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भारत मे किसान (खेत मज़दूर, सीमांत) आंदोलन - (भाग- १)
● सतीश छिम्पा
।कौन है अन्नदाता..... कुलुक किसान या मज़दूर
पंजाब के युवा साथी सुखविंदर की एक पोस्ट इस संदर्भ में जब वायरल हुई तब अचानक एक साथ स्टडी सर्किल्स, जन संघठनो, छात्र इकाइयों समेत हरेक जीवित तबकों में इस पर बहुत गंभीर अध्ययन- मनन- चिंतन शुरू हुआ, हल्की बहस, गंभीर उत्तेजक बहस जो बाद में वाद विवाद तक पहुंची और लगातार चलने के बाद नतीजे संवाद की स्थिति में आए- तब उस प्रदूषित धारणाओ को खारिज करके, निर्मम समाधन की कठिन विचलन भरी प्रक्रियाओं के बाद यह एक महान शब्द जिसको नरोदवादी कुलुकों ने प्रदूषित तो किया साथी ही बीमार भी, यह बहुत भ्रामक है। तीन बीघा या पांच बीघा वाला भी खुद को किसान कहता है और दो सौ बीघा जमीन वाला कुलुक भी खुद को किसान कहता है... जबकि हकीकत यह है कि असल मेहनतकश सीमांत किसान (कम जमीन वाला) जिसे घर चलाने के लिए खेती के साथ-साथ दिहाड़ी जैसे दूसरे छोटे- मोटे काम करने पड़ते हैं, होते हैं, या खेत मज़दूर (चौथिया, पांचिया जो फसल के चौथे या पांचवे हिस्से के लिए कुलुक के यहां मज़दूरी करते हैं, खेत के साथ साथ उनके डांगर पशुओं के लिए हरा चारा भी लाते और कुत्तर करते हैं, पशुओं को दुहते भी हैं) अकाल, अतिवृष्टि या सत्ता की नीतियों की मार सबसे ज्यादा इन्हें ही झेलनी पड़ती है। कुलुकों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे सिर्फ 'किसान' शब्द के नाम पर नेतृत्व करते हैं। जनान्दोलनों में इनकी भूमिका नगण्य होती है और ये सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी होने के साथ ही साथ बर्बर और तानाशाही व्यवहार के ही होते हैं, जहां कई जगहों पर खेत मज़दूर की घरेलू अस्मिता तक को नष्ट कर दिया जाता है। मज़दूर ही है अन्नदाता.... मज़दूर ही है निर्माता.....
विदर्भ की इस भक लेणी धरती के खेतों पर मौत का साया है जो कई दशकों से जारी है। एक के बाद एक आने वाली हर सरकार ने -चाहे केंद्र की हो या राज्यों की-कृषि क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के बड़े वायदे किए, पर किसान आत्महत्या के आंकड़ों में बदलाव उस क्षेत्र की मुश्किलों और उद्देश्यों के अंतर्गत की गई उपेक्षा को दर्शाता है।
मेंहनतकश तबके बाबत मुझे सरकारी और गैर सरकारी (एनजीओ) रिपोर्ट कभी भी विश्वसनीय नही लगती कारण फील्ड का अनुभव है। सीमांत छोटे किसानों (अर्ध सर्वहारा, दिहाड़ी भी करते हैं।) और कृषि मजदूरों की आत्महत्या के आंकड़े यहां भयावह है। इनकी रिपोर्ट की माने तो भी किसानों की आत्महत्या में लगभग 42 प्रतिशत की भयानक बढ़ोतरी हुई है तो कुल मज़दूर अपघात समेत 38 % का आंकड़ा जाता है, जबकि मेहनतकश सीमांत किसान (कम जमीन वाला) जिसे घर चलाने के लिए खेती के साथ-साथ दिहाड़ी जैसे दूसरे छोटे- मोटे काम करने पड़ते हैं, होते हैं, या खेत मज़दूर (चौथिया, पांचिया जो फसल के चौथे या पांचवे हिस्से के लिए कुलुक के यहां मज़दूरी करते हैं, खेत के साथ साथ उनके डांगर पशुओं के लिए हरा चारा भी लाते और कुत्तर करते हैं, पशुओं को दुहते भी हैं) अकाल, अतिवृष्टि या सत्ता की नीतियों की मार सबसे ज्यादा इन्हें ही झेलनी पड़ती है। कुलुक इन सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी होने के साथ ही साथ बर्बर और तानाशाही व्यवहार के ही होते हैं। विदर्भ में श्रम विभाजन उपरांत वर्गीय कठोर और खुरदरा स्वभाव है जो खतरनाक है।
‘एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड' में प्रकाशित एनसीआ
