर कितने तंज कसते हुए मेरी वैचारिक प्रतिबद्धता और मेरे इस जनवादी(लोकतांत्रिक) मिशन, मुहीम, कलाओं के मोर्चे पर लड़े जा रहे इस महा समर, इस कविता, जीवन और कलाओं को भयंकर संक्रामकता से बचाए रखने के लिए तैयार किया गया यह मोर्चा कइयों की आंख की किरकिरी है।

             आप चालाक है तो ठीक है, बचत में रहेंगे। झालर हैं तो कोई भी एरा गेरा आकर वाट लगा जाएगा । अरसे तक बहुत नुकसान  उठाया है मैंने गलत का विरोध और पुरजोर विरोध करके। अपने भी नाराज़ हुए और बाहर वाले तो हाशिए पर पटकने के लिए जैसे तैयार ही बैठे हैं। मैं क्या करूँ मैं समझौता परस्त नही हो सकता। चाहे जितना, मतलब सारा दिन झूठ बोलता हूं- लेकिन जैसे ही लिखने बैठता हूँ- मेरे भीतर मेरा ज़मीर उग्र होकर कुप्रवृत्तियों के गोदाम को उजाड़ देता है। मैं इस बात से दुखी नही कि मैंने ये किया तो ये हुआ, बिल्कुल नहीं। यह तो जारी ही रहेगा। पीड़ा तब होती है जब आप किसी को अपना अग्रज और लोकधर्मी और जनपक्षधर और ईमानदार मानते हुए उसके लिए हर तरह का लिख लिख प्रसारित करते हैं। दुश्मनी फिजूल में मिलती है। बहुत समय समर्पित रहने के बाद अचानक पता चलता है कि यह आदमी की जगह जातिवादी प्रदूषण कहाँ से आ गया। टूट जाता है भीतर तक बहुत कुछ। लेकिन इससे निकल लिया जल्दी जाता है और आप फिर अपने उन अपनो के पास जाकर शर्मिंदगी के बोझ से दबते हुए माफी मांगते हैं कि क्यों नही दुश्मन को पहचाना, अपनो को क्यो नाराज़ किया ? मगर अपने समझते हैं बहुत गहरी भावनाएं भी।  हम जीवित हैं यह बहुत लूंठी बात है।

         किसी भी तरह का स्वार्थ या निजी वैर विरोध किसी के साथ नहीं है। इच्छाएं है बस, कि इस कपट और पूंजीवादी अपसंस्कृतिक अवमूल्यों का इस दौर मे विध्वंश कर दिया जाए ताकि मेहनतकशों को उनके विमर्शों को जगह मिले, दलित विमर्श तूफान की तरह वाद और विवाद पैदा करे ताकि इस वैज्ञानिक पद्धति से कुछ और नवीन और मौलिक उद्देश्य और निष्कर्ष और रचनाएं पैदा हो।

      क्रमशः


     

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