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आप सभी साथियों ने कुछ ही दिन पहले भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा और विचलनकारी श्रमिक पलायन सड़कों पर देखा ही है। मानव इतिहास का यह बहुत गहरा मुद्दा है जिसको हम भारतीय पूंजीवादी स्टेट के आर्थिक किंसियन मॉडल को ध्वसत किए बिना कुछ भी संभव नही है। और महान बदलाव, क्रांति बिना इसको ध्वस्त करना एकदम नामुमकिन है- भले उम्र भर कोई जिंदाबाद मुर्दाबाद करता रहे... कींस के ट्रिकल डाउन या कहें रिस रहे लाभांश जो बहुत गहरी असमानता की कारक है, जिसकी वजह से ये पलायन कर रहे मजदूर (हकीकतन सीमांत या छोटे किसान जो इस मॉडल के चलते मजदूर बन गए) या कहें अमीर ज्यादा अमीर और गरीब ज्यादा गरीब। इलाज इस व्यवस्था का होना चाहिए क्योंकि स्थाई समाधान के बिना संभव नही है मानव मुक्ति। अन्नदाता किसान..... यह शब्द बहुत भ्रामक है। तीन बीघा या पांच बीघा वाला भी खुद को किसान कहता है और दो सौ बीघा जमीन वाला कुलुक भी खुद को किसान कहता है... जबकि हकीकत यह है कि असल मेहनतकश सीमांत किसान (कम जमीन वाला) जिसे घर चलाने के लिए खेती के साथ-साथ दिहाड़ी जैसे दूसरे छोटे- मोटे काम करने पड़ते हैं, होते हैं, या खेत मज़दूर (चौथिया, पांचिया जो फसल के चौथे या पांचवे हिस्से के लिए कुलुक के यहां मज़दूरी करते हैं, खेत के साथ साथ उनके डांगर पशुओं के लिए हरा चारा भी लाते और कुत्तर करते हैं, पशुओं को दुहते भी हैं) अकाल, अतिवृष्टि या सत्ता की नीतियों की मार सबसे ज्यादा इन्हें ही झेलनी पड़ती है। कुलुकों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे सिर्फ 'किसान' शब्द के नाम पर नेतृत्व करते आए अमानवीय बर्बर कुलुक जमात के हैं। जनान्दोलनों में इनकी भूमिका नगण्य होती है और ये सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी होने के साथ ही साथ बर्बर और तानाशाही व्यवहार के ही होते हैं, जहां कई जगहों पर खेत मज़दूर की घरेलू शांति तक को नष्ट कर दिया जाता
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महान कम्युनिष्ट किसान उभार तेलंगाना, तेभागा - और तेजा सिंह स्वतंत्र, लाल कम्युनिष्ट पार्टी और पंजाब का पेपसू मुजारा किसान आंदोलन और समकाल जन उभार पर संक्षिप्त विचार।
अक्सर हम लोग पहले के राजनीतिकी कार्यकर्ताओं और नेतृत्व की गलत राजनीतिक समझ और सैद्धांतिकी को उसी गलत और विकृत अर्थों में समझने लगते हैं। उन्ही धरणाओं और बीमारू स्थापनाओं के साथ, जिसके चलते अतीत में अयंग्यार, पूर्वी तट खेत मज़दूर, तेलंगाना, तेभागा, नक्सलबाड़ी.... फिर से एक बार तेलंगाना (1987-88ई.) आंदोलन और उनकी गलत मान्यताओं और धारणाओं के प्रयोग (हास्यास्पद शब्द लगता है जब हम विचलनों को पकड़ नही पाते।) में जाने कितने कम्युनिष्ट युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी है। यहां अक्सर यह मान लिया जाता है कि भारतीय समाज में समय-समय पर होने वाली युग पलटाव की उथल-पुथल में किसानों की बहुत विशेष और गहरी, सैद्धान्तिक रेडिकल भूमिका रही है, उनका मानना है ही यही वो महान लाइन है जिसमे अगर मज़दूर भी एकजुट होकर शामिल हो तो यह अद्वितीय मुक्ति युग का आगमन होगा। यह निरी बकवास है :- ऐसा नहीं है क्योंकि भारत के लोक युद्धों या कहें मुक्ति संघर्षों में जिस वर्ग ने सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी रुख किया है वो है कुलुक किसान नरोदीज़्म मतलब धनी किसान और कुछ हद तक मध्यम किसानी वर्ग… जनांदोलनों का सबसे बड़ा भीतरघाती रहा है यह तबका जिसको हम क्रांतिकारी किसान उभार कहते हैं वो दरअसल खेत मज़दूर जो सबसे ज्यादा शोषित है--- की बात की जाती है, जिसने महान मुक्ति समर में आधार स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, और मुख्य हथियार भी बने इनमें आदिवासियों, जनजातियों और अर्द्धसर्वहाराओं का अहम योगदान रहा है।
जब सब कुछ सोच के बिल्कुल उलट हुआ और भारतीय मेहनतकश आवाम को विदेशी पूंजीवादी साम्राज्यवादी शोषकों से स्वतंत्रता की उम्मीद जो एक सामाजिक जनवादी (सोशल डेमोक्रेटिक उथल पुथल) रूप में आने की थी और वो कभी आई ही नही- बल्कि उसका स्वरूप पड़े पूंजीवादी धड़ों ने लोकल नवजात भारतीय पूंजीवाद को सत्ता का हस्तांतरण कर दिया था। इससे बहुत कुछ प्रभावित होकर संक्रमित हो गया था। खतरनाक था यह सब कुछ। और इसी सिस्टम से पहले जो भूमिका बनी वह इसी की हामी होने वाली थी जिसकी झलक महात्मा गांधी के नेतृत्व में किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए वे किस प्रभाव के कारण अनुर्वर रहे जो बहुत बाद में जाकर कुछ वैचारिक ठोस आधार तलाश पाए थे। आप थोड़ा और पीछे जाएं और देखें कि देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, जो 1915 में शुरू हुआ, व्यापक जन विद्रोह होने लगा था, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में जो आंदोलन हुए थे, इन आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया।
मोपला विद्रोह : केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपला किसानों द्वारा सन् 1920 में विद्रोह किया गया। प्रारम्भ में यह विद्रोह अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ था। सन् 1920 में इस आन्दोलन ने हिन्दू-मुस्लिमों के मध्य साम्प्रदायिक आन्दोलन का रूप ले लिया और शीघ्र ही इस आन्दोलन को कुचल दिया गया। कूकाओं का आंदोलन भी कृषि संबंधी समस्याओं के खिलाफ अंग्रेज़ सरकार से लड़ने के लिए बनाए गए इस संगठन के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। सन् 1872 में इनके शिष्य बाबा रामसिंह ने अंग्रेजों का कड़ाई से सामना किया। कालान्तर में उन्हें कैद कर रंगून (अब यांगून) भेज दिया गया, जहां पर सन् 1885 में उनकी मृत्यु हो गई। बंगाल का तेभागा आन्दोलन सर्वाधिक सशक्त आन्दोलन था, 'तेभागा आंदोलन' फसल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीड़ित बटाईदार किसानों को दिलाने के लिए किया गया था। यह बंगाल के 28 में से 15 जिलों में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। 'किसान सभा' के आह्वान पर लड़े गए इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मजदूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। किसान आन्दोलनों का चरित्र पूर्व के आन्दोलन से अलग था। अब किसान बगैर किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे। इनकी अधिकांश मांगें आर्थिक होती थीं। सैद्धान्तिक अप्रोच के अभाव में ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया और ना ही इसमे मेहनतकशों का आधार था, कुलुक किसानों की लड़ाई के पीछे उद्देश्य अस्पष्ट भी था, लेकिन इन आन्दोलनों की असफलता के पीछे किसी ठोस विचार का ना होना ही था। इनसे किसी भांत का ठोस फायदा नही हुआ, नुकसान अलबत्ता हुआ और इस नुकसान और समय और स्थितियों का द्वंद्ववादी मूल्यांकन करें तो इससे तात्कालिक क्षद्म सफलता या लाभ तो नही मिला मगर इसके दूरगामी प्रभाव पेप्सू और तेभागा, तेलंगाना की नींव तैयार कर चुके थे।
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बुर्जुआ शोषकों और उनकी राज सत्ता के अपने आदर्श और हिटलर, मुसोलिनी और सीआईए जैसे बर्बर अपने निजी पुरोधा होते हैं, उनके इन निजी पुरोधाओं के जुल्म उन आतताइयों के आदर्श होते हैं..... जबकि हमारे हम मेहनतकशों और हमारे मुक्तिकामी कतारों के अपने अलग, अतिमानवीय साहस के हरावल और हमारे लिए सुंदर और न्याययुक्त समाज और दुनिया बनाने के सपने देखने और उन्हें पूरा करने की चाह में शहीद हो गए या जो भिड़े हुए हैं अन्याय और जुल्म से, हमारे हैं वे पुरोधा... मुक्तिकामी....... पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश की धरती क्रांतिचेताओं के लिए उर्वर भूमि है। किसानी समाज, कुलुक सामंती किसानी परिवेश हमेशा से मानवद्रोही स्वभाव का रहा है। हम शब्दों का भीतरी अर्थ जाने बिना अक्सर ही इन महान या कहें मानव जीवन की गरिमा स्थापित करने वाले इन शब्दो का हमेशा ही उल्टा या गलत प्रयोग करते हैं। जब भी आंदोलन या महान उभर की बात आती है तो वे मजदूर होते हैं, किसान नहीं, खेतिहर मजदूर, सीमांत किसान और भूमिहीन, अन्नदाता हमेशा मज़दूर ही रह है। ख़ैर, इंकलाबियों की इस परम्परा से पँजाब कैसे अछूता रह सकता था- और बहुत तैयारी के साथ पंजाब भी शामिल है इस धरती जिसका क्लासिकल नाम शायद कभी मुक्ति रहा हो, या किसी ने साफ दिल से मजाक किया हो कि यह धरती शहीदों की है। आंध्रप्रदेश या कहें तेलंगाना की धरती पर जब भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में भारतीय इतिहास का पहला सबसे बड़ा लोकयुद्ध चल रहा था तब उसी समय मे पंजाब में मुजारा आन्दोलन के गरिमामय गीत गाए जा रहे थे । यही नहीं बल्कि उस महान विद्रोह के बारे में या तो लोग बिल्कुल ही नही जानते हैं या जनता को खबर ही नही रही होगी। एक बात जो खासकर महत्वपूर्ण तथ्यों में रखने वाली है वो यह कि पंजाब का यह मुजारा आंदोलन, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष के समय ही उभरा था।
दरअसल तत्कालीन और पहले के तमाम लाल उभारो में से तेलंगाना किसान संघर्ष का वैचारिक आधार अद्भुत था। वे अपने से पहले और समकालीन और आगे निकट भविष्य और समकाल के तमाम महान आंदोलनों में से ज्यादा प्रतिबद्धता के साथ वैचारिक रूप से समृद्ध और ठोस था जो तेभागा और पंजाब के लाल कम्युनिष्ट पार्टी और नेतृत्व तेजा सिंह स्वतंत्र से ज्यादा विस्तृत और महान फैलाव लिए हुए था। जुलाई 1946 से अक्टूबर 1951 के बीच तेलंगाना में आधुनिक भारतीय इतिहास का यह सबसे बड़ा गुरिल्ला छापामार संघर्ष हुआ। अपने चरम पर, इस सशस्त्र किसान संघर्ष ने कुल 3,000 गाँवों के 16,000 वर्गमील क्षेत्र को मुक्त करा लिया था जिसकी आबादी करीब 30 लाख थी। लगभग डेढ़ वर्षों तक इस क्षेत्र की सारी शासन व्यवस्था किसानों की गाँव कमेटियों के हाथों में थी। हैदराबाद निजाम की बर्बर रियासत के अन्तर्गत तेलंगाना के मेहनतकश और अछूत समझे जाने वाले समुदायों के युवाओं ने जो कुलुकों और जागीरदारों के बर्बर शोषण-उत्पीड़न के शिकार थे, ने सफाया शुरू कर दिया। जुलाई 1947 से 1949 ई. के बीच का समय संघर्ष के चरमोत्कर्ष का काल था। यह प्रतिबद्धता के साथ वैचारिक रूप से समृद्ध और ठोस था जो तेभागा और पंजाब के लाल कम्युनिष्ट पार्टी और नेतृत्व तेजा सिंह स्वतंत्र से ज्यादा विस्तृत और महान फैलाव लिए हुए था। जिसको जनता ने मुक्ति का दल कहते हुए अपने आप का आधार बना लिया था।
यह विद्रोह की शुरुआत 1946 में विशनूर नामक जगह से हुई जो जल्दी ही पूरे तेलंगाना में फैल गयी। 1947 के प्रारम्भ से नियमित सशस्त्र छापामार दस्ते बनाये जाने लगे। अपने चरम काल में इसमें 10,000 ग्राम रक्षा स्वयंसेवक और नियमित दस्तों के 2000 सदस्य थे। अगस्त 1947 से सितम्बर 1948 के बीच का समय संघर्ष के चरमोत्कर्ष का काल था। छापामारों के नियन्त्रण के क्षेत्रों में इस दौरान भूमि पुनर्वितरण के अतिरिक्त सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कोशिशें हुईं। लेकिन इस संघर्ष को आगे ले जाने और देशव्यापी राष्ट्रीय जनवादी मुक्ति संघर्ष की कड़ी बनाने के बारे में कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व की कोई सुचिन्तित-सुसंगत नीति थी ही नहीं। फरवरी-मार्च 1948 की दूसरी पार्टी कांग्रेस में दक्षिणपन्थी पी.सी. जोशी की जगह बी.टी. रणदिवे पार्टी महासचिव बने, जिन्होंने किसान छापामार युध्दों के क्षेत्रों के निर्माण एवं फैलाव तथा उन्हें शहरी जनउभारों से जोड़ने की सुसंगत नीति के बजाय, जनवादी और समाजवादी क्रान्ति की मंजिलों को मिला देने की थीसिस दी तथा देश-भर में सशस्त्र आम विद्रोह का आह्नान किया। इस विनाशकारी ''वाम''-चरमपन्थी लाइन ने पूरे कम्युनिस्ट आन्दोलन और तेलंगाना किसान संघर्ष को भारी नुकसान पहुँचाया। यह अतिवामपन्थी लाइन वस्तुत: दक्षिणपन्थी भटकाव के लम्बे दौर की एक अतिरेकी प्रतिक्रिया थी। मई 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी की आन्ध्र इकाई ने रणदिवे की लाइन का विरोध करते हुए चीनी क्रान्ति की आम दिशा के अनुरूप गाँवों में छापामार संघर्ष के जरिये अलग-अलग क्षेत्रों में आधारक्षेत्रों के विकास की लाइन रखी। पर रणदिवे गुट के रहते इस लाइन पर अमल सम्भव नहीं था। तेलंगाना में आन्ध्र कमेटी की लाइन पर काम शुरू हुआ, किन्तु सितम्बर 1948 में भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया। निजाम के आत्मसमर्पण के बाद, 50-60 हजार की संख्या और उन्नत हथियारों वाली भारतीय सेना ने कम्युनिस्ट छापामारों के विरुध्द युध्द छेड़ दिया। गाँवों में बर्बर अमानुषिक दमन का ताण्डव हुआ और अन्तत: छापामार दूरवर्ती जंगलों में बिखर गये। चूँकि ऐसे छापामार संघर्षों के कई इलाके विकसित करने की कोई केन्द्रीय पार्टी नीति नहीं थी और आन्ध्र कमेटी के अलग-थलग पड़ जाने के कारण पीछे हटने, बिखर जाने और छापामार संघर्ष के नये दौर की तैयारी की कोई केन्द्रीय योजना नहीं थी, अत: तेलंगाना संघर्ष को अन्तत: त्रासद पराजय और ख़ून के दलदल में धकेल दिया गया था। अपनी ही जनता का बर्बर सैनिक दमन करके नेहरू की सरकार ने अपना वर्ग-चरित्र उघाड़कर रख दिया। पीछे हटने व बिखरने के बावजूद 1950-51 तक छापामार कार्रवाइयाँ जारी रहीं। छापामारों का अन्तिम मोर्चा गोदावरी का वन्य प्रदेश था। मई-जून 1950 में रणदिवे की लाइन की पराजय के बाद कुछ समय के लिए राजेश्वर राव पार्टी महासचिव बने और पार्टी ने आन्ध्र लाइन को आधिकारिक लाइन के तौर पर स्वीकार किया। तब तक देर हो चुकी थी- लेकिन एक उम्मीद इसलिए भी कायम रही क्योंकि समकाल में उत्तर में पेपसू मुजारा किसान आंदोलन अभी जमा हुआ था तो पूर्व में तेभागा ध्वस्त नही हुआ था।
इसके अलावा उत्तर भारत मे चल रहे पैपसू pepsu मतलब पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट यूनियन.....ब्रिटेन के अधीन रियासतकालीन जनपद था। यही पेपसू जो 1948 से सन 1956(57 अंतिम महीने में) तक भारत का एक प्रान्त था- आंदोलन। जिसमे उस समय पटियाला, जींद, नाभा, फरीदकोट, मलेरकोटला, कपूरथला (धौलपुर नरेश उदयभान सिंह का रक्त संबंधी, चाचा था।) के अंन्तर्गत कमिशनरेी या रियासत थी। शिमला भी इसी के अंतर्गत था। और उधर पंजाब में तेजा सिंह और बाबा बूझा सिंह मुझे भारतीय इतिहास के सबसे महान किरदारों में सबसे ऊपर लगते हैं। क्या जुनून था और क्या तो प्रतिबद्धता और दीवानगी थी इंकलाब की। पहले गदर आंदोलन फिर मुजारा किसान कम्युनिष्ट आंदोलन और फिर नक्सलवाड़ी आंदोलन, लगातार अनुभव और विचार की आग में पक और संवर रहे सोने की तरह ही थे हमारे पुरखे। वे पुरखे जिन्होंने हक हुक़ूक़ की लड़ाई लड़ी कभी अंग्रेजों से तो कभी लोकल धन पशुओं से तो कभी धार्मिक आतंकवाद से, लोहा लेते हुए जीवन को स्थापित भी कर रहे थे।
मुजारा आंदोलन आम नही था क्षेत्र भले कम था लेकिन क्रांतिकारी स्प्रिट और प्रतिबद्धता और कतारें, इंकलाब को गाते हुए बढ़ी थी आगे.... आगे... और आगे .... और आगे, वे जो अद्मय यौद्धा थे। हमेशा जुल्म और जबर के विरुद्ध खम ठोककर खड़े होते थे।
आज भी मालवा अंचल के मानसा के पास किशनगढ़ गांव में इस महान क्रांतिकारी आन्दोलन की यादों को जिंदा रखने वाले भावुक क्रांतिकारी और एक स्मारक है। तेलंगाना आन्दोलन के समय उसी तरह का आन्दोलन पंजाब की धरती पर मुजारों (सीमांत, खेतिहर मजदूर और गरीब व भूमिहीन किसान) की संगठित ताकत के बल पर चल रहा था। और यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक महान कम्युनिष्ट किसान क्रांतिकारी प्रचण्ड रूप आक्रोश में बढ़े। वे जो मुल्क को गुलाम रखने वाले ब्रिटिश एंपायर तो 1947ई के बाद लोकल पूंजीवादी साम्राज्यवादी जमात के विरुद्ध पाणा मांड कर खड़े हो गए थे।
मुजारा शब्द का ध्वन्यार्थ मेहनतकशों का है। खास बात यह है कि यह आंदोलन जो पंजाब का मुजारा आन्दोलन कहलाता है तत्कालीन पटियाला राज के अन्दर अंग्रेजों से देश की आजादी और बड़े जागीरदारों के खिलाफ उन सीमांत, भूमि हीन किसानों, जो खेत मज़दूर बने अपने शोषण को लाचारी से देखते हुए पल पल भर रहे थे। सीमांत और गरीब मेहनतकशों की बेटियों, बीबियों तक का बलात्कार जैसे शगल बन गया हो- प्रतिरोधक आक्रोश के चलते वे गरीब व भूमिहीन किसानों का संगठित आन्दोलन था जो जमीनों पर काश्त करते थे और नारा था 'जमीन जोतने वाले कि'..... क्रांतिचेताओं के शहादत को हमेशा याद में और ताजा रखने के प्रयासों में उन गांवों की छतों पर अक्सर लाल थंभी के ऊपर कम्युनिष्ट कामगारों- मुजारों के प्रिय लाल झंडे को बनाया गया है.... जिस पर कम्युनिस्टों का निशान हंसिया हथौड़ा बना है।
किशनगढ़ मुजारा इंकलाबी कम्युनिष्ट आन्दोलन का सबसे बड़ा गढ़ था। पटियाला महाराजा के लिए यह नाकाबिले बर्दाश्त मामला था जिसके चलते हमला भी किया गया था-- और इस लड़ाई में इस गांव के किसान योद्धा कुंडा सिंह और राम सिंह शहीद हुए थे।. पूरे मालवा क्षेत्र में मुजारा आन्दोलन में संघर्षरत किसानों की हिफाजत के लिए लगभग हजार से ज्यादा किसान गुरिल्ले विभिन्न जत्थों में संगठित किए गए थे। यह इंकलाबी जत्थे हथियारों के सदुपयोग के कारण चर्चा में रहते थे। वाकई में मानव इतिहास में कुछ पल और साहस भरा अतिमानवीय हौसलों का काम भुला दिया जाता है। पंजाब के महान मार्क्सवादी मुजारा आन्दोलन को देश के क्रांतिकारी किसान आंदोलनों की सूची में चलो ना भी मिला हो स्थान मगर युवाओं को और संगठनों की भी जिम्मेदारी ले ही लेनी चाहिए थी। वह स्थान अब भी नहीं मिला है जिसका वह हकदार था।
इस महान कम्युनिष्ट स्वतःस्फूर्त दावानल या कहें मार्क्सवादी किसान (सिर्फ मजदूर) मुजारा आन्दोलन की जड़ें ज्यादा पुरानी नही है। उन्नीसवीं सदी के शुरुआत में यहां के आसपास लोग बाहर देशों में रोजगार के लिए बाहर के देशों में जाने लगे थे। पर इन मेहनती और स्वाभिमानी लोगों को वहां दोहरी गुलामी का घूंट पीना पड़ता। गुलाम देश के नागरिक के तौर पर लगातार अपमान सहन होता था। इस कारण उनके अन्दर देश की आजादी की भावना ज्यादा हिलोरें मारने लगी. 1913 में अमेरिका और कनाडा में रहने वाले भारतीयों जिनमें ज्यादातर सिख थे ने ‘हिन्दी एशोसियेशन पेसिफिक पोस्ट’ नाम का संगठन बनाया. इस संगठन ने 1857 के गदर से प्रेरणा लेकर देश में आजादी के लिए काम करने के लिए गदर नाम से पार्टी और फिर आगे योजना बनाई। यह सब बाबा बूझासिंह की चेतना के लिए खाद और पौष्टिक तत्वों का काम कर रहे थे।
क्रांतिकारी सोहन सिंह भखना इसके संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए। लाला हरदयाल को इस संगठन के बौद्धिक पक्ष को देखते और लिखते और सुधारते थे।पार्टी के अखबार के संपादन का जिम्मा उन्ही का था।।. इसी अखबार के नाम से बाद में इस संगठन को गदर पार्टी के नाम से जाना जाने लगा। देश में क्रांति संगठित करने लिए इस संगठन ने 1914 में 800 गदरी भारत भेजे. इनमें से ज्यादातर को गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में कई को फांसी की सजा दी गयी। इन क्रांतिकारियों जिन्हें अब हम गदरी बाबा के नाम से संबोधित करते हैं की वीरगाथाएं सभी क्रांतिकारियों के लिए आज भी प्रेरणा की स्रोत हैं। आज भी देशभक्त यादगारी हैै।
1941 42 में गदर पार्टी का भारतीय विप्लव या कहें कम्युनिस्ट पार्टी में विलय हो गया और ये वही समय था जब एक तरफ तेलंगाना तो दूसरी तरफ पंजाब में मुजारा उभरा हुआ था। मगर सन 1946 में स्टेट सिद्धांतों के मुद्दे पर मतभेद होने से दो राष्ट्र के सवाल पर जो हकीकत में दक्षिणी धड़ो की राजनीति का हिस्सा होता है. बुझा सिंह की पार्टी समझ उस समय परवान चढ़ने लगी थी... पर मतभेद के कारण इसका बड़ा हिस्सा अलग हो गया। इन्होंने अलग पार्टी बनाई।
इन्होंने जिस पार्टी का गठन किया वो इतिहास में लाल पार्टी के नाम से जानी जाती है। जिसका गठन कामरेड तेजा सिंह ने किया और वे इसके सर्वोच्च नेता भी थे। बाबा बूझा सिंह और तेजासिंह ही वे व्यक्ति है जिन्होंने पंजाब में कम्युनिष्ट क्रांतिकारी मूवमेंट के बीज डाले थे।
पुनप्रा और वायलार उत्तरी-पश्चिमी त्रावणकोर के वे इलाके जहां किसान आंदोलन को वैचारिक स्तर पर बहुत ठोस समर्थन मिला, प्रतिबद्ध युवा और खेत मज़दूर जो आज भी अपनी गाथाओं के चलते याद किए जाते हैं। इस क्षेत्र में मार्क्सवादी इंकलाबी युवा कतारों ने पार्टी स्कूलों के माध्यम से एक बहुत प्रभावशाली सर्किल बना लिया जिसकी महता सन 1946 में किए जाने वाले- स्थानीय प्रदर्शन के दौरान साबित हुई जिसमें उम्मीद से ज्यादा लोगो ने हिस्सा लिया था। तरुण कम्युनिस्टों ने मछुआरों, पशु पालकों, नारियल के खेतों वाले कामगारों, मछुआरों और खेतिहर मजदूरों में सशक्त आधार बना लिया था। जो कामगार और कामगार किसान (खेत मज़दूर, भूमिहीन और सीमांत) संयुक्त गठन के बाद मोर्चा बना लिया- यह कुलुकों से साफ स्पष्ट दूरी सिद्ध हर जो बाद में संघर्षो में वर्ग विभाजन, श्रम आदि विभेद उपरांत स्पष्ट रूप से कुलुक किसानों (बड़े किसान) और खेत मज़दूर, युवा एकजुटता का शानदार उदाहरण तैयार हुआ लेकिन वर्ग विभाजन का यह महान सांकेतिक कार्य जिसको बाद में वैचारिक विचलन, अमानुषिक सेंधमारी के परिणामस्वरूप मध्यम मार्गी धड़ों, जिन्हें आप लोग लिबर्ल्स कहते हैं के कपटपूर्ण गतिविधियों अजीब एक लाइन खड़ी कर दी जिसके खामियाजे रूप में हम स्पष्ट रूप कुलुक बुर्जुआ किसानी अराजक सामाजिक गुंडावाहिनियों से निजात पाने के लिए आलोचनात्मक रूप से प्रयास किए तो भी बहुत से प्रदूषण साथ ही रहा। त्रावणकोर रियासत का दीवान रामास्वामी जो खुद धनी कुलुक था- जो स्थानीय कांग्रेसी नेतृत्व के साथ था :- और वे कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले मजदूर-किसान आन्दोलन का धुर विरोधी था ।
कम्युनिस्ट नेतृत्व ने प्रचण्ड जनान्दोलन छेड़ दिया। रियासत की सरकार ने बर्बर दमन-चक्र चलाया। आत्मरक्षा की दृष्टि से सताये गये कामगारों के शिविरों में कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं ने जमकर हथियार चलाने सीखे और गुरिल्ला ट्रेनिंग ली- और नवंबर के पहले हफ्ते में ही अलेप्पी के क्षेत्र में मजदूर हड़ताल की शुरुआत हुई। दो दिन बाद पुनप्रा गाँव के पुलिस कैम्प पर किसान-मजदूर स्वयंसेवक दस्तों ने हमला करके हथियार छीन लिये। 25 अक्टूबर को मार्शल ला लागू होने के बाद गुरिल्लाओं की कतारों पर सरकारी धड़ों ने हमला बोला। और वहीं के छोटे ख़ूनी गदर में करीब 800 लोग मारे गये। लोग फिर भी लड़ने को तैयार थे, पर कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व के पास कोई सटीक लाइन थी ही नहीं। बर्बर सैन्य दमन ने इस आन्दोलन को कुचल दिया, जिसका नतीजा आंशिक बिखराव में निकला।
लेकिन जब गरीब मज़दूरों का आक्रोश असहमति के दवानल के साथ फूटा तो जन जन की आवाज, आक्रोश और जीवन की गरिमा को बनाए रखने के महान संकल्प के साथ ही इस सशस्त्र किसान संघर्ष ने भारतीय नवजात पूंजीवादी सत्ता से कुल 16,000 वर्गमील क्षेत्र को मुक्त करा लिया था जिसकी आबादी करीब 30 लाख थी। लगभग दो - ढाई सालों तक इस क्षेत्र की सारी शासन व्यवस्था कामगारों की गाँव कमेटियों के हाथों में थी। हैदराबाद के आसफजाही निजामों के सामन्ती शासन के विरुद्ध तेलंगाना के कम्युनिस्टों ने युध्द के दौरान ही राशन की कमी और दुर्व्यवहार और अराजक दुर्व्यवस्था को ग़रीबों में असन्तोष का व्यापक आधार बना लिया था। विद्रोह की शुरुआत सन 1946 में विशनूर के शोषक कुलुक के ख़िलाफ हुई जो जल्दी ही पूरे तेलंगाना में फैल गयी। 1947 के प्रारम्भ से नियमित सशस्त्र छापामार दस्ते बनाये जाने लगे। अपने चरम काल में इसमें 10,000 ग्राम रक्षा कॉमरेड्स और नियमित दस्तों के 2000 कॉमरेड्स सदस्य थे। अगस्त 1947 से सितम्बर 1948 के बीच का समय संघर्ष के लिए महान उभार का काल था। छापामारों के नियन्त्रण के क्षेत्रों में इस दौरान भूमि कानून सुधार के अतिरिक्त, कामगारों समेत सामाजिक- सांस्कृतिक बदलाव की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कोशिशें हुईं। फरवरी-मार्च 1948 की दूसरी पार्टी कांग्रेस में दक्षिणपन्थी पी.सी. जोशी की जगह बी.टी. रणदिवे जब कम्युनिष्ट पार्टी महासचिव बना जिसने किसान छापामार युध्दों के क्षेत्रों के प्रचंड फैलाव, उभार और दुःसाहस की नीति पकड़ी और शहरी विद्यार्थी वर्ग तक फैलाव भी किया। इस विनाशकारी ''वाम''-चरमपन्थी लाइन ने पूरे कम्युनिस्ट आन्दोलन और तेलंगाना किसान संघर्ष को भारी नुकसान पहुँचाया। यह अतिवामपन्थी लाइन वस्तुत: दक्षिणपन्थी भटकाव के लम्बे दौर की एक फिजूल प्रतिक्रिया थी।
सन 1949 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की आन्ध्र इकाई ने रणदिवे की पॉलिटिकल लाइन का विरोध किया और चेताया कि वह चीनी क्रान्ति की आम दिशा के अनुरूप गाँवों में छापामार संघर्ष के जरिये काम शुरू करे और अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी लाइन सुस्पष्ट करे पर यह रणदिवे ने असफल कर दिया। और जब जल्द ही नवजात भारतीय पूंजीवादी सत्ता ने घातक हथियारों वाली अपनी सेना भेजकर कत्लेआम करवाया तब एक छोटा प्रतिरोध जरूर कम्युनिस्ट छापामारों ने किया मगर सत्ता के खूनी मनसूबे सामने आ चुके थे। और आम आदमी के विरुध्द नेहरू सत्ता ने। अपने देश के भूखे कामगारों पर ही बर्बर सैनिक दमन करके नेहरू और नवजात पूंजीवादी सत्ता की सरकार ने अपना वर्ग-चरित्र उघाड़कर रख दिया। पीछे हटने व बिखरने के बावजूद 1950-51 तक छापामार कार्रवाइयाँ जारी रहीं। जंगलीन और गाँवों में बर्बर अमानुषिक दमन का ताण्डव हुआ और अन्तत: छापामार दूरवर्ती जंगलों में बिखर गये। ऐसे छापामार संघर्षों के कई इलाके विकसित करने और पसराव करते हुए उसको स्थापित करने की कोई नीति उस समय पार्टी के पास नहीं थी और आन्ध्र कमेटी के अलग-थलग पड़ जाने के कारण दमन होते जाने और छापामार संघर्ष के नये दौर की तैयारी की कमी के चलते तेलंगाना संघर्ष - जो एक महान उभार था को लाशों से पाटकर त्रासद पराजय और ख़ून के दलदल में धकेल दिया गया था।
इसका सार यही है कि यह एक महान उभार जिसने उम्मीदें जगाई, वो अपने नेतृत्व की अदूरदर्शिता, अपरिपक्व राजनीतिक समझ, कपट और उस समय की कांग्रेसी कुलीन सत्ता के तिलिस्मी असर में भी फसा रहा। और बहुसंख्य मेहनतकश या कहें तमाम जन को अंधेरे में रखकर और सामन्ती शासकों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर भावी भारत के ऐसे संविधान की तैयारी जो पूंजीवादी समकाल का आधार बना, गहरी चालाकी के साथ स्थापित हुई गुलामी का ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया। और अंत हुआ एक महान इंकलाबी दौर का।
क्रमशः.... आगे की किश्त का इंतज़ार कीजिए
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